नवजात बछड़े का प्रबंधन

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नवजात बछड़े का प्रबंधन

 

डॉ नागेंद्र कुमार, एम. व्ही. एस. सी. स्कॉलर एवं डॉ निलेश कुमार पैकरा, एम. व्ही. एस. सी. स्कॉलर, पशु प्रबंधन एवं उत्पादन विभाग ,पशु चिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय अँजोरा दुर्ग, डी.एस.वि.सी.के.वी. दुर्ग छत्तीसगढ़  

 नवजात बछड़े की देखभाल जन्म के समय और उसके बाद करना उसके जीवन और अच्छे स्वास्थ्य के लिए  बहुत ज़रूरी है। जन्म के बाद शुरुआती दिनों में भी विशेष  देखभाल करनी चाहिए क्योंकि उस समय उसकी बीमारी से लड़ने की शक्ति बहुत कम होती है। डेयरी फार्म का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है की वहां बछड़ों की देखभाल और पालन-पोषण कितनी  अच्छी तरह किया  जाता है। अच्छी नस्ल के पशु बाहर से खरीदने की बजाय, सही देखभाल और प्रबंधन से फार्म पर ही स्वस्थ और मजबूत बछड़े तैयार किए  जा सकते हैं। इसलिए   बछड़े की सेहत और विकास  के लिए  समय पर देखभाल और उचित  प्रबंधन बहुत ज़रूरी है।

जन्म के समय देखभाल –

जन्म के तुरंत बाद बछड़े की श्वसन क्रिया शुरू होना बेहद आवश्यक है। इसके लिए सबसे पहले उसकी नाक और मुँह में जमी हुई श्लेष्मा या झिल्ली को साफ कपड़े से हटा दें। यिद सांस लेने में किठनाई हो तो बछड़े को पिछले पैरों से उठाकर हल्का झुलाएँ या उसकी छाती को धीरे-धीरे मलें, ताकि गले और नाक में फंसा तरल पदार्थ बाहर आ सके । 

सामान्यतः गाय बछड़े को जीभ से चाटती है, जिससे उसका शरीर जल्दी सूख जाता है और रक्त संचार भी बेहतर होता है। ठंडी जलवायु की स्थिति में बछड़े को सूखे कपड़े से पोंछकर गरम रखना चाहिए ।

नाभि नाल को शरीर से लगभग 2.5 सेमी दूरी पर बांधकर नीचे से काटें और कटे हुए हिससे को टिंक्चर आयोडीन या किसी  उपयुक्त ऐन्टिसेप्टिक से साफ करें। बाड़े की गीली बिछावन हटाकर उसे सूखा और स्वच्छ बनाएँ। 

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बछड़े को जन्म के तुरंत बाद माँ का पहला दूध (खीस) अवश्य पिलाए, क्योंकि यह उसकी रोग-प्रितरोधक क्षमता और विकास के लिए  बहुत जरूरी है। जन्म के लगभग एक घंटे के भीतर बछड़ा खड़े होकर दूध पीने का प्रयास करता है, यदि  वह कमजोर हो तो उसे खड़ा करने और दूध पिलाने में सहायता करें। साथ ही यदि पहली बार बछड़ा जनने वाली गाय बछड़े को स्वीकार न करे या मारने की कोशिश करे तो उसकी सुरक्षा पर विशेष ध्यान दें।

बछड़े का भोजन –

नवजात बछड़े के लिए  माँ का पहला दूध, जिससे  खीस या कोलोस्ट्रम कहा जाता है, सबसे आवश्यक और पहला आहार होता है। इसे जन्म के आधे घंटे के भीतर बछड़े को अवश्य पिलाना  चाहिए । खीस सामान्य दूध की तुलना में 2–3 गुना अधिक खनिज  और लगभग 5 गुना अधिक प्रोटीन प्रदान करता है, जिससे  बछड़े को तुरंत ऊर्जा  और शारीरिक  ताकत मिलती है। साथ ही इसमें एंटीबॉडीज़ भी पाई जाती हैं, जो बछड़े को संक्रमण और बीमारीयो  से बचाने में मदद करती हैं। खीस में लैक्टोज की मात्रा कम होने से दस्त लगने की संभावना भी कम हो जाती है। खीस का उत्पादन गाय के द्वारा बछड़े के जन्म के बाद लगभग 3 से 7 दिनों  तक होता है और यह बछड़े के लिए  पोषण व तरल पदार्थ का प्रमुख स्रोत है। जन्म के 15 दिन बाद बछड़े को फली दार हरा चारा ऑर दाने दार सांद्र आहार कुछ मात्रा मे देना शुरू कर सकते है | 

अन्य महत्वपूर्ण बाते –

  1. बछड़ों को तब तक अलग रखें जब तक उनका दूधछुड़ाया न जाए। इससे आपसी चाटने से होने वाले रोगों का प्रसार रुकता है।
  2. बाड़े को हमेशा स्वच्छ, सूखा और हवादार रखें। बिछावन  के लिए  लकड़ी का बुरादा या पुआल उपयोग करें।
  3. जन्म के तुरंत बाद बछड़े को सुखाएँ । स्थान का तापमान न अिधक ठंडा हो और न अधिक गरम।
  4. जन्म के तुरंत बाद माँ का पहला दूध अवश्य पिलाएं , इससे रोग प्रितरोधक क्षमता बढ़ती है।
  5. प्रितिदन बछड़े को उसके भार का लगभग 10% दूध दें|
  6. शरीर का निरीक्षण – नाक, मुँह, कान, गुदा और नाभि  की नियमित  जाँच करें ताकि  संक्रमण जल्दी पहचाना जासके ।
  7. पहला गोबर न होने पर – हल्के उपाय जैसे साबुन वाला पानी,अरंडी का तेल दें।
  8. बीमारियों  से बचाव – दस्त,निमोनिया , नाभि  संक्रमण, जोड़ रोग आदि  से बचाव करें। आवश्यकता पड़ने पर तुरंतपशु चिकित्सक  से संपकर् करें।
  9. जन्म के 15 दिनों  के भीतर ही सींगों को हटवाना उिचत है। देर करने पर यह किठन और ददर्नाक हो जाता है।
  10. समय पर आहार, सफाई और स्वास्थ्य प्रबंधन से बछड़े स्वस्थ रहते हैं और भविष्य  में अच्छे पशुधन के रूप मेंविकसित होते हैं।
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