ग्रामीण महिलाओं का कौशल सशक्तिकरण: ग्राम गुजर हेरि में सिलाई एवं फुलकारी प्रशिक्षण

0
507
SKILL DEVELOPMENT

ग्रामीण महिलाओं का कौशल सशक्तिकरण: ग्राम गुजर हेरि में सिलाई एवं फुलकारी प्रशिक्षण

लेख: डॉ आशीष भालाधरे, डॉ ऍम एच जान डॉ विशाल मुदगल एवं डॉ नवनीत सक्सेना

ग्रामीण भारत में कृषि एवं पशुपालन सदैव से पारिवारिक आजीविका की रीढ़ रहे हैं। किन्तु हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन, बढ़ती उत्पादन लागत, अस्थिर बाज़ार स्थिति तथा बार-बार आने वाली पशु स्वास्थ्य आपात स्थितियों के कारण यह क्षेत्र अनेक चुनौतियों से गुजर रहा है। ऐसे समय में परिवार स्तर पर विभिन्न आय स्रोत—विशेषकर महिलाओं द्वारा—परिवार की स्थिरता एवं आजीविका की निरंतरता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

पशुपालन पर निर्भर परिवार प्रायः ऐसी स्थिति का सामना करते हैं जब अचानक कोई पशु बीमार हो जाए। मास्टाइटिस, चयापचय विकार (Metabolic disorders), चोट, प्रसव संबंधी जटिलताएँ जै सी आपात स्थितियों में तत्काल पशु-चिकित्सा सेवाएँ, औषधियाँ एवं परीक्षण की आवश्यकता होती है। यदि परिवार के पास बचत या नियमित आय न हो, तो ऐसे खर्चों को वहन करना कठिन हो जाता है। कई बार लोग ऊँचे ब्याज पर साहूकारों से धन उधार लेने को मजबूर हो जाते हैं। समय पर अदायगी न होने पर कर्ज बढ़ता जाता है, जो अंततः आर्थिक दबाव, संपत्ति हानि या दीर्घकालिक संकट का रूप ले सकता है।

ऐसी परिस्थितियों में महिलाओं द्वारा अर्जित पूरक आय  एक सशक्त सहारा बन जाती है—छोटी किंतु नियमित आमदनी न केवल आपातकालीन पशु उपचार में सहयोग करती है, बल्कि बेहतर पशु प्रबंधन, टिकाऊ खेती एवं परिवार की आर्थिक प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाती है।

गुज हेरि गाँव में अनुसूचित जाति उपयोजना की  पहल : आधारभूत सर्वेक्षण से आवश्यकता की पहचान

READ MORE :  Scope of Skill Development in Agriculture

अनुसूचित जाति उपयोजना (SCSP) अंतर्गत ICAR–CIRB सब-कैंपस नाभा ने गुज्जर हेरि गाँव को आजीविका विकास एवं जन-जागरूकता के माध्यम से समग्र उन्नयन हेतु अपनाया। हस्तक्षेप की शुरुआत आधारभूत एवं आजीविका सर्वेक्षण से की गई, जिसमें 132 परिवार सम्मिलित थे—जिनमें से 117 परिवार अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित थे।

सर्वेक्षण में ज्ञात हुआ कि लगभग 50 परिवार आजीविका, दुग्ध उपभोग एवं आकस्मिक वित्तीय आवश्यकताओं हेतु भैंस, गाय एवं बकरियों पर निर्भर हैं। ग्रामीण पशुधन स्थिति के अनुसार गाँव में 150 से अधिक गो–भैंस (बछड़ों सहित) तथा 50–60 बकरियाँ पाई गईं। इसके बावजूद सीमित आय स्रोत, आपातकालीन धन उपलब्धता की कमी एवं कौशल आधारित रोजगार का अभाव—दोनों ही जीविकोपार्जन एवं पशु स्वास्थ्य संरक्षण में प्रमुख बाधाओं के रूप में सामने आए।

महिलाओं की चुनौतियाँ एवं कौशल आधारित आय की आवश्यकता

अध्ययन में यह भी पाया गया कि अधिकांश महिलाएँ सीमित शिक्षा प्राप्त हैं तथा नियमित रूप से मनरेगा या दैनिक मजदूरी में संलग्न रहती हैं। उनकी आय अनियमित है, जिससे अचानक होने वाले पशु-चिकित्सा व्यय को पूरा करना कठिन हो जाता है।

सर्वेक्षण से मुख्य निष्कर्ष निम्न रहे:

  • महिलाएँ आर्थिक योगदान देना चाहती थीं, पर प्रशिक्षण के अवसरों का अभाव था
  • घरेलू दायित्वों के कारण वे गाँव से बाहर प्रशिक्षण के लिए नहीं जा पातीं
  • बड़ी संख्या में महिलाएँसिलाई एवं पंजाब की पारंपरिक फुलकारी कढ़ाई में रुचि रखती थीं — जो सांस्कृतिक रूप से जुड़ी होने के साथ-साथ बाज़ार में मांग योग्य कौशल है

इस आधार पर महिला केंद्रित कौशल विकास कार्यक्रम आवश्यक एवं तात्कालिक प्रतीत हुआ।

छः माह का सिलाई एवं फुलकारी प्रशिक्षण कार्यक्रम — प्रारंभ

READ MORE :  Pashu Sakhis play a great role in livestock rearing in Jharkhand's tribal hinterland

 औपचारिक अनुमोदन के पश्चात गाँव में ही छह माह का सिलाई एवं फुलकारी कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम आरम्भ किया गया। प्रशिक्षण केंद्र गाँव के अंदर होने से महिलाएँ घरेलू दायित्वों एवं सीखने के बीच संतुलन बना सकीं।

कार्यक्रम की प्रमुख विशेषताएँ:

  • सिलाई, डिज़ाइन एवं कढ़ाई में व्यावहारिक प्रशिक्षण
  • स्कूल यूनिफॉर्म, परिधान एवं परंपरागत वस्तुओं का निर्माण अभ्यास
  • फुलकारी पैटर्न, धागा-कार्य एवं स्टाइलिंग तकनीक परिचय
  • मूल्य निर्धारण, लागत प्रबंधन एवं ग्राहक व्यवहार जैसेबेसिक बिज़नेस कौशल

आरंभिक बैच में 17 महिलाएँ सम्मिलित हुईं तथा आगे और महिलाओं के जुड़ने की संभावना है।

चित्र 1. प्रशिक्षण के दौरान प्रशिक्षक के साथ गुज्जर हेरि की महिला प्रतिभागी।

भविष्य दृष्टि : स्वयं सहायता समूह (SHG) का गठन

दीर्घकालिक लक्ष्य प्रशिक्षित महिलाओं का एसएचजी गठन है, जिससे उन्हें अवसर प्राप्त होंगे:

  • समूह आधारित उत्पादन एवं विपणन
  • मौसमी निर्भरता से मुक्त नियमित आय
  • लघु ऋण एवं वित्तीय सहायता तक पहुँच
  • स्थानीय बाजार एवं प्रदर्शनियों में उत्पाद विस्तार

यह प्रयास गाँव में स्थायी माइक्रो-एंटरप्राइज़  की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करेगा।

सहयोग एवं वित्तीय सहायता

यह सम्पूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम SCSP द्वारा वित्तपोषित है, जबकि स्थानीय पंचायत ने प्रशिक्षण केंद्र हेतु भवन एवं आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराईं। इस संयुक्त प्रयास ने महिलाओं हेतु सुरक्षित, सुलभ एवं नि:शुल्क प्रशिक्षण वातावरण सुनिश्चित किया।

निष्कर्ष : आत्मनिर्भर एवं सशक्त समुदाय की दिशा में कदम

व्यावहारिक कौशल प्रदान कर महिलाओं को आय सृजन से जोड़ना न केवल परिवारों की आर्थिक शक्ति बढ़ाता है, बल्कि पशुपालन एवं कृषि की स्थिरता भी सुनिश्चित करता है। अल्प स्तर पर होने वाली कमाई से भी परिवार सक्षम हो पाते हैं:

  • पशु-चिकित्सा आपात स्थितियों का प्रबंधन
  • चारा एवं मिनरल मिक्स खर्च
  • बच्चों की शिक्षा
  • घरेलू आवश्यकताएँ
  • ऋण-मुक्त वित्तीय योजना
READ MORE :  महिला सशक्तिकरण के लिए सामाजिक सहभागिता जरूरी

इस पहल के माध्यम से गुज्जर हेरि एक मजबूत, स्वावलंबी एवं आर्थिक रूप से सुरक्षित ग्रामीण समाज की ओर अग्रसर है—जहाँ महिला सशक्तिकरण ही सतत ग्रामीण विकास की नींव बन रहा है।

 

Please follow and like us:
Follow by Email
Twitter

Visit Us
Follow Me
YOUTUBE

YOUTUBE
PINTEREST
LINKEDIN

Share
INSTAGRAM
SOCIALICON