शहरी भारत में आवारा पशु प्रबंधन: नीति और पद्धतियाँ

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 शहरी भारत में आवारा पशु प्रबंधन: नीति और पद्धतियाँ

शहरी भारत में आवारा पशु प्रबंधन: नीति और पद्धतियाँ

डॉ. अमित कुमार श्रीवास्तवा

भा.कृ.अ.प.- भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान

गोगामुख, असम ७८७०३५

पत्राचार* के लिये : ak.srivastvavet@icar.org.in & aksrivastavavet@gmail.com

सारांश

आवारा पशुओं की बढ़ती जनसंख्या सबसे गंभीर वैश्विक समस्याओं में से एक बन गई है, जिसका समुदाय, वातावरण और जन स्वास्थ्य पर कई नकारात्मक प्रभाव पड़ रहे हैं।अधिकांश आवारा पशु भोजन और आश्रय के लिए मनुष्यों पर निर्भर नहीं होते, इसलिए वे अनियंत्रित रूप से प्रजनन कर सकते हैं। आवारा पशुओं के अनियंत्रित प्रजनन से उनकी जनसंख्या बढ़ जाती है, जिससे शिकार, सड़क दुर्घटनाएँ, पशुजनित रोगों के संचरण की संभावना बढ़ जाती है और परिणामस्वरूप, वे कुछ बीमारियों के वाहक बन जाते हैं। आवारा पशुओं की स्थिति और प्रकृति के आधार पर आवारा पशुओं की जनसंख्या नियंत्रण के कई तरीके हैं। ग़ोवंश के लिये इन तरीकों में ग्राम गोसदनों, गौ अभयारण्यों और पशु कॉलोनियों की स्थापना और कुत्तों और बिल्लियों के लिये गर्भनिरोधक, जाल-नपुंसकीकरण, विष-निषेचन, इच्छामृत्यु और बंदूक से गोली मारना आदि शामिल हैं। प्रत्येक उल्लिखित तरीके के व्यावहारिकता, संचालन में आसानी, लागत, प्रभावशीलता, नैतिकता और पशु कल्याण के मुद्दों के अनुसार अपने फायदे और नुकसान हैं। निष्कर्षतः, आवारा पशुओं की आबादी और उनके द्वारा उत्पन्न समस्याओं पर सफलतापूर्वक नियंत्रण के लिए, पशु अधिकार कानून बनाने और उन्हें लागू करने, पशुओं के लिए चिकित्सा देखभाल (उपचार और टीकाकरण), भोजन, आश्रय प्रदान करने और उनके प्रजनन को नियंत्रित करने की आवश्यकता है। जन स्वास्थ्य और पर्यावरण एजेंसियां व्यक्तिगत और पर्यावरणीय स्वच्छता, पशुजनित और संक्रामक रोगों की रोकथाम और नियंत्रण को विनियमित करके सेवाओं में सुधार कर सकती हैं, जो आवारा पशुओं से क्रमशः जनता और अन्य पशुओं में फैल सकते हैं।

प्रस्तावना

आवारा पशुओं को उन प्राणियों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो सड़कों पर पैदा होते हैं,रहते हैं और प्रजनन करते हैं। आवारा पशु बिना मालिक वाले पालतू पशु है जो खुले में घूमते रहते है या खो जाते है। इसलिए, सामान्यतः गाय और उसके गोवंश, कुत्ते एवम्‌ बिल्लियों को, गाँवों, कस्बों और शहरों की सड़कों पर घूमते हुए आवारा पशु कहा जा सकता है। सामान्यतः आवारा पशुओं की बढ़ती आबादी, जो कस्बों और शहरों की सड़कों पर घूमते हैं, वातावरण, परिवहन व्यवस्था और लोगों के सामान्य जीवन के साथ-साथ स्वयं पशुओं के लिए भी एक गंभीर समस्या है। ये आवारा पशु संक्रमण का स्रोत हैं और यातायात दुर्घटनाओं का कारण भी बनते हैं। ये पशु अधिकांशतः स्वतंत्र रूप से रहते हैं, अनियंत्रित रूप से प्रजनन करते हैं, शहरी क्षेत्रों में अत्यधिक वंशवृद्धि करते हैं, और अक्सर अराजकता और उपद्रव का स्रोत बन जाते हैं और सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं वातावरण के लिए वैश्विक चुनौती बन जाते हैं।

आवारा पशुओं की आबादी निरंतर बढ़ती जा रही है और उनकी भारी संख्या ने एक अपरिहार्य समस्या पैदा कर दी है। एक अनुमान के अनुसार लगभग 76 लाख पालतू पशु हर साल आवारा हो जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, वर्ष 2009 और 2010 के बीच दुनिया भर में आवारा कुत्तों की अनुमानित संख्या लगभग 20.0 करोड़ या उससे अधिक थी (पैटी, 2011)। आवारा पशुओं की इस संख्या के साथ, हर वर्ष 40–50 लाख पशुओं को नष्ट कर दिया जाता है। भारत में आवारा पशुओं की समस्या वर्षों से चली आ रही है। ट्रैफिक जाम, सड़क दुर्घटनाएँ, चोटें और कई अन्य समस्याएँ इनके कारण होती हैं। इसके अलावा,आवारा पशुओं के अस्वच्छ रहने के कारण कई स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं। भोजन या पानी के माध्यम से फैलने वाले कई खतरनाक सूक्ष्मजीव और विषाणु इन पशुओं में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा भी है, जिसे आमतौर पर तब उठाया जाता है जब भी गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रश्न उठता है। बार-बार यह कहा जाता रहा है कि आवारा गोवंश इस बात का संकेत हैं कि ये अयोग्य हैं और इनका पालन-पोषण आर्थिक रूप से लाभदायक नहीं है। यही कारण है कि मालिक इन्हें अंततः बूचड़खाने की यात्रा पर धकेल देते हैं। चूँकि ये पशु अस्वस्थ होते हैं और विभिन्न बीमारियों का कारण बनते हैं, इसलिए इस बढ़ती समस्या को ध्यान में रखते हुए, पशुओं की सुरक्षा और मनुष्यों को संभावित समस्याओं से बचाने के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए।

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भारतीय कानून और अन्य पहल

भारत में ऐसे कई कानून हैं जो आवारा पशुओं को किसी भी प्रकार के आक्रमण या अमानवीय व्यवहार से बचाते हैं। भारतीय दंड संहिता-1860 (आईपीसी), जो आपराधिक कानून के सभी मूलभूत पहलुओं को संबोधित करती है, देश की आधिकारिक दंड संहिता है। क्रूरता के सभी कृत्य, जैसे पशुओं की हत्या, उन्हें अपंग बनाना, जहर देना या अनुपयोगी बनाना, आईपीसी की धारा 428 और 429 के तहत दंडनीय हैं। ‘पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम’ के तहत, आवारा कुत्तों को उठाया जाता है, उनकी नसबंदी की जाती है, रेबीज का टीका लगाया जाता है और उन्हें उनके संबंधित क्षेत्रों में पुन: प्रतिस्थापित कर दिया जाता है। यह पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2001 के अनुसार है, जो पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 382 के तहत बनाया गया है। नसबंदी आवारा कुत्तों की प्रजनन शक्ति को समाप्त करने और बच्चे पैदा करने से रोकने में सहयता करती है। इस अधिनियम के तहत आवारा कुत्तों को पीटना, मारना, भगाना, विस्थापित नहीं किया जाना चाहिए। आवारा पशुओं को खिलाने की प्रथा कानून द्वारा निषिद्ध नहीं है।

भारतीय संविधान में पशु कल्याण के लिए नागरिकों/स्वयंसेवकों पर सभी जीवों के प्रति दया भाव रखने के कर्तव्य का प्रावधान है। आवारा पशुओं को खिलाने के लिए दिशानिर्देशों का एक व्यापक सेट, हालही में भारतीय पशु कल्याण बोर्ड (AWBI) द्वारा विकसित किया गया है। संविधान क़े अनुच्छेद 51A के अनुसार प्रत्येक नागरिक का दायित्व है कि वह वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन करे, साथ ही “जीवों के प्रति दया का भाव रखे”। भारत के सबसे बड़े पशु कल्याण संगठनों में से एक, पीपल फॉर एनिमल्स (PFA) ने हज़ारों लोगों को फीडर कार्ड दिए हैं ताकि वे अपने पशुओं की देखभाल कर सकें। पीपल फॉर एनिमल्स की स्थापना वर्ष 1992 में पशु अधिकार कार्यकर्ता और लोकसभा सदस्या श्रीमती मेनका संजय गांधीजी ने की थी। इस संगठन की पूरे भारत देश में 100 से ज़्यादा क्षेत्रीय शाखाएँ हैं।

सभी प्रकार के जीवों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा संरक्षित किया गया है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2014 में, भारतीय पशु कल्याण बोर्ड की एक याचिका के मामले में, संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निहित जीवन के अधिकार को पशुओं पर भी लागू माना। यह ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है कि 8 जून, 2019 को पशु कल्याण कानून पर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के एक ऐतिहासिक फैसले के अनुसार, पशुओं और पक्षियों के भी मनुष्यों की तरह कानूनी अधिकार हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि नागरिकों की यह ज़िम्मेदारी है कि वे पशुओं के कल्याण की रक्षा करें और उन्हें बढ़ावा दें, और “पशु जगत के संरक्षक” के रूप में कार्य करें।

परिस्थितियाँ और पशुओं के प्रति व्यवहार

भारतीय पशु संरक्षण संगठनों के संघ द्वारा जारी एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वर्ष 2010 और 2020 के बीच 4,93,910 पशुओं पर मानवीय क्रूरता हुयी थी। वर्ष 2019 की पशुगणना के अनुसार, देश में आवारा कुत्तों और मवेशियों की संख्या 203.31 लाख थी। नवंबर 2021 में जारी “स्टेट ऑफ पेट होमलेसनेस इंडेक्स” शीर्षक से मार्स पेटकेयर इंडिया के एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में लगभग 50% वर्तमान और पूर्व पालतू पशु मालिकों ने दावा किया कि उन्होंने पहले किसी पालतू पशु को छोड़ दिया था, जबकि वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा 28% है। यह भारत में आवारा पशुओं की बढ़ती संख्या में परित्यक्त पालतू जानवरों के संभावित योगदान को दर्शाता है। महामारी के दौरान ऐसे जानवरों को छोड़ने की घटनाओं में संभावित वृद्धि हो सकती है, क्योंकि कई पशु मालिकों की आर्थिक स्थिति खराब हो सकती है अथवा उनकी देखभाल करने वालों की मृत्यु भी हो सकती है।

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नीतिगत मुद्दे

हालाँकि ऐसे आवारा जानवरों की सुरक्षा के लिए कई कानून हैं, लेकिन और सख्त नियमों और मौजूदा कानूनों के बेहतर क्रियान्वयन की आवश्यकता है। एक पालतू जानवर का मालिक जो “जानबूझकर या लापरवाही से” अपने पालतू जानवर से होने वाले संभावित खतरे के प्रति पर्याप्त सावधानी बरतने में विफल रहता है, तो उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 289 के तहत, दंड या क्षतिपूर्ति के रूप में छह महीने तक की कैद हो सकती है। वर्ष 2015 में शहर की एक गोशाला के प्रतिनिधियों और पशु तस्करों के बीच पकड़े गए पशुओं की रिहाई को लेकर हुए संघर्ष ने पशु अधिकार कानूनों की खामियों को उजागर किया, जिससे पशुओं की सुरक्षा और भी चुनौतीपूर्ण हो गई। पशु क्रूरता निवारण कानून के तहत पुलिस को पशुओं को ज़ब्त करने की अनुमति तो है, लेकिन उन्हें उनकी देखभाल के लिए संसाधन या धन नहीं दिया जाता।

भारतीय पशु क्रूरता निवारण अधिनियम की धारा 11, उन विशिष्ट अपराधों को सूचीबद्ध करता है जो क्रूरता के कृत्यों के लिए दंडनीय हैं। परिणामस्वरूप, यह अधिनियम पशुओं को मारना, लात मारना, सवारी करना, पीड़ा देना आदि जैसे कार्यों को गैरकानूनी बनाता है जिससे किसी भी पशु को अनावश्यक पीड़ा होती है। इस अधिनियम की धारा के तहत, अपराधी पर केवल 50 रुपये तक का जुर्माना अथवा तीन महीने तक के कारावास की सजा या दोनों की सजा दी जा सकती है। यह मामूली सजा एक औपचारिकता अधिक लगती है जो किसी तरह लोगों को आवारा पशुओं के साथ इस तरह के जघन्य व्यवहार को रोकने में अक्षम है। इसलिये अपराधों की सज़ा तय करते समय आनुपातिकता के सिद्धांत का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए।

 आवारा पशुओं की संख्या नियंत्रण लिये सुझाव

ग़ोवंश का नियंत्रण

आवारा गोवंश पशुओं और ‘तथाकथित’ बेकार या सूखे पशुओं की समस्या से निपटने की रणनीतियों को सभी स्तरों पर और विभिन्न एजेंसियों के संयुक्त प्रयास से लागू किया जाना चाहिए। ‘राष्ट्रीय पशु आयोग’ द्वारा इस उद्देश्य के लिए निम्नलिखित रणनीतियों की सिफ़ारिश की गई है:

  1. ग्राम गौ-सदनों की स्थापना

प्रत्येक गाँव में आवारा पशुओं की देखभाल के लिए एक ग्राम गौसदन होना चाहिए। साथ ही, मौसमी रूप से छोड़े गए पशुओं को भी वहाँ रखा जा सकता है। यह एक छोटा ग्राम स्तरीय संस्थान हें, जिसमें केवल ग्राम पंचायत क्षेत्र के आवारा मवेशी को रखने के लिये 100 एकड़ या उपलब्धता के अनुसार भूमि होती है। इसमें बायोगैस, जैव-उर्वरक, जैव-कीटनाशक, पंच-गव्य औषधियाँ, नस्ल सुधार, बैल सेवा और दूध की बिक्री से आय भी शामिल है। इस गौसदन का ‘कृषि विज्ञान केंद्रों, अनुसंधान संगठनों, कृषि और पशु चिकित्सा विस्तार इकाइयों आदि के साथ संबंध भी होता है। जैविक खेती, गोबर के वैज्ञानिक उपयोग, गोबर और गोमूत्र पर शोध कार्य इस मॉडल को आत्म निर्भर बनाया जा सकता है।

  1. गौ-अभयारण्यों की स्थापना

समिति ने यह यह प्रस्ताव दिया कि प्रत्येक राज्य में गौ-अभयारण्य स्थापित किए जाएँ। प्रत्येक राज्य में भूमि के बड़े हिस्से अनुपयोगी और खाली पड़े हैं। ऐसी भूमि को गौ अभयारण्यों के रूप में विकसित किया जा सकता है। आसपास के शहरों और कस्बों के सभी आवारा मवेशियों को इनमें रखा जा सकता है। इस प्रकार, यदि गौसदन ग्रामीण क्षेत्रों में आवारा मवेशियों की देखभाल करेंगे, तो गौअभयारण्य शहरों क़े आवारा मवेशियों की लगातार बढ़ती समस्या से छुटकारा पाने में मदद करेंगे।

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3.पशु कॉलोनियों की स्थापना

कुछ सफल गौ-अभयारण्यों को पशु कॉलोनियों के रूप में विकसित करने के लिए चुना जाना चाहिए। पशु कॉलोनियाँ पर्याप्त प्राकृतिक और चारा घास वाले क्षेत्र होंगे जहाँ दुधारू गायों को रखा जा सकता है। औसतन, 500 हेक्टेयर का एक फार्म 250 दुधारू गायों और 50 ‘गोपालक’ परिवारों के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त हो सकता है।

आवारा कुत्तों और बिल्लियों का नियंत्रण

आवारा पशुओं की बढ़ती समस्या को कम करने के लिए आवारा कुत्तों को मारने के कई उदाहरण सामने आए हैं। उदाहरण के लिए, वर्ष 2016 में केरल में एक आवारा कुत्ता उन्मूलन संस्था का गठन किया गया था, जिसने एक वर्ष में लगभग 300 आवारा कुत्तों को मार दिया। लेकिन यह अनैतिक है और समस्या का समाधान भी नहीं करता।आवारा कुत्तों और बिल्लियों की संख्या नियंत्रित करने के लिये निम्नलिखित उपाय अपनाए जाने चहिये:

अ.  गर्भनिरोधक

गर्भनिरोधक मादा पशुओं में गर्भधारण को रोकने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली विधि है और इसे किसी दवा, उपकरण या प्रक्रिया के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। गर्भनिरोधक एजेंटों का उपयोग उनके प्रकार (गोलियाँ या इंजेक्शन के रूप में) और उपयोग की विधि के आधार पर विभिन्न रूपों में किया जा सकता है। कुछ गर्भनिरोधक एजेंट हार्मोनल गतिविधियों में बदलाव करके गर्भनिरोधक को प्रेरित करते हैं, विशेष रूप से हार्मोन-आधारित गर्भनिरोधक जैसे डायथाइलस्टिलबेस्ट्रोल, प्रोजेस्टिन, मेड्रोक्सी प्रोजेस्टेरोन एसीटेट, प्रोलिजेस्टोन और माइबोलेरोन इत्यादि।

ब. जालनपुंसकीकरणवापसी

आवारा पशुओं को नियंत्रित करने के तरीकों, विशेष रूप से व्यावहारिक, प्रभावी और मानवीय विकल्पों की पहचान करने के संबंध में, जाल-नपुंसकीकरण-वापसी कार्यक्रमों को पशुओं को नुकसान पहुँचाए बिना प्रजनन को रोकने के लिए डिज़ाइन किया गया है। वर्तमान समय में, नीदरलैंड एकमात्र ऐसा देश है जहाँ कोई आवारा कुत्ता नहीं है, क्योंकि उनका संग्रह, नसबंदी, टीकाकरण और वापसी कार्यक्रम एक सरकारी नसबंदी कार्यक्रम है। इस विधि में, पशुओं को जाल में फँसाया जाता है, उनकी नसबंदी की जाती है और उन्हें रेबीज का टीका लगाकर, उनके मूल स्थान में वापस छोड़ दिया जाता है। यह प्रक्रिया पशु चिकित्सकों द्वारा मादा पशु की नसबंदी या नर पशु का बधियाकरण करके की जाती है। एशिया में रेबीज से होने वाली मौतों में भारत का योगदान 59.9 प्रतिशत और वैश्विक स्तर पर 35% है। इसलिए, नसबंदी के साथ-साथ रेबीज टीकाकरण अभियान भी चलाया जाना चाहिए। आवारा पशु जनसंख्या नियंत्रण के लिए एक मानवीय विधि के रूप में यह प्रणाली कल्याणकारी संगठनों द्वारा अनुशंसित है।

स. इच्छा मृत्यु

यूथेनेशिया शब्द, जो ग्रीक शब्द “सुरक्षित हत्या” या “अच्छी मृत्यु” से लिया गया है, चिकित्सीय उपायों के माध्यम से पशुओं को मारने का एक मानवीय तरीका है। यह बार्बिटुरेट्स और केटामाइन जैसे संवेदनाहारी एजेंटों की अधिक मात्रा में इंजेक्सन देकर प्राप्त किया जा सकता है। यह दर्द रहित है और तेजी से बेहोशी, फिर श्वसन और हृदय गति रुकना और अंततः मृत्यु का कारण बनता है। दूसरे शब्दों में, यह शीघ्र मृत्यु का दर्द रहित उपाय है। विश्व पशु संरक्षण संघ (WSPA) का मानना है कि इच्छामृत्यु के माध्यम से पालतू पशुओं की हत्या एक मानवीय तरीका है और इसे केवल प्रशिक्षित पेशेवरों द्वारा ही किया जाना चाहिए।

द. विषाक्तता

विष रासायनिक पदार्थ होते हैं जो अंगों, तंत्र या शरीर को क्षति पहुँचाते हैं। यह तब होता है जब कोई जानवर पर्याप्त मात्रा में रसायनों को अवशोषित कर लेता है या उनके संपर्क में आता है। आवारा पशुओं की आबादी को नियंत्रित करने के तरीकों में से एक विषाक्तता है। सबसे अधिक इस्तेमाल किए जाने वाले रसायन एंटीकोआगुलंट्स और सोडियम मोनोफ्लोरोएसीटेट हैं। विषाक्तता से जुड़ी मुख्य समस्या यह है कि यह क्रूर है, और जानवरों की दर्दनाक और धीमी मौत होती है।

५. बंदूक से गोली मारना

शूटिंग आवारा पशु जनसंख्या नियंत्रण की एक और विधि है जो त्वरित, दर्द रहित और कुशल है। यह तभी संभव है जब गोलियां लक्षित जानवरों पर लगें। बिना सरकारी अनुमति के सभी के लिए बंदूक चलाना एक चुनौती है। सड़क पर आवारा जानवरों को गोली मारना खतरनाक है और अगर निशाना चूक जाए और गलती से लोगों को लग जाए तो इसके कई जोखिम हैं। इसे सफाई तकनीक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, यह पागल कुत्तों को नियंत्रित करने का सबसे तेज़ तरीका है ।

आवारा पशुओं के अधिकारों के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए भी पहल की जानी चाहिए ताकि सभी नागरिक आवारा पशुओं की स्थिति के प्रति संवेदनशील बन सके। लोगों को शुद्ध नस्ल के कुत्तों के बजाय आवारा कुत्तों को अपनाने के लिए प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। दुकानों से खरीदे गए कुत्तों पर कर लगाया जाना चाहिए। इसके अलावा, पालतू पशुओं के मालिकों पर नियंत्रण के लिए कानून होने चाहिए जिसका उद्देश्य पालतू जानवरों को छोड़ने की दर को कम करना हो। आवारा पशुओं को आश्रय प्रदान करके उन्हें फिर से घर देने की पहल की जानी चाहिए।

निष्कर्ष

पशुओं की सुरक्षा के दायित्व को परिभाषित करने वाले संवैधानिक प्रावधानों के परिणामस्वरूप, संघीय और राज्य दोनों स्तरों पर पशु संरक्षण कानून पारित किए गए हैं, जिनमें 1960 का पशु क्रूरता निवारण अधिनियम सबसे उल्लेखनीय उदाहरण है। आवारा पशुओं की आबादी को नियंत्रित करने के लिए पिछले कई दशकों से विभिन्न तरीकों का प्रयोग किया जाता रहा है। ग़ोवंश के लिये इन तरीकों में ग्राम गौसदनों, गौ अभयारण्यों और पशु कॉलोनियों की स्थापना और कुत्तों और बिल्लियों के लिये इन तरीकों में ज़हर देना, नपुंसक बनाना, दवाईयों से इच्छामृत्यु देना और हार्मोन-आधारित गर्भनिरोधक दवाईयाँ देना इत्यादि शामिल है। नियमित रूप से नसबंदी और टीकाकरण अभियान चलाए जाने चाहिए और लोगों को इस बात के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए कि आवारा पशु एक ख़तरा होने के बजाय समाज के लिए एक ज़िम्मेदारी हैं।

संदर्भ :

  1. अ‍ॅबुबकर अब्दुलकरीम, मोहम्मद आज़म खान बिन गोरीमन खान और एर्किहुन अकलिलु (2021(.आवारा पशु जनसंख्या नियंत्रण: विधियाँ, जन स्वास्थ्य चिंताएँ, नैतिकता और पशु कल्याण संबंधी मुद्दे, World Veterinary Journal, 11(3):319-326, सितंबर, 2021
  2. अज्ञात (2021)। गौशालाएँ। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित MAW-004, एनिमल वेलफेयर प्रैक्टिसेज, इकोनॉमिक्स एंड लाइवलीहुड, 4(1): 76-78में।
  3. इशिका इशानवी (2023)। आवारा पशु: एक सामाजिक उत्तरदायित्व या खतरा? Jus Corpus Law Journal Open Access Law Journal पृ. 1036-1042,फरवरी 2023
  4. पैटी एस.(2011). वैश्विक आवारा कुत्तों की जनसंख्या संकट। नेशनल एनिमल इंटरेस्ट अलायंस। 14 जुलाई, 2025 को पुनःप्राप्त उपलब्ध:

http://www.naiaonline.org/articles/the-global-stray-dog-population-crisis-and-humane-relocation#sthash.O9Kc3L4P.xlQzPm3O.dpbs

 

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