डेयरी व्यवसाय में सफलता के लिए वैज्ञानिक पशुपालन प्रबंधन
डॉ. प्रबुद्ध दुबे* एवं डॉ. शुभम दीप चौधरी
पशु प्रजनन, मादा रोग एवं प्रसूति विज्ञान विभाग
पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय (COVAS), मेरठ – 250110
*संपर्क लेखक: prabuddhdubey16@gmail.com
परिचय
भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है, फिर भी अधिकांश पशुपालकों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। इसका प्रमुख कारण वैज्ञानिक पशुपालन प्रबंधन का अभाव है। यदि पशुओं का चयन, आवास, पोषण, प्रजनन, दुग्ध दोहन तथा रोग नियंत्रण वैज्ञानिक ढंग से किया जाए तो दुग्ध उत्पादन के साथ-साथ पशुओं का स्वास्थ्य भी बेहतर रहता है और डेयरी व्यवसाय अधिक लाभकारी बनता है। निम्नलिखित वैज्ञानिक उपाय अपनाकर पशुपालक अपने डेयरी व्यवसाय की उत्पादकता एवं आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं।
- पशु चयन एवं क्रय
- सदैव विश्वसनीय बाजार, प्रजनन केन्द्र अथवा प्रमाणित स्रोत से ही पशु खरीदें।
- अधिक दुग्ध उत्पादन देने वाली स्वस्थ एवं उच्च आनुवंशिक क्षमता वाली नस्ल का चयन पशु चिकित्सक की सलाह से करें।
- पशु खरीदने से पूर्व लगातार तीन बार दुहान कर उसके वास्तविक दुग्ध उत्पादन की पुष्टि करें।
- नए पशु को कम-से-कम 15 दिनों तक क्वारंटीन (अलग) रखें तथा आवश्यक टीकाकरण एवं स्वास्थ्य परीक्षण अवश्य कराएं।
- आवास प्रबंधन
- पशुशाला का फर्श पक्का, साफ, सूखा तथा उचित ढलान वाला होना चाहिए, जिससे पानी एवं मल-मूत्र का निकास आसानी से हो सके।
- प्रत्येक पशु के लिए लगभग 6 × 4.5 फीट स्थान उपलब्ध कराएं।
- पशुशाला की छत की ऊँचाई 10–12 फीट रखें तथा पर्याप्त वेंटिलेशन की व्यवस्था करें।
- मच्छरों एवं मक्खियों से बचाव के लिए खिड़कियों पर जाली लगाएं।
- गोबर एवं मूत्र के उचित निस्तारण हेतु गोबर गैस संयंत्र अथवा कम्पोस्ट गड्ढे का उपयोग करें।
- दुग्धारू पशुओं का संतुलित आहार
- पशुओं के आहार में कम-से-कम एक-तिहाई भाग हरा चारा अवश्य शामिल करें।
- चारे को काटकर तथा सान्द्र आहार को अच्छी तरह मिलाकर खिलाएं।
- खनिज मिश्रण एवं सामान्य नमक प्रतिदिन निर्धारित मात्रा में दें, जिससे प्रजनन क्षमता एवं उत्पादन में सुधार होता है।
- पशुओं को दिन में 3–4 बार स्वच्छ एवं ताजा पानी उपलब्ध कराएं।
- दुग्ध दोहन की वैज्ञानिक विधि
- प्रतिदिन निश्चित समय पर दुग्ध दोहन करें तथा पूरी प्रक्रिया 8 मिनट के भीतर पूरी करें।
- दुग्ध दोहन से पहले थनों को गुनगुने पानी अथवा पोटैशियम परमैंगनेट के हल्के घोल से साफ करें, जिससे थनैला (Mastitis) रोग की संभावना कम होती है।
- प्रत्येक पशु के दुग्ध उत्पादन का नियमित Milk Record रखें, जिससे उत्पादन एवं प्रजनन प्रबंधन में सहायता मिलती है।
- प्रजनन प्रबंधन
- पशु के गर्मी (Heat) में आने के 12–18 घंटे के भीतर कृत्रिम गर्भाधान कराना सर्वोत्तम माना जाता है।
- गर्भाधान के लगभग 60 दिन बाद पशु चिकित्सक द्वारा गर्भ परीक्षण अवश्य कराएं।
- बेहतर संतानों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले Frozen Semen का उपयोग करें।
- नवजात बछड़ों की देखभाल
- जन्म के तुरंत बाद नाभिनाल को साफ एवं कीटाणुरहित चाकू से काटकर टिंचर आयोडीन लगाएं।
- बछड़े को जन्म के तुरंत बाद खीस (Colostrum) अवश्य पिलाएं, जिससे उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
- 10–15 दिन की आयु में कृमिनाशक दवा दें तथा 5–7 दिन की आयु में डीहॉर्निंग (सींग रहित करना) कराएं।
- रोगों से बचाव
- बीमार पशुओं को तुरंत स्वस्थ पशुओं से अलग रखें।
- समय-समय पर मल (गोबर) की जांच कराकर आवश्यकता अनुसार कृमिनाशक दवा दें।
- वर्ष में दो बार खुरपका-मुंहपका (FMD) तथा एक बार गलघोंटू (HS) का टीकाकरण अवश्य कराएं।
- पशुशाला की नियमित सफाई, कीटाणुशोधन तथा जैव-सुरक्षा (Biosecurity) के नियमों का पालन करें।
निष्कर्ष
वैज्ञानिक पशुपालन प्रबंधन अपनाने से पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर रहता है, रोगों की संभावना कम होती है तथा दुग्ध उत्पादन एवं प्रजनन क्षमता में वृद्धि होती है। उचित पोषण, स्वच्छ आवास, समय पर टीकाकरण, वैज्ञानिक दुग्ध दोहन एवं प्रजनन प्रबंधन के माध्यम से डेयरी व्यवसाय को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाया जा सकता है। इसलिए प्रत्येक पशुपालक को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर अपने डेयरी व्यवसाय का सफल संचालन करना चाहिए।



