बकरी पालन और विपणन
डॉ. निर्भय भावसार और डॉ. हरिदीप वर्मा
प्रसार शिक्षा विभाग
भाकृ अनुप.- भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, बरेली (उ. प्र.), भारत
गांधी जी बकरी के दूध को शुद्ध, सात्विक और शाकाहार के नज़दीक मानते थे। उन्होंने अपने उपवासों और स्वास्थ्य प्रयोगों के दौरान बकरी का दूध ग्रहण किया था, और इसे एक तरह से “नैतिक विकल्प” के रूप में स्वीकार किया था जब उनका शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया था।
उद्धरण (संदर्भ अनुसार, आत्मकथा और लेखों से):
“मैंने शपथ ली थी कि मैं दूध नहीं लूंगा, लेकिन जब स्वास्थ्य की स्थिति बहुत खराब हो गई तो मैंने बकरी का दूध लेना शुरू किया। मैंने इसे गाय या भैंस के दूध की तुलना में कम हिंसक माना।”
वर्तमान में भारतीय किसानों को अपनी आय को बढ़ाने के लिए अपने कृषि कार्य के साथ साथ बकरी पालन को एक सहायक रोजगार के रूप में करना चाहिए क्योंकि बकरी पालन सरल सीधा व कम लागत में प्रारम्भ होने वाला उद्यम है।
राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBAGR) के अनुसार, भारत में बकरियों की स्थिति विविध, समृद्ध और पारंपरिक पशुपालन पर आधारित है। भारत विश्व में बकरी पालन के लिए प्रमुख देशों में से एक है।
NBAGR ने भारत में 39 स्वदेशी बकरियों का रजिस्टर्ड किया है। देश में कुल बकरियों की संख्या लगभग 14 करोड़ है। सबसे अधिक बकरियाँ राजस्थान में पाई जाती है उसके बाद क्रमशः पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार का स्थान आता है। बेसिक एनिमल हसबेंडरी स्टेटिक के आकड़ों के अनुसार कुल दुग्ध उत्पादन का 3.36 प्रतिशत हिस्सा और कुल मांस उत्पादन का 15.50 प्रतिशत हिस्सा बकरियों से प्राप्त होता है।
बकरी पालन:-
बकरी पालन की विशेषताएँ (संवर्धित रूप में):
- कम पूंजी की आवश्यकता: बकरी पालन शुरू करने के लिए अधिक पूंजी की जरूरत नहीं होती, जिससे यह छोटे किसानों और गरीब परिवारों के लिए भी उपयुक्त है।
- कम स्थान में पालन संभव: बकरियों को पालने के लिए बड़े फार्म या अधिक भूमि की आवश्यकता नहीं होती, सीमित स्थान में भी पालन संभव है।
- कम चारे-दाने की जरूरत: बकरियाँ कम मात्रा में चारा और दाना खाकर भी अच्छे से पलती हैं, जिससे खर्चा कम होता है।
- अल्प आयु में प्रजनन क्षमता: बकरियाँ छोटी उम्र में ही प्रजनन करने लगती हैं, जिससे उत्पादन तेजी से बढ़ता है।
- हर बियात में औसतन एक से अधिक बच्चे: प्रत्येक गर्भधारण में बकरियाँ अक्सर दो या उससे अधिक बच्चे देती हैं, जिससे झुंड जल्दी बढ़ता है।
- हर प्रकार की जलवायु में अनुकूलता: बकरियाँ गर्मी, सर्दी और वर्षा जैसी विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में भी आसानी से जीवित रहती हैं।
- रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक: बकरियों में रोगों से लड़ने की प्राकृतिक क्षमता अधिक होती है, जिससे इनके इलाज पर कम खर्च आता है।
- कम लागत में लाभकारी व्यवसाय: कम निवेश में अच्छा मुनाफा देने वाला व्यवसाय है।
- बकरी के मांस की अधिक मांग: बकरी का मांस स्वादिष्ट, पोषक और स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है, जिससे बाजार में इसकी मांग अधिक रहती है।
- खरीद-बिक्री में सरलता: बकरी की कीमत कम होती है और इसे आसानी से खरीदा या बेचा जा सकता है।
- जोखिम कम: अन्य पशुपालन की तुलना में बकरी पालन में रोग, हानि या नुकसान का खतरा अपेक्षाकृत कम होता है।
बकरी की प्रमुख नस्लें और उपयोग:
- दूध उत्पादन: जामुनापारी
- मांस उत्पादन: ब्लैक बंगाल
- ऊन उत्पादन: पश्मीना
- बाड़े में पालन (फोर फीडिंग): बीटल
- अन्य उपयोगी नस्लें: बरबरी, सिरोही, झकराना
बकरी पालन की पद्धतियां:
- सघन पद्धति: बकरियों को घर या फार्म पर रखकर ही दाना-चारा दिया जाता है।
- अर्द्ध-सघन पद्धति: बकरियों को कुछ समय के लिए सीमित चराई हेतु छोड़ा जाता है, और बाद में उन्हें फार्म पर चारा दिया जाता है।
- स्वतंत्र पद्धति: बकरियाँ पूरी तरह से चारागाह पर निर्भर होती हैं।
बकरियों में हीट (Oestrus) की पहचान के लक्षण:
- पूंछ को बार-बार हिलाना
- बार-बार मूत्र त्याग करना
- अन्य बकरियों पर चढ़ने का प्रयास करना
- बकरे को संभोग की स्वीकृति देना
- योनि से पारदर्शी, चिकना तरल स्राव
- बार-बार मिमियाना
- बेचैनी और सतर्कता दिखाना
- बकरियाँ हर 19–21दिन पर हीट में आती हैं। यह अवस्था 24–36 घंटे तक रहती है।
- सामान्यतः डेढ़ वर्ष की उम्र से ही हीट में आना शुरू करती हैं।
- इस दौरान बकरियों को बकरे के साथ स्वच्छ बाड़े में रखना चाहिए और यौन रोगों से बचाव के लिए सावधानी रखनी चाहिए।
गर्भावस्था (Gestation):
- सामान्यतः बकरी का गर्भकाल 145से 150 दिनों का होता है।
- प्रसव तिथि से 7–8दिन पूर्व विशेष देखभाल शुरू कर देनी चाहिए।
- हल्का चारा देना चाहिए और चराई रोक देनी चाहिए।
प्रसव पूर्व लक्षण:
- बकरी बेचैन हो जाती है।
- थनों का आकार बढ़ता है।
- थनों में चमक और सूजन आना।
- पहली बार ब्याने वाली बकरी के थनों से दूध आना।
- योनि से तरल पदार्थ का स्राव।
- झुंड से अलग रहना।
- दर्द की स्थिति आना।
प्रसव पश्चात देखभाल:
- माँ और बच्चे को कुछ समय के लिए अकेला छोड़ें।
- बकरी को हल्का गर्म गुड़ का पानी दिन में दो बार, तीन दिन तक दें।
- बकरी के नवजात बच्चे की देखभाल:
- बच्चे के मुँह और नथुनों से म्यूकस हटाना चाहिए।
- श्वसन न होने पर तिनके से नथुने साफ करें।
- माँ को बच्चे को चाटने देना चाहिए।
- गर्भनाल को काटकर टिंचर लगाना चाहिए।
- 1–2घंटे में माँ का गाढ़ा दूध पिलाना चाहिए।
- वजन के दसवें हिस्से के बराबर दूध दिन में 3–4बार दें।
- 3महीने तक माँ का दूध, फिर धीरे-धीरे हरे पत्ते देना शुरू करें।
बकरी का विपणन (Marketing):-
- स्थानीय हाट-बाजार:-आस-पास के हाटों में बकरियों की सीधी बिक्री करें।
- मांस विक्रेताओं से संपर्क:-कसाइयों और होटल व्यवसायियों से संपर्क करके बिक्री बढ़ा सकते हैं।
- ईद और बकरी ईद के मौके पर:-त्योहारों पर बकरियों की मांग अधिक होती है, इस समय अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
- प्रचार और विपणन रणनीति:-प्रचार के माध्यम से ग्राहकों को आकर्षित करें। सही समय पर बिक्री की योजना बनाएं।
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से बिक्री:
- AgriBazar (www.agribazaar.com):-कृषि उत्पादों की वेबसाइट।
बकरी की फोटो, उम्र, वजन आदि डालकर सीधे खरीदार से संपर्क करें।
- PashuLok (www.pashulok.com):-पशुओं के लिए विशेष पोर्टल,अकाउंट बनाकर बकरियों की डिटेल अपलोड करें।
- Animall App: -पशु पालकों के लिए उपयोगी ऐप,खरीद-बिक्री, सलाह और हेल्थ सुविधाएं उपलब्ध।
- Bikayi या Dukaan App: -डिजिटल स्टोर बनाकर बकरियों की जानकारी दें। ग्राहक सीधे संपर्क कर सकते हैं।
- OLX App: -व्यक्तिगत ग्राहकों तक पहुँचने का आसान तरीका,फोटो, नस्ल, उम्र और वजन की जानकारी के साथ विज्ञापन डालें।



