वर्षा ऋतु में पशुओं का महत्वपूर्ण रोग – फैसिओलोसिस (Fasciolosis) एवं उसका नियंत्रण

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वर्षा ऋतु में पशुओं का महत्वपूर्ण रोग – फैसिओलोसिस (Fasciolosis) एवं उसका नियंत्रण

डॉ. नबनीता गांगुली, डॉ. जीमी पटेल एवं डॉ. भूपेन्द्रकुमार ठाकरे
पशु परजीवी विज्ञान विभाग पशु चिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय, राजपुरा (नवा), हिम्मतनगर, गुजरात

📧 ई-मेल: nabanitaganguly@kamdhenuuni.edu.in

सारांश (Abstract)

वर्षा ऋतु में पशुओं में परजीवीजनित रोगों की घटनाएं बढ़ जाती हैं, जिनमें फैसिओलोसिस (Fasciolosis) एक महत्वपूर्ण एवं आर्थिक दृष्टि से हानिकारक रोग है। यह रोग यकृत कृमि Fasciola gigantica तथा Fasciola hepatica द्वारा उत्पन्न होता है और मुख्यतः गाय, भैंस, भेड़ एवं बकरियों को प्रभावित करता है। वर्षा ऋतु में जलभराव एवं आर्द्र वातावरण के कारण मध्यवर्ती पोषक घोंघों की संख्या बढ़ जाती है, जिससे रोग का प्रसार अधिक होता है। संक्रमित पशुओं में भूख कम लगना, वजन घटना, एनीमिया, दस्त, दूध उत्पादन में कमी तथा गंभीर अवस्था में मृत्यु तक हो सकती है। यह रोग पशुपालकों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से भारी आर्थिक क्षति पहुंचाता है।फैसिओलोसिस के प्रभावी नियंत्रण हेतु नियमित कृमिनाशक दवाओं का उपयोग, जलभराव वाले क्षेत्रों का प्रबंधन, घोंघों की संख्या पर नियंत्रण, स्वच्छ चरागाह व्यवस्था तथा पशुपालकों में जागरूकता अत्यंत आवश्यक है। समय पर निदान एवं समुचित नियंत्रण उपाय अपनाकर इस रोग की रोकथाम की जा सकती है तथा पशुधन की उत्पादकता और स्वास्थ्य में सुधार किया जा सकता है। यह लेख वर्षा ऋतु में फैसिओलोसिस की समस्या, इसके कारणों, लक्षणों तथा नियंत्रण उपायों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करता है।

परिचय

फैसिओलोसिस (Fasciolosis) पशुओं में पाया जाने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण परजीवी रोग है, जो यकृत कृमियों (Liver Flukes) Fasciola gigantica तथा Fasciola hepatica के संक्रमण के कारण होता है। यह रोग मुख्य रूप से गाय, भैंस, भेड़ और बकरियों को प्रभावित करता है तथा पशुपालन उद्योग में भारी आर्थिक हानि का कारण बनता है। भारत में विशेष रूप से Fasciola gigantica अधिक पाई जाती है, जबकि ठंडे एवं समशीतोष्ण क्षेत्रों में Fasciola hepatica का प्रकोप अधिक देखा जाता है। यह रोग वर्षा ऋतु तथा वर्षा के बाद के महीनों में अधिक फैलता है, क्योंकि इस समय खेतों, चरागाहों और निम्न भूमि वाले क्षेत्रों में जलभराव हो जाता है। ऐसे नम और आर्द्र वातावरण में घोंघों (Snails) की संख्या तेजी से बढ़ती है। घोंघे इस परजीवी के जीवनचक्र में मध्यवर्ती पोषक (Intermediate Host) के रूप में कार्य करते हैं, जहाँ परजीवी का लार्वा विकसित होकर संक्रामक अवस्था तक पहुँचता है। बाद में यह संक्रामक अवस्था घास, जलीय पौधों और दूषित जल स्रोतों पर चिपक जाती है, जिन्हें चरते समय पशु निगल लेते हैं और संक्रमित हो जाते हैं।

संक्रमण के बाद परजीवी आंत से होकर यकृत (Liver) तक पहुँचता है, जहाँ यह यकृत ऊतकों और पित्त नलिकाओं (Bile Ducts) को नुकसान पहुँचाता है। इसके परिणामस्वरूप यकृत में सूजन, रक्तस्राव, फाइब्रोसिस, एनीमिया, वजन में कमी तथा दूध उत्पादन में गिरावट जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। लंबे समय तक संक्रमण बने रहने पर पशुओं की वृद्धि, प्रजनन क्षमता और कार्यक्षमता भी प्रभावित होती है। फैसिओलोसिस केवल पशुओं के स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण रोग है। इस रोग के कारण दूध उत्पादन में कमी, वजन घटने, उपचार व्यय में वृद्धि, यकृत के अनुपयोगी हो जाने तथा कभी-कभी पशुओं की मृत्यु से पशुपालकों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए वर्षा ऋतु में इस रोग की रोकथाम, समय पर निदान तथा उचित नियंत्रण उपाय अपनाना अत्यंत आवश्यक है।

मध्यवर्ती पोषक (Intermediate Host) – घोंघा (Snail)

फैसिओलोसिस रोग के जीवनचक्र में घोंघा (Snail) अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बिना घोंघे के इस परजीवी का जीवनचक्र पूरा नहीं हो सकता। इसलिए घोंघे को फैसिओला परजीवी का मध्यवर्ती पोषक (Intermediate Host) कहा जाता है। परजीवी अपने जीवनचक्र का एक महत्वपूर्ण भाग घोंघे के शरीर के भीतर पूरा करता है और वहीं से संक्रामक अवस्था में विकसित होकर पशुओं तक पहुँचता है। भारत में Lymnaea auricularia, Lymnaea acuminata तथा अन्य Lymnaea प्रजाति के मीठे पानी के घोंघे फैसिओला के प्रमुख मध्यवर्ती पोषक हैं। ये घोंघे सामान्यतः तालाबों, नहरों, धान के खेतों, दलदली क्षेत्रों, जलभराव वाले चरागाहों तथा धीमी गति से बहने वाले जल स्रोतों में पाए जाते हैं।

रोग का प्रसार (Transmission and Life Cycle)

फैसिओलोसिस का प्रसार एक जटिल जीवनचक्र के माध्यम से होता है, जिसमें पशु, घोंघा (Snail) तथा पर्यावरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संक्रमित पशुओं के यकृत एवं पित्त नलिकाओं में रहने वाले वयस्क फैसिओला कृमि अंडे उत्पन्न करते हैं, जो पित्त के माध्यम से आंत में पहुँचकर मल के साथ बाहर निकल जाते हैं। जब ये अंडे जलयुक्त, नम और अनुकूल वातावरण में पहुँचते हैं, तब कुछ दिनों के भीतर इनमें से मिरासिडियम (Miracidium) नामक लार्वा निकलता है। यह मुक्त तैरने वाला लार्वा उपयुक्त घोंघे की खोज करता है और उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है। घोंघा इस परजीवी का मध्यवर्ती पोषक (Intermediate Host) होता है। घोंघे के शरीर के भीतर परजीवी कई विकासात्मक अवस्थाओं जैसे स्पोरोसिस्ट (Sporocyst), रेडिया (Redia) तथा सर्केरिया (Cercaria) से होकर गुजरता है और संख्या में कई गुना बढ़ जाता है। यह प्रक्रिया सामान्यतः 4 से 7 सप्ताह तक चलती है।

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विकसित सर्केरिया घोंघे से बाहर निकलकर पानी में तैरते हैं और बाद में घास, चारे तथा जलीय पौधों की सतह पर चिपक जाते हैं। यहाँ वे अपने चारों ओर एक सुरक्षात्मक आवरण बनाकर मेटासर्केरिया (Metacercaria) नामक संक्रामक अवस्था में परिवर्तित हो जाते हैं। यही अवस्था पशुओं के लिए सबसे अधिक संक्रामक होती है। जब गाय, भैंस, भेड़ या बकरी वर्षा ऋतु में जलभराव वाले क्षेत्रों की दूषित घास, चारा या जलीय वनस्पतियों का सेवन करते हैं अथवा संक्रमित जल पीते हैं, तब मेटासर्केरिया उनके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। पशु की छोटी आंत में पहुँचकर इनका आवरण टूट जाता है और युवा कृमि (Immature Fluke) बाहर निकलते हैं। ये आंत की दीवार को भेदकर उदर गुहा (Abdominal Cavity) में पहुँचते हैं और अंततः यकृत में प्रवेश कर जाते हैं। यकृत में पहुँचने के बाद युवा कृमि यकृत ऊतकों को क्षति पहुँचाते हुए पित्त नलिकाओं तक पहुँचते हैं, जहाँ वे वयस्क कृमि में विकसित हो जाते हैं। लगभग 10 से 12 सप्ताह बाद ये वयस्क कृमि पुनः अंडे देना प्रारंभ कर देते हैं, जो मल के साथ बाहर निकलकर जीवनचक्र को आगे बढ़ाते हैं। इस प्रकार वर्षा ऋतु में जलभराव, घोंघों की अधिक संख्या तथा दूषित घास और पानी के सेवन के कारण फैसिओलोसिस का संक्रमण तेजी से फैलता है और पशुओं में रोग का प्रकोप बढ़ जाता है।

रोगजनन (Pathogenesis) – फैसिओलोसिस (Fasciolosis)

फैसिओलोसिस में रोगजनन की प्रक्रिया तब शुरू होती है जब पशु दूषित घास, चारा, जलीय पौधों या पानी के साथ मेटासर्केरिया (Metacercaria) अवस्था को निगल लेता है। पशु की छोटी आंत में पहुँचने पर मेटासर्केरिया का बाहरी आवरण टूट जाता है और उससे युवा कृमि (Immature Fluke) बाहर निकलते हैं। ये युवा कृमि आंत की दीवार को भेदकर उदर गुहा (Abdominal Cavity) में प्रवेश करते हैं और कुछ दिनों बाद यकृत (Liver) तक पहुँच जाते हैं। यकृत में प्रवेश करने के बाद युवा कृमि यकृत ऊतकों के भीतर कई सप्ताह तक इधर-उधर घूमते रहते हैं, जिससे यकृत कोशिकाओं (Liver Cells) का विनाश, रक्तस्राव तथा सूजन उत्पन्न होती है। इस दौरान यकृत में सुरंगनुमा मार्ग (Migration Tracks) बन जाते हैं, जो यकृत की सामान्य संरचना और कार्यक्षमता को प्रभावित करते हैं। गंभीर संक्रमण में यकृत का बड़ा भाग क्षतिग्रस्त हो सकता है, जिससे पशु में कमजोरी, रक्ताल्पता (Anemia) और वजन में कमी दिखाई देती है। लगभग 8 से 12 सप्ताह बाद ये युवा कृमि पित्त नलिकाओं (Bile Ducts) में पहुँचकर वयस्क कृमि (Adult Fluke) में विकसित हो जाते हैं। वयस्क कृमि पित्त नलिकाओं की भीतरी परत को लगातार क्षति पहुँचाते हैं, जिससे उनमें सूजन, मोटापन (Hyperplasia) और फाइब्रोसिस (Fibrosis) विकसित हो जाता है। परिणामस्वरूप पित्त का प्रवाह बाधित होता है और यकृत की कार्यक्षमता कम हो जाती है।

कृमियों द्वारा रक्त चूसने और यकृत क्षति के कारण पशु में गंभीर रक्ताल्पता (Anemia), हाइपोप्रोटीनीमिया (Hypoproteinemia) तथा सूजन (Edema) विकसित हो सकती है। रक्त में प्रोटीन की कमी होने से जबड़े के नीचे सूजन (Bottle Jaw) एक विशिष्ट लक्षण के रूप में दिखाई देती है। लंबे समय तक संक्रमण रहने पर पशु का शरीर कमजोर हो जाता है, वजन घटने लगता है, वृद्धि रुक जाती है और दूध उत्पादन में कमी आ जाती है। अत्यधिक संक्रमण की स्थिति में यकृत की गंभीर क्षति, आंतरिक रक्तस्राव, तीव्र एनीमिया तथा द्वितीयक जीवाणु संक्रमण के कारण पशु की मृत्यु भी हो सकती है। इस प्रकार फैसिओलोसिस में रोगजनन मुख्य रूप से यकृत ऊतकों और पित्त नलिकाओं को होने वाली क्षति, रक्त की हानि तथा पोषक तत्वों की कमी के कारण विकसित होता है।Top of FormBottom of Form

फैसिओलोसिस के लक्षण (Clinical Signs of Fasciolosis)

फैसिओलोसिस के लक्षण संक्रमण की तीव्रता, परजीवियों की संख्या, पशु की आयु, पोषण स्तर तथा संक्रमण की अवधि पर निर्भर करते हैं। यह रोग मुख्य रूप से यकृत (Liver) को प्रभावित करता है, इसलिए इसके अधिकांश लक्षण यकृत क्षति, रक्ताल्पता तथा पोषण की कमी से संबंधित होते हैं।

  1. भूख कम लगना (Loss of Appetite): रोगग्रस्त पशुओं में सबसे प्रारंभिक लक्षणों में से एक भूख का कम हो जाना है। पशु सामान्य मात्रा में चारा और दाना नहीं खाता, जिसके कारण शरीर को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता। लंबे समय तक भूख कम रहने से पशु की शारीरिक स्थिति लगातार खराब होती जाती है।
  2. शरीर का वजन घटना (Weight Loss) : पोषक तत्वों के अपर्याप्त उपयोग और यकृत की कार्यक्षमता प्रभावित होने के कारण पशु धीरे-धीरे दुबला होने लगता है। अच्छी गुणवत्ता का चारा मिलने के बावजूद वजन में कमी देखी जा सकती है। भेड़ और बकरियों में यह लक्षण विशेष रूप से स्पष्ट दिखाई देता है।
  3. कमजोरी और सुस्ती (Weakness and Lethargy): संक्रमित पशु कमजोर, सुस्त और कम सक्रिय दिखाई देते हैं। वे अधिक समय तक बैठे रहते हैं, चलने-फिरने में रुचि कम दिखाते हैं तथा कार्य करने की क्षमता घट जाती है। गंभीर संक्रमण में पशु खड़े रहने में भी कठिनाई महसूस कर सकता है।
  4. रक्ताल्पता (Anemia): फैसिओला कृमि यकृत ऊतकों को क्षति पहुँचाने के साथ-साथ रक्त का भी उपभोग करते हैं, जिससे पशु में रक्ताल्पता विकसित हो जाती है। इसके कारण आंखों, मसूड़ों तथा अन्य श्लेष्म झिल्लियों का रंग फीका पड़ जाता है। गंभीर एनीमिया में पशु अत्यधिक कमजोर और थका हुआ दिखाई देता है।
  5. जबड़े के नीचे सूजन (Bottle Jaw): फैसिओलोसिस का एक विशिष्ट लक्षण जबड़े के नीचे मुलायम सूजन का विकसित होना है, जिसे “बॉटल जॉ” कहा जाता है। यह रक्त में प्रोटीन की कमी (Hypoproteinemia) के कारण होता है। यह सूजन दर्दरहित होती है और रोग की गंभीरता का संकेत देती है।
  6. दस्त (Diarrhea): कई संक्रमित पशुओं में बार-बार पतले दस्त की समस्या देखी जाती है। दस्त के कारण शरीर में पानी और पोषक तत्वों की कमी हो सकती है, जिससे पशु और अधिक कमजोर हो जाता है।
  7. बालों का रूखा और बेजान होना: रोगग्रस्त पशुओं के बाल अपनी प्राकृतिक चमक खो देते हैं और रूखे, बिखरे तथा खुरदरे दिखाई देते हैं। यह शरीर में पोषक तत्वों की कमी और लंबे समय तक बीमारी बने रहने का संकेत है।
  8. दूध उत्पादन में कमी: दूध देने वाले पशुओं में फैसिओलोसिस के कारण दूध उत्पादन में उल्लेखनीय कमी आ जाती है। यकृत की कार्यक्षमता कम होने और पशु की सामान्य शारीरिक स्थिति खराब होने से दुग्ध उत्पादन सीधे प्रभावित होता है। इससे पशुपालकों को आर्थिक हानि होती है।
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9. गंभीर संक्रमण के लक्षण: अत्यधिक संक्रमण की स्थिति में यकृत को व्यापक क्षति पहुँचती है, जिसके कारण पशु में गंभीर कमजोरी, अत्यधिक रक्ताल्पता, शरीर में सूजन, तेजी से वजन घटना, चलने में कठिनाई तथा कभी-कभी सांस लेने में परेशानी भी हो सकती है। ऐसे पशु अत्यधिक दुर्बल हो जाते हैं और यदि समय पर उपचार न मिले तो उनकी मृत्यु भी हो सकती है।

फैसिओलोसिस का निदान (Diagnosis of Fasciolosis)

फैसिओलोसिस का निदान पशु में दिखाई देने वाले नैदानिक लक्षणों, रोग के इतिहास, प्रयोगशाला परीक्षणों तथा मृत्युपरांत परीक्षण (Post-mortem Examination) के आधार पर किया जाता है। चूंकि इस रोग के लक्षण कई अन्य रोगों से मिलते-जुलते हो सकते हैं, इसलिए सही और समय पर निदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

1. नैदानिक निदान (Clinical Diagnosis)

पशु के इतिहास और लक्षणों के आधार पर फैसिओलोसिस की प्रारंभिक पहचान की जा सकती है। विशेष रूप से वर्षा ऋतु या जलभराव वाले क्षेत्रों में चरने वाले पशुओं में इस रोग की संभावना अधिक होती है। प्रमुख नैदानिक लक्षण: भूख में कमी, वजन घटना, कमजोरी और सुस्ती, रक्ताल्पता (Anemia), जबड़े के नीचे सूजन (Bottle Jaw), दस्त, दूध उत्पादन में कमी, बालों का रूखा और बेजान होना. यदि ये लक्षण वर्षा ऋतु के दौरान या उसके बाद दिखाई दें, तो फैसिओलोसिस की संभावना बढ़ जाती है।

2. मल परीक्षण (Fecal Examination)

फैसिओलोसिस के निदान की सबसे सामान्य और महत्वपूर्ण विधि मल परीक्षण है।

सेडिमेंटेशन विधि (Sedimentation Technique): फैसिओला के अंडे अपेक्षाकृत भारी होते हैं, इसलिए उन्हें पहचानने के लिए सेडिमेंटेशन तकनीक का उपयोग किया जाता है। मल में बड़े, अंडाकार, पीले-भूरे रंग के ऑपर्कुलेटेड (Operculated) अंडे दिखाई देते हैं। अंडों की उपस्थिति रोग की पुष्टि करती है। ध्यान रहे कि संक्रमण के प्रारंभिक चरण में अंडे मल में नहीं मिलते क्योंकि उस समय कृमि अभी वयस्क नहीं बने होते।

3. रक्त परीक्षण (Hematological Examination): रक्त परीक्षण से रोग की गंभीरता का आकलन किया जा सकता है। सामान्य परिवर्तन: हीमोग्लोबिन में कमी, Packed Cell Volume (PCV) में कमी, लाल रक्त कणों (RBC) की संख्या में कमी, इओसिनोफिल (Eosinophils) की संख्या में वृद्धि, रक्त प्रोटीन विशेषकर एल्ब्यूमिन में कमी, ये परिवर्तन रक्ताल्पता और यकृत क्षति का संकेत देते हैं।

4. जैव रासायनिक परीक्षण (Biochemical Tests): यकृत को होने वाली क्षति का मूल्यांकन करने के लिए जैव रासायनिक परीक्षण किए जाते हैं। प्रमुख परिवर्तन: Liver Enzymes (AST, ALT, GGT) में वृद्धि, कुल प्रोटीन में कमी, एल्ब्यूमिन स्तर में कमी, बिलीरुबिन में वृद्धि, ये परिवर्तन यकृत की कार्यक्षमता में कमी को दर्शाते हैं।

5. सीरोलॉजिकल परीक्षण (Serological Tests):प्रारंभिक संक्रमण की पहचान के लिए प्रतिरक्षात्मक परीक्षण उपयोगी होते हैं। प्रमुख परीक्षण: ELISA (Enzyme Linked Immunosorbent Assay), Indirect Hemagglutination Test (IHA). इन परीक्षणों द्वारा फैसिओला के विरुद्ध बने प्रतिरक्षी (Antibodies) की पहचान की जाती है।

6. आणविक निदान (Molecular Diagnosis): PCR (Polymerase Chain Reaction). PCR एक अत्यंत संवेदनशील और विशिष्ट तकनीक है, जिसके द्वारा फैसिओला परजीवी के DNA की पहचान की जाती है। लाभ: प्रारंभिक संक्रमण में भी निदान संभव, अत्यधिक सटीक परिणाम, कम संख्या में परजीवी होने पर भी पहचान.  

7. अल्ट्रासोनोग्राफी (Ultrasonography):उन्नत पशु चिकित्सा सुविधाओं में यकृत और पित्त नलिकाओं में होने वाले परिवर्तनों को देखने के लिए अल्ट्रासाउंड का उपयोग किया जा सकता है। दिखाई देने वाले परिवर्तन, यकृत का बढ़ना, पित्त नलिकाओं का मोटा होना, यकृत ऊतकों में क्षति.  

8. मृत्युपरांत परीक्षण (Post-mortem Examination): मृत पशु के परीक्षण से रोग की निश्चित पुष्टि की जा सकती है।

आर्थिक हानि

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इस रोग के कारण दूध उत्पादन में कमी, वजन में गिरावट, वृद्धि दर में कमी, प्रजनन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव तथा उपचार पर अतिरिक्त खर्च होता है। गंभीर मामलों में पशुओं की मृत्यु से पशुपालकों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।

फैसिओलोसिस का नियंत्रण एवं रोकथाम (Control and Prevention of Fasciolosis)

फैसिओलोसिस एक महत्वपूर्ण परजीवी रोग है, जिसका प्रभावी नियंत्रण केवल उपचार से संभव नहीं है। इसके लिए परजीवी, घोंघा (Intermediate Host), पर्यावरण तथा पशु प्रबंधन से संबंधित विभिन्न उपायों को एक साथ अपनाना आवश्यक होता है। विशेष रूप से वर्षा ऋतु और वर्षा के बाद के महीनों में इस रोग की रोकथाम पर अधिक ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इसी अवधि में संक्रमण का खतरा सबसे अधिक होता है।

  1. चरागाह एवं जलभराव का प्रबंधन: फैसिओला परजीवी का जीवनचक्र घोंघों और नम वातावरण पर निर्भर करता है। इसलिए जलभराव वाले क्षेत्रों में पशुओं को चराने से बचाना चाहिए। दलदली भूमि, तालाबों के किनारे, नहरों के आसपास तथा स्थिर पानी वाले चरागाह संक्रमण के प्रमुख स्रोत होते हैं। चरागाहों की उचित जल निकासी (Drainage) की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि घोंघों के प्रजनन के लिए अनुकूल वातावरण न बन सके। वर्षा ऋतु में विशेष रूप से ऐसे क्षेत्रों में पशुओं के चरने पर नियंत्रण रखना चाहिए।
  2. घोंघा नियंत्रण (Snail Control): घोंघा फैसिओला का मध्यवर्ती पोषक होता है, इसलिए रोग नियंत्रण में घोंघों की संख्या कम करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। दलदली एवं जलभराव वाले क्षेत्रों को सूखा रखना। जल निकासी की उचित व्यवस्था करना। चरागाहों की नियमित सफाई करना। नालियों और तालाबों के किनारों की झाड़ियों को हटाना। आवश्यकता पड़ने पर घोंघानाशक (Molluscicides) का नियंत्रित उपयोग करना। घोंघों के प्राकृतिक शत्रुओं के संरक्षण को बढ़ावा देना। घोंघों की संख्या कम होने से फैसिओला का जीवनचक्र बाधित हो जाता है और संक्रमण की संभावना घट जाती है।
  3. नियमित कृमिनाशन (Strategic Deworming): फैसिओलोसिस की रोकथाम में नियमित कृमिनाशन सबसे महत्वपूर्ण उपायों में से एक है। पशुओं को पशुचिकित्सक की सलाह अनुसार प्रभावी कृमिनाशक दवाएँ निर्धारित समय पर देनी चाहिए। फैशियोलोसिस (लीवर फ्लूक रोग) के उपचार एवं नियंत्रण के लिए ट्राइक्लाबेन्डाजोल (Triclabendazole), क्लोसैन्टेल (Closantel), रैफोक्सानाइड (Rafoxanide) तथा ऑक्सीक्लोज़ानाइड (Oxyclozanide) प्रमुख रूप से उपयोग की जाती हैं। ट्राइक्लाबेन्डाजोल फैशियोला के अपरिपक्व एवं परिपक्व दोनों चरणों पर अत्यधिक प्रभावी है, जबकि क्लोसैन्टेल और रैफोक्सानाइड विकसित तथा परिपक्व लीवर फ्लूक के नियंत्रण में उपयोगी हैं। ऑक्सीक्लोज़ानाइड मुख्यतः परिपक्व फ्लूक के विरुद्ध प्रभावी होती है। इन दवाओं का उचित मात्रा में तथा पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार उपयोग करने से रोग का सफल उपचार एवं नियंत्रण संभव है। सामान्यतः वर्षा ऋतु के अंत में तथा शीत ऋतु के प्रारंभ में कृमिनाशन कार्यक्रम चलाना अधिक लाभकारी माना जाता है। इससे परजीवी भार कम होता है और चरागाहों में अंडों का प्रसार घटता है।
  4. संक्रमित पशुओं की शीघ्र पहचान एवं उपचार: रोगग्रस्त पशुओं की समय पर पहचान और उपचार संक्रमण के प्रसार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जिन पशुओं में रक्ताल्पता, बॉटल जॉ (Bottle Jaw), वजन में कमी, दस्त या दूध उत्पादन में गिरावट जैसे लक्षण दिखाई दें, उनका तुरंत परीक्षण कराना चाहिए। शीघ्र उपचार से यकृत को होने वाली गंभीर क्षति को कम किया जा सकता है और उत्पादन हानि भी घटाई जा सकती है।
  5. स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था: पशुओं को हमेशा स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना चाहिए। तालाबों, नहरों या जलभराव वाले क्षेत्रों का दूषित पानी संक्रमण का स्रोत बन सकता है। इसलिए पशुओं को ऐसे जल स्रोतों से पानी पीने से बचाना चाहिए और साफ पानी की व्यवस्था करनी चाहिए।
  6. पशुपालन प्रबंधन (Good Management Practices): पशुशाला की नियमित सफाई करना। गोबर और अपशिष्ट पदार्थों का उचित निपटान करना। पशुओं को संतुलित एवं पौष्टिक आहार देना। नए खरीदे गए पशुओं की स्वास्थ्य जांच करना। नियमित पशु स्वास्थ्य परीक्षण करवाना। वर्षा ऋतु में रोग निगरानी बढ़ाना। उचित प्रबंधन से पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और संक्रमण की संभावना कम होती है।
  7. पशुपालकों में जागरूकता: फैसिओलोसिस की रोकथाम के लिए पशुपालकों को रोग के जीवनचक्र, घोंघों की भूमिका, संक्रमण के स्रोत, प्रारंभिक लक्षणों तथा कृमिनाशन कार्यक्रमों के बारे में जानकारी देना आवश्यक है। जागरूक पशुपालक समय पर रोग की पहचान कर सकते हैं और उचित नियंत्रण उपाय अपना सकते हैं।
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