तराई क्षेत्र में गर्भित बकरी की देखभाल
Care of pregnant goats in the Terai region.
अनिरुद्ध चंद्रा,
चतुर्थ वर्ष छात्र बी. वी. एस. सी. एवं ए. एच.
पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय
गोविन्द बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय
पंतनगर, उत्तराखण्ड
डाॅ. सक्षम राजपूत,
पशु चिकित्सा विशेषज्ञ
अयान सिंह
चतुर्थ वर्ष छात्र बी. वी. एस. सी. एवं ए. एच.
पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय गोविन्द बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर, उत्तराखण्ड
तराई क्षेत्र अपनी अधिक नमी, वर्षा और हरे चारे की उपलब्धता के कारण बकरी पालन के लिए अनुकूल माना जाता है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में छोटे और सीमांत किसान बकरी पालन से अपनी आजीविका चलाते हैं। किन्तु तराई की यही परिस्थितियाँ गर्भित बकरियों के लिए कई स्वास्थ्य संबधी चुनौतियाँ भी उत्पन्न करती हैं। गर्भावस्था के दौरान बकरी की सही देखभाल न होने पर न केवल माँ बकरी का स्वास्थ्य प्रभावित होता है, बल्कि बकरी के बच्चे का विकास भी ठीक प्रकार से नहीं हो पाता। इसलिए तराई क्षेत्र में गर्भित बकरियों की वैज्ञानिक एवं समयबंद्ध देखभाल अत्यंत आवश्यक है।
गर्भावस्था के दौरान पोषण का महत्व
गर्भावस्था के समय बकरी के शरीर में पोषक तत्वों की आवश्यकता सामान्य अवस्था की तुलना में अधिक हो जाती है। भ्रूण के विकास, माँ बकरी की शक्ति बनाए रखने तथा प्रसव के बाद दूध उत्पादन के लिए संतुलित आहार अत्यंत आवश्यक होता है। तराई क्षेत्र में हरा चारा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहता है, परन्तु केवल हरा चारा पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होता। गर्भित बकरी को हरा चारा के साथ सूखा चारा, दाना और खनिज मिश्रण भी नियमित रूप से देना चाहिए। खनिज मिश्रण में कैलशियम, फाॅस्फोरस, सेलीनियम और विटामिन ई जैसे तत्व विशेष रूप से आवश्यक होते हैं, क्योंकि इनकी कमी से बकरी कमजोर हो सकती है और बच्चे में माँसपेशियों की कमजोरी देखी जा सकती है।
कृमि संक्रमण और उसका प्रभाव
तराई क्षेत्र में नमी अधिक होने के कारण पेट के कमियों, विशेषतः स्ट्राॅंगाइल कमि, का संक्रमण सामान्यतः अधिक पाया जाता है। ये कमि बकरी के शरीर में खून की कमी, पोषक तत्वों की हानि और कमजोरी उत्पन्न करते हैं। गर्भावस्था के दौरान यदि कृमि संक्रमण बना रहे, तो भ्रूण को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता। इस कारण बच्चा कमजोर जन्म ले सकता है या जन्म के बाद खड़ा न हो पाने जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए गर्भित बकरियों में कृमि नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
कृमिनाशन के समय सावधानियाँ
कृमिनाशन गर्भावस्था से पहले या प्रसव के बाद करना अधिक सुरक्षित माना जाता है। गर्भावस्था के दौरान अनावश्यक कमिनाशन से जोखिम बढ़ सकता है। यदि अत्यधिक आवश्यकता हो, तो कमिनाशन केवल पशु चिकित्सक की सलाह से ही किया जाना चाहिए। कमिनाशन से पहले बकरी को लिवर टाॅनिक देना लाभकारी होता है, जिस से दवाओं का दुष्प्रभाव कम होता है। इसके साथ ही कृमिनाशन के समय बकरी को तनाव मुक्त वातावरण में रखना चाहिए, क्योंकि तनाव की स्थिति में दवा का प्रभाव ठीक से नहीं हो पाता।
कृमि संक्रमण और उसका प्रभाव
तराई क्षेत्र में नमी अधिक होने के कारण पेट के कृमियों, विशेषतः स्ट्राॅंगाइल कृमि, का संक्रमण सामान्यतः अधिक पाया जाता है। ये कृमि बकरी के शरीर में खून की कमी, पोषक तत्वों की हानि और कमजोरी उत्पन्न करते हैं। गर्भावस्था के दौरान यदि कृमि संक्रमण बना रहे, तो भ्रूण को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता। इस कारण बच्चा कमजोर जन्म ले सकता है या जन्म के बाद खड़ा न हो पाने जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए गर्भित बकरियों में कृमि नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
कृमिनाशन की सही अवधिः
बकरियों में सामान्य रूप से कृमिनाशन हर 3-4 महीने पर करना चाहिए। गर्भित बकरी का कृमिनाशन गर्भधरण से पहले या प्रसव के बाद करना अधिक सुरक्षित होता है। गर्भावस्था के दौरान कृमिनाशन केवल पशु चिकित्सक की सलाह से ही करना चाहिए। बकरी के बच्चों में पहला कमिनाशन 2-3 महीने की आयु में तथा इसके बाद हर 3 महीने पर किया जाना चाहिए।
सवोत्तर देखभाल में कोलिबेसिलोसिस से बचाव
प्रसव के बाद बकरी के बच्चों में कोलिबेसिलोसिस मुख्यतः अस्वच्छ वातावरण और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण होता है। इससे बचाव के लिए प्रसव स्थल को साफ, सूखा और स्वच्छ रखना आवश्यक है। जन्म के तुतन्त बाद बच्चे की नाभि को कीटाणुनाशक से साफ करना चाहिए, जिस से संक्रमण का खतरा कम हो जाता है। बच्चे को समय पर माँ का पहला दूध (कोलास्ट्रम) पिलाना अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि इससे उसे प्रारंभिक रोगों से लड़ने की क्षमता मिलती है। माँ बकरी को संतुलित आहार और स्वच्छ पानी देना चाहिए ताकि दूध की गुणवत्ता बना रहे। यदि बच्चे में दस्त या कमजोरी के लक्षण दिखाई दें, तो तुतन्त पशु चिकित्सक से सम्पर्क करना चाहिए।
बकरी के बच्चों में होने वाले अन्य नवजात रोग
- हाइपोथर्मिया (ठंड लगना):जन्म के बाद ठंड और नमी के कारण शरीर का तापमान कम हो जाना, जिससे बच्चा सुस्त हो जाता है।
- हाइपोग्लाइसीमिया (कम शुगर):समय पर दूध या कोलोस्ट्रम न मिलने से शरीर में शर्करा की कमी हो जाना।
- नाभि संक्रमण (नाभि रोग):नाभि की सफाई न होने से बैक्टीरिया का संक्रमण होना।
- नवजात दस्त:गंदगी, दूषित दूध या संक्रमण के कारण दस्त होना।
- नवजात सेप्टीसीमिया:कमजोर प्रतिरक्षा के कारण शरीर में संक्रमण फैल जाना।
- खनिज एवं विटामिन की कमी:विशेष रूप से विटामिन E और सेलेनियम की कमी से मांसपेशियों की कमजोरी।
- कमजोर चूसने की क्षमता:जन्मजात कमजोरी या माँ की कमजोरी के कारण दूध ठीक से न पी पाना।
- सांस संबंधी समस्या:ठंड, संक्रमण या कमजोरी के कारण सांस लेने में कठिनाई।
नवजात रोगों से बचाव के उपाय
- जन्म के तुरंत बाद कोलोस्ट्रम पिलाएँ:बच्चे को जन्म के पहले 1–2 घंटे के भीतर माँ का पहला दूध अवश्य पिलाएँ, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
- ठंड और नमी से बचाव करें:नवजात बच्चे को सूखी, साफ और गर्म जगह पर रखें, विशेषकर सर्दी और बरसात के मौसम में।
- नाभि की सही सफाई करें:जन्म के बाद नाभि को आयोडीन या किसी उपयुक्त कीटाणुनाशक से साफ करें, जिससे संक्रमण न हो।
- स्वच्छता बनाए रखें:बाड़ा, बिस्तर और दूध पिलाने के बर्तन साफ रखें ताकि संक्रमण फैलने से रोका जा सके।
- नियमित दूध पिलाएँ:बच्चे को समय-समय पर पर्याप्त दूध पिलाएँ, जिससे कमजोरी और शुगर की कमी न हो।
- माँ बकरी का पोषण सुधारें:गर्भावस्था और प्रसव के बाद माँ बकरी को संतुलित आहार, खनिज एवं विटामिन दें।
- भीड़ और तनाव से बचाएँ:नवजात बच्चों को अधिक भीड़, शोर और तनाव से दूर रखें।
- बीमार बच्चे को अलग रखें:किसी भी बच्चे में रोग के लक्षण दिखें तो उसे अन्य बच्चों से अलग रखें।
- समय पर पशु चिकित्सक से संपर्क करें:दस्त, कमजोरी, सांस की समस्या या दूध न पीने की स्थिति में तुरंत पशु चिकित्सक को दिखाएँ।
निष्कर्ष
तराई क्षेत्र में गर्भित बकरी और उसके बच्चों की सही देखभाल अत्यंत आवश्यक है। संतुलित पोषण, खनिज एवं विटामिन की पूर्ति, उचित समय पर कृमिनाशन तथा पशु चिकित्सक की नियमित निगरानी से माँ बकरी स्वस्थ रहती है और नवजात बच्चों में रोगों की संभावना कम होती है। जन्म के बाद साफ-सुथरा वातावरण, समय पर कोलोस्ट्रम पिलाना और प्रारंभिक देखभाल अपनाकर बकरी पालन को सुरक्षित एवं अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है।


