गायों में लंपी स्किन डिज़ीज़ (Lumpy Skin Disease): एक गंभीर उभरता हुआ रोग
Sudhanshu Kumar1 and Anil Kumar Safi2
1Assistant Professor, Department of Veterinary Medicine
2Assistant Professor, Department of Veterinary Anatomy
Mahala Veterinary College, Reengus, RAJUVAS
Corresponding author: Sudhanshubvc7463@gmail.com
परिचय
लंपी स्किन डिज़ीज़ (Lumpy Skin Disease–LSD) गायों और भैंसों में होने वाला एक अत्यधिक संक्रामक वायरल रोग है, जिसने हाल के वर्षों में भारत सहित एशिया, अफ्रीका और यूरोप के कई देशों में गंभीर रूप से पैर पसार लिए हैं। यह रोग मुख्यतः कैप्रिपॉक्स वायरस (Capripoxvirus) के कारण होता है, जो पॉक्सवीरिडी (Poxviridae) कुल से संबंधित है और शीप पॉक्स व गोट पॉक्स वायरस से निकट संबंध रखता है। यह रोग पशुपालकों के लिए आर्थिक रूप से अत्यंत विनाशकारी सिद्ध होता है, क्योंकि इससे दूध उत्पादन में भारी गिरावट, पशुओं का दुबला-पन, कार्यक्षमता में कमी, प्रजनन क्षमता में बाधा तथा गंभीर मामलों में पशुओं की मृत्यु तक हो सकती है। संक्रमित दुधारू पशुओं में दूध की मात्रा और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती हैं, जिससे दुग्ध उद्योग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
लंपी स्किन डिज़ीज़ की प्रमुख पहचान पशुओं की त्वचा पर बनने वाली कठोर, गोलाकार गांठें (लंप्स) हैं, जो पूरे शरीर—विशेषकर गर्दन, कंधे, पीठ, थन और जननांगों—पर दिखाई देती हैं। इसके साथ-साथ तेज बुखार, भूख न लगना, लसीका ग्रंथियों का सूजन, लंगड़ापन, आंख और नाक से स्राव तथा कभी-कभी त्वचा के घावों में द्वितीयक जीवाणु संक्रमण भी देखने को मिलता है।यह रोग मुख्यतः रक्त चूसने वाले कीटों जैसे मच्छर, मक्खी, टिक और जूं के माध्यम से फैलता है, जिससे मानसून और आर्द्र मौसम में इसका प्रकोप अधिक देखा जाता है। प्रत्यक्ष संपर्क, दूषित चारा-पानी, उपकरण तथा संक्रमित पशुओं की आवाजाही भी रोग के प्रसार में सहायक होती है।
रोग का प्रसार (संक्रमण का तरीका)
लंपी स्किन डिज़ीज़ का प्रसार मुख्य रूप से
- मच्छर
- मक्खी
- किलनी (Ticks)
- जूं
जैसे रक्त चूसने वाले कीटों द्वारा होता है। संक्रमित पशुओं के सीधे संपर्क, दूषित उपकरणों और परिवहन के दौरान भी रोग फैल सकता है।
रोग के लक्षण लंपी स्किन डिज़ीज़ (LSD) के लक्षण रोग की तीव्रता, पशु की उम्र, प्रतिरोधक क्षमता और द्वितीयक संक्रमण पर निर्भर करते हैं। सामान्यतः रोग के लक्षण संक्रमण के 4–14 दिनों के भीतर दिखाई देने लगते हैं। इस रोग के प्रमुख एवं विस्तृत लक्षण निम्नलिखित हैं:
- तेज बुखार (40–41°C या उससे अधिक):रोग की शुरुआत अचानक तेज बुखार से होती है, जो कई दिनों तक बना रह सकता है। बुखार के साथ पशु सुस्त हो जाता है और सामान्य गतिविधियों में कमी आ जाती है।
- शरीर पर गोल, कठोर गांठें (Lumps):यह रोग की सबसे विशिष्ट पहचान है। त्वचा पर 2–5 सेमी या उससे अधिक व्यास कीगोल, ठोस और दर्दनाक गांठें विकसित होती हैं। ये गांठें गर्दन, कंधे, पीठ, जांघ, थन, पेट तथा जननांगों के आसपास अधिक पाई जाती हैं। कुछ मामलों में ये गांठें गहरी होकर मांसपेशियों तक पहुंच जाती हैं।
- त्वचा पर सूजन, घाव और नेक्रोसिस:समय के साथ गांठें फट सकती हैं और उनमें से मवाद या सीरमी द्रव निकल सकता है। गंभीर मामलों में त्वचा का ऊतक मर जाता है (नेक्रोसिस) जिससेखुले घाव बन जाते हैं और द्वितीयक जीवाणु संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
- लिम्फ नोड्स का बढ़ना (Lymphadenopathy):विशेष रूप से प्री-स्कैपुलर और प्री-फेमोरल लिम्फ नोड्स स्पष्ट रूप से बढ़ जाते हैं और दर्दनाक हो सकते हैं, जो शरीर में संक्रमण के प्रसार का संकेत है।
- दूध उत्पादन में अचानक और भारी कमी:दुधारू पशुओं में दूध की मात्रा में तीव्र गिरावट आती है। कई मामलों में दूध की गुणवत्ता भी खराब हो जाती है, जिससे आर्थिक नुकसान होता है।
- भूख न लगना (Anorexia) और कमजोरी:पशु खाना-पीना कम कर देता है, शरीर कमजोर हो जाता है और वजन तेजी से घटने लगता है। लंबे समय तक बीमारी रहने पर पशु कुपोषित हो सकता है।
- आंख और नाक से स्राव:कुछ पशुओं में आंखों से पानी या मवाद आना (कंजंक्टिवाइटिस) तथा नाक से स्राव (राइनाइटिस) देखा जाता है, जिससे श्वसन कष्ट भी हो सकता है।
- लंगड़ापन (Lameness):पैरों के जोड़ों या त्वचा में गांठें और सूजन के कारण पशु चलने में कठिनाई महसूस करता है। गंभीर मामलों में पशु खड़ा होने में भी असमर्थ हो सकता है।
- जनन तंत्र पर प्रभाव:गर्भित पशुओं मेंगर्भपात हो सकता है। नर पशुओं में वृषण की सूजन (ऑर्काइटिस) और अस्थायी या स्थायी बांझपन भी देखा गया है।
- त्वचा, थन और थनाग्र की जटिलताएं:थन पर गांठें और घाव होने से दुग्ध दोहन में कठिनाई होती है तथामास्टाइटिस की संभावना बढ़ जाती है।
- मृत्यु (Severe cases):हालांकि LSD में मृत्यु दर सामान्यतः कम (1–5%) होती है, लेकिनबछड़ों, कमजोर और गंभीर रूप से संक्रमित पशुओं में मृत्यु भी हो सकती है, विशेषकर जब द्वितीयक संक्रमण और निर्जलीकरण हो जाए।
निदान (Diagnosis)
रोग का निदान मुख्यतः लक्षणों के आधार पर किया जाता है। पुष्टि के लिए
- PCR टेस्ट
- वायरस आइसोलेशन
- सीरोलॉजिकल टेस्ट
का प्रयोग किया जाता है।
चूँकि लंपी स्किन डिज़ीज़ (LSD) एक वायरल रोग है, इसलिए इसका कोई विशिष्ट उपचार उपलब्ध नहीं है। वर्तमान में इसका उपचार मुख्यतः सहायक (Supportive) एवं लक्षणात्मक (Symptomatic) होता है, जिसका उद्देश्य पशु की पीड़ा कम करना, द्वितीयक संक्रमण को रोकना तथा शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ करना होता है। वैज्ञानिक अध्ययनों और फील्ड केस-रिपोर्ट्स से यह सिद्ध हुआ है कि समय पर दिया गया सहायक उपचार रोग की गंभीरता और मृत्यु दर को काफी हद तक कम कर सकता है।
1. बुखार, दर्द एवं सूजन का नियंत्रण
LSD से पीड़ित पशुओं में तेज बुखार, त्वचा पर दर्दयुक्त गांठें तथा सूजन देखी जाती है, जिससे पशु का खाना-पीना कम हो जाता है और कमजोरी बढ़ती है। ऐसी स्थिति में ज्वरनाशक, दर्द निवारक एवं सूजनरोधी दवाओं का उपयोग किया जाता है, जिससे शरीर का तापमान नियंत्रित होता है, दर्द में राहत मिलती है और पशु की सामान्य गतिविधियाँ धीरे-धीरे बहाल होने लगती हैं। अध्ययनों में पाया गया है कि इन दवाओं से पशु की भूख में सुधार होता है और रिकवरी की गति तेज होती है।
- द्वितीयक बैक्टीरियल संक्रमण की रोकथाम
LSD में त्वचा की गांठें फटने पर खुले घाव बन जाते हैं, जिनसे बैक्टीरिया के प्रवेश की संभावना बढ़ जाती है। इससे त्वचा संक्रमण, फोड़े, न्यूमोनिया या सेप्टीसीमिया जैसी जटिलताएँ हो सकती हैं। इसलिए व्यापक प्रभाव वाले (broad spectrum Antibiotics) एंटीबायोटिक्स का उपयोग द्वितीयक संक्रमण को रोकने या नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।
विभिन्न केस-स्टडीज़ में यह देखा गया है कि सहायक उपचार के साथ एंटीबायोटिक देने से जटिलताओं में कमी आई और पशु अपेक्षाकृत जल्दी स्वस्थ हुआ।
3. घावों की देखभाल एवं स्वच्छता
LSD के दौरान त्वचा पर बनने वाली गांठें बाद में घाव का रूप ले सकती हैं।
इन घावों की नियमित सफाई एंटीसेप्टिक घोल से करना अत्यंत आवश्यक है।
स्वच्छता बनाए रखने से संक्रमण की संभावना कम होती है और घाव भरने की प्रक्रिया तेज होती है। वैज्ञानिक रिपोर्टों में यह स्पष्ट किया गया है कि उचित वाउंड-केयर से त्वचा की जटिलताएँ और स्थायी निशान (scars) कम हो जाते हैं।
4. पोषण एवं प्रतिरक्षा समर्थन
बीमार पशु को रोग से उबरने के लिए अतिरिक्त ऊर्जा और पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। पशु को संतुलित, उच्च-प्रोटीन आहार, पर्याप्त हरा चारा और स्वच्छ पेयजल देना चाहिए। विटामिन एवं खनिज पूरक देने से रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार होता है और पशु शीघ्र स्वस्थ होता है। अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ है कि अच्छा पोषण LSD से उबरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
रोकथाम एवं नियंत्रण
- प्रभावित पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखें
- कीट नियंत्रण (Insect control) पर विशेष ध्यान दें
- पशु शेड की नियमित सफाई एवं कीटनाशक छिड़काव
- संक्रमित क्षेत्र में पशुओं की आवाजाही पर रोक
- टीकाकरण (Vaccination)सबसे प्रभावी उपाय है
भारत में गोट पॉक्स वैक्सीन का उपयोग LSD की रोकथाम में सफल पाया गया है।
निष्कर्ष
लंपी स्किन डिज़ीज़ एक गंभीर, संक्रामक और आर्थिक रूप से नुकसानदायक रोग है। पशुपालकों को इस रोग के प्रति जागरूक होना आवश्यक है ताकि पशुधन स्वास्थ्य और डेयरी उद्योग की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। हालांकि इस रोग की मृत्यु दर अपेक्षाकृत कम होती है, लेकिन रोगग्रस्तता (morbidity) अधिक होने के कारण बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान होता है। अतः समय पर रोग की पहचान, संक्रमित पशुओं का पृथक्करण, कीट नियंत्रण उपाय, उचित पोषण तथा टीकाकरण इस रोग की रोकथाम और नियंत्रण के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
इस प्रकार, लंपी स्किन डिज़ीज़ न केवल एक पशु-स्वास्थ्य समस्या है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पशुपालकों की आजीविका के लिए भी एक गंभीर चुनौती बन चुकी है।
References
- OIE (World Organisation for Animal Health). Lumpy Skin Disease – Technical Disease Card.
- FAO (2020). Lumpy Skin Disease – A Field Manual.
- Gupta, T. et al. (2022). Emergence of Lumpy Skin Disease in India. Indian Journal of Animal Sciences.
- Ministry of Fisheries, Animal Husbandry and Dairying, Govt. of India (2022). LSD Advisory Guidelines.



