“मेरा रेशम मेरा अभिमान” अभियान: जशपुर में दो माह की सफल गाथा
निधि सुखीजा¹, श्याम कुमार², इम्मानुएल गिलवैक्स प्रभु¹, दीपिका उमेश¹, दिव्या राजावत¹, विशाल मित्तल¹, एन. बी. चौधरी¹
¹ केन्द्रीय तसर अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, राँची (झारखंड)
² सहायक निदेशक (रेशम), जशपुर (छत्तीसगढ़)
राष्ट्रीय अभियान “मेरा रेशम मेरा अभिमान” (MRMA) के अंतर्गत जशपुर ज़िले में जुलाई से सितम्बर 2025 तक एक श्रृंखलाबद्ध कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। यह अभियान केन्द्रीय तसर अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान (सीएसबी-सीटीआरटीआई), नगड़ी, रांची के तत्वावधान में एवं स्थानीय रेशम विभाग के सहयोग से सम्पन्न हुआ।
लगभग दो माह तक चले इस अभियान में 13 से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें 500 से अधिक तसर व रेशम कृषकों की सक्रिय भागीदारी रही। इन आयोजनों का नेतृत्व डॉ. निधि सुखिजा, वैज्ञानिक-बी, सीएसबी-सीटीआरटीआई रांची एवं श्री श्याम कुमार, सहायक निदेशक (रेशम), जशपुर ने किया:
- प्री-ककून हेतु बेसलाइन सर्वे – क्षेत्रीय भ्रमण – जशपुर
- रेशमकीट पालन: विज्ञान से व्यवहार तक – प्रशिक्षण कार्यक्रम – बंदरचुआ एवं बोडाटोंगरी
- गुणवत्तापूर्ण ग्रेनाज हेतु मानक संचालन प्रक्रियाएँ – प्रशिक्षण कार्यक्रम – सिंगिबहार
- सेरी-जैवविविधता हेतु हितधारक-केंद्रित दृष्टिकोण – जागरूकता कार्यक्रम – नारायणपुर
- टीओटी (तसर): लैब से भूमि तक – प्रदर्शन – भीठघरा
- पालनगृह की विसंक्रमण एवं स्वच्छता – जागरूकता कार्यक्रम – चीकनीपानी
- रेशमकीट रोग प्रबंधन – जागरूकता कार्यक्रम – कांसाबेल
- तसर एवं शहतूत कृषकों के साथ संवाद – क्षेत्रीय भ्रमण – हाथघड़ा
- कृषकों के साथ संवाद – क्षेत्रीय भ्रमण – पगुराबहार
- कोकून कटाई एवं संभाल – प्रशिक्षण कार्यक्रम – भेलवा
- प्रदर्शन / टीओटी वान्या (तसर) प्रौद्योगिकियाँ – प्रदर्शन – भीहावल
- प्रारंभिक आयु रेशमकीट पालन के तरीके – जागरूकता कार्यक्रम – पंड्रिपानी
- अंतिम आयु रेशमकीट पालन के तरीके – जागरूकता कार्यक्रम – गोडिजामर्गी
इस अवधि में किसानों को तसर पालन की विभिन्न तकनीकों से अवगत कराया गया। प्रमुख रूप से किसानों को कोकून हैंडलिंग एवं हार्वेस्टिंग, रोग प्रबंधन, चींटी नियंत्रण, मेजबान पौधों के संरक्षण और मूल्य संवर्धन जैसे विषयों पर प्रशिक्षण प्रदान किया गया।
अभियान के दौरान कई बार किसानों की चुनौतियों पर भी खुली चर्चा की गई, जैसे – बंदरों का आक्रमण, देर अवस्था की बीमारियाँ, चींटी का प्रकोप और कोकून के उचित मूल्य न मिलना। वैज्ञानिकों ने इन समस्याओं के समाधान हेतु मानक संचालन प्रक्रियाएँ (SOPs) किसानों को समझाईं और उनके व्यावहारिक उपयोग की जानकारी दी।
सतत् तसर पालन हेतु किसानों को प्रेरित करने के लिए 200 से अधिक पौधों का वितरण भी किया गया। इसके साथ ही किसानों को सीरी-इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया, ताकि उनकी आय में विविधता और स्थिरता आ सके।
इन कार्यक्रमों में स्थानीय जनप्रतिनिधियों, ग्राम प्रधानों एवं अधिकारियों की उपस्थिति ने भी किसानों का उत्साह बढ़ाया। उनकी सक्रिय भागीदारी से यह अभियान केवल तकनीकी प्रशिक्षण तक सीमित न रहकर एक सामाजिक आंदोलन का रूप ले सका।
“मेरा रेशम मेरा अभिमान” अभियान ने जशपुर के किसानों में आत्मविश्वास जगाया और तसर पालन को स्थायी आजीविका के रूप में अपनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुआ। यह पहल जशपुर को एक उभरते हुए “सेरिकल्चर हॉटस्पॉट” के रूप में स्थापित करने में सहायक सिद्ध होगी।

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