पशुधन,वन्यजीव,मानव इंटरफेस एक जटिल संबंध और इसके प्रभाव
परिचय
आज के समय में मानव गतिविधियों में तीव्र वृद्धि, शहरीकरण, कृषि विस्तार और जंगलों की कटाई के कारण पशुधन, वन्यजीव और मानव के बीच संपर्क बहुत अधिक बढ़ गया है। यह त्रिकोणीय संपर्क कई सामाजिक, जैविक और पारिस्थितिकीय परिणामों को जन्म देता है। वर्त्तमान स्थिति में पशुधन, वन्यजीव और मानवों के बीच संबंध बढ़ने के कारण संक्रामक बीमारियों के स्पिलओवर यानी एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति में संक्रमण फैलने की घटनाओं को जन्म देता है। विशेषकर जब कोई बीमारी वन्यजीव से पशुधन और फिर मानवों तक पहुंचती हैए तो यह वैश्विक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन जाती है।
पशुधन.वन्यजीव.मानव इंटरफेस क्या है।
जब वन्यजीव, पालतू पशुधन और मनुष्य एक.दूसरे के निकट संपर्क में आते हैंए तो उन्हें साझा पर्यावरण संसाधन और संक्रमणों का भागी बनना पड़ता है। इसे ही इंटरफेस कहा जाता है।
उदाहरण के लिए-
- चूंकिमानव आबादी तेजी से बढ़ रही है और जैव विविधता उच्च बनी हुई हैए इसलिए पशुधन, वन्यजीव और मानवों के बीच संपर्क तेजी से आम होता जा रहा है। फलस्वरुप आवास में गड़बड़ी एवं जंगली जानवरों के प्राकृतिक आवासों का विनाश शामिल है एक और महत्वपूर्ण कारक है।
- अन्य कारकों में वनों की कटाई पशुओं द्वारा अत्यधिक चराईतथा मानव बस्तियों और कृषि के विस्तार के कारण बड़े पैमाने पर वन्यजीवों काआवास विनाश शामिल हैं।जब खेतों के पास जंगल होते हैं और जंगली सूअर या बंदर खेत में आते हैं। और जब गाय.बकरी खुले जंगल में चरती हैं और वहाँ वन्यजीवों से संपर्क में आती हैं।जब इंसान वन्यजीवों के साथ मांस बाजार पालतू व्यापार या पर्यटन के माध्यम से संपर्क में आता है।
स्पिलओवर घटनाएँ और इनका महत्व
स्पिलओवर का अर्थ है किसी रोग का एक प्रजाति ;आमतौर पर वन्यजीव से दूसरी प्रजाति जैसे पशु या मानव में फैलना। यह प्राकृतिक रूप से भी हो सकता है लेकिन मानव गतिविधियों ने इसे तेज कर दिया है।
उदाहरण- कोरोना वायरस संभवतः चमगादड़ों से इंसानों में फैला है। निपाह वायरस चमगादड़ से सुअर और फिर मानवों में फैला है। एवियन फ्लू, स्वाइन फ्लू, और रेबीज जैसी बीमारियाँ भी इसी इंटरफेस की देन हैं।
स्पिलओवर केवल स्वास्थ्य की समस्या नहीं है बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक संकट, यात्रा पर रोक, व्यापार बाधा और मृत्यु दर बढ़ाने जैसी समस्याएँ भी लाता है
पशुधन.वन्यजीव.मानव इंटरफेस क्यों खतरनाक होता जा रहा है
- जंगलों की कटाई -इंसानों द्वारा जंगल काटकर वहाँ कृषि,आवास या उद्योग स्थापित करने से वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास समाप्त होता जा रहा है।
- पशुधन पालन का विस्तार- जैसेजैसे पशुधन की संख्या बढ़ रही हैए वे जंगलों और वन्यजीवों के इलाके में चराई के लिए जा रहे हैं।
- शहरीकरण और घनत्व में वृद्धि- अधिकजनसंख्या और भीड़भाड़ के कारण मानवों का वन्यजीव क्षेत्रों में हस्तक्षेप बढ़ा है।
- अवैध वन्यजीव व्यापार-जानवरों को पालतू बनाने, मांस के लिए बेचने या दवाइयों के लिए उपयोग करने से इंसानों और वन्यजीवों का घनिष्ठ संपर्क बढ़ा है
- जोखिम और प्रभाव- नए रोगों का जन्म और फैलाव पशु और मानव मृत्यु दर में वृद्धि, स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव, आर्थिक नुकसान और व्यापार में गिरावटए पर्यावरणीय असंतुलन
प्रबंधन और समाधान
स्पिलओवर और इंटरफेस के खतरों को कम करने के लिए एक समग्र और बहुस्तरीय दृष्टिकोण जरूरी है।
- वनहेल्थ दृष्टिकोण अपनाना- यह एक ऐसा दृष्टिकोण है जो मानव, पशु और पर्यावरण के स्वास्थ्य को एक साथ जोड़ता है। इसके अंतर्गत पशु और मानव दोनों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाना, रोगों की निगरानी प्रणाली विकसित करना, पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देना है
- जागरूकता और शिक्षा- ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में लोगों को यह समझाना जरूरी है कि वन्यजीवों से अनावश्यक संपर्क किस प्रकार जानलेवा हो सकता है। इसमें आवास संरक्षण,सामुदायिक सहभागिता, पूर्व चेतावनी प्रणाली, उचित अपशिष्ट प्रबंधन, प्रभावी भूमि.उपयोग नियोजन और टिकाऊ आजीविका प्रथाओं को बढ़ावा देना शामिल है।
- वन्यजीवों और पर्यावरण का संरक्षण- जंगलों की कटाई रोकना,जैव विविधता बनाए रखना, पशुओं के बाड़ों के चारों ओर अवरोधों का निर्माण, विशिष्ट वन्यजीव गलियारे का निर्माण तथा हाथियों को रोकने के लिए खेतों के चारों ओर मधुमक्खी के छत्ते जैसी बाड़ लगाना ये सभी मानव.वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए सफल और लागत प्रभावी रणनीतियाँ साबित हुई हैं।
- पशुधन प्रबंधन में सुधार- स्वच्छता बनाए रखनाए नियमित टीकाकरणए पशुओं को नियंत्रित क्षेत्र में चरानाजानवरों को एक तरह से प्रबंधित किया जाना चाहिए जो प्राकृतिक संसाधनों और जैव विविधता का संरक्षण करते हैं।कोई एंटीबायोटिक या कृत्रिम विकास हार्मोन की अनुमति नहीं होना चाहिए।सभी फ़ीड को चाहिए सौ प्रतिशत जैविक होना चाहिए और जानवरों को प्रमाणित जैविक भूमि पर उठाया रखा जाना चाहिए।
- अनुसंधान और निगरानी प्रणाली-ज़ूनोटिक रोगों को रोकने के लिए अनुसंधान और निगरानी प्रणाली को मजबूत करना महत्वपूर्ण है। इसमें प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, प्रयोगशाला क्षमता में वृद्धि और डेटा साझाकरण और विश्लेषण को बेहतर बनाना शामिल है। साथ ही ज़ूनोटिक रोगों की रोकथाम के लिए अनुसंधान और विकास क्षमताओं को बढ़ाना भी आवश्यक है जिसमें पारिस्थितिकी ज़ूनोटिक रोगों के विज्ञान और टीकों नैदानिक परीक्षणों और उपचारों का विकास शामिल है।
निष्कर्ष
पशुधन.वन्यजीव.मानव इंटरफेस हमारे समय की एक महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण वास्तविकता है। यदि इस पर ध्यान न दिया गया। तो भविष्य में और अधिक घातक महामारियाँ जन्म ले सकती हैं। एक जिम्मेदार वैज्ञानिक और सतत दृष्टिकोण अपनाकर ही हम स्पिलओवर जैसी घटनाओं को रोक सकते हैं और एक सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ सकते हैं।
Dr. Anchal Keshri



