पशुओं में पैर की बनावट एवं चलने की शैलियाँ
डॉ. भूपेन्द्र कुमार देवांगन¹, डॉ. दुर्गा चौरसिया², डॉ. डिंपल पैकरा¹ एवं डॉ. दिलीप पैकरा¹
¹ पशु चिकित्सा सहायक शल्यज्ञ, पशुधन विकास विभाग, छत्तीसगढ़ शासन
² प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष, पशु शरीर रचना विज्ञान विभाग, पशु चिकित्सा विज्ञान एवं पशु पालन महाविद्यालय, अंजोरा, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
चौपाया पशुओं (Quadrupeds) में पैरों की संरचना (Limb structure) उनके चलने-फिरने (Locomotion), गति (Speed), संतुलन (Stability) तथा पर्यावरणीय अनुकूलन (Adaptation) से घनिष्ठ रूप से संबंधित होती है। पशु चलते समय अपने पैर के किस भाग से भूमि का संपर्क करते हैं, इसके आधार पर उन्हें मुख्यतः तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है— प्लांटिग्रेड (Plantigrade), डिजिटिग्रेड (Digitigrade) तथा अनगुलेट (Unguligrade / Ungulates)। यह वर्गीकरण पशु शरीर रचना विज्ञान (Veterinary Anatomy) तथा तुलनात्मक शरीर रचना (Comparative Anatomy) के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

- प्लांटिग्रेड (Plantigrade) चाल
प्लांटिग्रेड पशुओं में चलने के दौरान पैर का सम्पूर्ण भाग—उंगलियाँ (Phalanges), मेटाकार्पल/मेटाटार्सल (Metacarpal/Metatarsal), कार्पल/टार्सल (Carpal/Tarsal) तथा एड़ी (Calcaneus)—भूमि को स्पर्श करता है। इस कारण इन पशुओं में स्थिरता अधिक होती है, किन्तु गति अपेक्षाकृत कम होती है।
शारीरिक विशेषताएँ

- पैर का पूरा भाग भूमि के संपर्क में रहता है
- एड़ी (Calcaneus) कम उभरी हुई होती है
- अंग अपेक्षाकृत छोटे होते हैं
- जोड़ भूमि के समीप स्थित होते हैं
- स्थिरता अधिक, गति कम
कार्यात्मक महत्व
यह प्रकार की चाल चढ़ने, खोदने तथा भार वहन करने के लिए उपयुक्त होती है।
उदाहरण
भालू, मनुष्य, बंदर, रैकून आदि।
- डिजिटिग्रेड (Digitigrade) चाल
डिजिटिग्रेड पशुओं में केवल उंगलियाँ (Digits) ही भूमि को स्पर्श करती हैं, जबकि एड़ी ऊपर उठी रहती है। मेटाकार्पल एवं मेटाटार्सल हड्डियाँ भूमि से ऊपर स्थित रहती हैं, जिससे अंग की कार्यात्मक लंबाई बढ़ जाती है और गति अधिक हो जाती है।
शारीरिक विशेषताएँ

- केवल उंगलियाँ भूमि को स्पर्श करती हैं
- मेटाकार्पल एवं मेटाटार्सल ऊपर उठे रहते हैं
- एड़ी स्पष्ट एवं उभरी हुई होती है
- अंग लंबे एवं हल्के होते हैं
- जोड़ अपेक्षाकृत ऊँचाई पर स्थित होते हैं
कार्यात्मक महत्व
- तीव्र गति एवं फुर्ती
- शिकारी पशुओं में सामान्य
- बिना अधिक ध्वनि के चलना संभव
उदाहरण
कुत्ता, बिल्ली, लोमड़ी आदि मांसाहारी पशु।
- अनगुलेट (Unguligrade / Ungulates) चाल
अनगुलेट पशुओं में चलने का भार केवल उंगली के अंतिम भाग (Distal phalanx) पर स्थित खुर (Hoof) द्वारा वहन किया जाता है। यह चलने की सबसे अधिक विशिष्टीकृत अवस्था है, जो तेज गति तथा लंबी दूरी तक दौड़ने के लिए अनुकूल होती है।
शारीरिक विशेषताएँ

- केवल खुर (Distal phalanx) भूमि के संपर्क में रहता है
- मेटाकार्पल/मेटाटार्सल अत्यधिक लंबे होते हैं (Cannon bone)
- कई हड्डियाँ आपस में जुड़ी (Fused) होती हैं (जैसे जुगाली करने वाले पशुओं में III एवं IV)
- एड़ी अत्यधिक विकसित — शक्तिशाली प्रेरण (Propulsion)
- अंग स्प्रिंग की भाँति कार्य करते हैं
कार्यात्मक महत्व
- अधिकतम गति प्राप्त करने की क्षमता
- लंबी दूरी तक दौड़ने में सक्षम
- ऊर्जा की बचत (Energy efficiency)
उदाहरण
घोड़ा, गाय, भैंस, बकरी, हिरण आदि।
विकासात्मक प्रवृत्ति (Evolutionary Trend)
विकासक्रम में अंगों की संरचना क्रमशः Plantigrade → Digitigrade → Unguligrade की दिशा में प्रगतिशील रूप से परिवर्तित हुई है। इस क्रम में अंगों की लंबाई बढ़ती है, भूमि से संपर्क क्षेत्र कम होता है, गति एवं दक्षता बढ़ती है तथा ऊर्जा व्यय कम होता है
इसे Cursorial adaptation कहा जाता है, जो दौड़ने के लिए विशेष अनुकूलन का उदाहरण है।
निष्कर्ष यह निकलता है कि चौपाया पशुओं में पैर की बनावट उनकी जीवन-शैली, पर्यावरण तथा कार्यात्मक आवश्यकताओं के अनुसार विकसित हुई है। प्लांटिग्रेड पशुओं में स्थिरता अधिक होती है, डिजिटिग्रेड पशुओं में गति एवं फुर्ती अधिक होती है, जबकि अनगुलेट पशुओं में अधिकतम गति तथा ऊर्जा दक्षता पाई जाती है। अतः अंगों की संरचना एवं चलने की शैली के बीच गहरा कार्यात्मक तथा विकासात्मक संबंध विद्यमान है, जो पशु शरीर रचना विज्ञान के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण है।



