फार्म पशुओं के नवजात शिशुओं में सामान्य रोग एवं जन्मजात विकृतियाँ: पहचान, रोकथाम एवं प्रबंधन की व्यावहारिक मार्गदर्शिका
डॉ. प्रशांत तिवारी
प्रोजेक्ट रिसर्च साइंटिस्ट (पशु चिकित्सा)
ICMR-NIIHR, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश
भूमिका
किसी भी पशुपालन इकाई की सफलता स्वस्थ नवजात शिशुओं पर निर्भर करती है। जन्म के बाद का प्रारम्भिक समय, विशेषकर पहले 24 से 48 घंटे, नवजात बछड़े, भैंस के बच्चे, मेमने, बकरी के बच्चे, पिगलेट तथा बछेड़ों के जीवन का सबसे संवेदनशील चरण होता है। इस अवधि में उनका प्रतिरक्षा तंत्र पूर्ण रूप से विकसित नहीं होता, शरीर का तापमान नियंत्रित करने की क्षमता सीमित होती है तथा ऊर्जा का भंडार भी कम होता है। परिणामस्वरूप वे संक्रमण, पोषण संबंधी विकारों तथा जन्मजात विकृतियों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील रहते हैं।
भारत में नवजात मृत्यु पशुपालकों के लिए आर्थिक हानि का एक प्रमुख कारण है। समय पर कोलोस्ट्रम (खीस) पिलाने, स्वच्छ प्रसव व्यवस्था अपनाने तथा रोगों की शीघ्र पहचान से अधिकांश नवजात रोगों को रोका जा सकता है। इसलिए प्रत्येक पशुपालक एवं पशु चिकित्सक के लिए इन रोगों और जन्मजात विकृतियों की जानकारी अत्यंत आवश्यक है।
नवजात पशु अधिक संवेदनशील क्यों होते हैं?
जन्म के समय अधिकांश फार्म पशुओं में रोगों से लड़ने वाली प्रतिरोधक क्षमता विकसित नहीं होती। इन्हें प्रारम्भिक सुरक्षा केवल माँ के पहले दूध अर्थात् कोलोस्ट्रम (खीस) से प्राप्त होती है। यदि समय पर पर्याप्त मात्रा में खीस नहीं मिलती, तो संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त ठंड का प्रभाव, दूध कम पीना, अस्वच्छ वातावरण तथा प्रसव के दौरान होने वाला तनाव भी नवजातों को बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं।
नवजातों में होने वाले प्रमुख रोग
- नाभि संक्रमण (Omphalitis)
नाभि संक्रमण नवजातों में सबसे सामान्य जीवाणुजनित रोगों में से एक है। यह प्रायः तब होता है जब प्रसव स्थल अस्वच्छ हो या जन्म के बाद नाभि को कीटाणुनाशक से साफ न किया जाए।
इस रोग में नाभि सूज जाती है, स्पर्श करने पर दर्द होता है तथा बछड़ा या मेमना सुस्त दिखाई देता है। गंभीर अवस्था में संक्रमण रक्त के माध्यम से पूरे शरीर में फैलकर सेप्टीसीमिया या जोड़ों के संक्रमण का कारण बन सकता है।
समय पर एंटीबायोटिक उपचार, सूजन कम करने वाली दवाएँ तथा आवश्यक होने पर शल्य चिकित्सा द्वारा फोड़े की सफाई की जाती है। जन्म के तुरंत बाद नाभि को आयोडीन या क्लोरहेक्सिडीन से डुबोना इसकी सबसे प्रभावी रोकथाम है।
- कोलोस्ट्रम न मिलने से प्रतिरक्षा की कमी (Failure of Passive Transfer)
नवजात पशु जन्म के समय लगभग बिना एंटीबॉडी के पैदा होते हैं। यदि उन्हें जन्म के पहले दो घंटे के भीतर पर्याप्त खीस नहीं मिलती, तो उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर रह जाती है।
ऐसे नवजातों में बार-बार दस्त, निमोनिया, नाभि संक्रमण तथा सेप्टीसीमिया जैसी समस्याएँ देखने को मिलती हैं। इसलिए प्रत्येक नवजात को जन्म के तुरंत बाद उसकी शारीरिक आवश्यकता के अनुसार उच्च गुणवत्ता वाला कोलोस्ट्रम अवश्य पिलाना चाहिए।
- पिगलेट एनीमिया
पिगलेट जन्म के समय शरीर में बहुत कम आयरन लेकर पैदा होते हैं, जबकि सूअरनी के दूध में भी आयरन की मात्रा बहुत कम होती है। परिणामस्वरूप कुछ ही दिनों में उनमें एनीमिया विकसित हो सकता है।
बीमार पिगलेट पीले दिखाई देते हैं, सुस्त रहते हैं तथा उनका विकास रुक जाता है। इससे बचाव के लिए जन्म के 2–3 दिन के भीतर आयरन डेक्सट्रान का इंजेक्शन लगाना अत्यंत आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, कुछ सूअर पालन इकाइयों में सूअरनी के थनों (teats) पर फेरस सल्फेट (FeSO₄) का घोल लगाने की प्रथा भी अपनाई जाती है I
- हाइपोग्लाइसीमिया (रक्त में शर्करा की कमी)
यदि नवजात समय पर दूध नहीं पीता या अत्यधिक ठंड का शिकार हो जाता है, तो उसके शरीर में ग्लूकोज का स्तर तेजी से गिरने लगता है।
ऐसे पशु में कमजोरी, शरीर का ठंडा पड़ना, कंपन, दौरे तथा बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। तत्काल गर्म वातावरण उपलब्ध कराना, ग्लूकोज देना तथा मूल कारण का उपचार करना जीवनरक्षक सिद्ध हो सकता है।
- नवजात दस्त (Scours)
नवजात दस्त विश्वभर में नवजात मृत्यु का प्रमुख कारण माना जाता है। यह ई. कोलाई, रोटावायरस, कोरोनावायरस, क्रिप्टोस्पोरिडियम तथा साल्मोनेला जैसे रोगजनकों के कारण होता है।
दस्त के साथ शरीर में पानी की कमी, कमजोरी, आँखों का धँस जाना तथा दूध पीना बंद कर देना प्रमुख लक्षण हैं। उपचार में तरल एवं इलेक्ट्रोलाइट देना, आवश्यकता पड़ने पर एंटीबायोटिक तथा उचित देखभाल शामिल है।
- रिकेट्स
विटामिन D, कैल्शियम या फॉस्फोरस की कमी से हड्डियों का सामान्य विकास नहीं हो पाता, जिससे रिकेट्स रोग उत्पन्न होता है।
ऐसे नवजातों में पैर टेढ़े हो जाते हैं, जोड़ बड़े दिखाई देते हैं तथा चलने में कठिनाई होती है। संतुलित खनिज आहार, विटामिन D तथा पर्याप्त धूप इसकी रोकथाम के लिए आवश्यक हैं।
- एबोमेसल मिल्क इम्पैक्शन
यह रोग मुख्यतः कृत्रिम रूप से दूध पिलाए जाने वाले बछड़ों में देखा जाता है। अधिक मात्रा में दूध पिलाने या गलत तरीके से दूध पिलाने के कारण दूध एबोमेसम में जमा होकर पाचन में बाधा उत्पन्न करता है।
ऐसे पशुओं का पेट फूल जाता है, भूख कम हो जाती है तथा उनका विकास रुक जाता है। समय पर दूध की मात्रा नियंत्रित करना तथा इलेक्ट्रोलाइट देना इसका प्रमुख उपचार है।
- हेयरबॉल (Trichobezoar)
अनाथ अथवा कृत्रिम रूप से पाले गए नवजातों में अत्यधिक बाल निगलने से पेट में बालों का गोला बन जाता है।
ऐसे पशुओं में बार-बार पेट फूलना, भूख कम लगना तथा वजन न बढ़ना प्रमुख लक्षण हैं। गंभीर स्थिति में शल्य चिकित्सा की आवश्यकता पड़ सकती है।
नवजातों में सामान्य जन्मजात विकृतियाँ
कुछ विकृतियाँ जन्म के समय ही उपस्थित होती हैं और इनके पीछे आनुवंशिक कारण, गर्भावस्था के दौरान संक्रमण, पोषण की कमी या विषैले पदार्थों का प्रभाव जिम्मेदार हो सकता है।
एट्रेसिया एनी में गुदा का छिद्र विकसित नहीं होता, जिससे मल त्याग नहीं हो पाता। इसका उपचार केवल शल्य चिकित्सा है।
क्लेफ्ट लिप एवं क्लेफ्ट पैलेट वाले नवजातों में दूध नाक से बाहर निकलता है और फेफड़ों में संक्रमण होने की संभावना बढ़ जाती है। उचित समय पर शल्य चिकित्सा ही इसका स्थायी समाधान है।
कॉर्नियल अपारदर्शिता में आँख की कॉर्निया धुंधली दिखाई देती है। यह संक्रमण, विटामिन A की कमी अथवा प्रसवकालीन चोट के कारण हो सकता है।
अतिरिक्त दाँत (Supernumerary Teeth) अथवा दाँतों का अभाव (Anodontia) भी कभी-कभी देखने को मिलता है, जिससे दूध पीने में कठिनाई होती है।
नाभि हर्निया एवं अंडकोश हर्निया में पेट की दीवार पूरी तरह बंद नहीं हो पाती, जिसके कारण आँतें बाहर की ओर उभर आती हैं। बड़े हर्निया का उपचार शल्य चिकित्सा द्वारा किया जाता है।
पेटेंट डक्टस आर्टेरियोसस (PDA) एक जन्मजात हृदय दोष है, जिसमें भ्रूण अवस्था की रक्त वाहिका जन्म के बाद भी बंद नहीं होती। इससे हृदय में असामान्य रक्त प्रवाह होता है और पशु का विकास प्रभावित होता है।
रोकथाम ही सबसे प्रभावी उपचार
नवजात रोगों की रोकथाम उपचार की तुलना में कहीं अधिक सरल और किफायती है। प्रत्येक पशुपालक को निम्नलिखित बातों का पालन करना चाहिए—
- प्रसव स्थान को स्वच्छ एवं सूखा रखें।
- जन्म के तुरंत बाद नाभि को आयोडीन या क्लोरहेक्सिडीन से कीटाणुरहित करें।
- प्रत्येक नवजात को जन्म के पहले दो घंटे के भीतर पर्याप्त मात्रा में खीस अवश्य पिलाएँ।
- नवजात को ठंड, नमी एवं हवा से बचाएँ।
- गर्भित पशुओं को संतुलित एवं खनिज युक्त आहार दें।
- गर्भित पशुओं का समय पर टीकाकरण एवं कृमिनाशन कराएँ।
- जन्म के पहले सप्ताह तक प्रतिदिन नवजात का निरीक्षण करें।
पशुपालकों के लिए विशेष सुझाव
यदि नवजात जन्म के दो घंटे बाद भी खड़ा न हो, दूध न पी रहा हो, लगातार दस्त हो, शरीर ठंडा पड़ रहा हो, नाक से दूध निकल रहा हो या मल त्याग न कर पा रहा हो, तो बिना विलंब किए पशु चिकित्सक से संपर्क करें। प्रारम्भिक उपचार अधिकांश मामलों में नवजात का जीवन बचा सकता है।
निष्कर्ष
स्वस्थ नवजात ही सफल एवं लाभकारी पशुपालन की आधारशिला है। उचित प्रसव प्रबंधन, समय पर खीस पिलाना, नाभि की देखभाल, संतुलित पोषण तथा रोगों की शीघ्र पहचान से अधिकांश नवजात रोगों एवं जन्मजात विकृतियों के दुष्प्रभावों को रोका जा सकता है। पशुपालकों में जागरूकता और नियमित पशु चिकित्सकीय परामर्श न केवल नवजात मृत्यु दर को कम करते हैं, बल्कि पशुधन की उत्पादकता, स्वास्थ्य और आर्थिक लाभ में भी उल्लेखनीय वृद्धि करते हैं।



