एक स्वास्थ्य दृष्टिकोण और जूनोसिस: एक सुरक्षित भविष्य की ओर
अनुपमा वर्मा
चिकित्सा विभाग,आईसीएआर- भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, इज्जतनगर, बरेली, उत्तरप्रदेश (243122), भारत
सारांश
वैश्विक स्तर पर उभरते और पुनःउभरते संक्रामक रोगों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मानव स्वास्थ्य को पृथक रूप में नहीं देखा जा सकता। मनुष्य, पशु और पर्यावरण के बीच जटिल अंतर्संबंधों के कारण जूनोसिस, रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR) और पर्यावरणीय परिवर्तनों का प्रभाव सीधे मानव समाज पर पड़ता है। ‘एक स्वास्थ्य’ (One Health) दृष्टिकोण इन तीनों घटकों को एकीकृत कर स्वास्थ्य सुरक्षा को सुदृढ़ करने का वैज्ञानिक ढांचा प्रदान करता है। भारत, अपनी विशाल जनसंख्या, पशुधन संसाधन और पारिस्थितिक विविधता के कारण, इस मॉडल को अपनाने के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है। यह निबंध ‘एक स्वास्थ्य’ की अवधारणा, भारत का रोडमैप, पशु चिकित्सा जन स्वास्थ्य (VPH) की भूमिका, AMR नियंत्रण और महामारी-पूर्व रोकथाम के पहलुओं का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
प्रस्तावना
21वीं सदी में मानवता जिन सबसे गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है, उनमें संक्रामक रोगों का खतरा सर्वोपरि है। पिछले कुछ दशकों में, हमने देखा है कि किस प्रकार एक सूक्ष्म वायरस पूरी दुनिया को ठप कर सकता है, अर्थव्यवस्थाओं को ध्वस्त कर सकता है और लाखों लोगों की जान ले सकता है। COVID-19 महामारी ने हमें यह कड़वा सबक सिखाया है कि मानव स्वास्थ्य को एक अलग-थलग द्वीप के रूप में नहीं देखा जा सकता। हम जिस हवा में सांस लेते हैं, जिन जानवरों के साथ हम रहते हैं या जिनका हम सेवन करते हैं, और जिस पर्यावरण का हम हिस्सा हैं—ये सब एक अदृश्य डोर से बंधे हुए हैं। इसी अंतर्संबंध को समझने और सुरक्षित करने की वैज्ञानिक विचारधारा का नाम है—‘एक स्वास्थ्य‘
‘एक स्वास्थ्य’ कोई नई अवधारणा नहीं है, लेकिन आज के समय में इसकी प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। यह एक एकीकृत, एकीकरण करने वाला दृष्टिकोण है जो लोगों, जानवरों और पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) के स्वास्थ्य को संतुलित और अनुकूलित करने का लक्ष्य रखता है। यह स्वीकार करता है कि मानव स्वास्थ्य, घरेलू और जंगली जानवरों के स्वास्थ्य, और व्यापक पर्यावरण (जिसमें पौधे और पारिस्थितिक तंत्र शामिल हैं) निकटता से जुड़े हुए हैं और एक-दूसरे पर निर्भर हैं। इस संदर्भ में, जूनोसिस या प्राणिज रोग वे बीमारियाँ हैं जो जानवरों से मनुष्यों में फैलती हैं। चाहे वह रेबीज हो, बर्ड फ्लू हो, इबोला हो, या निपाह वायरस—ये सभी जूनोटिक रोगों के उदाहरण हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मनुष्यों में होने वाले लगभग 60% ज्ञात संक्रामक रोग और 75% नए उभरते हुए संक्रामक रोग जानवरों से आते हैं। यह आँकड़ा ही इस बात का प्रमाण है कि यदि हमें मानव जाति को सुरक्षित रखना है, तो हमें पशु जगत और पर्यावरण के स्वास्थ्य की भी उतनी ही चिंता करनी होगी।
मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य को जोड़ना: भारत का रोडमैप
भारत, अपनी विशाल जनसंख्या, समृद्ध जैव विविधता और दुनिया की सबसे बड़ी पशुधन आबादी के साथ, ‘एक स्वास्थ्य’ दृष्टिकोण को लागू करने के लिए एक अद्वितीय और महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ मनुष्य और जानवर बहुत निकटता में रहते हैं। हमारे यहाँ कृषि, पशुपालन और वन्य जीवन का ताना-बाना इतना घना है कि किसी एक क्षेत्र में होने वाली स्वास्थ्य गड़बड़ी का प्रभाव तुरंत दूसरे क्षेत्रों में दिखाई देता है। इसलिए, भारत के लिए ‘एक स्वास्थ्य’ केवल एक सैद्धांतिक अवधारणा नहीं, बल्कि एक अस्तित्व की आवश्यकता है।
भारत में मानव-पशु-पर्यावरण इंटरफेस पर कई चुनौतियां हैं:
- सघनजनसंख्या: उच्च जनसंख्या घनत्व संक्रमण को तेजी से फैलाने में मदद करता है।
- पशुधनपर निर्भरता: भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पशुपालन पर बहुत अधिक निर्भर है। दूध, मांस और अंडों के उत्पादन के लिए जानवरों के साथ निकट संपर्क अनिवार्य है।
- वन्यजीवोंके आवास में अतिक्रमण: शहरीकरण और कृषि विस्तार के कारण वनों की कटाई हो रही है, जिससे जंगली जानवर और मनुष्य एक-दूसरे के संपर्क में आ रहे हैं। यह ‘स्पिलओवर’ (Spillover) की घटनाओं के लिए आदर्श स्थिति पैदा करता है, जहाँ एक वायरस जंगली जानवर से मानव आबादी में कूद सकता है (जैसे कि निपाह वायरस या क्यासनूर फॉरेस्ट डिजीज)।
- जलवायुपरिवर्तन: बदलते मौसम के पैटर्न वेक्टर-जनित रोगों (जैसे डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया) के प्रसार को प्रभावित कर रहे हैं और रोगाणुओं को नए क्षेत्रों में पनपने का मौका दे रहे हैं।
भारत सरकार ने इन चुनौतियों को पहचानते हुए एक महत्वाकांक्षी रोडमैप तैयार किया है। “वसुधैव कुटुम्बकम” (पूरी दुनिया एक परिवार है) के दर्शन पर चलते हुए, भारत ने “एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य, एक भविष्य” के मंत्र को अपनाया है।
राष्ट्रीय एक स्वास्थ्य मिशन
प्रधानमंत्री विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार सलाहकार परिषद (PM-STIAC) ने एक राष्ट्रीय ‘एक स्वास्थ्य’ मिशन को मंजूरी दी है। यह एक ऐतिहासिक कदम है जो विभिन्न मंत्रालयों को एक छत के नीचे लाता है। इसमें स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, पशुपालन और डेयरी विभाग, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, और विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय शामिल हैं।इसका मुख्य उद्देश्य देश में मौजूदा ‘एक स्वास्थ्य’ गतिविधियों को समन्वित करना, समर्थन देना और एकीकृत करना है।भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) इस मिशन की नोडल एजेंसी के रूप में कार्य कर रही है। नागपुर में राष्ट्रीय एक स्वास्थ्य संस्थान (National Institute of One Health – NIOH) की स्थापना इस दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर है। यह संस्थान जूनोटिक रोगों, रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR) और अन्य उभरते खतरों पर अनुसंधान और निगरानी का केंद्र बनेगा।
भारत के रोडमैप का एक प्रमुख स्तंभ ‘एकीकृत निगरानी’ है। अब तक, मानव स्वास्थ्य की निगरानी (NCDC द्वारा) और पशु स्वास्थ्य की निगरानी (पशुपालन विभाग द्वारा) अलग-अलग सिलोस (silos) में की जाती थी। लेकिन अब डेटा साझाकरण और संयुक्त निगरानी पर जोर दिया जा रहा है। DBT ने ‘वन हेल्थ’ पर भारत का पहला कंसोर्टियम लॉन्च किया है, जिसमें 27 संगठन शामिल हैं। इसका उद्देश्य महत्वपूर्ण जीवाणु, वायरल और परजीवी रोगों की निगरानी करना है। पशुपालन और डेयरी विभाग ने उत्तराखंड और कर्नाटक जैसे राज्यों में ‘वन हेल्थ’ पायलट प्रोजेक्ट शुरू किए हैं। इन परियोजनाओं का उद्देश्य जमीनी स्तर पर संस्थागत क्षमता का निर्माण करना है।
भारत का रोडमैप केवल बीमारियों को रोकने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें खाद्य सुरक्षा, पोषण और पर्यावरण संरक्षण भी शामिल है। भारत ने AMR पर एक राष्ट्रीय कार्य योजना (NAP-AMR) तैयार की है, जो मानव और पशु स्वास्थ्य दोनों क्षेत्रों में एंटीबायोटिक्स के दुरुपयोग को रोकने पर केंद्रित है। स्वदेशी वैक्सीन विकास, डायग्नोस्टिक किट और जीनोमिक सर्विलांस में निवेश बढ़ाया जा रहा है।’एक स्वास्थ्य’ को एक जन आंदोलन (Mass Movement) बनाने का प्रयास, ताकि आम नागरिक स्वच्छता, पशु देखभाल और पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझें।
अगली महामारी की रोकथाम: पशु चिकित्सा जन स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाना
इतिहास गवाह है कि अधिकांश महामारियों की जड़ें पशु जगत में होती हैं। 1918 का स्पैनिश फ्लू (पक्षियों से), 2009 का स्वाइन फ्लू (सूअरों से), निपाह वायरस (चमगादड़ों से), और संभवतः SARS-CoV-2 भी ये सभी इस बात की पुष्टि करते हैं कि यदि हम जानवरों के स्वास्थ्य की उपेक्षा करते हैं, तो हम अपनी सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। यहीं पर पशु चिकित्सा जन स्वास्थ्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। पशु चिकित्सा जन स्वास्थ्य वह विज्ञान है जो पशु चिकित्सा कौशल, ज्ञान और संसाधनों का उपयोग मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा और सुधार के लिए करता है। अगली महामारी को रोकने के लिए, हमें अपनी स्वास्थ्य प्रणाली की वास्तुकला में पशु चिकित्सा जन स्वास्थ्य को एक केंद्रीय स्तंभ बनाना होगा। पशु अक्सर “कोयले की खान में कैनरी” की तरह कार्य करते हैं। वे मनुष्यों की तुलना में पर्यावरणीय खतरों और रोगजनकों के प्रति पहले प्रतिक्रिया देते हैं। एक मजबूत VPH प्रणाली जानवरों में असामान्य बीमारी या मृत्यु के पैटर्न का पता लगा सकती है, इससे पहले कि वे मनुष्यों में फैलें। उदाहरण: यदि जंगली पक्षियों या पोल्ट्री में अचानक उच्च मृत्यु दर देखी जाती है, तो पशु चिकित्सक तुरंत H5N1 (एवियन इन्फ्लूएंजा) का परीक्षण कर सकते हैं। यदि पुष्टि हो जाती है, तो संक्रमित पक्षियों को मारकर और उस क्षेत्र को सील करके वायरस को मनुष्यों तक पहुँचने से रोका जा सकता है। यह “स्रोत पर रोकथाम” है, जो महामारी को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका है।
अगली महामारी को रोकने के लिए भारत को अपने पशु चिकित्सा निगरानी तंत्र को आधुनिक बनाना होगा:
- प्रयोगशालानेटवर्क: हमें जिला स्तर पर अत्याधुनिक निदान प्रयोगशालाओं की आवश्यकता है। BSL-3 और BSL-4 (Biosafety Level) प्रयोगशालाओं का नेटवर्क बढ़ाना होगा जो उच्च जोखिम वाले रोगजनकों को संभालने में सक्षम हों।
- क्षेत्रीयमहामारी विज्ञान: पशु चिकित्सकों को महामारी विज्ञान में विशेष प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है। वे न केवल जानवरों का इलाज करें, बल्कि बीमारी के प्रसार के पैटर्न का विश्लेषण करने और ‘हॉटस्पॉट’ की पहचान करने में सक्षम हों। AMR को अगली बड़ी वैश्विक स्वास्थ्य आपदा माना जा रहा है। पशुधन में वृद्धि प्रवर्तक के रूप में एंटीबायोटिक्स का अंधाधुंध उपयोग दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया को जन्म दे रहा है। ये सुपरबग खाद्य श्रृंखला (दूध, मांस) या पर्यावरण (अपशिष्ट जल) के माध्यम से मनुष्यों तक पहुँचते हैं।
खाद्य सुरक्षा और खाद्य जनित रोग
पशु चिकित्सा जन स्वास्थ्य का सीधा संबंध खाद्य सुरक्षा से है। साल्मोनेला, ई. कोलाई, और ब्रुसेलोसिस जैसे कई रोग दूषित पशु उत्पादों के सेवन से फैलते हैं। वधशालाओं और प्रसंस्करण इकाइयों में पशु चिकित्सकों द्वारा सख्त निरीक्षण यह सुनिश्चित करता है कि केवल स्वस्थ जानवरों का मांस ही बाजार में जाए। यह न केवल बीमारियों को रोकता है, बल्कि वैश्विक बाजार में भारतीय खाद्य उत्पादों की विश्वसनीयता भी बढ़ाता है।
जैसे-जैसे मानव बस्तियां जंगलों के करीब जा रही हैं, वन्यजीव स्वास्थ्य की निगरानी महत्वपूर्ण हो गई है। रेबीज और क्यासनूर फॉरेस्ट डिजीज (KFD) जैसे रोगों को नियंत्रित करने के लिए वन्यजीव विभागों और पशु चिकित्सा सेवाओं के बीच समन्वय आवश्यक है। जंगली जानवरों का टीकाकरण (जैसे ओरल रेबीज वैक्सीन) और उनकी आबादी के स्वास्थ्य की निगरानी VPH का एक अभिन्न अंग है। विश्व बैंक और अन्य वैश्विक संस्थाओं का अनुमान है कि ‘वन हेल्थ’ और VPH में निवेश की लागत महामारी से होने वाले आर्थिक नुकसान का एक बहुत छोटा अंश है। “रोकथाम इलाज से बेहतर है” का सिद्धांत यहाँ पूरी तरह लागू होता है। पशु चिकित्सा सेवाओं को सुदृढ़ बनाना, उन्हें पर्याप्त संसाधन और जनबल प्रदान करना, भविष्य की महामारियों के खिलाफ एक अभेद्य ढाल बनाने के समान है।
उभरते और फिर से उभरते जूनोसिस को नियंत्रित करने में पशु चिकित्सकों की भूमिका
जब भी किसी जूनोटिक बीमारी का प्रकोप होता है, तो अक्सर ध्यान डॉक्टरों और अस्पतालों पर केंद्रित होता है। लेकिन पर्दे के पीछे, और अक्सर अग्रिम मोर्चे पर, पशु चिकित्सक होते हैं जो इस लड़ाई के मूक योद्धा हैं। वे केवल ‘जानवरों के डॉक्टर’ नहीं हैं; वे मानव स्वास्थ्य के रक्षक भी हैं। उभरते (Emerging – जो नए हैं या पहली बार किसी क्षेत्र में देखे गए हैं) और फिर से उभरते (जो नियंत्रण में थे लेकिन फिर से बढ़ रहे हैं) जूनोसिस को नियंत्रित करने में उनकी भूमिका बहुआयामी है।
पशु चिकित्सक समुदाय और पशु आबादी के बीच की कड़ी हैं। वे ग्रामीण भारत के दूरदराज के इलाकों में भी मौजूद हैं, जहां आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं कम हो सकती हैं वे अक्सर पहले व्यक्ति होते हैं जो किसी बीमारी के प्रकोप को नोटिस करते हैं। चाहे वह गायों में लंपी स्किन डिजीज हो या घोड़ों में ग्लैंडर्स, उनकी त्वरित रिपोर्टिंग प्रशासन को सतर्क कर देती है। उभरते रोगों के निदान के लिए नैदानिक कौशल की आवश्यकता होती है। पशु चिकित्सक लक्षणों के आधार पर संभावित जूनोटिक खतरे को पहचान सकते हैं और नमूनों को प्रयोगशालाओं में भेजकर पुष्टि कर सकते हैं।
जूनोसिस को नियंत्रित करने का सबसे प्रभावी तरीका पशु मेजबान (Animal Host) में बीमारी को रोकना है। भारत में रेबीज से होने वाली हजारों मौतों को रोकने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से पशु चिकित्सकों पर है। कुत्तों का बड़े पैमाने पर टीकाकरण और नसबंदी रेबीज उन्मूलन की कुंजी है। राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम के तहत, पशु चिकित्सक लाखों पशुओं का टीकाकरण कर रहे हैं। इससे न केवल पशुधन की रक्षा होती है, बल्कि किसानों और पशुपालकों को भी इन घातक संक्रमणों से बचाया जाता है। उभरते हुए रोग अक्सर खराब प्रबंधन प्रथाओं के कारण फैलते हैं। पशु चिकित्सक किसानों और पोल्ट्री मालिकों को जैव-सुरक्षा उपायों के बारे में शिक्षित करते हैं।पशु चिकित्सक वैज्ञानिक अनुसंधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कई मानव रोगों के मॉडल जानवरों में पाए जाते हैं। एक पशु चिकित्सक केवल इलाज नहीं करता, वह शिक्षित भी करता है। वे किसानों, पेट ओनर्स और आम जनता को समझाते हैं कि कैसे जानवरों के साथ सुरक्षित संपर्क रखा जाए।
बाढ़, भूकंप या अन्य प्राकृतिक आपदाओं के दौरान, बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ जाता है। सड़े हुए शव, दूषित पानी और विस्थापित जानवर जूनोसिस का कारण बन सकते हैं। पशु चिकित्सक आपदा प्रतिक्रिया टीमों का हिस्सा होते हैं, जो शवों का सुरक्षित निपटान सुनिश्चित करते हैं और महामारी को रोकने के लिए शिविर लगाते हैं।
केस स्टडी: भारत में निपाह वायरस और पशु चिकित्सकों की भूमिका
जब केरल में निपाह वायरस का प्रकोप हुआ, तो यह स्पष्ट हो गया कि यह फलों के चमगादड़ों (Fruit Bats) से जुड़ा था। पशु चिकित्सा विशेषज्ञों ने ही इस कड़ी को जोड़ने में मदद की। उन्होंने चमगादड़ों के नमूनों का परीक्षण किया और स्थानीय लोगों को सलाह दी कि वे जमीन पर गिरे फलों या पक्षियों द्वारा कुतरे गए फलों का सेवन न करें। यह उदाहरण दिखाता है कि एक प्रकोप की जांच (Outbreak Investigation) में पशु चिकित्सक महामारी विज्ञानियों (Epidemiologists) के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कैसे काम करते हैं।
निष्कर्ष
“एक स्वास्थ्य” दृष्टिकोण केवल एक सरकारी नीति या वैज्ञानिक शब्दावली नहीं है; यह हमारे अस्तित्व की सुरक्षा के लिए एक अनिवार्य बदलाव है। जैसा कि हमने इस निबंध में देखा, मानव, पशु और पर्यावरण का स्वास्थ्य एक अटूट बंधन में बंधा है। इस बंधन की उपेक्षा करने की कीमत हम महामारियों, आर्थिक नुकसान और मानव जीवन की क्षति के रूप में चुकाते हैं। भारत का रोडमैप एक आशाजनक भविष्य की ओर इशारा करता है, जहां विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के बीच की दीवारें टूट रही हैं और सहयोग की नई संस्कृति जन्म ले रही है। राष्ट्रीय एक स्वास्थ्य मिशन और एकीकृत निगरानी प्रणालियां सही दिशा में उठाए गए कदम हैं। हालांकि, इस रोडमैप की सफलता काफी हद तक पशु चिकित्सा जन स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाने और पशु चिकित्सकों को सशक्त करने पर निर्भर करती है। हमें यह समझना होगा कि एक स्वस्थ पशु आबादी ही एक स्वस्थ मानव समाज की गारंटी है। पशु चिकित्सकों को केवल ‘पशुओं के डॉक्टर’ के रूप में देखने का नजरिया बदलना होगा; वे वास्तव में ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य के रक्षक’ हैं।
अंत में, महात्मा गांधी के शब्दों को याद करना प्रासंगिक होगा: “किसी राष्ट्र की महानता और उसकी नैतिक प्रगति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां जानवरों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है।” ‘एक स्वास्थ्य’ के संदर्भ में, यह कथन और भी गहरा अर्थ रखता है जानवरों की भलाई में ही हमारी भलाई निहित है। जूनोसिस के खिलाफ युद्ध में, हम अलग-अलग नहीं जीत सकते; हमें ‘एक स्वास्थ्य’ के ध्वज तले एकजुट होना ही होगा। यही एक सुरक्षित, स्वस्थ और समृद्ध भविष्य का मार्ग है।



