उत्तर प्रदेश: पशुधन क्रांति का नया नेतृत्व – डेयरी विकास, पोल्ट्री विस्तार और वन हेल्थ नवाचारों की नई उड़ान
लेखक: डॉ. जितेंद्र सिंह
प्रेसिडेंट, Veterinary Association of India
Chief Veterinary Officer, जनपद चित्रकूट, उत्तर प्रदेश
| परंपरा अनुसंधान को दिशा दे सकती है, लेकिन उपचार की विश्वसनीयता का आधार वैज्ञानिक प्रमाण, सुरक्षा और पशु कल्याण ही होना चाहिए। |
प्रस्तावना: परंपरा, विज्ञान और सुशासन का संगम
भारत का ग्रामीण जीवन पशुधन के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। गाय, भैंस, बकरी, भेड़ और मुर्गी पालन केवल आजीविका के साधन नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पोषण सुरक्षा, महिला सशक्तीकरण और कृषि-आधारित रोजगार के महत्वपूर्ण आधार हैं। सदियों से भारतीय पशुपालक अपने अनुभवों के आधार पर स्थानीय औषधीय पौधों, जड़ी-बूटियों और घरेलू उपायों का उपयोग करते आए हैं। इस अनुभव-आधारित ज्ञान को एथनोवेटरिनरी मेडिसिन (Ethnoveterinary Medicine) कहा जाता है।
आज आवश्यकता आधुनिक पशु चिकित्सा विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करने की नहीं, बल्कि उनके बीच वैज्ञानिक संवाद स्थापित करने की है। जो पारंपरिक उपचार प्रभावी और सुरक्षित सिद्ध हों, उन्हें उचित मानकों के साथ पूरक विकल्प के रूप में विकसित किया जा सकता है। जो दावे प्रमाणित न हों, उन्हें उपचार के रूप में प्रचारित करने से बचना भी उतना ही आवश्यक है।
इस दिशा में उत्तर प्रदेश का अनुभव विशेष रूप से उल्लेखनीय है। विशाल पशुधन आधार, देश में सर्वाधिक दुग्ध उत्पादन, पशु स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और पोल्ट्री क्षेत्र को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों के कारण उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय पशुपालन परिदृश्य में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। राज्य सरकार और पशुपालन विभाग ने पशुधन को ग्रामीण विकास, पोषण और रोजगार की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए अनेक महत्वपूर्ण पहलें की हैं।
उत्तर प्रदेश: देश के दुग्ध उत्पादन का अग्रणी स्तंभ
भारत सरकार के Department of Animal Husbandry and Dairying की Basic Animal Husbandry Statistics 2025 के अनुसार, वर्ष 2024–25 में भारत का कुल दुग्ध उत्पादन 247.87 मिलियन टन रहा। इसमें उत्तर प्रदेश का योगदान 15.66 प्रतिशत रहा और राज्य देश में प्रथम स्थान पर बना हुआ है। इसी अवधि में उत्तर प्रदेश का अनुमानित दुग्ध उत्पादन लगभग 38.82 मिलियन टन रहा। यह उपलब्धि राज्य के विशाल पशुधन आधार, लाखों पशुपालक परिवारों के परिश्रम और पशुपालन तंत्र की निरंतर सक्रियता को दर्शाती है।
उत्तर प्रदेश की यह अग्रणी स्थिति केवल उत्पादन का आंकड़ा नहीं है; यह ग्रामीण परिवारों की आय, पोषण सुरक्षा, डेयरी उद्यमिता और कृषि-पशुपालन के परस्पर संबंधों का भी प्रमाण है। देश के कुल दूध उत्पादन में राज्य की इतनी बड़ी हिस्सेदारी उसे राष्ट्रीय डेयरी अर्थव्यवस्था का एक निर्णायक केंद्र बनाती है।
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नंद बाबा दुग्ध मिशन के अंतर्गत स्वदेशी नस्लों के संरक्षण, नस्ल सुधार और दुग्ध उत्पादन क्षमता बढ़ाने की दिशा में किए जा रहे प्रयास महत्वपूर्ण हैं। नंदिनी कृषक समृद्धि योजना, मिनी नंदिनी कृषक समृद्धि योजना तथा मुख्यमंत्री स्वदेशी गौ संवर्धन योजना जैसी पहलों के माध्यम से उन्नत पशुपालन इकाइयों और स्वदेशी गोवंश को प्रोत्साहन देने का प्रयास किया जा रहा है। इन योजनाओं का उद्देश्य केवल पशुओं की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण नस्ल, उत्पादकता और पशुपालक की आर्थिक क्षमता को मजबूत करना है।
राज्य सरकार का यह दृष्टिकोण सराहनीय है कि पशुपालन को परंपरागत गतिविधि से आगे बढ़ाकर संगठित, तकनीक-समर्थित और उद्यमशील क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाए। दुग्ध उत्पादन में उत्तर प्रदेश का राष्ट्रीय नेतृत्व इस नीति-दिशा को और अधिक महत्वपूर्ण बनाता है।
पोल्ट्री क्षेत्र: उत्तर प्रदेश में उभरता हुआ नया विकास केंद्र
दुग्ध उत्पादन के साथ-साथ उत्तर प्रदेश में पोल्ट्री क्षेत्र के विस्तार की भी उल्लेखनीय संभावनाएँ हैं। अंडा और चिकन उत्पादन ग्रामीण तथा अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रोजगार, उद्यमिता और किफायती प्रोटीन उपलब्ध कराने के महत्वपूर्ण साधन हैं। राज्य सरकार की Uttar Pradesh Poultry Development Policy–2022 इस क्षेत्र को संगठित निवेश और उद्यमिता के माध्यम से गति देने का प्रयास है।
इस नीति के अंतर्गत कमर्शियल लेयर फार्म तथा ब्रॉयलर पैरेंट फार्म की स्थापना को प्रोत्साहित करने के लिए पात्र परियोजनाओं पर पांच वर्षों तक बैंक ऋण के ब्याज पर 7 प्रतिशत प्रतिपूर्ति, निर्धारित शर्तों के अनुसार बिजली शुल्क में दस वर्षों तक 100 प्रतिशत छूट और भूमि खरीद अथवा लीज पर स्टाम्प ड्यूटी में छूट जैसे प्रोत्साहन दिए गए हैं। नीति में प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण, उद्यमिता विकास, तकनीकी प्रशिक्षण तथा परियोजना सुविधा एवं निगरानी व्यवस्था का भी प्रावधान है।
इन प्रोत्साहनों से राज्य में कमर्शियल लेयर, ब्रॉयलर, हैचरी, फीड, बायो-सिक्योरिटी, प्रसंस्करण, कोल्ड-चेन और विपणन से जुड़ी मूल्य-श्रृंखला के विस्तार की संभावना बनती है। उत्तर प्रदेश को पोल्ट्री हब के रूप में विकसित करने की दिशा में यह एक दूरदर्शी कदम है। हालांकि, इस क्षेत्र की वास्तविक प्रगति का आकलन उत्पादन, उत्पादकता, रोग नियंत्रण, बाजार-संपर्क और किसानों की आय जैसे संकेतकों से लगातार किया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024–25 में भारत का कुल अंडा उत्पादन 149.11 अरब रहा। इस अवधि में आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक प्रमुख योगदानकर्ता रहे। उत्तर प्रदेश के लिए विशेष रूप से उत्साहजनक तथ्य यह है कि 2023–24 में राज्य के अंडा उत्पादन में पिछले वर्ष की तुलना में 29.88 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई थी। यह वृद्धि राज्य में पोल्ट्री उद्यमिता और उत्पादन क्षमता के विस्तार की संभावना को रेखांकित करती है।
मांस उत्पादन के क्षेत्र में भी उत्तर प्रदेश की स्थिति उल्लेखनीय है। Basic Animal Husbandry Statistics 2025 के अनुसार, 2024–25 में राज्य का देश के कुल मांस उत्पादन में 12.20 प्रतिशत योगदान रहा और वह दूसरे स्थान पर रहा। इससे स्पष्ट है कि राज्य का पशुधन क्षेत्र डेयरी तक सीमित नहीं, बल्कि बहुआयामी आर्थिक गतिविधियों का आधार है।
उत्तर प्रदेश पशुपालन विभाग और राज्य सरकार: नेतृत्व, प्रतिबद्धता और सेवा का विस्तार
किसी भी राज्य की पशुधन अर्थव्यवस्था की मजबूती के पीछे नीतियों के साथ-साथ उनका प्रभावी क्रियान्वयन, फील्ड स्तर पर पशु चिकित्सा सेवाओं की उपलब्धता और पशुपालकों तक योजनाओं का लाभ पहुंचना निर्णायक होता है। इस दृष्टि से उत्तर प्रदेश सरकार और पशुपालन विभाग के प्रयास प्रशंसा के पात्र हैं।
पशु चिकित्सा संस्थानों को मजबूत करना, कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से नस्ल सुधार, सेक्स-सॉर्टेड सीमेन जैसी आधुनिक तकनीकों को प्रोत्साहन, चारा उपलब्धता बढ़ाना, स्वदेशी नस्लों का संरक्षण और संक्रामक रोगों के विरुद्ध टीकाकरण जैसे कदम पशुधन विकास की आधारशिला हैं। केंद्र सरकार को दी गई राज्य की जानकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश में नए पशु चिकित्सालयों के निर्माण, नस्ल सुधार, चारा संसाधनों और निःशुल्क टीकाकरण सहित कई मोर्चों पर कार्य किया जा रहा है।
मोबाइल पशु चिकित्सा सेवाएं ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के पशुपालकों के लिए विशेष महत्व रखती हैं। आपातकालीन स्थिति में समय पर चिकित्सकीय सहायता पशु की जान बचाने, उत्पादन हानि कम करने और पशुपालक के आर्थिक जोखिम को घटाने में मदद कर सकती है। राज्य में 1962 हेल्पलाइन के माध्यम से पशु चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।
उत्तर प्रदेश सरकार का पशुपालन को ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार से जोड़ने का प्रयास सराहनीय है। राज्य का विशाल पशुधन आधार, दुग्ध उत्पादन में प्रथम स्थान और पोल्ट्री क्षेत्र को बढ़ावा देने वाली नीति यह दर्शाती है कि पशुपालन को विकास की मुख्यधारा में रखने की स्पष्ट प्राथमिकता है। इन उपलब्धियों को और मजबूत करने के लिए विभागीय सेवाओं में निरंतर गुणवत्ता सुधार, रोग निगरानी, डिजिटल रिकॉर्ड, पशु चिकित्सकों की उपलब्धता और फील्ड-स्तरीय प्रशिक्षण पर भी समान बल देना होगा।
One Health: पशु, मानव और पर्यावरण के स्वास्थ्य का साझा दृष्टिकोण
One Health का मूल सिद्धांत है कि मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण का स्वास्थ्य परस्पर जुड़े हुए हैं। पशुओं में होने वाले अनेक संक्रामक रोग मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। पशुपालन में एंटीमाइक्रोबियल दवाओं का अनुचित उपयोग Antimicrobial Resistance (AMR) को बढ़ा सकता है। दूषित जल, अस्वच्छ पशु आवास, अनुचित अपशिष्ट प्रबंधन और दूध-मांस-अंडों में औषधीय अवशेष भी सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं।
इसलिए आधुनिक पशु चिकित्सा का लक्ष्य केवल रोग का उपचार नहीं, बल्कि रोग की रोकथाम, जैव-सुरक्षा, टीकाकरण, स्वच्छ उत्पादन, जिम्मेदार औषधि उपयोग और पर्यावरणीय संतुलन भी होना चाहिए। पारंपरिक औषधीय ज्ञान का वैज्ञानिक मूल्यांकन भी इसी व्यापक One Health ढांचे में किया जाना चाहिए।
एथनोवेटरिनरी मेडिसिन: ग्रामीण अनुभवों में छिपी अनुसंधान की संभावनाएँ
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में पशुपालकों द्वारा स्थानीय परिस्थितियों और उपलब्ध वनस्पतियों के आधार पर अनेक पारंपरिक उपचारों का उपयोग किया जाता है। नीम (Azadirachta indica), हल्दी (Curcuma longa), तुलसी (Ocimum tenuiflorum) और एलोवेरा (Aloe vera) जैसी वनस्पतियों के कुछ जैव-सक्रिय घटकों पर प्रयोगशाला तथा अन्य वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध हैं।
नीम के कुछ घटकों में कीटरोधी और सूक्ष्मजीवरोधी गतिविधियों का अध्ययन किया गया है। हल्दी में उपस्थित करक्यूमिन पर सूजनरोधी और एंटीऑक्सीडेंट गुणों के संदर्भ में शोध हुआ है। एलोवेरा के कुछ घटकों का उपयोग त्वचा देखभाल संबंधी उत्पादों में किया जाता है, जबकि तुलसी के जैव-सक्रिय तत्वों पर भी अनुसंधान हुआ है।
फिर भी प्रयोगशाला में किसी अर्क की गतिविधि दिखना और खेत-खलिहान में किसी पशु रोग का सफल उपचार होना दो अलग बातें हैं। पौधे की प्रजाति, प्रयुक्त भाग, निष्कर्षण विधि, मात्रा, पशु की प्रजाति, गर्भावस्था, दुग्ध उत्पादन, अन्य दवाओं के साथ अंतःक्रिया और खाद्य उत्पादों में अवशेष—इन सभी पहलुओं की जांच जरूरी है। पारंपरिक नुस्खों को बिना परीक्षण के उपचार के रूप में प्रचारित करना उचित नहीं होगा।
आयुर्वेद और आधुनिक पशु चिकित्सा विज्ञान: प्रमाण आधारित समन्वय
भारतीय परंपरा में पशु चिकित्सा का ऐतिहासिक साहित्य उपलब्ध है। शालिहोत्र संहिता जैसे ग्रंथ पशुओं के स्वास्थ्य और उपचार संबंधी प्राचीन ज्ञान की ओर संकेत करते हैं। आज इस विरासत को आधुनिक अनुसंधान पद्धतियों के माध्यम से समझने और परखने की आवश्यकता है।
आयुर्वेदिक औषधीय पौधों और फॉर्मूलेशन पर पशुओं में पाचन स्वास्थ्य, त्वचा संबंधी समस्याओं, सूजन, तनाव प्रबंधन और सहायक पोषण जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान किया जा सकता है। किसी भी उत्पाद को उपयोग में लाने से पहले उसकी पहचान, गुणवत्ता, सक्रिय घटक, सुरक्षित मात्रा, विषाक्तता, दवा-अंतःक्रिया और दूध-मांस-अंडों में अवशेषों का मूल्यांकन होना चाहिए।
इस क्षेत्र में पशु चिकित्सा विश्वविद्यालयों, ICAR संस्थानों, आयुष अनुसंधान संस्थानों, औषधीय वनस्पति विशेषज्ञों और फील्ड वेटरिनेरियन्स के बीच सहयोग उपयोगी होगा। नियंत्रित क्लिनिकल परीक्षणों के बाद ही किसी औषधि की प्रभावशीलता और उपयोग की सीमा तय की जानी चाहिए।
होम्योपैथी: निष्पक्ष मूल्यांकन, अनुसंधान और पशु कल्याण सर्वोपरि
पशु चिकित्सा में होम्योपैथी के उपयोग को लेकर पशुपालकों और कुछ चिकित्सकों के अनुभव सामने आते रहे हैं। इस पद्धति पर वैज्ञानिक साहित्य भी उपलब्ध है, लेकिन अनुभव, केस रिपोर्ट और उच्च गुणवत्ता वाले नियंत्रित परीक्षणों को एक समान प्रमाण नहीं माना जा सकता।
वर्ष 2024 में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा तथा 2025 में प्रकाशित systematic reviews के overview ने पशु चिकित्सा में होम्योपैथी, एक्यूपंक्चर और फाइटोथेरेपी से संबंधित उपलब्ध अध्ययनों का मूल्यांकन किया। समीक्षा में होम्योपैथी के कुछ सीमित नियंत्रित अध्ययनों में सकारात्मक संकेतों का उल्लेख हुआ, लेकिन समग्र प्रमाण आधार अभी इतना व्यापक और निर्णायक नहीं है कि इसे स्थापित पशु चिकित्सा उपचार का विकल्प माना जाए। लेखकों ने बेहतर गुणवत्ता वाले समकालीन क्लिनिकल परीक्षणों की आवश्यकता बताई।
इसलिए होम्योपैथी पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण न तो पूर्वाग्रहपूर्ण अस्वीकृति का होना चाहिए और न ही बिना प्रमाण के व्यापक प्रभावशीलता का दावा। इसके संभावित उपयोगों का परीक्षण स्वतंत्र, नियंत्रित और पर्याप्त नमूना आकार वाले अध्ययनों से होना चाहिए। गंभीर संक्रमण, थनैला, निमोनिया, रक्त-परजीवी रोग, गर्भाशय संक्रमण और आपातकालीन स्थितियों में प्रमाणित उपचार में देरी करना पशु कल्याण के विरुद्ध होगा। होम्योपैथिक या किसी भी पूरक पद्धति का उपयोग, यदि किया जाए, तो वह पंजीकृत पशु चिकित्सक की निगरानी में और प्रभावी मानक उपचार को टाले बिना ही होना चाहिए।
एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस: जिम्मेदार पशु चिकित्सा की अनिवार्यता
AMR आज मानव और पशु स्वास्थ्य दोनों के लिए गंभीर चुनौती है। एंटीबायोटिक का अनावश्यक उपयोग, अधूरी खुराक, बिना निदान दवा देना और पशु उत्पादों में अवशेषों की अनदेखी इस समस्या को बढ़ा सकती है। औषधीय पौधों से प्राप्त जैव-सक्रिय यौगिकों पर अनुसंधान संभावित सहायक उत्पादों के विकास का रास्ता खोल सकता है, लेकिन हर्बल उत्पादों को स्वतः एंटीबायोटिक का विकल्प नहीं माना जा सकता।
किसी भी हर्बल या पारंपरिक उत्पाद के लिए प्रभावकारिता, गुणवत्ता, विषाक्तता, दवा-अंतःक्रिया और खाद्य सुरक्षा का मूल्यांकन आवश्यक है। एंटीबायोटिक का चयन, मात्रा और अवधि पशु चिकित्सक के निर्णय तथा उचित निदान पर आधारित होनी चाहिए।
चित्रकूट और बुंदेलखंड: जिला स्तर पर ज्ञान-संग्रह और अनुसंधान की पहल
चित्रकूट सहित बुंदेलखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालकों के पारंपरिक अनुभवों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया जा सकता है। स्थानीय पशुपालकों, पशु चिकित्सालयों, कृषि विज्ञान केंद्रों, विश्वविद्यालयों और औषधीय वनस्पति विशेषज्ञों के सहयोग से जिला स्तरीय Ethnoveterinary Knowledge Repository विकसित की जा सकती है।
इस ज्ञान-संग्रह में प्रत्येक प्रचलित उपचार के साथ प्रयुक्त वनस्पति की वैज्ञानिक पहचान, उपयोग का उद्देश्य, उपलब्ध शोध प्रमाण, संभावित जोखिम, पशु प्रजाति, सुरक्षित उपयोग की स्थिति और विशेषज्ञ की सलाह दर्ज की जाए। जिन नुस्खों की प्रभावशीलता प्रमाणित न हो, उन्हें स्पष्ट रूप से अप्रमाणित बताया जाए। विषाक्त या हानिकारक उपचारों की पहचान कर पशुपालकों को उनसे बचाना भी इस पहल का हिस्सा होना चाहिए।
ऐसी पहल स्थानीय जैव-विविधता के संरक्षण, ग्रामीण ज्ञान के दस्तावेजीकरण और युवा पशु चिकित्सकों को अनुसंधान से जोड़ने में उपयोगी हो सकती है।
आगे की राह: उत्तर प्रदेश के नेतृत्व को अनुसंधान और नवाचार से जोड़ना
उत्तर प्रदेश ने दुग्ध उत्पादन में देश में प्रथम स्थान प्राप्त कर अपनी क्षमता सिद्ध की है। मांस उत्पादन में दूसरा स्थान, पोल्ट्री विकास नीति के माध्यम से निवेश और उद्यमिता को प्रोत्साहन तथा पशु चिकित्सा सेवाओं के विस्तार के प्रयास राज्य के पशुधन क्षेत्र को बहुआयामी दिशा दे रहे हैं। अब इस नेतृत्व को पशु स्वास्थ्य अनुसंधान, जैव-सुरक्षा, नस्ल सुधार, चारा सुरक्षा, डिजिटल पशुधन प्रबंधन और वैज्ञानिक एथनोवेटरिनरी अनुसंधान से और मजबूत किया जा सकता है।
Veterinary Association of India जैसे पेशेवर संगठनों की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। संगठन के स्तर पर One Health और Ethnoveterinary Medicine पर राष्ट्रीय वेबिनार, विशेषज्ञ परिचर्चाएं, फील्ड सर्वेक्षण, अनुसंधान सहयोग और पशुपालक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। उत्तर प्रदेश के पशुपालन विभाग के अनुभव और राज्य की उपलब्धियों को ऐसे राष्ट्रीय संवादों में साझा करना भी उपयोगी होगा।
निष्कर्ष: परंपरा का सम्मान, विज्ञान का अनुशासन
पशु चिकित्सा का भविष्य केवल नई दवाओं और आधुनिक तकनीकों तक सीमित नहीं है। यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि हम पारंपरिक ज्ञान, आधुनिक विज्ञान और स्थानीय आवश्यकताओं के बीच कितना प्रभावी समन्वय स्थापित कर पाते हैं। एथनोवेटरिनरी मेडिसिन और आयुर्वेद में अनुसंधान की संभावनाएं हैं। होम्योपैथी सहित पूरक पद्धतियों के दावों का भी निष्पक्ष वैज्ञानिक परीक्षण होना चाहिए। लेकिन किसी भी पद्धति से ऊपर पशु का स्वास्थ्य, उसका कल्याण, खाद्य सुरक्षा और पशुपालक का हित सर्वोपरि है।
उत्तर प्रदेश सरकार और पशुपालन विभाग ने दुग्ध उत्पादन में राष्ट्रीय नेतृत्व तथा पशुधन विकास की विभिन्न पहलों के माध्यम से राज्य को एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है। इस उपलब्धि को निरंतर मजबूत करने के लिए विभागीय सेवाओं, अनुसंधान संस्थानों और पशु चिकित्सकों के सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं।
परंपरा हमें दिशा दे सकती है, अनुभव हमें प्रश्न दे सकता है, लेकिन किसी भी उपचार की विश्वसनीयता का अंतिम आधार विज्ञान, सुरक्षा और पशु कल्याण ही होना चाहिए। यही One Health की भावना है और यही भविष्य की जिम्मेदार पशु चिकित्सा का मार्ग है।
प्रमुख तथ्य एवं संदर्भ
- Department of Animal Husbandry and Dairying, Government of India. Basic Animal Husbandry Statistics 2025; PIB release on Milk, Egg, Meat and Wool Production 2024–25 (PRID 2195049).
- Government of India, Lok Sabha/PIB: State-wise milk production estimates for 2024–25; Uttar Pradesh production 38,815.34 thousand tonnes (as reproduced in parliamentary answer dated 10 March 2026).
- Invest UP, Government of Uttar Pradesh. Uttar Pradesh Poultry Development Policy–2022: policy objectives, incentives, training and nodal agency.
- PIB / Ministry of Fisheries, Animal Husbandry and Dairying: Information supplied by Government of Uttar Pradesh on veterinary infrastructure, breed improvement, fodder and vaccination measures; Nand Baba Dugdh Mission and associated schemes (March 2026).
- da Matta EC et al. Homeopathy, Acupuncture and Phytotherapy in the Veterinary Treatment or Prophylaxis of Diseases in Animals: An Overview of Systematic Reviews. 2025;114(2):106–116. DOI: 10.1055/s-0044-1788570. PMID: 39284363.
- Bez ICC et al. The use of homeopathy in veterinary medicine: a systematic review. Semina: Ciências Agrárias. 2024;45(3):783–798. DOI: 10.5433/1679-0359.2024v45n3p783.
टिप्पणी: उत्पादन संबंधी आंकड़े संबंधित सरकारी सर्वेक्षण वर्ष के अनुसार दिए गए हैं।



