पशुओ में एन्टी बायोटिक रेजिस्टेंस और उसका नियंत्रण
Antibiotic resistance in animals and its control
डॉ. निर्भय भावसार¹, डॉ. सोनू कुमार यादव2
¹एम.वी. एससी. –प्रसार शिक्षा विभाग, भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, बरेली
2पीएच.डी. शोधकर्ता, पशुधन उत्पादन एवं प्रबंधन विभाग, पशुचिकित्सा विज्ञान एवं पशुपालन महाविद्यालय, रीवा
भारत विश्व के प्रमुख पशुधन-सम्पन्न देशों में से एक है और कई श्रेणियों में वैश्विक नेतृत्व रखता है। भारत में कुल पशुधन संख्या लगभग 53–54 करोड़ आँकी जाती है, जो विश्व के कुल पशुधन का करीब 11–12% है। इस आधार पर भारत का विश्व में पहला स्थान माना जाता है।
भारत में गायों की संख्या लगभग 19–20 करोड़ है, जिससे भारत विश्व में दूसरे स्थान पर आता है, जबकि भैंसों की संख्या लगभग 11–12 करोड़ है और इस श्रेणी में भारत विश्व में प्रथम स्थान रखता है, विश्व की कुल भैंस आबादी का लगभग 55–60% अकेले भारत में पाया जाता है। बकरियों की संख्या लगभग 14–15 करोड़ होने के कारण भारत का दूसरा स्थान है, जबकि भेड़ों की संख्या लगभग 7–8 करोड़ है। इससे ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब इतनी अधिक पशुधन संख्या है तो उनमें फैलने वाली बीमारियों की व्यापकता भी उतनी ही अधिक होगी।
भारत सरकार के बुनियादी पशुपालन सांख्यकी (BAHS) जैसे आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, देश में विभिन्न पशुओं में कई संक्रामक रोग पाए जाते हैं जिनका प्रभाव पशु-प्रजाति के अनुसार अलग-अलग स्तर पर देखा गया है। बड़े पशुओं जैसे गाय और भैंस में खुरपका-मुंहपका रोग सबसे अधिक फैलने वाला रोग है, जबकि हेमरेजिक सेप्टीसीमिया या गलाघोंटू और एंथ्रेक्स की घटनाएँ भी काफी संख्या में पाई जाती है। भेड़ और बकरियों में शीप-गोट पॉक्स और पीपीआर (पेस्ट दे पेटिट्स रूमिनेंट्स) जैसे रोग दर्ज किए गए हैं। सूअरों में स्वाइन फीवर की घटनाएँ सामने आती हैं। वहीं मुर्गियों में रोगों का प्रभाव सबसे अधिक पाया गया है, जहाँ साल्मोनेलोसिस, क्रॉनिक रेस्पिरेटरी डिज़ीज़, इंफेक्शियस बर्सल डिज़ीज़, फाउल पॉक्स और रानीखेत रोग जैसी बीमारियाँ बड़ी संख्या में रिपोर्ट की गई है। इनमे से अधिकतर रोग जीवाणु जनित है तथा कुछ रोग विषाणु जनित। इन जीवाणु और विषाणु जनित रोगों के निदान हेतु बहुत भारी मात्रा में एंटीबायोटिक्स का उपयोग किया जा रहा है।
एंटीबायोटिक्स क्या होता है ?
एंटीबायोटिक (Antibiotic) वे दवाइयाँ हैं जो बैक्टीरिया (जीवाणु) से होने वाले संक्रमणों से लड़ने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं।
सरल शब्दों में कहे तो एंटीबायोटिक्स एक प्रकार की दवाएं हैं जो बैक्टीरिया के विकास को नष्ट या धीमा कर देती हैं और संक्रमण को फैलने से रोकती है।
एंटीबायोटिक प्रतिरोध क्या है…?
ये वह स्थिति है जब बैक्टीरिया, एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिक्रिया करना बंद कर देते हैं, जिससे वे दवाएँ जो पहले उन्हें मार देती थीं या उनकी वृद्धि रोक देती थीं, अब अप्रभावी हो जाती हैं और संक्रमण का इलाज करना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि बैक्टीरिया उत्परिवर्तित होकर या प्रतिरोधक जीन प्राप्त करके इन दवाओं के प्रति प्रतिरोधी बन जाते हैं।
भारत में पशुओं में मुख्य रूप से ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन, एनरोफ्लोक्सासिन , सेफ्ट्रिएक्सोन , पेनिसिलिन, और सल्फोनामाइड्स जैसी एंटीबायोटिक्स का उपयोग होता है, जो श्वसन, आंतों के संक्रमण और खुरपका जैसी बीमारियों के इलाज व रोकथाम के लिए होती हैं, लेकिन इनके अत्यधिक उपयोग से एंटीबायोटिक प्रतिरोध बढ़ रहा है, जो मानव पशु , पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए भी खतरा है।
इंडियन नेटवर्क फॉर फिशरी एंड एनिमल एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (INFAAR) भारत की पहली राष्ट्रीय स्तर की रिपोर्ट है, जो पशुधन, पोल्ट्री तथा मत्स्य क्षेत्रों में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस से संबंधित वैज्ञानिक आंकड़े प्रस्तुत करती है। यह रिपोर्ट वर्ष 2019 से 2022 के बीच एकत्र किए गए आंकड़ों पर आधारित है और इसे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) तथा खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के सहयोग से तैयार किया गया है। इस अध्ययन में कुल 5,983 पशु नमूनों का विश्लेषण किया गया, जिनमें ई. कोलाई और स्टैफाइलोकोकस जैसे प्रमुख बैक्टीरिया शामिल थे। रिपोर्ट के अनुसार ई. कोलाई बैक्टीरिया में सेफोटैक्सिम के विरुद्ध लगभग 46 प्रतिशत तथा एम्पीसिलिन के विरुद्ध लगभग 41 प्रतिशत तक एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस पाया गया, जिसमें पोल्ट्री के नमूनों में प्रतिरोध की दर सबसे अधिक दर्ज की गई। वहीं स्टैफाइलोकोकस बैक्टीरिया में पेनिसिलिन के प्रति लगभग 75 प्रतिशत तक प्रतिरोध पाया गया। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कई बैक्टीरियल स्ट्रेन मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट (अनेक दवाओं के प्रति प्रतिरोधी) थे, जो पशु स्वास्थ्य के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य के लिए भी एक गंभीर चुनौती को दर्शाता है।
एंटीबायोटिक प्रतिरोध को लेकर वैश्विक प्रयास-
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने एंटीबायोटिक प्रतिरोध की गंभीर समस्या को नियंत्रित करने के लिए वर्ष 2015 में एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध पर वैश्विक कार्य योजना प्रारंभ की। इस योजना का मुख्य उद्देश्य एंटीबायोटिक प्रतिरोध के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाना, निगरानी एवं अनुसंधान प्रणाली को मजबूत करना, संक्रमण की रोकथाम एवं नियंत्रण को प्रभावी बनाना, एंटीबायोटिक दवाओं के विवेकपूर्ण और जिम्मेदार उपयोग को प्रोत्साहित करना तथा नई एंटीमाइक्रोबियल दवाओं, टीकों और जांच तकनीकों के विकास को बढ़ावा देना है। इसके साथ ही, डब्ल्यूएचओ ने वैश्विक एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध निगरानी प्रणाली के माध्यम से विभिन्न देशों से संबंधित आंकड़ों का संकलन कर वैश्विक स्तर पर निगरानी व्यवस्था को सुदृढ़ किया है। डब्ल्यूएचओ वन हेल्थ दृष्टिकोण को अपनाते हुए मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण के बीच समन्वय पर भी विशेष बल देता है, ताकि एंटीबायोटिक प्रतिरोध की समस्या का समग्र और प्रभावी समाधान किया जा सके।
भारत सरकार द्वारा पशुओ को एंटीबॉयोटिक प्रतिरोध से बचाने हेतु जारी गाइडलाइन्स-
भारत सरकार ने पशुओं के उपचार के लिए मानक पशु चिकित्सा उपचार दिशानिर्देश जारी किए हैं।
इन दिशानिर्देशों के अनुसार
- एंटीबायोटिक्स का उपयोग केवल पशु चिकित्सक की सलाह पर ही किया जानाचाहिए।
- बिनाबीमारी के या केवल उत्पादन/वृद्धि बढ़ाने के लिए एंटीबायोटिक्स का प्रयोग प्रतिबंधित है।
- पशुओं में एंटीबायोटिक देने से पहले सही रोग निदान को अनिवार्य माना गया है।
एंटीबायोटिक दवाओं का पूरा निर्धारित कोर्स और सही मात्रा देना आवश्यक है। - ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940के अंतर्गत पशुओं में उपयोग होने वाली एंटीबायोटिक्स को नियंत्रित किया जाता है।
- दूध, मांस और अंडों में दवा के अवशेष से बचने के लिए विदड्रॉल पीरियड का पालनअनिवार्य है।
- कुछ महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक्स जैसे कार्बापेनेम समूह (जैसे इमिपेनेम), पेनम, मोनोबैक्टम, ग्लाइकोपेप्टाइड समूह (जैसे वैनकोमाइसिन), लिपोपेप्टाइड, ऑक्साज़ोलिडिनोन समूह (जैसे लाइनज़ोलिड), यूरीडोपेनीसिलिन, साइडरोफोर सेफालोस्पोरिन, सेफ्टोबिप्रोल, सेफ्टारोलिन, फिडैक्सोमाइसिन, प्लाज़ोमाइसिन, ग्लाइसाइक्लिन, इरावासाइक्लिन तथा ओमाडासाइक्लिन शामिल हैं। इसके अलावा खाद्य पशुओं में क्लोरैमफेनिकोल, नाइट्रोफ्यूरान समूह (जैसे फ्यूराज़ोलिडोन), नाइट्रोइमिडाज़ोल समूह, कार्बाडॉक्स और कोलिस्टिन जैसी दवाएँ भी भारत में प्रतिबंधित या सख़्त रूप से वर्जित हैं।
- भारत सरकार की राष्ट्रीय एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस कार्य योजना (NAP-AMR) पशुओं में एंटीबायोटिक के विवेकपूर्ण उपयोग पर ज़ोर देती है।
- एंटीबायोटिक्स के विकल्प के रूप में टीकाकरण, स्वच्छता, बेहतर पोषण और बायो-सिक्योरिटी उपायों को अपनाने की सलाह दी गई है।
इन सभी दिशानिर्देशों का मुख्य उद्देश्य एंटीबायोटिक प्रतिरोध को रोकना, पशु स्वास्थ्य सुधारना और मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा करना व पर्यावरण को भी स्वस्थ और विषाक्तता से मुक्त करना है।
जानवरों में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस से बचने के पारंपरिक उपाय
विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शोध अध्ययनों से यह प्रमाणित हुआ है कि पशुपालन में पारंपरिक प्रबंधन और प्राकृतिक रोकथाम उपाय अपनाकर एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस को प्रभावी रूप से कम किया जा सकता है। अनुसंधानों के अनुसार, स्वच्छ बाड़ा प्रबंधन, पर्याप्त वेंटिलेशन, नियमित सफाई तथा जैव-सुरक्षा उपाय अपनाने से पशुओं में संक्रामक रोगों की घटनाएँ घटती हैं, जिससे एंटीबायोटिक की आवश्यकता कम होती है। एथ्नो-वेटरिनरी और आयुर्वेदिक अध्ययनों में यह पाया गया है कि नीम, हल्दी, लहसुन, तुलसी, गिलोय और आंवला जैसे औषधीय पौधों का नियंत्रित एवं वैज्ञानिक उपयोग पशुओं की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। इसके अतिरिक्त, संतुलित आहार, खनिज मिश्रण, प्रोबायोटिक्स और हर्बल सप्लीमेंट्स के प्रयोग से आंतों का स्वास्थ्य बेहतर रहता है और रोगजनकों का प्रभाव कम होता है। FAO और WHO की रिपोर्टों में यह भी उल्लेख किया गया है कि समय पर टीकाकरण, तनाव-मुक्त प्रबंधन तथा पारंपरिक रोकथाम उपाय अपनाने से पशुपालन में एंटीबायोटिक पर निर्भरता घटती है, जो अंततः एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस की समस्या को नियंत्रित करने में सहायक सिद्ध होती है।
पशुओं में साधारण बीमारियाँ एवं उनके पारंपरिक उपचार
- दस्त (डायरिया)
भारत में किए गए एथ्नो-वेटरिनरी अध्ययनों के अनुसार, पशुओं में दस्त के उपचार हेतु इसबगोल, बेल फल, अनार के छिलके और चावल का माड़ प्रभावी पाए गए हैं। शोध बताते हैं कि इन पदार्थों में मौजूद टैनिन और घुलनशील फाइबर आंतों की गतिशीलता को नियंत्रित करते हैं और निर्जलीकरण को कम करते हैं।
- अपच एवं अफारा-
आई सी ए आर और पारंपरिक पशु चिकित्सा पर आधारित शोधों में यह पाया गया है कि अजवाइन, सौंफ, सौंठ और हींग पाचन एंजाइमों के स्राव को बढ़ाते हैं। ये गैस बनने की प्रक्रिया को कम करते हैं और जुगाली करने वाले पशुओं में रूमेन क्रिया को बेहतर बनाते हैं।
- बुखार-
एथ्नो-वेटरिनरी रिसर्च के अनुसार, गिलोय, नीम और तुलसी में प्राकृतिक एंटीपायरेटिक और इम्यूनो-मॉड्यूलेटरी गुण पाए जाते हैं। हल्के संक्रमण या प्रारंभिक अवस्था के बुखार में इनका उपयोग सहायक माना गया है।
- घाव और जख्म-
वैज्ञानिक अध्ययनों से यह प्रमाणित हुआ है कि हल्दी में करक्यूमिन नामक यौगिक होता है, जिसमें जीवाणुरोधी और सूजनरोधी गुण होते हैं। नीम और एलोवेरा का बाह्य प्रयोग घाव भरने की प्रक्रिया को तेज करता है और द्वितीयक संक्रमण को रोकता है।
- त्वचा रोग-
पशुओं में खुजली, दाद और फंगल संक्रमण के लिए नीम, करंज तेल और हल्दी मिश्रित तेल का उपयोग विभिन्न शोधों में प्रभावी पाया गया है। इनमें एंटीफंगल और एंटीबैक्टीरियल गुण मौजूद होते हैं।
- खांसी एवं श्वसन समस्याएँ-
शोधों के अनुसार, तुलसी, अदरक और शहद श्वसन तंत्र में सूजन को कम करते हैं और कफ को बाहर निकालने में सहायक होते हैं। यह उपचार हल्की श्वसन समस्याओं में उपयोगी पाया गया है।
- दुग्ध उत्पादन में कमी-
अध्ययनों में यह पाया गया है कि मेथी, सौंफ, अजवाइन और संतुलित पारंपरिक आहार देने से पाचन सुधरता है, हार्मोनल संतुलन बेहतर होता है और दुग्ध उत्पादन में वृद्धि होती है।
एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस आज पशु और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए एक गंभीर वैश्विक चुनौती बन चुका है। इसका मुख्य कारण एंटीबायोटिक दवाओं का अनावश्यक, असंतुलित और बिना चिकित्सकीय सलाह के उपयोग है। इस समस्या के नियंत्रण के लिए एंटीबायोटिक्स का जिम्मेदाराना उपयोग, प्रतिबंधित दवाओं का पूर्ण पालन और पशुपालन में स्वच्छता व जैव-सुरक्षा उपायों को अपनाना अत्यंत आवश्यक है। साथ ही, पारंपरिक एवं वैकल्पिक उपचार विधियों, टीकाकरण और रोग-निवारण पर अधिक जोर देना चाहिए। समन्वित प्रयासों से ही एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस को नियंत्रित कर भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्रभावी उपचार सुरक्षित रखा जा सकता है।
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