डेरी पशुओं में होने वाले कुछ प्रमुख रोगों की पहचान एवं रोकथाम

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डेरी पशुओं में होने वाले कुछ प्रमुख रोगों की पहचान एवं रोकथाम

निपुणा ठाकुर1, गीतांजलि सिंह1, ऋषिका विज1, श्रीजा सिन्हा2

1पशु शरीरक्रिया विज्ञान और जैव रसायन विभाग, पशु चिकित्सा विज्ञान और पशुपालन महाविद्यालय, पालमपुर (हि.प्र.) 2भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ

परिचय

विभिन्न डेयरी रोगों की घटनाओं ने भारत में डेयरी उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। प्रमुख कारणों में से एक रोग के लक्षणों और प्रकृति के बारे में सीमित जानकारी है। इस प्रकार रोग के टीकाकरण या रोगनिरोधी उपायों के बारे में जागरूकता भी सीमित है। निम्नलिखित लेख में हमारा उद्देश्य डेयरी मवेशियों के उत्पादन को प्रभावित करने वाली प्रमुख बीमारियों के सबसे महत्वपूर्ण बिंदुओं को उजागर करना है, जिससे पशुपालकों को पशुओं का समय पर टीकाकरण करवाने और सुरक्षा उपायों को अपनाने के माध्यम से प्रमुख पशुधन रोगों की रोकथाम करने में मदद मिल सके।

डेरी पशुओं में होने वाले कुछ प्रमुख रोग:

  1. खुरमुहि /खुरपकामुँहपका रोग (फुट एंड माउथ डिजीज)

खुरमुहि (एफ. एम. डी.) फटे खुरों वाले पशुओं (गाय, भैंस, भेड़, बकरी, सूअर आदि) का अत्यधिक संक्रामक विषाणु जनित रोग है। यह रोग बहुत छोटे पशुओं को छोड़कर वयस्क पशुओं में जानलेवा नहीं होता है। लेकिन इसके कारण डेयरी उत्पादन में भारी नुकसान होता है। खुरमुहि की शुरुआत पशु के दूध उत्पादन में अचानक गिरावट, तेज बुखार और चारा न खाने से होती है। पशु के मुंह (मुख की श्रलेष्मा, मसूड़ों, जीभ) और खुरों में छाले उभर आते हैं। अत्यधिक लार गिरती है और इन घावों के कारण पशु को खाने-पीने में असमर्थता हो जाती है। इन सभी कारणों से उत्पादन में कमी, लंगड़ापन और पशुओं की रुग्णता में वृद्धि होती है। खुरमुहि जानवरों में तीव्रता से फैलने वाली बीमारी है, जो बीमार जानवर के संपर्क से या बीमारी से दूषित हवा, पानी, प्रवास इत्यादि के संपर्क में आने से होती है।  ऐसे में ये अनिवार्य है की बीमार जानवरों का संगरोधन किया जाए और इन्हें स्वस्थ जानवरों से अलग रखा जाए।  एफ.एम.डी रोग आमतौर पर जानवरों से मनुष्यों में नहीं फैलता है।

खुरमुहि की रोकथाम के लिए पहली बार पशु को 4 महीने की आयु में टीका लगाएं, फिर 28 दिन बाद बूस्टर टीका दोहराये। इसके बाद साल में दो बार 6  महीने के अंतराल पर (जनवरी व् जून में), मवेशियों का टीकाकरण जरूर करवाएं।

पशु की जीभ पर छाले, खुरों पर छाले और अत्यधिक लार गिरना

  1. गलघोटू (हेमोरेजिक सेप्टिसीमिया)

गलघोटू (एच. एस.) एक अचानक और तीव्र गति से होने वाला मवेशियों का जीवाणुजनित रोग है जो गाय, भैंस, भेड़ और बकरी को संक्रमित करता है।  एच. एस. बैक्टीरिया इन पशुओं के ऊपरी श्वसन तंत्र में एक सामान्य निवासी और सहजीवी है। लेकिन जानवरों के परिवहन, कतरने से पहले पानी में डुबोना, पर्यावरणीय तनाव जैसी तनावपूर्ण स्थितियों में, यह बैक्टीरिया रोग उत्पन्न कर सकते हैं। पशुओं को एचएस से बचाने के लिए, पशुपालकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि परिवहन, प्रतिकूल जलवायु, उत्पादन से संबंधित गतिविधियों या चारे में अचानक परिवर्तन के दौरान, पशुओं को किसी भी तरह के तनाव से मुक्त रखा जाए।

यह रोग बरसात के मौसम में संक्रमित पशुओं की लार से दूषित चारे के माध्यम से फैलता है। रोग की शुरुवात पशु के शरीर में अचानक जहर फैलने, बुखार आने और अधिक मात्रा में लार गिरने से होने से होती है। गले, छाती और फेफड़ों में गर्म, दर्दनाक सूजन हो जाती है, जिससे पशु का सांस लेना बहुत मुश्किल हो जाता है और पशु का दम घुटने लगता है। गायों में 24 घंटों के भीतर मृत्यु हो जाती है और इसकी मृत्यु दर 50-100 % तक हो सकती है । एच. एस. का मृत्यु दर भैंसों में 3 गुना अधिक देखा गया है।

गलघोटू से बचाव के लिए मवेशियों को पहली बार 6 महीने की आयु में टीका दिया जाना चाहिए। इसके बाद बरसात की शुरुआत में बूस्टर टीका दोहराएं और फिर रोकथाम के लिए सालाना टीका दोहराया जा सकता है।

एच.एस. के अधिकांश मामले जानवरों द्वारा लंबी दूरी की यात्रा करने के बाद देखे गए हैं। पशु को लम्बे सफर से होने वाले तनाव से बचने के लिए, परिवहन से कुछ दिन पहले पशु का कृमिनाशन करें, मल्टीविटामिन दें। सफर के दौरान पशु को खुले, आरामदायक वाहन में ले जाएँ, उपयुक्त चारे, पानी और आराम आदि की व्यवस्था समय समय पर करते रहें। एच.एस रोग आमतौर पर जानवरों से मनुष्यों में नहीं फैलता है।

मुँह,गले, छाती और फेफड़ों में दर्दनाक सूजन, जिससे सांस लेना मुश्किल

  1. लंगड़ा बुखार/ जहरबाद (ब्लैक लेग/ ब्लैकक्वाटर)

लंगड़ा बुखार (बी. क्यू.) अचानक और तीव्र गति से होने वाला मवेशियों का जीवाणुजनित रोग है, जो मुख्यता गाय, भैस को और कभी-कभी भेड़, बकरी, सूअर  और कभी-कभार घोड़ों आदि को भी प्रभावित कर सकता है। लंगड़ा बुखार ज्यादातर युवा मवेशियों (6 महीने से 2 वर्ष) में देखा जाता है। इस रोग में तेज़ बुखार, मांसपेशियों में सूजन, शरीर में जहर फैलना और उच्च मृत्यु दर पशुओं में देखा जा सकता है। शुरुआत में मांसपेशी गर्म और छूने में दर्दनाक होती हैं, लेकिन जल्द ही ठंडी, दर्द रहित हो जाती हैं और सूजन व् हवा के बुलबुले से भर जाती हैं। प्रभावित पशु की टांग की मांसपेशियों सूजन और दर्द से लाल पड़ जाती हैं और इसके कारण पशु लंगड़ा हो जाता है और जल्द ही मर जाता है। यह रोग मिट्टी में पाए जाने वाले बीमारी के बीजाणुओं के कारण फैलता है, जो चारे के माध्यम से, घाव के द्वारा या जन्म के समय नाभि नाल को सफाई से ना काटे जाने से पशु के शरीर में प्रवेश कर सकता है। लंगड़ा बुखार (बी. क्यू.) बचाव के लिए मवेशियों को पहली बार 6 महीने की आयु में में टीका लगाया जा सकता है। बरसात की शुरुआत में बूस्टर टीका दोहराएं।  फिर रोकथाम के लिए सालाना दोहराया जा सकता है। बी. क्यू. रोग आमतौर पर जानवरों से मनुष्यों में नहीं फैलता है।

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मांसपेशी में दर्दनाक सूजन  व् लंगड़ापन

  1. पशुओं की प्लेग (रिंडरपेस्ट)

रिंडरपेस्ट मवेशियों (गाय) का अत्यधिक संक्रामक विषाणु जनित रोग है। यह भैंस, भेड़, बकरी, सुअर, ऊंट, हिरण, जिराफ आदि को भी प्रभावित कर सकता है। इस रोग से ग्रसित पशुओं में तेज बुखार, मुँह में छाले, दस्त और उच्च मृत्यु दर  देखा जाता है। रोग के प्रारम्भ में पशुओं में तेज बुखार, भूख न लगना, थूथन सूखना, बेचैनी, कब्ज, अत्यधिक प्यास, जुगाली में कमी, अधिक लार गिरना तथा प्रकाश से भय जैसे लक्षण देखे जा सकते हैं। 3 से 5 दिन बाद बुखार कम हो जाता है तथा दस्त शुरू हो जाते हैं। साथ ही पेट में दर्द, श्वसन दर में वृद्धि या हांफना, शरीर में पानी की कमी, कमज़ोरी देखी जाती है। अन्त में पशु बैठ जाता है, उसका तापमान सामान्य से कम हो जाता है, तथा 6-12 दिन के भीतर उसकी मृत्यु हो जाती है।

रोग की रोकथाम के लिए जीवन में एक बार लगने वाले टीके का विकास किया गया है, परन्तु यह अभी कम उपलब्ध है। रिंडरपेस्ट रोग आमतौर पर जानवरों से मनुष्यों में नहीं फैलता है।

तेज बुखार, मुँह में छाले, दस्त और उच्च मृत्यु दर

  1. बछड़ों के संक्रामक खूनीदस्त (एन्टेरोटोक्सिमिआ/ काफ स्कोर्स)

यह नवजात एवं छोटे बछड़ों की जीवाणुजनित बीमारी है। यह मेमनों, बछड़ों, सूअर के बच्चों में भी पाया जाता है तथा कुछ जीवाणु प्रजातियों वयस्कों को भी प्रभावित कर सकती हैं। इस रोग का जीवाणु मिट्टी में, बीमार जानवरों की आंतों अथवा जानवर के परिसर में होता है। यह गंदे खान-पान से जानवर के शरीर में आ जाता है और पशु के शरीर में विषैले तत्व छोड़ता है। इस रोग से ग्रसित बछड़ों में  खूनी दस्त, आंतों में अल्सर, पेट में दर्द, ऐंठन, छाती में सूजन, पीलिया, खून की कमी, पेशाब में खून देखा जाता है। 12-24 घंटों के भीतर बछड़े की मौत हो जाती है।

इस रोग की रोकथाम के लिए बछड़े को दवा की पहली खुराक 4 -6  हफ्ते पर और  दूसरी 2 से 3 महीने पर दें। प्रवास में रोग की आशंका होने पर या बरसात से पहले दवा को दोहराया जा सकता है। बीमार बछड़ों और संक्रमित गोबर से सने सामान को संभालने के दौरान, खूनी दस्त बछड़ों से मल-मौखिक मार्ग के माध्यम से मनुष्यों में फैल सकता है। इसलिए, संक्रमित बछड़ों की देखभाल करते समय सीधे संपर्क से बचने के लिए स्वच्छता और एहतियात बरतने का ध्यान रखा जाना चाहिए।

खूनी दस्त, आंतों में दर्द, छाती में सूजन और 12-24 घंटों के भीतर बछड़े की मौत

  1. हलकना (रेबीज)

रेबीज एक अत्यधिक संक्रामक विषाणु जनित रोग है, जो सभी घरेलू और जंगली गर्म खून वाले जानवरों(गाय, कुत्ते, बिल्ली, घोड़ा, बकरी, भेड़, सुअर, घोड़ा, चमगादड़, गिलहरी, नेवलाआदि) को प्रभावित करती है, जिसमें मनुष्य भी शामिल हैं। यह संक्रमित जानवर के काटने के गहरे घावों के माध्यम से फैलता है। रेबीज विषाणु जानवर के तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है और इसके परिणामस्वरूप पागलपन, उत्तेजना, जल-भय, ऐंठन और आमतौर पर श्वसन मांसपेशियों में लकवा हो जाने पर साँस ना ले पाने के कारण पशु की मृत्यु हो जाती है।  एक बार संक्रमित होने पर रेबीज रोग लगभग हमेशा घातक होता है।

मवेशियों (गाय) में रेबीज़ के दो रूप देखे जाते हैं। एक जो पागल बना देता है और दूसरा जो लकवाग्रस्त कर देता है। पागल गायों में अत्यधिक लार स्राव, अत्यधिक रम्भाना, काटने की प्रवृत्ति और उग्र व्यवहार देखा जाता है। रोग के लकवाग्रस्त रूप में गायों में अत्यधिक लार स्राव और निगलने में असमर्थता देखी जाती है।

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रेबीज़ की रोकथाम के लिए बछड़ों को 3 महीने या उससे अधिक उम्र में एक बार रोग-निरोधी खुराक (काटने से पहले) के रूप में टीका लगवाएं। यदि काट लिया जाए, तो काटने के बाद 0, 3,7,14, 28, 90 दिनों पर टीका दोहराया जाता है।

पागल जानवर में निर्जीव वस्तुओं और पशु दोनों को काटने की प्रवृत्ति होती है। ऐसे संक्रमित जानवरों से बचने के लिए सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि संक्रमित जानवर के काटने से रेबीज आसानी से मनुष्यों या अन्य जानवरों में फैल सकता है। पागल जानवर द्वारा काटे जाने पर, काटे गए स्थान को तुरंत साबुन और पानी से धोएं, विषाणु नाशक पोविडोन आयोडीन या अल्कोहल के घोल से धोएं और काटने के घाव को न ढकें। घाव पर पारंपरिक घरेलू उपचार या चूना, मिट्टी या हल्दी जैसे उत्तेजक पदार्थ न लगाएं। एंटी रेबीज इम्यूनोग्लोबुलिन इंजेक्शन और अनुशंसित टीकाकरण कार्यक्रम के लिए तुरंत अस्पताल जाएं।

पागलपन या लकवा मार जाना

  1. संक्रामकगर्भपात (ब्रुसेला)

ब्रुसेला एक व्यापक रूप से प्रचलित जीवाणु जनित रोग है, जो गाय, भैंस, भेड़, बकरी, सूअर, घोड़े, कुत्ते आदि पशु प्रजातियों में पाया जाता है। यह जीवाणु गर्भस्थ शिशु, पशु की जैर अथवा गर्भाशय की निकलने वाले स्राव से संक्रमित आहार के सेवन अथवा संक्रमित पशु की जेर खा लेने से पशुओं में प्रवेश करता है। इसके बाद ब्रूसेला जीवाणु क्षेत्रीय लसीका गांठ(लिम्फ नोड्स), प्लीहा, जिगर, जोड़ों में स्थानीयकृत हो जाता है और प्लेसेंटा तथा भ्रूण में स्थानांतरित होने की इसकी अत्यधिक प्रवृत्ति रहती है। गायों में, ब्रुसेला मुख्य रूप से गर्भावस्था की अंतिम तिमाही (7 वें-8वें महीने)में गर्भपात का कारण बनता है। ऐसे पशुओं में जेर भी जल्दी नहीं गिरती या अंदर ही रह जाती है। बछड़े कमज़ोर या मरे हुए पैदा होते हैं। यह गायों की चमड़ी व् शरीर में सामान्यीकृत गांठों और घुटने के जोड़ों में सूजन का कारण भी बन सकता है। नर पशुओं में यह संक्रमित मादा से सहवास या संक्रमित वीर्य से कृत्रिम गर्भाधान से करवाने के माध्यम से प्रवेश कर सकता है और नर के जननांगों में सूजन अथवा बांझपन का कारण बन सकता है। बैल रोग के लक्षण वाहक के रूप में कार्य करते हैं और संक्रमित वीर्य के माध्यम से असंक्रमित मादाओं में तथा पशुपालकों में भी ब्रुसेला फैला सकते हैं।

ब्रुसेला को रोकने के लिए, मादा पशुओं को 4-8 महीने की उम्र में पहला टीका लगाया जाना चाहिए। इसके बाद रोग होने की सम्भावना होने पर टीका दोहराया जा सकता है।

ब्रूसल्ला एक पशुओं से मनुष्यों में फैलने वाला रोग है और जीवाणु संक्रमित गायों का बिना उबला दूध पीने से, ग्वालों में दूध दोहते समय चोट से या संक्रमित सामग्री से संपर्क में आने से मनुष्यों में प्रवेश कर सकता है। मनुष्यों में यह बुखार, थकावट, बदन, पेट अथवा जोड़ों के दर्द,  प्लीहा, जिगर, लिम्फ नोड्स अथवा जननांगों में सूजन का कारण बन सकता है। ब्रूसेला को पशुओं से मनुष्यों में फैलने से रोकने के लिए, दूध को अच्छी तरह उबाल कर प्रयोग करें, हाथों में खुले घाव आदि होने पर संक्रमित पशु को न दोहे और पशु के गर्भपात या प्रसव के बाद बिना दस्ताने पहने पशु की जैर और संक्रमित आवास स्थान को न धोएं।

  1. संक्रमित पशु की जेर खा लेना2. जेर न जल्दी गिरना3. तीसरी तिमाही में गर्भपात 4. घुटने के जोड़ों में सूजन

8.टिक/ चीचड़ जनित ज्वर (थेलेरिओसिस)

थेलेरिया चीचड़ जनित- प्रोटोजोअल रोग है, जो भेड़, भैंस, बकरी आदि पशु प्रजातियों को प्रभावित करता है। यह संक्रमित चीचड़ की लार में मौजूद होता है और चीचड़ों की कई प्रजातियों के काटने से पशु में प्रवेश कर सकता है। यह रोग पशुओं के रक्त में श्वेत रक्त कोशिकाओं और लाल रक्त कोशिकाओं को प्रभावित करता है। विदेशी नस्ल के मवेशी, देशी नस्ल की तुलना में थेरेलिया संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।

थेलेरिया रोग चीचड़ के काटने के 15 दिन बाद बुखार, भूख में कमी, जुगाली बंद होने तथा दूध उत्पादन में कमी के साथ शुरू होता है। लिम्फ नोड में सूजन आ जाती है, थूथन सूख जाता है, पशु एनीमिया से ग्रस्त हो जाता है, पेशाब में खून आने लगता है, आँख की श्लेष्मा झिल्ली में  पीलापन और पशु के नेत्र गोलक बाहर की और लटक जाते हैं, बाल रूखे हो जाते हैं, तथा अधिक लार और आंसू गिरने लगते हैं। फेफड़ों और छाती में तरल पदार्थ भर जाने के कारण पशु को सांस लेने में तकलीफ हो सकती है। शरीर के अन्य भागों में भी सूजन देखी जा सकती है। मृत्यु दर अधिक होती है तथा 100% तक हो सकती है। मजबूत प्रतिरक्षा वाले पशु जीवित रह जाते हैं तथा ऐसे पशु भविष्य में रोग के लिए प्रतिरक्षा प्राप्त कर लेते हैं। इस रोग की रोकथाम के लिए पशुओं को 2-8 महीने की उम्र में पहला टीका दिया जा सकती है। उसके बाद टीका  3 वर्ष के अंतराल पर दोहराया जा सकता है। थेलेरिया रोग आमतौर पर जानवरों से मनुष्यों में नहीं फैलता है।   

  1. चीचड़ ग्रस्त पशु लिम्फ नोड में सूजन3. आँखों का पीलापन और सूजन 4. साँस लेने में दिक्कत
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9.लम्पी स्किन डिजीज (एल.एस.डी.) / गांठदार त्वचा रोग

लम्पी स्किन डिजीज (एल.एस.डी.) मवेशियों और भैंसों का एक संक्रामक, विषाणु जनित रोग है। यह मुख्य रूप से मक्खियों और मच्छरों, संभवतः चीचड़ों आदि जैसे कीड़ों के काटने से फैलता है। संक्रमित जानवरों और उनके स्रावों या उत्सर्जनों के सीधे संपर्क से भी लम्पी रोग फैल सकता है। लम्पी स्किन डिजीज रोग आमतौर पर जानवरों से मनुष्यों में नहीं फैलता है।

लम्पी स्किन डिजीज की विशेषता बुखार और मुख्यता त्वचा पर गांठें होती हैं। प्रभावित पशुओं के लिम्फ नोड्स और अंगों में सूजन हो सकती है। श्वसन और जठरांत्र संबंधी समस्याएं, दूध उत्पादन में कमी, खराब विकास दर, बांझपन और गर्भपात भी देखे जा सकते हैं। हालाँकि इस बीमारी से मृत्यु दर कम होती है, लेकिन यह दूध उत्पादन में कमी, क्षीणता, क्षतिग्रस्त खाल, बांझपन और गर्भपात के कारण आर्थिक नुकसान का महत्वपूर्ण कारण बनता है। हालाँकि इसका कोई विशिष्ट इलाज नहीं है, लेकिन इसके उपचार के लिए, पशु चिकित्सक के परामर्श से एंटीबायोटिक्स और सहायक दवाएं पशु को दी जा सकती है। लम्पी स्किन डिजीज की रोकथाम करने के लिए पशु का टीकाकरण और कीड़ों कीड़ों की आबादी को नियंत्रित करना शामिल हैं।

लम्पी स्किन डिजीज (एल.एस.डी.) के टीकाकरण के लिए आयु संबंधी दिशानिर्देश अलग-अलग होते हैं:-

  • सभीवयस्क मवेशियों और भैंसों का टीकाकरण सालाना किया जाना चाहिए।
  • टीकाकृतमाताओं के बछड़ों का टीकाकरण 3 से 6 महीने की उम्र के बीच किया जाना चाहिए।
  • बिनाटीकाकरण वाली माताओं के बछड़ों का टीकाकरण किसी भी उम्र में किया जा सकता है।
  • नएखरीदे गए पशुओं का टीकाकरण झुंड में शामिल करने से 28 दिन पहले किया जाना चाहिए।
  • पशुओंका टीकाकरण परिवहन या किसी नए स्थान पर ले जाने से 28 दिन पहले किया जाना चाहिए।

टीकाकरण से संबंधित मार्गदर्शन के लिए टीका निर्माता के निदेशों का पालन करना और स्थानीय पशु चिकित्सक से परामर्श करना बहुत महत्वपूर्ण है।

पशुओं की त्वचा और थनों पर गांठें

  1. थनेलारोग /स्तनदाह  (मेसटाइटीस)

गायों में स्तनदाह (मैस्टाइटिस) स्तन ग्रंथि की सूजन होती है, जो अक्सर थन-नलिका से बैक्टीरिया के प्रवेश के कारण होती है। इससे दूध की गुणवत्ता और मात्रा कम हो जाती है, और गाय के स्वास्थ्य को संभावित नुकसान पहुँचता है।

  1. मैस्टाइटिस दो प्रकार की देखी जाती है।यह नैदानिक (क्लीनिकल) हो सकती है, जिसमें एक या एक से अधिक सूजे हुए, दर्दनाक थन और असामान्य दूध जैसे लक्षण दिखाई देते है।
  2. यह उप-नैदानिक ​​(सब-क्लीनिकल) हो सकती है, जिसमें कुछ या कोई लक्षण दिखाई नहीं देते, लेकिन फिर भी दूध में उच्च दैहिक कोशिका की गणना (सोमेटिक सेल काउंट) द्वारा इसका पता लगाया जा सकता है।

मैस्टाइटिस से पशु को कष्ट होता है और दूध उत्पाद कम होने से ग्वालों को भारी नुकसान उठना पड़ता है। मैस्टाइटिस की रोकथाम के लिए गाए व् ग्वाले की स्वच्छता, सफाई से दूध दोहने की प्रक्रिया, पशु के पर्यावरण का कीटाणुशोधन और थनों के बैक्टीरिया संपर्क को कम करने के लिए थनों को दोहने के बाद 1 % पोटैशियम परमैंगनेट (नीला थोथा) आदि जैसे कीटाणुनाशक पदार्थों (डिप्स) से धोया जाना चाहिए। साथ ही दोहन के तुरंत बाद पशु को ज़मीन पर नहीं बैठने देना चाहिए, क्यूंकि इस समय थनों के छिद्र खुले होतें हैं और ऐसे में बैक्टीरिया आसानी से थनों में प्रवेश कर सकते है। थनों में सूजन, लाली, दर्द, खून आने पर या दूध के रंग, स्वाद, गंध में बदलाव, उबलने पर शीघ्र फट जाने पर मैस्टाइटिस का संदेह किया जा सकता है।

मैस्टाइटिस का निदान पास के पशु चिकित्सालय से पशु के थनों की स्थिति देख कर और पशु के चारों थनों के दूध का परिक्षण केलिफोर्निआ मैस्टाइटिस टेस्ट अथवा सोमेटिक सेल काउंट इत्यादि जैसे आधुनिक निदानात्मक परीक्षणों से करवा कर किया जा सकता है। मैस्टाइटिस के उपचार के लिए, पशु चिकित्सक के परामर्श से एंटीबायोटिक्स और सहायक दवाएं पशु को दी जा सकती है। इसमें थनों पर लगाई जाने वाली और पशु को खिलाई जाने वाली दवाएं शामिल होती हैं।

नैदानिक (क्लीनिकल) और उप-नैदानिक (सब-क्लीनिकल) मैस्टाइटिस        दूध की जाँच

(केलिफोर्निआ मैस्टाइटिस टेस्ट)

सारांश

किसानों द्वारा पशु रोग का शीघ्र निदान, रोग के प्रकोप को रोकने और डेयरी उद्योग में होने वाले नुकसान से बचने में बहुत मददगार हो सकता है। रोग की प्रकृति के बारे में जानकारी प्रदान करना और इसके निवारक उपायों के बारे में जागरूकता फैलाना इस दिशा में पहला कदम है। पशुपालन विभाग द्वारा विस्तार गतिविधियों को बढ़ावा देना और सूचना का तेजी से प्रसार करना और भी मददगार हो सकता है।

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