राष्ट्रीय उन्नति के पथ पर पशुपालन व मत्स्य पालन क्षेत्रों का योगदान

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राष्ट्रीय उन्नति के पथ पर पशुपालन  मत्स्य पालन क्षेत्रों का योगदान

 1डॉ. राकेश आहूजा, 1डॉ. देवेश ठाकुर, 1डॉ. तरंग शाह एवं 2डॉ. हरदीप कलकल

1डॉ. जी. सी. नेगी पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय, चौधरी सरवन कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर – 176062

 2कृषि विज्ञान केंद्र, सिरसा, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविधालय, हिसार

भारत में पशुपालनसहजीवन का इतिहास

यह केवल मनुष्य ही है जो अन्य जानवरों को पालतू बना सकता है और स्वयं की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उनका उपयोग कर सकता है।पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में मानव आवास के विभिन्न केंद्रों से पुरातत्वविदों द्वारा भारी मात्रा में जानवरों के अवशेष खोजे गए हैं। पशुपालन न केवल आर्थिक/सैन्य रूप से बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के साथ भी भारतीय ऐतिहासिक सभ्यताओं का पर्याय बन गया।

भेड़ और बकरियों को सबसे पहले दक्षिण भारतीय नवपाषाण काल के मनुष्यों ने लगभग 2 हजार पाँच सौ ईसा पूर्व दूध, ऊन, मांस, चमड़ा और अन्य वस्तुओं के स्रोत के रूप में पाला था। आज के भारतीय घरेलू मुर्गे की उत्पत्ति लाल जंगली मुर्गे से हुई है। सिंधु सभ्यता की मुहरों को कूबड़ वाले और कूबड़ रहित बैलों, बकरियों, भेड़ों, हाथियों और मुर्गों से सजाया गया था। वैदिक आर्य घोड़े, कुत्ते, भेड़, बकरी, मुर्गी, हाथी, गाय-बैल आदि पालते थे। मौर्य युग के दौरान, भैंस को डेयरी मवेशियों की श्रेणी में शामिल किया गया था।

मानव इतिहास में जानवरों को पालतू बनाना कोई नई बात नहीं है।वैदिक साहित्य में गाय को धन की मापक इकाई माना गया है। गाय को “अघ्न्या” (हत्या न की जाए) का दर्जा प्राप्त था।” छठी शताब्दी ईसा पूर्व श्रावस्ती, कौसांबी और लिच्छवी राज्यों के भारतीय शासकों ने कूबड़ वाले बैल/गाय के चित्र वाले सिक्के जारी किए थे। घोड़े और हाथी, मौर्य सेना के दो मुख्य युद्ध जानवर थे। तीसरे मौर्य सम्राट, अशोक, ने बौद्ध धर्म में परिवर्तन के बाद, अपने पूरे क्षेत्र में पशु चिकित्सालयों की स्थापना की। “पुजारी प्राचीन भारत के पहले पशुचिकित्सक थे। उनमें से प्रमुख थे शालिहोत्र [घोड़े की चिकित्सा के शुरुआती विशेषज्ञ और “हया आयुर्वेद” के लेखक] ।

प्राचीन भारतीय, पशुपालन की तकनीक से भी परिचित थे। संक्षेप में प्राचीन भारतीय पशु चिकित्सा आयुर्वेदिक और शल्य चिकित्सा उपचार इक्कीसवीं सदी में भी मनोवैज्ञानिक तनाव के अलावा पेचिश, खांसी, घाव, बांझपन और विभिन्न संक्रमणों को ठीक करने में प्रभावी हैं। स्थलीय जानवरों के अलावा प्राचीन भारतीय लोग मछलियों, सीपियों और कछुओं के अस्तित्व से भी परिचित थे।

खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा

किसानों द्वारा पाले गए पशु दूध, मांस, अंडे जैसे पौष्टिक खाद्य का स्रोत हैं।भारत के किसानों में खेती के साथ पशुपालन करना सर्वाधिक प्रचलन में है। फसल उपोत्पाद पशुओं के चारे और आहार के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं। इसी प्रकार पशुओं का मल खाद के रूप में फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। काम लागत में किसान अपने घर में ही पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थ प्राप्त कर पा रहे हैं जिससे खाद्य सुरक्षा में बढ़ावा हो रहा है। अर्थात पशु पालन से कम मासिक अथवा वार्षिक आय कमाने वाले व्यक्ति भी अपनी पोषण संबंधी आवश्यकताएं पर्याप्त रूप से पूरी कर पा रहे हैं।

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भारत में मत्स्य पालन क्षेत्र देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में बहुआयामी और महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह न केवल खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान देता है, बल्कि पोषण सुरक्षा का भी एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जो आवश्यक फैटी एसिड, विटामिन और खनिजों से भरपूर किफायती पशु प्रोटीन प्रदान करता है जो कुपोषण से लड़ने में मदद करता है। भारत में किसानो द्वारा मत्स्य पालन के साथ पशु पालन बहुत व्यापक रूप से किया जा रहा है,जिससे पशु का मल मछली के भोजन बनाने का काम आ जाता है और मछलियों के आहार पर होने वाला खर्च भी कम हो जाता है। किसानो को मछली के साथ दूध, अंडा, व मांस का अतिरिक्त स्त्रोत मिलता है।

भारत में पशु  मत्स्य उत्पादों का प्रसंस्करण क्षेत्र

भारत में पशुपालन व मत्स्य उत्पादों का प्रसंस्करण क्षेत्र एक महत्वपूर्ण और विस्तृत क्षेत्र है जो देश की आर्थिक और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है। यह क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था के एक प्रमुख खंड के रूप में माना जाता है, जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों लोग रोजगार पाते हैं। पशु व मत्स्य उत्पादों के प्रसंस्करण क्षेत्र में तकनीकी उन्नति और नवाचार भी हो रहे हैं।यह सुनिश्चित करता है कि उत्पादों की गुणवत्ता और अनुपातितता में सुधार होता रहता है। पशुपालन उत्पादों के प्रसंस्करण क्षेत्र में दूध, मांस, अंडा, सींग, खुर, ऊन, चमड़ा और हड्डी जैसे उत्पादों का प्रसंस्करण किया जाता है। मछली प्रसंस्करण से विभिन्न प्रकार के उत्पाद जैसे ताज़ा और जमे हुए फ़िलेट्स, स्टेक, और मूल्यवर्धित उत्पाद जैसे फ़िश फ़िंगर्स, कटलेट, सॉसेज और अचार, डिब्बाबंद मछली, सुरीमी उत्पाद, और उप-उत्पाद जैसे मछली का तेल, कोलेजन और न्यूट्रास्युटिकल्स भी शामिल हैं जिनका भोजन, चारा और उद्योग में विविध उपयोग होता है।

इस क्षेत्र का विकास ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाता है। पशुपालन व मत्स्य उत्पादों का खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र उत्पादकों को अधिक मूल्य और उत्पन्नता के साथ उनके उत्पादों को बेचने का असर प्रदान करता है।

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गरीबी उन्मूलन में योगदान 

‘अमूल सहकारी समाज’ गरीबी उन्मूलन का पर्याय बन चुका है। पशुपालन व मत्स्य पालन क्षेत्रों युवाओं की बेरोजगारी का समाधान और प्रगति के नए अवसर प्रदान कर ही रहा है साथ ही साथ इसका किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान है। दूध, मांस, अंडों, मछली की अधिशेष उपज को बेचकर किसानों की आय में बढ़ोतरी हुई है । यह एकमात्र क्षेत्र है जिसने अशिक्षित लोगों को रोज़गार प्रदान किया है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सुधार में पशु व मत्स्य पालन की मुख्य भूमिका है। विशेषकर भूमिहीन और सीमांत किसानों की आजीविका का साधन पशुपालन है। पशु व मत्स्य पालन में अधिकतर महिलाएं संलग्न हैं। अतः यह श्रम क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण में योगदान दे रहा है। पिछले 20 वर्षों से भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है और दूध उत्पादन बड़े स्तर पर देश की अर्थव्यवस्था में भागीदारी करता है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है । 

मत्स्य पालन में कम लागत से अधिक आर्थिक लाभ, मधुमक्खी पालन से शहद जैसे महंगे उत्पाद की प्राप्ति, भेड़ पालन से ऊन प्राप्त करना यह सारे कम लागत से अच्छी आय प्राप्त प्राप्त करने के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं जो पशुपालन क्षेत्र में देखने को मिलते हैं। पशुपालन ने Venky’s जैसे कई बड़े उद्योगों को जन्म दिया है और पशुपालन क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भी बड़ी भागीदारी है। इनके अतिरिक्त युवा वैज्ञानिकों के लिए शोध और अनुसंधान के अवसर पशुपालन ने प्रदान किए हैं।

पर्यावरण की रक्षा में पशुपालन की भूमिका  

प्रयावरण की रक्षा में पशुपालन क्षेत्र की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। पशुपालन न केवल आर्थिक विकास का स्रोत है, बल्कि यह प्रदूषण नियंत्रण, उर्वरक संवर्धन, और सांस्कृतिक समृद्धि में भी योगदान करता है। पशुओं के गोबर से बने खाद के उपयोग से खेतों में उर्वरक संवर्धन होता है और कृषि उत्पादन में वृद्धि होती है। इसके अलावा, पशुपालन के क्षेत्र में हुआ प्रयोग उर्वरक संवर्धन और वृक्षारोपण में भी सहायक हो सकता है, जिससे प्राकृतिक संतुलन बना रहता है। पशुपालन क्षेत्र की बढ़ती महत्ता को देखते हुए, हमें इसे प्राकृतिक संसाधनों के सही उपयोग और संरक्षण के साथ विकसित करने का प्रयास करना चाहिए।

पशुपालन क्षेत्र का सही तरीके से प्रबंधन करने से प्रयावरण को भी लाभ होता है। जंगलों की कटाई को कम करके, वन्यजीवों की सुरक्षा के माध्यम से,और पशुपालन क्षेत्र की विविधता को बढ़ावा देने से प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण किया जा सकता है। इसके अलावा, आदिवासी समुदाय की पशुओं के साथ सहजीविता भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक गौर करने वाला पहलू है। उन्हें अपनी जीवनशैली के अनुसार पशुओं से जुड़े रहने का अवसर मिलता है, जो उनकी दैनिक आहार आवश्यकताओं और सुरक्षा कारणों को भी साधता है।

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पशुपालन क्षेत्र की बढ़ती हुई महत्वपूर्णता के साथ-साथ, हमें इसके सुरक्षित और नैतिक अनुसंधान की भी जरुरत है।पशुओं के साथ सहजीवन और उनके उपयोग में जिम्मेदारीपूर्ण तरीके से बदलाव करने से यह सुनिश्चित होगा कि हम न केवल आर्थिक विकास कर रहे हैं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों का सही से उपयोग कर रहे हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे सुरक्षित रख रहे हैं।

निष्कर्ष

मानव सभ्यता के प्रारंभ से वर्तमान समय तक पशुपालन ने मनुष्य के जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा किया है। प्राचीन समय से पशुपालन न केवल आर्थिक या सैन्य बल के रूप से महत्वपूर्ण रहा है अपितु धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़कर विश्व की विभिन्न सभ्यताओं का पर्याय बन गया है। पशु व मत्स्य पालन के कारण लोग अपने घर पर ही दूध मांस अंडे मछली जैसे पौष्टिक खाद्य पदार्थ प्राप्त कर पा रहे हैं जिससे खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा मिला है। पशु व मत्स्य पालन क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण खंड है। इस वर्ग ने लाखों लोगों को रोजगार प्रदान किया है विशेषकर अशिक्षित वर्ग को सबसे अधिक रोजगार प्रदान किया है। जिससे गरीबी उन्मूलन में बड़ी सहायता मिली है। अंतर्राष्ट्रीय उद्योग में अपनी जगह बनाकर पशुपालन क्षेत्र, देश की अर्थव्यवस्था को संभालने वाले एक मजबूत स्तंभ के रूप में उजागर हुआ है। पशुपालन, पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से एक ऐसा घटक है जिसे किसी दूसरे घटक से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है। पशुओं के गोबर से प्राप्त की जाने वाली खाद के कारण रासायनिक उर्वरकों पर हमारी निर्भरता कम हुई है। गोबर गैस उत्पादन से ईंधन के प्राकृतिक संसाधनों पर भार काम हो रहा है। बड़े स्तर पर चारे की फसलों और चारे के पेड़ उगाने से वायु की गुणवत्ता में सुधार होता है और प्रकृति का संतुलन बना रहता है। खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र ने कई लोगों को रोजगार प्रदान किया है और पशुपालन उत्पादों की गुणवत्ता के सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रसंस्करण की सहायता से खाद्य उत्पादों की आयु बढ़ती है और इनके निर्यात में भी सहायता मिलती है। खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र कई युवा वैज्ञानिकों को तकनीकी उन्नति के अवसर प्रदान करता है। इस तरह पशुपालन क्षेत्र राष्ट्रीय उन्नति के पथ पर महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

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