पषुओं में हरे चारे के खाने से होने वाले विशाक्कता एवं प्रबंधन
गोविन्द कुमार चैधरी1, रमेष कुमार निराला1, पंकज कुमार चैधरी2, अर्चना1, मनोज कुमार सिन्हा3 एवं आर के षर्मा4
बिहार पशु चिकित्सा महाविद्यालय, पटना, बिहार
1सह-प्राध्यापक, पषुचिकित्सा औशधि एवं विश विज्ञान विभाग, 2सह-प्राध्यापक, पषुचिकित्सा षरीर क्रिया विज्ञान विभाग, 3सहायक- प्राध्यापक, पषु षरीर रचना विभाग, सह-प्राध्यापक, पषुचिकित्सा परजीवि विज्ञान विभाग
षारांषः विष एक ऐसा पदार्थ है जिसके खाने, पीने एवं अधिक मात्रा मंे लगाने से प्रायः पशुओं की मृत्यु हो जाती हैं। बहुत से विशाक्त तत्व पौधे, फल, अनाज, खनिज या दवाॅइयों में पाये जाते है जो पशु को हानि पहुॅचाते है। पशुपालकों की असावधानी से भी ये विशाक्त तत्व पशु को हानि पहॅुचा सकते है। इसलिए पशुपालकांे को विशाक्त तत्वों के बारे में जानकारी होनी चाहिए व उनके सेवन से पशुओं को बचाने के लिए सावधनी रखनी चाहिए।
मुख्य षब्दः हरा चारा, पषु, विशाक्तता,
- सायनाइडविशाक्तताः
यह एक षक्तिषाली विश है जो कई प्रकार के पौधांे (ज्वार, बाजरा, चरी) में पाया जाता है। गर्मी के मौसम में पानी की कमी से अपूर्ण विकसित सूखी ज्वार को खिलाने से भी इस जहर का असर होता है। जानकारी के आभाव में पशुपालक भी ऐसा चारा पशु को खिला देता है
लक्षणः प्रभावित चारा खाने के 10-15 मिनट बाद ही निम्नलिखित लक्षण दिखाई देने लगते है और पशु 1-2 घण्टें में मर जाता है। पशु में बेचैनी, मॅुह खोल कर ष्वास लेना तथा मुॅह पर फेन होना, अफरा होना, पशु का गिर जाना एवं उठने में असमर्थ रहना। माॅस-पेषियांे में तीब्र ऐठन के साथ मिल्क फीवर की तरह सिर को बगल की तरफ घुमा कर रखना एवं आॅखे बन्द करना तथा मॅह से कड़वे बादाम जैसी गंध आना, दाॅतो का किटकिटाना एवं मौत के समय दम घुटने जैसी कराह व पीड़ा होती है।
बचावः
- पशुओंको चारागाह में कम बढ़ी हुई ज्वार, बाजरा, चरी नहीं खाने देना चाहिए।
- बौने, सूखकरटेढ़े पीले मुरझाये पौधो को चारे के रूप में उपयोग में नही लाना है।
- षुरूमें हरे चारे में सुखा चारा मिला कर खिलायें।
- फसलको ‘हे‘ या साइलेज के रूप में संरक्षित कर ले।
उपचारः
- सायनाइडविशाक्तता के लक्षण प्रकट होने पर पशु को सोडियम नाइट्राइट ३ ग्राम एवं सोडियम थायोसल्फेट 15 ग्राम की 200मि॰ली॰ औसत जल में घेालकर नस के माघ्यम से देना चाहिए।
- 30-50 ग्रामसोडियम थायासल्फेट हर घण्टे मुॅह से देना चाहिए।
- डेक्स्ट्रोसया कैल्बोराल एवं एन्टी हिस्टामिनिक का इन्जेक्षन देना चाहिए।
- नाइटेªट /नाइट्राइट बिशाक्तताः
नाइटेªट युक्त खादे, ऐसे पौधे जिन्हे उच्च प्रकार की नाइटेªट युक्त खाद दी गई हो के खाने अथवा सोडियम या पोटेषियम नाइटेªट के अधिक प्रयोग से बिशाक्तता उत्पन्न हो जाती है। नाइटेªट बिशाक्तता मुख्यतः ऐसे चारो सें होती है जिसकी वृद्वि रूक गयी हा एवं जो सूखे हो। उच्च नाइटेªट युक्त चारों का अधिक मात्रा में षरीर में पहुॅचने पर नाइटेªट का नाइट्राइट में परिवर्तन हो जाता है जो रक्त में पहुॅचकर हीमोग्लोबिन को मेटहीमोग्लोबिन में बदल देता है जिससे षरीर के विभिन्न ऊतकों में आक्सीजन नही पहुॅच पाती है और नाइटेªट /नाइट्राइट बिशाक्तता हो जाती है।
लक्षणः इससे पशुओ में निम्नलिखित लक्षण दिखाई देते है, पशु का ष्वसन एवं नाड़ी दर का बढ़ जाना, साॅस लेने में कठिनाई, लार का गिरना, उदर पीड़ा (पशु अपना मुॅह पेट की तरफ घुमा कर बैठ जाता है), माॅसपेषियों में कॅपकपी, आक्सीजन की कमी से ष्लेश्मा गहरे रंग की हो जाती है तथा रक्त चाकलेटी भूरा हो जाता है।
बचावः
- कमजोरपषुओ को नाइटेªट युक्त चारे के सेवन से बचायंे।
- बौने/सूखेऐठे, मुरझाये हुए पौधों को चारे के रूप मे उपयोग में न लायें।
उपचारः
- मेथिलीनब्लू 1-2 मि॰ग्रा॰ प्रति किलो षरीर भार पर 2-3 प्रतिषत घोल सीधे नस में देना चाहिए।
- 5-20 ग्रामप्रति किग्रा के हिसाब से स्कार्बिक ऐसिड (विटामिन ‘सी‘) सीधे नस में देना चाहिए।
- धतूराबिशाक्तताः
चरते समय पशु बीज सहित पौधे को खा जाता है, कभी-कभी पशुपालक न्यूमोनिया आदि में पशु को कई-कई धतूरे के फलो को खिला देते है जिससे धतूरा बिशाक्तता हो जाती है।
लक्षणः इससे पशुओ में मुख का सूखापन, आॅखो की पुतलियों का फेला होना, तीव्र एवं भरी हुई नाड़ी, ष्लेश्मा में कनजेषन, लार एवं अन्य श्राव में रूकावट तथा पक्षघात जैसे लक्षण दिखाई देता है।
उपचारः लाक्षणिक चिकित्सा।
- पाइलोकार्पिनया फाइसोस्टिग्मीन लाभकारी सिद्ध हो सकती है।
- पेटसाफ करने के लिए दस्तावार दवाॅए जैसे मंैगनिसियम सल्फेट आदि देना चाहिऐ।
- अमाषयनलिका से ॰.५ प्रतिषत पोटास के घोल से पेट धोना चाहिए।
- पानीअधिक मात्रा में पिलाना चाहिए।
- घुंघचीविशाक्तता:
घुंघची को औशधि के रूप में पीस कर अधिक मात्रा में खिला देने से अथवा दुष्मनी वष बीजों को पानी में पीस कर तथा सूई के आकार का बनाकर, धूप में सुखाकर पषु के मसीले भाग में खोंस देने से यह विशाक्तता उत्पन्न होती है।
लक्षणः असहनीय खोंचा मारने वाला तीव्र दर्द, स्थानीय सूजन, पहले तेज बुखार बाद में तापक्रम गिरकर निर्बलता का बढ़ना, तथा अन्त में बेहोष होकर पषु की मृत्यु।
उपचारः
- घावका पता लगाकर उसमें से सूई बाहर निकाल दें और घाव को एन्टीसेप्टिक लोषन से धोयें।
- मैगसल्फ$ नमक पानी में घोलकर जुलाब रूप में दें।
- ऐरीकोलीनहाइड्रो-ब्रोमाइड़ का इंजेक्षन एस0/सी0 रूप में।
- यदिउपलब्ध हो सके तो पषु को एन्टी-एब्रिन सीरम का इंजेक्षन दें।
- कुचला :
इसे स्ट्रीकनीन विश भी कहते हैं। दुष्मनी वष लोग कुचल का बीज तेल-खली में मिलाकर खिला देते हैं। इसे विषेशकर कुत्तों को खिलाया जाता है।
लक्षणः टेटनस जैसी अकड़न या ऐठन, पेषियों में कड़ापन और ष्वास कश्ट, षरीर की नसों में बहुत अधिक उत्तेजना, असह्य दर्द, कुत्तो में षारीरिक तापक्रम 20 थ् से 40 थ् तक बढ़ा हुआ, मितली, कै, बेचैनी, कराहना आदि ष्वास के अंगों का पक्षाघात एवं मृत्यु।
उपचारः
- पषुको कृत्रिम ष्वास दें।
- कैकराने के लिए- एपोमार्फिन 20 माइकोग्राम आई0वी0 द्वारा।
- इन्ट्रावलसोडियम5 ग्राम को 20 मिली0 पानी में घोलकर 30 मिग्रा0/किलो षरीर भार पर षिरा में।
- टैनिकएसिड़ 1 में 200 और पोटाष परमैगनेट 1 में 5000 पानी में घोलकर दे सकते हैं।
- पषुको अंधेरे, षान्तमय स्थान में रखकर बाह्य उत्तेजना से बचायें।
- कनेरकीविशाक्तताः
- यहविशाक्तता बीजों के चूर्ण के प्रयोग से होती है।
लक्षणः कश्टप्रद ष्वास-प्रष्वास, उदरषूल, मुंह से झाग का गिरना, सुस्ती एवं बेचैनी, पषु का कांपना, बार-बार पेषाब का आना एवं मांसपेषियों की ऐठन तथा कराह-कराह कर पषु की मृत्यु।
उपचारः
- मैगसल्फया खाने का नमक जुलाब रूप में।
- दर्दकम करने के लिए लार्गेक्टिल तथा झाग को रोकने के लिए एट्रोपीन सल्फेट का इंजेक्षन।
- मांसपेषियोंकी ऐठन में क्लोरेल हाइड्रेट अलसी के तेल में मिलाकर दें।
- डेक्स्ट्रोजसैलाइन 5 प्रतिषत घोल आई0/वी0।
- कपासबीजविशाक्तताः
कपास का छिलका युक्त बीज विशयुक्त होता है। जिसके खिलाने से या खाने से उसका विश पषु को प्रभावित कर देता है।
लक्षणः अन्तिम अंगो में सूजन भरा षोध, पिछला धड़ दुर्बल तथा आंख की पुतलियां फैली हुयी होती हैं।
उपचार व्यवस्थाः छिलके वाले बीज खिलाना बन्द कर दें तथा इसकी खली भी न खिलावें।
- भांग/गांजा/चरस विशाक्तता ( ब्ंदंइपेपदकपबं)ः
दर्द निवारण तथा पषु को नींद लाने के लिए इनकी मात्रा से अधिक प्रयोग करने पर षरीर में विश का प्रभाव हो जाता है। पषु कभी-कभी इनके पौधों को चरते समय खा लेता है।
लक्षणः सुस्ती एवं नींद, नाड़ी एवं ष्वास धीमी, पिछले भाग का पक्षाघात एसफइसिया (।ेचीलेपं) तथा मृत्यु।
उपचारः
- कैकराने की दवा देें।
- मैगसल्फका परगेटिव (जुलाब)।
- स्टीमुलंेट्स(ैजपउनसंदजे) का उपयोग।
- मदार/आकविशाक्तता(ब्ंसवजतवचपे)ः
आक के पौधे को पषु द्वारा खा लेने से अथवा पेट फूलने पर पषुपालक द्वारा अधिक फूल खिला देने से विश के लक्षण पैदा हो जाते हैं।
लक्षणः लगाने की जगह पर षोथ ( ैूमससपदह ), कै एवं लगातार लार बहना, टेटनस जैसे दौरे, धीमी ष्वास तथा पुतलियां फैली हुई।
उपचारः चिकित्सा लक्षणों के अनुसार की जाती है।
- सर्पदंषविश:
सर्प पषुओं को पैर या मुंह पर काट लेते हैं। अतः इन जगहों पर सांप के दांत का निषान देखना चाहिए।
लक्षणः काटने के स्थान पर दर्द एवं सूजन, मुंह से लार-फेन का आना, अकड़न, ऊंघना एवं षून्यता, फैली हुई आंख की पुतलियां, षरीर की समस्त ष्लैश्मिक झिल्लियों का लाल हो जाना, लेटना एवं पक्षाघात का लक्षण तथा अन्त में बेहोषी और पषु की पृथ्वी पर गिरकर ष्वास रूकने से मृत्यु।
उपचारः
- सांपके काटे हुए स्थान के ऊपर किसी कपड़े या रस्सी से बांध दें।
- काटेहुए स्थान को चाकू या ब्लेड़ से काटकर या चीरा लगाकर पोटाष परमैगनेट भर दें।
- यदिउपलब्ध हो तो तुरन्त ही एन्टीवेनम सीरम का इंजेक्षन पषु को षिरा में (आई0/वी0) लगा देना चाहिए।
- पषुके षरीर को कम्बल या टाट से ढ़क कर गर्म रखें।
- टेटनसतथा गैस गेन्ग्रीन के बचाव हेतु एन्टीटाॅक्सिन दें।
- कार्टीसोनएवं एन्टीहिस्टामाइन्स दें।
- कैल्षियमएवं इपीनेफ्रीन दें।
- द्रवचिकित्सा दें।
संदर्भ:
- रायबीके 2003. भेटनरी फार्माकोलाॅजी एण्ड थेराप्युटिक्स, कल्याणी पबलीषर्स



