ब्रॉयलर मुर्गियों में ई. कोलाई संक्रमण: कारण, पहचान, उपचार एवं रोकथाम

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 ब्रॉयलर मुर्गियों में . कोलाई संक्रमण: कारण, पहचान, उपचार एवं रोकथाम

 

                   डॉ. अरुणिमा सिंह1* एवं प्रबुद्ध दुबे2 

1सहायक प्राध्यापक, पशु रोग विज्ञान विभाग, आर. आर. कॉलेज ऑफ वेटरनरी एवं एनिमल साइंस, देओली, राजस्थान – 304804

2एम.वी. एससी. शोधार्थी, पशु प्रजनन एवं स्त्री रोग विभाग, कॉलेज ऑफ वेटरनरी एवं एनिमल साइंस, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय

मेरठ, उत्तर प्रदेश – 250110

                *पत्राचार लेखक: 001drarunima@gmail.com

सार

ब्रॉयलर मुर्गियों में ईशरीशिया कोलाई संक्रमण एक प्रमुख जीवाणुजनित रोग है, जो पोल्ट्री उद्योग में आर्थिक हानि का महत्वपूर्ण कारण माना जाता है। यह संक्रमण विशेष रूप से अस्वच्छ आवास, दूषित जल एवं आहार, अत्यधिक घनत्व, कमजोर प्रतिरक्षा तथा अपर्याप्त जैव-सुरक्षा उपायों के कारण तेजी से फैलता है। ई. कोलाई संक्रमण से प्रभावित ब्रॉयलर मुर्गियों में श्वसन संबंधी लक्षण, दस्त, सुस्ती, चारा कम खाना, वृद्धि में कमी तथा मृत्यु दर में वृद्धि देखी जाती है। इस रोग की समय पर पहचान एवं प्रभावी उपचार अत्यंत आवश्यक है। उपचार में एंटीबायोटिक दवाओं का संवेदनशीलता परीक्षण के आधार पर उपयोग, इलेक्ट्रोलाइट एवं विटामिन की पूर्ति तथा सहायक चिकित्सा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। रोग की रोकथाम हेतु ब्रॉयलर शेड की नियमित सफाई एवं कीटाणुशोधन, स्वच्छ पेयजल एवं संतुलित आहार की व्यवस्था, उपयुक्त तापमान एवं वेंटिलेशन, टीकाकरण कार्यक्रम का पालन तथा सख्त जैव-सुरक्षा उपाय अपनाना आवश्यक है। उचित प्रबंधन एवं रोकथाम रणनीतियों को अपनाकर ब्रॉयलर मुर्गियों में ई. कोलाई संक्रमण की घटनाओं को प्रभावी रूप से कम किया जा सकता है, जिससे उत्पादन क्षमता में वृद्धि एवं आर्थिक नुकसान में कमी लाई जा सकती है।

मुख्य शब्द: ब्रॉयलर मुर्गियाँ, ई. कोलाई संक्रमण, जीवाणुजनित रोग, उपचार, रोकथाम, पोल्ट्री प्रबंधन 

परिचय

भारत में ब्रॉयलर मुर्गी पालन आज ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रोजगार और आय का एक महत्वपूर्ण साधन बन चुका है। कम समय में अधिक उत्पादन और बाजार में निरंतर मांग के कारण बड़ी संख्या में किसान इस व्यवसाय से जुड़ रहे हैं। आधुनिक तकनीक और उन्नत नस्लों के उपयोग से उत्पादन तो बढ़ा है, लेकिन इसके साथ ही रोगों की समस्या भी बढ़ती जा रही है। मुर्गी पालन में थोड़ी सी लापरवाही पूरे झुंड को प्रभावित कर सकती है। ब्रॉयलर मुर्गियों में होने वाले जीवाणुजनित रोगों में ईशेरिशिया कोलाई (E. coli) संक्रमण एक प्रमुख और आम समस्या है। यह रोग हर आयु वर्ग की मुर्गियों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन ब्रॉयलर में इसका प्रभाव विशेष रूप से गंभीर देखा जाता है। यह न केवल मुर्गियों की वृद्धि और स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, बल्कि किसान की आर्थिक स्थिति पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

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इस लेख का उद्देश्य मुर्गी पालकों को . कोलाई संक्रमण के बारे में सरल और व्यावहारिक जानकारी देना है, ताकि वे समय रहते इस रोग को पहचान सकें और उचित उपाय अपनाकर नुकसान से बच सकें।

. कोलाई क्या है?

ईशेरिशिया कोलाई एक प्रकार का जीवाणु है जो सामान्य रूप से मुर्गियों की आंत में पाया जाता है। सामान्य परिस्थितियों में यह जीवाणु शरीर को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता और आंतों के सामान्य संतुलन का हिस्सा होता है। लेकिन जब मुर्गियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है, तब यही जीवाणु रोगजनक बन जाता है और संक्रमण का कारण बनता है। . कोलाई को अवसरवादी जीवाणु कहा जाता है, क्योंकि यह खराब वातावरण, तनाव और कमजोर प्रतिरक्षा का लाभ उठाकर बीमारी फैलाता है। गंदा पानी, खराब गुणवत्ता का दाना, गीला लिटर और अत्यधिक भीड़ इसके पनपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाते हैं।

. कोलाई संक्रमण फैलने के प्रमुख कारण:

. कोलाई संक्रमण के फैलने के पीछे कई प्रबंधन संबंधी कारण जिम्मेदार होते हैं। फार्म पर स्वच्छता की कमी सबसे बड़ा कारण है। यदि पीने का पानी साफ न हो या पानी की टंकियों की नियमित सफाई न की जाए, तो जीवाणु तेजी से फैल सकता है। दाने का सही भंडारण न होना भी एक बड़ी समस्या है। नमी लगे या फफूंद युक्त दाने से मुर्गियों की प्रतिरक्षा क्षमता कमजोर हो जाती है, जिससे वे . कोलाई संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं। इसके अलावा, लिटर का लंबे समय तक गीला रहना, अमोनिया गैस की अधिकता और वेंटिलेशन की कमी भी संक्रमण को बढ़ावा देती है। मौसम का तनाव, जैसे अत्यधिक गर्मी या ठंड, ट्रांसपोर्ट के दौरान होने वाला तनाव और अन्य बीमारियों का पहले से मौजूद होना भी ई. कोलाई संक्रमण को गंभीर बना सकता है।

ब्रॉयलर मुर्गियों में . कोलाई का प्रभाव:

. कोलाई संक्रमण का प्रभाव केवल एक अंग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरे शरीर को प्रभावित कर सकता है। यह जीवाणु रक्त के माध्यम से शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंच सकता है। संक्रमण की स्थिति में यकृत, हृदय, प्लीहा और आंत प्रमुख रूप से प्रभावित होते हैं। इन अंगों के प्रभावित होने से मुर्गियों की पाचन क्रिया बिगड़ जाती है, जिससे दाने का सही उपयोग नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप वजन बढ़ने की गति धीमी हो जाती है और मुर्गियां तय समय पर बाजार के लिए तैयार नहीं हो पातीं। गंभीर मामलों में मृत्यु दर भी बढ़ सकती है।

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रोग के सामान्य लक्षण:

. कोलाई संक्रमण के लक्षण अलग-अलग फार्म पर अलग रूप में दिखाई दे सकते हैं। सामान्यतः संक्रमित मुर्गियां सुस्त दिखाई देती हैं और उनकी गतिविधियां कम हो जाती हैं। वे दाना कम खाने लगती हैं और एक कोने में सिमटी हुई बैठी रहती हैं। पंखों का फूला हुआ रहना, शरीर की चमक कम होना और वजन न बढ़ना इस रोग के आम लक्षण हैं। कई मामलों में दस्त, गंदा पिछला हिस्सा और सांस लेने में कठिनाई भी देखी जाती है। कुछ फार्मों में अचानक मृत्यु की घटनाएं भी सामने आती हैं, जिससे किसान चिंतित हो जाते हैं।

समय पर पहचान का महत्व:

. कोलाई संक्रमण की समय पर पहचान बेहद आवश्यक है। शुरुआती अवस्था में यदि रोग की पहचान हो जाए, तो उपचार अपेक्षाकृत आसान हो जाता है और नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। लेकिन यदि बीमारी को नजरअंदाज किया जाए, तो यह पूरे झुंड में तेजी से फैल सकती है। पशु चिकित्सक द्वारा प्रयोगशाला जांच के माध्यम से संक्रमण की पुष्टि की जाती है। सही जांच से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि समस्या . कोलाई की ही है, न कि किसी अन्य रोग की। इससे सही उपचार योजना बनाने में मदद मिलती है।

उपचार में सावधानियां:

. कोलाई संक्रमण के उपचार में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बिना पशु चिकित्सक की सलाह के कोई भी दवा न दी जाए। एंटीबायोटिक का चयन सोच-समझकर किया जाना चाहिए और उसका पूरा कोर्स पूरा करना चाहिए। अधूरा उपचार करने से रोग दोबारा उभर सकता है और समस्या और गंभीर हो सकती है। बार-बार एक ही एंटीबायोटिक का उपयोग करने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस की समस्या उत्पन्न हो सकती है। इसके साथ ही उपचार के दौरान फार्म की साफ-सफाई और प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

रोकथाम: . कोलाई से बचाव के उपाय:

. कोलाई संक्रमण से बचाव उपचार की तुलना में अधिक प्रभावी और किफायती है। फार्म पर हमेशा साफ और स्वच्छ पानी की व्यवस्था होनी चाहिए। पानी की टंकियों और पाइपलाइन की नियमित सफाई बहुत जरूरी है। दाना हमेशा अच्छी गुणवत्ता का होना चाहिए और उसे नमी व फफूंद से बचाकर रखना चाहिए। लिटर को सूखा रखना, समय-समय पर बदलना और शेड की नियमित सफाई करना संक्रमण के खतरे को कम करता है। उचित वेंटिलेशन और सही तापमान बनाए रखना भी बेहद आवश्यक है।

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जैवसुरक्षा (Biosecurity) की भूमिका:

जैव-सुरक्षा . कोलाई सहित कई संक्रामक रोगों से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है। फार्म में बाहरी व्यक्तियों का अनावश्यक प्रवेश रोकना चाहिए। फार्म में उपयोग होने वाले उपकरणों, वाहनों और जूतों की नियमित सफाई और कीटाणुशोधन करना चाहिए। नई मुर्गियों को सीधे पुराने झुंड में शामिल करने से पहले कुछ समय तक अलग रखना चाहिए, ताकि किसी भी संभावित संक्रमण को रोका जा सके। ये छोटे-छोटे कदम फार्म को बड़े नुकसान से बचा सकते हैं।

मुर्गी पालकों के लिए उपयोगी सुझाव:

मुर्गी पालकों को चाहिए कि वे फार्म प्रबंधन को प्राथमिकता दें। नियमित निरीक्षण, साफ-सफाई और संतुलित आहार से मुर्गियों की प्रतिरक्षा क्षमता मजबूत बनी रहती है। किसी भी असामान्य लक्षण को नजरअंदाज न करें और समय रहते पशु चिकित्सक से संपर्क करें। स्वस्थ मुर्गियां ही सफल और लाभकारी मुर्गी पालन की नींव होती हैं। सही जानकारी और सावधानी अपनाकर ई. कोलाई संक्रमण से बचाव संभव है।

निष्कर्ष:

. कोलाई संक्रमण ब्रॉयलर मुर्गियों में एक आम लेकिन गंभीर समस्या है। यह रोग थोड़ी सी लापरवाही के कारण बड़े आर्थिक नुकसान का कारण बन सकता है। लेकिन सही प्रबंधन, स्वच्छता, जैव-सुरक्षा और समय पर उपचार से इस रोग को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है। यदि मुर्गी पालक जागरूक रहें और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाएं, तो वे न केवल अपने फार्म को सुरक्षित रख सकते हैं, बल्कि बेहतर उत्पादन और लाभ भी प्राप्त कर सकते हैं।

संदर्भ

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