ब्रॉयलर मुर्गियों में हीट स्ट्रेस: कारण, पहचान, प्रभाव एवं वैज्ञानिक प्रबंधन

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ब्रॉयलर मुर्गियों में हीट स्ट्रेस: कारण, पहचान, प्रभाव एवं वैज्ञानिक प्रबंधन    

              डॉ.अरुणिमा सिंह1* एवं प्रबुद्ध दुबे2 

1पीएच.डी. शोधार्थी, पशु विकृति विज्ञान विभाग, दीनदयाल उपाध्याय पशुचिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय एवं गौ-अनुसंधान संस्थान (दुवासु), मथुरा – 281001, उत्तर प्रदेश

2पीएच.डी. शोधार्थी, पशु प्रजनन एवं स्त्री रोग विभाग, कॉलेज ऑफ वेटरनरी एवं एनिमल साइंस, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ, उत्तर प्रदेश – 250110

               *पत्राचार लेखक: 001drarunima@gmail.com

सारांश

हीट स्ट्रेस ब्रॉयलर मुर्गियों में एक प्रमुख पर्यावरणीय समस्या है, जो विशेष रूप से गर्म और आर्द्र जलवायु वाले क्षेत्रों में पोल्ट्री उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। ब्रॉयलर मुर्गियों में पसीने की ग्रंथियों का अभाव होता है, जिसके कारण वे अपने शरीर के तापमान को प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं कर पातीं। परिणामस्वरूप अत्यधिक तापमान की स्थिति में शारीरिक, जैव रासायनिक तथा प्रतिरक्षा संबंधी असंतुलन उत्पन्न हो जाता है। हीट स्ट्रेस का सीधा प्रभाव दाने की खपत, वृद्धि दर, फीड कन्वर्ज़न रेशियो, रोग प्रतिरोधक क्षमता तथा मृत्यु दर पर पड़ता है, जिससे आर्थिक नुकसान होता है। प्रस्तुत लेख में ब्रॉयलर मुर्गियों में हीट स्ट्रेस के कारणों, शारीरिक परिवर्तन, नैदानिक लक्षणों, उत्पादन पर प्रभाव तथा वैज्ञानिक प्रबंधन एवं रोकथाम उपायों पर विस्तृत चर्चा की गई है, जिससे किसानों और पशु चिकित्सकों को व्यावहारिक मार्गदर्शन प्राप्त हो सके।

प्रमुख शब्द

ब्रॉयलर मुर्गी, हीट स्ट्रेस, तापीय तनाव, पोल्ट्री प्रबंधन, उत्पादन हानि

परिचय

भारत में पोल्ट्री उद्योग पशुपालन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है, जिसमें ब्रॉयलर उत्पादन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। देश की भौगोलिक स्थिति के कारण अधिकांश क्षेत्रों में वर्ष के बड़े भाग में उच्च तापमान और आर्द्रता बनी रहती है। जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मी की तीव्रता और अवधि में भी निरंतर वृद्धि देखी जा रही है। ऐसी परिस्थितियों में ब्रॉयलर मुर्गियाँ हीट स्ट्रेस के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाती हैं। हीट स्ट्रेस न केवल मुर्गियों के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, बल्कि उनके उत्पादन प्रदर्शन और पोल्ट्री फार्म की आर्थिक स्थिरता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है, इसलिए ब्रॉयलर उत्पादन में हीट स्ट्रेस की समस्या को समझना और उसका वैज्ञानिक समाधान अपनाना अत्यंत आवश्यक है।

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ब्रॉयलर मुर्गियों में हीट स्ट्रेस की शारीरिक क्रिया-विधि

सामान्य परिस्थितियों में ब्रॉयलर मुर्गियों का शरीर तापमान लगभग 41–42 डिग्री सेल्सियस रहता है। जब वातावरण का तापमान इस सीमा से अधिक हो जाता है, तो मुर्गियाँ शरीर से अतिरिक्त ऊष्मा को बाहर निकालने के लिए तेज़ी से साँस लेने लगती हैं, जिसे पैंटिंग कहा जाता है। लगातार पैंटिंग के कारण शरीर से कार्बन डाइऑक्साइड की अधिक मात्रा बाहर निकल जाती है, जिससे रक्त का pH बढ़ जाता है और रेस्पिरेटरी अल्कलोसिस की स्थिति उत्पन्न होती है। इस अवस्था में कैल्शियम और फॉस्फोरस जैसे खनिजों का संतुलन बिगड़ जाता है तथा एंज़ाइम गतिविधि प्रभावित होती है। लंबे समय तक हीट स्ट्रेस बने रहने से हार्मोनल असंतुलन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी देखी जाती है।

हीट स्ट्रेस के कारण

ब्रॉयलर मुर्गियों में हीट स्ट्रेस के उत्पन्न होने में पर्यावरणीय, प्रबंधन संबंधी तथा पोषण संबंधी कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अत्यधिक वातावरणीय तापमान, उच्च आर्द्रता तथा हीट वेव जैसी परिस्थितियाँ इसके प्रमुख पर्यावरणीय कारण हैं। इसके अतिरिक्त, पोल्ट्री शेड में अपर्याप्त वेंटिलेशन, खराब शेड डिज़ाइन, अधिक स्टॉकिंग डेंसिटी तथा ठंडे और स्वच्छ पानी की कमी प्रबंधन संबंधी कारणों में शामिल हैं। पोषण की दृष्टि से अत्यधिक प्रोटीन युक्त आहार, इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन तथा विटामिन और खनिजों की कमी हीट स्ट्रेस की तीव्रता को और बढ़ा देती है।

हीट स्ट्रेस के नैदानिक लक्षण

हीट स्ट्रेस से ग्रसित ब्रॉयलर मुर्गियों में लक्षणों की तीव्रता तनाव की अवधि और गंभीरता पर निर्भर करती है। प्रारंभिक अवस्था में मुर्गियाँ पंख फैलाकर बैठती हैं और हल्की हांफती हुई साँस लेती हैं। पानी की खपत बढ़ जाती है, जबकि दाने की खपत में धीरे-धीरे कमी आने लगती है। मध्यम अवस्था में सुस्ती, गतिविधि में कमी और वजन वृद्धि रुक जाना स्पष्ट रूप से देखा जाता है। गंभीर अवस्था में अत्यधिक पैंटिंग, निर्जलीकरण, कमजोरी तथा मृत्यु दर में वृद्धि हो जाती है, जिससे फार्म को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

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हीट स्ट्रेस का उत्पादन एवं स्वास्थ्य पर प्रभाव

हीट स्ट्रेस का प्रभाव ब्रॉयलर मुर्गियों के उत्पादन प्रदर्शन पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। दाने की खपत कम होने से वृद्धि दर घट जाती है और फीड कन्वर्ज़न रेशियो खराब हो जाता है। इसके साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आने के कारण मुर्गियाँ बैक्टीरियल, वायरल एवं परजीवी रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं। वैक्सीनेशन का प्रभाव भी अपेक्षाकृत कम हो सकता है। इन सभी कारणों से उत्पादन लागत बढ़ जाती है और पोल्ट्री फार्म की लाभप्रदता प्रभावित होती है।

हीट स्ट्रेस के दौरान पोषण एवं प्रबंधन रणनीतियाँ

हीट स्ट्रेस की स्थिति में संतुलित पोषण और उचित प्रबंधन अत्यंत आवश्यक होता है। आहार में ऊर्जा और प्रोटीन का संतुलन बनाए रखना चाहिए, ताकि मेटाबॉलिक हीट का उत्पादन कम हो। पीने के पानी में इलेक्ट्रोलाइट्स जैसे सोडियम, पोटैशियम और क्लोराइड का प्रयोग शरीर के इलेक्ट्रोलाइट संतुलन को बनाए रखने में सहायक होता है। विटामिन C और विटामिन E जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में सहायक सिद्ध होते हैं। इसके साथ ही दाने का वितरण दिन के ठंडे समय में करना तथा शेड में वेंटिलेशन, कूलिंग सिस्टम और उचित स्टॉकिंग डेंसिटी बनाए रखना प्रभावी प्रबंधन रणनीतियाँ मानी जाती हैं।

निष्कर्ष

ब्रॉयलर मुर्गियों में हीट स्ट्रेस एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती है, जो उत्पादन, स्वास्थ्य और आर्थिक लाभ को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है। हालांकि, वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए उचित पोषण, बेहतर शेड डिज़ाइन और प्रभावी प्रबंधन रणनीतियों के माध्यम से इसके दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। समय पर पहचान और सही प्रबंधन न केवल मुर्गियों के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखता है, बल्कि पोल्ट्री उद्योग को भी अधिक टिकाऊ और लाभदायक बनाता है।

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संदर्भ

Mujahid, A., et al. (2007). Effect of heat stress on poultry production. Poultry Science.

Lin, H., et al. (2006). Strategies for preventing heat stress in poultry. World’s Poultry Science Journal.

NRC (1994). Nutrient Requirements of Poultry. National Academy Press.

ICAR (2013). Poultry Production Management. Indian Council of Agricultural Research.

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