Value Addition and Marketing of Goat Milk and Meat: A New Foundation for Rural Income

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2014

बकरी के दूध और मांस का मूल्यवर्धन एवं विपणन: ग्रामीण आय का नया आधार 

लेखकः डॉ. पूजा तम्बोली

भा.कृ.अनु.प.-भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान, झाँसी 284003 (उत्तर प्रदेश) भारत

*Corresponding author: tamboli.pooja307@gmail.com 

 सारांश: बकरियों की संख्या के आधार पर भारत का विश्व में दूसरा स्थान है। 20वीं पशुगणना (2019) के अनुसार, देश में बकरियों की संख्या लगभग 14.88 करोड़ है। पशु जैव विविधता की दृष्टि से भारत की तुलना विश्व का कोई अन्य देश नहीं कर सकता।

भारत में बकरी को ‘गरीब की गाय’ कहा जाता है, क्योंकि इसका पालन पोषण गाय और भैंस की तुलना में कहीं अधिक सस्ता और सरल होता है। बकरियां घास, झाड़ियाँ और पेड़ों की पत्तियाँ खाकर आसानी से जीवित रह सकती हैं और बदले में दूध, मांस और मेगनी (गोबर) के रूप में उपयोगी उत्पाद प्रदान करती हैं, जो कृषि के लिए उत्तम खाद का कार्य करते हैं।

बकरियों में जल्दी व्यस्क होने और जुड़वाँ बच्चे देने की विशेषता होती है, जिससे यह अन्य पशुओं की तुलना में अधिक लाभकारी सिद्ध होती हैं। यद्यपि बकरियों को मुख्यतः मांस हेतु पाला जाता है, परंतु इनका दूध भी अत्यंत पौष्टिक एवं औषधीय गुणों से भरपूर होता है। यह विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और रोगियों के लिए लाभकारी माना गया है।

वर्ष 2016-17 के अनुसार, भारत में उत्पादित कुल मांस में बकरी मांस की हिस्सेदारी 14.2% रही है। इसकी बाज़ार में अच्छी मांग रहती है और यह ऊँचे दामों पर बिकता है। इन्हीं सभी कारणों से बकरी पालन छोटे एवं मंझोले किसानों और भूमिहीन मजदूरों के लिए आय का एक उत्कृष्ट साधन बन गया है। बकरी पालन ग्रामीण भारत की आर्थिक उन्नति का एक सशक्त माध्यम बनता जा रहा है। विशेष रूप से बकरी के दूध और मांस की बढ़ती मांग ने इसके मूल्यवर्धन और विपणन के क्षेत्र में नए अवसर पैदा किए हैं। बकरी का दूध पोषक तत्वों और औषधीय गुणों से भरपूर होता है, जबकि बकरी का मांस स्वादिष्ट, सुपाच्य और बाजार में अत्यधिक मांग वाला उत्पाद है। यदि इन उत्पादों का वैज्ञानिक विधियों से प्रसंस्करण (Processing), आकर्षक पैकेजिंग, और आधुनिक विपणन माध्यमों द्वारा प्रचार किया जाए, तो यह ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार, स्वरोज़गार और आयवृद्धि का सशक्त साधन बन सकता है। यह लेख बकरी उत्पादों के मूल्यवर्धन के तरीकों, विपणन रणनीतियों और उनके संभावित लाभों पर प्रकाश डालता है। विशेषकर बकरी का दूध और मांस, जिनका यदि सही तरीके से मूल्यवर्धन (Value Addition) और विपणन (Marketing) किया जाए, तो यह ग्रामीण किसानों की आमदनी को कई गुना बढ़ा सकते हैं।

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प्रमुख शब्द: बकरी, दूध, मांस, मूल्यवर्धन, विपणन

बकरी पालन के लाभ

बकरियाँ एक बहुउपयोगी पशु हैं, जो एक साथ दूध, मांस, रेशा, त्वचा और खाद जैसे कई उत्पाद प्रदान करती हैं। गाय और भैंस जैसे अन्य पशुओं की तुलना में बकरी पालन के लिए कम स्थान और सीमित संसाधनों की ज़रूरत होती है। बकरी पालन में बुनियादी ढांचे, आहार और चिकित्सा जैसी आवश्यकताओं पर खर्च अपेक्षाकृत कम होता है, जिससे यह कम लागत में अधिक लाभ देने वाला व्यवसाय बनता है। अन्य फार्म पशुओं की तुलना में बकरियों की देखभाल और पालन आसान होता है। इससे कम श्रम और कम समय में बेहतर परिणाम मिलते हैं। बकरियाँ विभिन्न प्रकार की कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल होती हैं, और इनमें आमतौर पर रोगों की घटनाएँ कम देखी जाती हैं। बकरी पालन किसानों के लिए एक लाभदायक विकल्प है, जो मिश्रित खेती प्रणाली (Mixed Farming) में सफलतापूर्वक शामिल किया जा सकता है। प्रति इकाई निवेश पर बकरियाँ अपेक्षाकृत अधिक उत्पादन और लाभ प्रदान करती हैं।

बकरी से प्राप्त उत्पादों की विविधता

यदि बकरी उत्पादों को किसानों या चरवाहों के समूह द्वारा स्थानीय रूप से संसाधित किया जाए, तो इससे उनकी आय में महत्वपूर्ण वृद्धि हो सकती है। बकरियों से प्राप्त प्रमुख उत्पाद हैं:

  • दूध और उससे बने उत्पाद (जैसे मक्खन, पनीर)
  • मांस और शव उत्पाद
  • खाल (leather)
  • रेशा (fiber)
  • खाद (organic manure)

बकरी के दूध का महत्व और मूल्यवर्धन

बकरी का दूध पोषण और औषधीय गुणों से भरपूर होता है। यह लैक्टोज असहिष्णुता (lactose intolerance) से पीड़ित लोगों के लिए भी उपयोगी है। इसमें कैल्शियम, पोटैशियम, और प्रोटीन की भरपूर मात्रा होती है।

मूल्यवर्धन के तरीके:

  • फ्लेवरयुक्त दूध:बकरी के दूध में चॉकलेट, केसर, इलायची आदि फ्लेवर मिलाकर इसे बाजार में विशेष उत्पाद के रूप में बेचा जा सकता है।
  • दही, पनीर और घी:इन डेयरी उत्पादों की ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में भारी मांग है।
  • बकरी दूध से बने साबुन और क्रीम:शुद्धता और औषधीय गुणों के कारण यह सौंदर्य प्रसाधनों में भी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।
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 बकरी के मांस की मांग और मूल्यवर्धन

बकरी का मांस यानी चिकन के मुकाबले अधिक पसंद किया जाने वाला ‘मटन’, स्वाद और पौष्टिकता दोनों में श्रेष्ठ माना जाता है। इसकी मांग त्योहारों, शादी समारोहों, और रेस्टोरेंट व्यवसाय में लगातार बढ़ रही है।

मूल्यवर्धन के तरीके:

  • पैकेज्ड फ्रेश मटन:साफ-सुथरे, वैक्यूम पैक्ड मटन की शहरों में जबरदस्त मांग है।
  • मटन की रेडी-टू-कुक आइटम्स:मटन करी, कबाब, कीमा आदि को फ्रीज/पैक करके बेचना एक उभरता हुआ बाजार है।
  • बकरी मांस के अचार और मसालेदार ड्राय मटन:ये प्रोडक्ट्स ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर काफी लोकप्रिय हो रहे हैं।
  • बकरी के मांस को स्वादिष्ट, उपयोगी और लंबे समय तक टिकाऊ बनाने के लिए प्रसंस्करण किया जा सकता है। जैसे – स्मोक्ड (धूम्रपानयुक्त) सॉसेज, किण्वित मांस उत्पाद, मांस की रोटी, फ्रैंकफर्टर आदि।
    • धूम्रपान और किण्वित मांस उपभोक्ताओं के लिए स्वीकार्य हैं।
    • पके हुए बकरी मांस में विशिष्ट स्वाद उत्पन्न होता है जो अन्य प्रजातियों से अलग होता है।
  • पोस्टमॉर्टम तकनीकें:मांस की कोमलता और गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए शव पर एजिंग (aging), इलेक्ट्रिकल स्टिमुलेशन, और ब्लेड टेंडराइजेशन जैसे उपाय किए जा सकते हैं।
  • सांद्र आहार का प्रभाव:जिन बकरियों को संतुलित और ऊर्जा युक्त आहार (जैसे जौ, भूसी) दिया जाता है, उनके मांस में अधिक वसा, स्वाद और कोमलता पाई जाती है।
  • उत्पाद का पोषण मूल्य सुधारना:बकरी मांस में α-टोकोफेरोल मिलाने से उसकी ऑक्सीडेटिव स्थिरता बढ़ती है, जिससे मांस की शेल्फ लाइफ और गुणवत्ता दोनों में सुधार होता है।
  • पैकेजिंग और कटिंग स्टैंडर्ड:USDA जैसे संस्थानों के मानकों के अनुसार समान आकार और कटिंग मांस खाद्य सेवा क्षेत्र के लिए उपयुक्त होता है।

विपणन रणनीतियाँ (Marketing Strategies):

बकरी उत्पादों की बिक्री को बढ़ाने के लिए किसानों और उद्यमियों को पारंपरिक तरीकों से हटकर आधुनिक विपणन अपनाना चाहिए।

प्रमुख उपाय:

  1. स्थानीय ब्रांडिंग:अपने गांव, राज्य या नस्ल के नाम से ब्रांड तैयार करना।
  2. सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स:इंस्टाग्राम, फेसबुक और वेबसाइट के जरिए सीधे ग्राहकों से जुड़ाव।
  3. कोल्ड चेन और पैकेजिंग:अच्छी पैकेजिंग और कोल्ड स्टोरेज से उत्पाद की गुणवत्ता और शेल्फ लाइफ बढ़ाई जा सकती है।
  4. सहकारी समितियाँ और स्टार्टअप सहयोग:मिलकर काम करने से संसाधनों और लागत का बेहतर प्रबंधन होता है।
  5. मेलों और प्रदर्शनों में भागीदारी:लोकल फूड फेस्टिवल, हाट बाजार, और कृषि मेले प्रभावशाली प्लेटफॉर्म हो सकते हैं।
  6. सुसंगत समूहों में विपणन:
    एक जैसी उम्र, नस्ल और वजन की बकरियों का समूह बनाकर उन्हें बेचना मूल्य बढ़ाने का एक प्रभावी तरीका है।
  7. वितरण लागत में कमी:
    बिचौलियों की संख्या घटाकर औरसीधे बाजार या उपभोक्ताओं से जोड़कर किसानों को बेहतर मूल्य मिल सकता है।
  8. उच्च आय वर्ग के लिए प्रीमियम उत्पाद:
    उच्च आय वाले उपभोक्ता ऐसेमूल्यवर्धित खाद्य उत्पादों को पसंद करते हैं जो सुंदर पैकिंग, स्वाद, स्वास्थ्य और ब्रांडिंग के साथ हों।
  9. कम आय वर्ग के लिए सस्ती आपूर्ति:
    आयातित, जमे हुए मांस का मुकाबला करने के लिएस्थानीय सस्ते उत्पाद बनाए जाने चाहिए, ताकि घरेलू बाजार को संतुलित रखा जा सके।
  10. प्राकृतिक और पारंपरिक स्वाद का प्रचार:
    बकरी के मांस में मौजूद विशिष्टकार्बनिक अम्ल और पारंपरिक व्यंजन जैसे करी, चिली, पेटी आदि के माध्यम से स्थानीय और वैश्विक बाजारों में विशेष पहचान बनाई जा सकती है।
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निष्कर्ष:

बकरी के मांस में उच्च पोषण, विशिष्ट स्वाद और बहु-उपयोगिता की अपार संभावनाएं हैं। उचित प्रसंस्करण तकनीकों, नवाचारपूर्ण उत्पाद निर्माण और स्मार्ट विपणन रणनीतियों के माध्यम से इसकी उपयोगिता को और बढ़ाया जा सकता है। इस दिशा में सरकारी सहायता, प्रशिक्षण, अनुसंधान और निजी भागीदारी से बकरी मांस उद्योग, भारत की अर्थव्यवस्था को नया बल दे सकता है।  बकरी के दूध और मांस का मूल्यवर्धन एवं आधुनिक विपणन न केवल किसानों की आमदनी बढ़ाने में सहायक है, बल्कि यह भारत के पोषण सुरक्षा और रोज़गार सृजन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। अगर बकरी पालन को सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि व्यवसाय के रूप में देखा जाए — तो यह ग्रामीण भारत की आर्थिक क्रांति का हिस्सा बन सकता है।

चित्र: बकरी के दूध और मांस के उत्पादों का प्रदर्शन

 

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