पशुओं में उष्णता (हीट) की पहचान: वैज्ञानिक तकनीकों से प्रजनन सफलता तक
Detection of Heat in Animals: From Scientific Techniques to Reproductive Success
मधु मीना
भा.कृ.अनु.प-राष्ट्रीयडेयरीअनुसंधानसंस्थान,
करनाल – 132001
भारत में पशुपालन न केवल आजीविका का एक मुख्य साधन है, बल्कि दुग्ध उत्पादन और मांस उद्योग की रीढ़ भी है। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पशुओं का कुशल प्रजनन प्रबंधन अनिवार्य है। मादा पशुओं में समय पर और सटीक हीट की पहचान, कृत्रिम गर्भाधान की सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक है। हीट की गलत पहचान न केवल गर्भाधान की असफलता का कारण बनती है, बल्कि इससे पशुपालकों को आर्थिक क्षति भी होती है।
पशुओं की सही समय पर गर्भधारण न कर पाने की समस्या, प्रजनन विज्ञान की सफलता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है।
हीट की पहचान में चुनौतियाँ
अनुमान है कि भारत में लगभग 30–40% मादा पशुओं में हीट के लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देते। कई बार हीट के लक्षणों को पशुपालक समय पर नहीं पहचान पाते, जिससे गर्भाधान उचित समय पर नहीं हो पाता। इसके कारण पशु की प्रजनन दर घटती है और उत्पादन चक्र बाधित होता है। अतः हीट की सही और समयानुकूल पहचान पशुपालन में सफलता की कुंजी है।
इसके परिणामस्वरूप वे पशु गर्भधारण नहीं कर पाते हैं। यह मुख्यतः पशु पालकों द्वारा पशुओं के हीट के लक्षणों की सही जानकारी न होने के कारण होता है। हीट की सही पहचान न हो पाने और गलत समय पर गर्भाधान कराए जाने के कारण पशु गर्भधारण नहीं कर पाते हैं, जिससे उनका मद चक्र प्रभावित होता है और दूध उत्पादन में भी हानि होती है।
हीट का समय, तरीका, और उसके संकेतों की सही पहचान न होने से या पशु में चुपचाप हीट आने के कारण पशुपालकों को 10 हजार रुपये तक का आर्थिक नुकसान हो सकता है।
इस आर्थिक नुकसान से बचने के लिए पशुपालकों को हीट का सटीक पहचान करने की प्रक्रिया एवं उच्चतम गर्भधारण दर प्राप्त करने हेतु आधुनिक विधियों की जानकारी होना अत्यंत आवश्यक है।
वर्तमान में कई वैज्ञानिक तरीके विकसित किए गए हैं, जिनके द्वारा हर पशुपालक को यह ज्ञान होना चाहिए कि हीट की जांच कैसे करें।
हीट जांच के मुख्य तरीके निम्नलिखित हैं:
- हीट के लक्षणों का सावधानीपूर्वक अवलोकन
- प्रत्येक पशुपालक को हीट के स्पष्ट लक्षणों की पूरी जानकारी होनी चाहिए तथा उन्हें इन लक्षणों का सावधानीपूर्वक अवलोकन करना चाहिए।
- पशुपालकों को हीट की प्रारंभिक अवस्था एवं वास्तविक अवस्था में दिखाई देने वाले लक्षणों की पूरी जानकारी होनी चाहिए।
प्रारंभिक हीट अवस्था के लक्षण:
- गायें अन्य गायों पर चढ़ने का प्रयास करती हैं।
- प्रारंभिक हीट अवस्था में पशु अपने साथियों को चाटने लगते हैं।
- वास्तविक हीट अवस्था की ओर बढ़ते हुए पशु दूसरों पर सवार होने का प्रयास करते हैं।
- गायों के वल्वा (योनि द्वार) से श्लेष्मा का स्त्राव होता है। यह स्त्राव हीट की स्थिति में विशेष रूप से देखा जाता है।
हीट की वास्तविक अवस्था से संबंधित लक्षण:
- हीट की वास्तविक अवस्था में गायें अपनी साथ की अन्य गायों या बछड़ों के ऊपर चढ़ने के समय शांत भाव में स्थिर खड़ी रहती हैं। यह हीट की वास्तविक अवस्था का सबसे स्पष्ट लक्षण होता है।
- इस अवस्था में गायों में परस्पर समन्वय का स्पष्ट लक्षण दिखाई देता है। यदि कोई गाय दूसरी गाय पर सवार होती है जो हीट में नहीं है, तो वह सवार होने वाली गाय विफल हो जाती है। यह समन्वय की प्रक्रिया गर्भाधान के अवसरों को कम कर देती है।
- पशु के योनिपथ से गाढ़े चिपचिपे श्लेष्माका स्राव होता है, जो एक लंबी धागे जैसी संरचना के रूप में पूंछ तक लटकता रहता है। यह श्लेष्मा यदि पूंछ और पिछले पैरों पर चिपका हुआ पाया जाए, तो यह पशु के हीट में होने का संकेत देता है और यह संकेत दो से तीन दिन तक देखा जा सकता है।
- पशु के वल्वा (योनि द्वार) पर सूजन आ जाती है तथा उसमें से स्पष्ट द्रव का स्राव होने लगता है, जिससे वह गुलाबी अथवा लाल दिखाई देने लगती है।
- पशु बार-बार रंभाती है।
- पशु की शारीरिक सक्रियता और गतिशीलता में वृद्धि हो जाती है।
- हीट की अवस्था में पशु अन्य पशुओं को चाटती है, सूंघती है और उनके पीछे-पीछे चलती है।
- पशु बार-बार मूत्र त्याग करती है। यह हीट अवस्था का एक अत्यंत स्पष्ट लक्षण होता है।
- पशु कम चारा खाने लगते हैं।
- पशु का दुग्ध उत्पादन कम हो जाता है।
- पशु की आंखों से आँसू बहते हैं।
अधिकतर पशुओं, विशेष रूप से दुधारू पशुओं में, हीट की अवस्था रात्रि के समय आती है। अतः हीट की पहचान करने वाले व्यक्ति को रात्रि के समय सतर्क रहना चाहिए। हीट की पहचान हेतु कम से कम तीन बार अवलोकन करना आवश्यक है, जिसमें एक बार रात्रि का समय अनिवार्य रूप से होना चाहिए।
हीट चक्र की अवधि एवं उसकी तीव्रता नस्ल के अनुसार भिन्न हो सकती है।
विदेशी तथा संकर नस्ल की गायों में भारतीय नस्ल की गायों की तुलना में हीट चक्र की अवधि एवं तीव्रता अधिक पाई जाती है
प्रजनन (गर्भाधान) का उपयुक्त समय
यह प्रजनन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। पशुओं में बार-बार निष्फल प्रयासों के कारण यदि गलत समय पर गर्भाधान किया जाए, तो यह भारी नुकसान का कारण बनता है। इसलिए प्रत्येक पशुपालक को इसके संबंध में स्पष्ट जानकारी होनी चाहिए। इस विषय में तीन प्रमुख बातें जानना आवश्यक है
- गाय और भैंस में हीट की अवधि:
- गाय में हीट की अवधि लगभग12–24 घंटे होती है।
- भैंसों में यह अवधि लगभग20–24 घंटे तक होती है।
- ओव्यूलेशन (डिंबोत्सर्जन) हीट समाप्त होने के12–14 घंटे बाद होता है।
यदि इन तीनों बिंदुओं को ध्यान में रखा जाए, तो यह समझना आसान हो जाता है कि पशु को गर्भित करने का उपयुक्त समय हीट की मध्यावधि से लेकर अंत तक की अवस्था होती है।
- यदि गाय सुबह हीट में आई है, तो उसेशाम को गर्भाधान कराना चाहिए।
- यदि शाम/रात्रि को हीट में आई है, तोअगले दिन सुबह गर्भाधान कराना उचित होता है।
अनेक परिस्थितियों में हीट शुरू होने का समय और पशुपालक द्वारा उसकी पहचान का समय भिन्न हो सकता है। ऐसी स्थिति में जैसे ही पशुपालक को यह ज्ञात हो कि पशु हीट में है, उसे तुरंत गर्भाधान करा देना चाहिए, और 12 घंटे बाद दोबारा गर्भाधान कराने की व्यवस्था करनी चाहिए।
हीट पहचान की आधुनिक तकनीकें
टीज़र पशु
- टीज़र पशु हीट अवस्था में आए पशुओं को सूंघकर उन्हें पहचानता है और उनके ऊपर चढ़ने का प्रयास करता है।
- लेकिन वह गर्भाधान करने में सक्षम नहीं होता है।
- टीज़र पशु द्वारा हीट की पहचान बहुत आसानी और प्रभावशाली ढंग से की जा सकती है।
- पशुओं कोप्रतिदिन तीन से चार बार खुले स्थान पर छोड़ना चाहिए, जिससे हीट के लक्षणों का स्पष्टता से अवलोकन किया जा सके।
हीट माउंट डिटेक्टर
- इस तकनीक में पशु की पीठ पर पूंछ के पास “हीट माउंट डिटेक्टर” नामक यंत्र चिपका दिया जाता है।
- जब पशु हीट की अवस्था में आता है और अन्य पशु उस पर सवार होते हैं, तो दबाव पड़ने पर डिवाइस में भरा रंग निकल कर फैल जाता है।
- यह रंग दूर से ही दिखाई देता है, जिससे पशु की हीट की पहचान आसानी से की जा सकती है।
स्वचालित हीट डिटेक्शन सिस्टम
- ये डिजिटल उपकरण होते हैं जो पशु की गतिविधियों, तापमान और व्यवहार में परिवर्तन को रियल टाइम में रिकॉर्ड करते हैं।
- इसमेंएक्सेलेरोमीटर, ताप संवेदक और जीपीएस आधारित तकनीकें शामिल होती हैं।
- डेटा को मोबाइल ऐप या कंप्यूटर से जोड़ा जाता है, जिससे पशुपालक तुरंत अलर्ट प्राप्त कर सकें
वजाइनल इलेक्ट्रिकल रेजिस्टेंस
- इस तकनीक में एक विशेष उपकरण द्वारा योनि की विद्युत प्रतिरोध क्षमता को मापा जाता है।
- हीट के दौरान योनि स्राव की pH और आयनिक परिवर्तनों की वजह से प्रतिरोध कम हो जाता है।
- वजाइनल इलेक्ट्रिकल रेजिस्टेंस का उपयोग हीट के सटीक समय की पहचान में किया जाता है।
इंडेक्स बेस्ड सिस्टम
- इस विधि में पशु के अनेक संकेतों (जैसे – गतिविधि, योनि स्राव, वोकलाइजेशन) को स्कोर दिया जाता है।
- एक कंपोज़िट स्कोर बनाकर हीट की सटीकता का आकलन किया जाता है। इसे डेयरी सॉफ्टवेयर में इंटीग्रेट किया जाता है।
आईआर थर्मोग्राफी
- एक संपर्क-रहित तकनीक जो शरीर की सतही गर्मी को मापती है।
- हीट के समय योनी और पेरिनियल क्षेत्र में रक्त प्रवाह बढ़ता है, जिससे इन क्षेत्रों का तापमान बढ़ता है।
- इन्फ्रारेड थर्मोग्राफीकैमरे से यह थर्मल बदलाव आसानी से पता लगाया जा सकता है।
बायोमेट्रिक सेंसर कॉलर
- यह पशु कीजुगाली, तापमान, गति आदि को रिकॉर्ड करता है।
- भैंसों की रात में सक्रियता या असामान्य व्यवहारको ये सेंसर पहचानते हैं और अलर्ट भेजते हैं।
एंडोस्कोपी आधारित फोलिकल स्टडी
- उन्नत वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में प्रजनन मार्गका निरीक्षण एंडोस्कोपी द्वारा किया जाता है।
- यह तकनीक विशेष रूप से इन विट्रो निषेचन या भ्रूण स्थानांतरणकार्यक्रमों में फोलिकल की मैच्योरिटी जाँचने के लिए प्रयुक्त होती है।
हीट सिंक्रोनाइजेशन और समयबद्ध गर्भाधान
- यदि हीट पहचान में समस्या हो तो यह हार्मोन आधारित प्रोटोकॉल प्रयोग किया जाता है।
- इसमें गोनैडोट्रॉपिन विमोचक हार्मोनऔर प्रोस्टाग्लैंडिन एफ2-अल्फा इंजेक्शन देकर हीट को नियंत्रित किया जाता है, जिससे बिना हीट पहचान के भी सही समय पर गर्भाधान संभव होता है
क्लोज़ सर्किट टेलीविज़न प्रणाली
- बड़े-बड़े पशु फार्मों में मादा पशुओं की हीट की पहचान के लिए यह एक अत्यंत प्रभावी तकनीक है।
- इसके माध्यम से पशुओं के व्यवहार, एक-दूसरे पर सवार होने की क्रिया तथा अन्य हीट लक्षणों की लगातार निगरानी की जा सकती है।
- यह रिकार्डिंग वीडियो कैमरे में होती है जिसे देखकर पशु की हीट की पहचान की जा सकती है।
प्रोजेस्टेरोन हार्मोन का परीक्षण
- इस तकनीक में रक्त अथवा दूध में प्रोजेस्टेरोन हार्मोन की मात्रा मापकर यह जाना जा सकता है कि पशु हीट की अवस्था में है या नहीं।
- जब रक्त में प्रोजेस्टेरोन का स्तर 1 नैनोग्राम प्रति मिलीलीटर से कम होता है, तो इसे हीट की अवस्था का संकेत माना जाता है।
पेडोमीटर
- हीट की अवस्था में पशु की शारीरिक सक्रियता 3–4 गुना तक बढ़ जाती है।
- यदि पेडोमीटर नामक यंत्र को पशु के पिछले पैरों में बांधा जाए, तो यह गतिविधि की वृद्धि को मापता है, जिससे हीट की पहचान की जा सकती है।
ग्राफाइट स्लाइड विधि द्वारा सर्वाइकल म्यूकस का फर्न पैटर्न
- हीट की अवस्था में पशु की योनिक स्राव (सर्वाइकल म्यूकस) और हार्मोनल परिवर्तनों के कारण उसमें एक विशिष्ट नमूनात्मक (फर्न) आकृति उभरती है।
- इस स्राव को स्लाइड पर फैला कर माइक्रोस्कोप से देखने पर फर्न के पत्तों जैसी आकृति दिखती है।
- यह आकृति केवल हीट की अवस्था में ही बनती है, अन्य अवस्थाओं में यह आकृति नहीं दिखाई देती।
- यह तकनीक गायों और भैंसों में हीट की पहचान के लिए सरल, विश्वसनीय और व्यवहारिक पद्धति है।
- अनुसंधान से यह ज्ञात हुआ है कि यदि इस ग्राफाइट स्लाइड विधि के आधार पर गर्भाधान किया जाए, तो गर्भधारण दरगायों में 64% तथा भैंसों में 58% तक देखी गई है
निष्कर्ष
- गर्भाधान की सफलता दर को बढ़ाने एवं पशुपालन में आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिए मादा पशुओं में हीट (उष्णता) की सटीक और समयानुसार पहचान अत्यंत आवश्यक है। पारंपरिक लक्षणों के साथ-साथ आधुनिक तकनीकों जैसे हीट माउंट डिटेक्टर, पेडोमीटर, सीसीटीवी निगरानी, प्रोजेस्टेरोन स्तर परीक्षण, फर्न पैटर्न विश्लेषण आदि ने हीट की सटीकता से पहचान को संभव बनाया है। इन विधियों की सहायता से पशुपालक उचित समय पर गर्भाधान करवा सकते हैं, जिससे गर्भधारण दर में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
सही समय पर हीट की पहचान न केवल पशु की प्रजनन क्षमता बढ़ाती है, बल्कि यह पशुपालन व्यवसाय की उत्पादकता एवं लाभप्रदता को भी सुनिश्चित करती है। अतः पशुपालकों एवं कृत्रिम गर्भाधान तकनीशियनों को चाहिए कि वे हीट पहचान की पारंपरिक एवं आधुनिक विधियों का समुचित प्रयोग कर प्रजनन प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाएं।



