पृथ्वी के मौन प्रहरी: विश्व वन्य जीव दिवस 2026 और सह-अस्तित्व का वैश्विक संकल्प

0
713
Silent sentinels of the Earth: World Wildlife Day 2026 and the global resolve for coexistence

पृथ्वी के मौन प्रहरी: विश्व वन्य जीव दिवस 2026 और सह-अस्तित्व का वैश्विक संकल्प

                     – डॉ दीपक कोहली –

3 मार्च को मनाया जाने वाला विश्व वन्य जीव दिवस केवल एक औपचारिक अंतरराष्ट्रीय तिथि नहीं, बल्कि पृथ्वी के उन मौन प्रहरियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है, जिनके कारण जीवन का संतुलन आज भी संभव है। यह दिवस मानवता के लिए एक ऐसी पुकार है, जो जंगलों की निस्तब्धता से उठकर सभ्यता के कोलाहल तक पहुँचती है और हमें यह स्मरण कराती है कि पृथ्वी पर जीवन का ताना-बाना केवल मनुष्य के श्रम, बुद्धि और तकनीक से नहीं, बल्कि उन असंख्य प्राणियों से बुना गया है जो चुपचाप प्रकृति के संतुलन को बनाए रखते हैं। इस दिवस की स्थापना 2013 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा की गई थी, और 3 मार्च की तिथि इसलिए चुनी गई क्योंकि इसी दिन 1973 में साइट्स (वन्य जीवों और वनस्पतियों की संकटग्रस्त प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर अभिसमय) पर हस्ताक्षर हुए थे, जिसका उद्देश्य संकटग्रस्त प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नियंत्रित कर उनके अस्तित्व की रक्षा करना है। यह तथ्य अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि वन्य जीवों का प्रश्न किसी एक देश की सीमा में सिमटा नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक दायित्व है, जो हर राष्ट्र, हर समाज और हर नागरिक से उत्तरदायित्व की अपेक्षा करता है।

वर्ष 2026 की थीम “वन्य जीव संरक्षण में वित्त: लोगों और पृथ्वी में निवेश” (Wildlife Conservation Finance: Investing in People and Planet) इस बात पर विशेष बल देती है कि संरक्षण केवल भावनात्मक अपील का विषय नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक प्रतिबद्धता का भी प्रश्न है। इस वर्ष का संदेश यह है कि यदि जैव-विविधता की रक्षा करनी है तो सरकारों, निजी क्षेत्र, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और स्थानीय समुदायों को मिलकर ऐसी वित्तीय व्यवस्थाएँ विकसित करनी होंगी, जो संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन, अवैध शिकार की रोकथाम, अनुसंधान, सामुदायिक भागीदारी और हरित आजीविका को सतत संसाधन प्रदान कर सकें; क्योंकि बिना पर्याप्त निवेश के संरक्षण के संकल्प व्यावहारिक धरातल पर सफल नहीं हो सकते।

यदि हम 2026 के परिप्रेक्ष्य में इस दिवस को देखें तो पाएँगे कि यह समय जैव-विविधता के लिए अत्यंत निर्णायक है। जलवायु परिवर्तन की तीव्र होती मार, वनों की अंधाधुंध कटाई, प्रदूषण, अवैध शिकार और अनियंत्रित शहरीकरण ने असंख्य प्रजातियों को विलुप्ति के कगार पर पहुँचा दिया है। वैज्ञानिक आँकड़े संकेत देते हैं कि पृथ्वी पर जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियाँ या तो विलुप्त हो चुकी हैं या अपने अस्तित्व के अंतिम दौर में हैं। यह केवल किसी प्राणी विशेष का लोप नहीं, बल्कि प्रकृति की उस जटिल खाद्य-श्रृंखला का टूटना है, जो करोड़ों वर्षों में विकसित हुई है। जब किसी वन से एक शीर्ष शिकारी समाप्त होता है, तो उसका प्रभाव घास तक पहुँचता है; जब मधुमक्खियाँ कम होती हैं, तो कृषि उत्पादन प्रभावित होता है; जब समुद्री जीव मरते हैं, तो महासागरों का संतुलन डगमगाता है। इस प्रकार वन्य जीवों का प्रश्न अंततः मानव अस्तित्व का प्रश्न बन जाता है।

READ MORE :  Biodiversity Hotspots: Guardians of Life on Earth

भारत जैसे देश के लिए यह विषय और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ हिमालय की बर्फीली ऊँचाइयों से लेकर पश्चिमी घाट की वर्षा-वन श्रृंखलाओं, थार मरुस्थल की शुष्क भूमि से लेकर सुंदरबन के मैनग्रोव तटों तक विविध पारिस्थितिक तंत्र विद्यमान हैं। भारत विश्व के उन चुनिंदा देशों में है, जहाँ जैव-विविधता की अपार संपदा पाई जाती है। असंख्य पक्षी, सरीसृप, स्तनधारी और समुद्री जीव यहाँ निवास करते हैं। असम का काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान एक-सींग वाले गैंडे के संरक्षण का जीवंत उदाहरण है, जहाँ कठोर सुरक्षा उपायों और स्थानीय समुदायों के सहयोग से इस विलुप्तप्राय प्रजाति को नई आशा मिली है। गुजरात का गिर राष्ट्रीय उद्यान एशियाई शेरों का अंतिम सुरक्षित घर है, जिसने यह सिद्ध किया कि यदि इच्छाशक्ति और दीर्घकालिक योजना हो तो लुप्तप्राय प्रजातियों को पुनर्जीवन दिया जा सकता है। राजस्थान का रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान और पश्चिम बंगाल का सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान बाघ संरक्षण की दृष्टि से विशेष महत्त्व रखते हैं, जहाँ भारत का राष्ट्रीय पशु बंगाल टाइगरआज भी अपने वन्य वैभव के साथ विचरण करता है, यद्यपि उसका अस्तित्व निरंतर चुनौतियों से घिरा हुआ है।

वन्य जीवों के संरक्षण की बात करते समय हमें यह स्वीकार करना होगा कि मनुष्य की विकास-यात्रा ने प्रकृति पर गहरा प्रभाव डाला है। औद्योगीकरण और शहरीकरण ने जहाँ मानव जीवन को सुविधाएँ दीं, वहीं जंगलों को सीमित कर दिया। सड़कें, रेलमार्ग और बाँध प्राकृतिक आवासों को खंडित कर देते हैं, जिससे जीवों के आवागमन के मार्ग बाधित होते हैं। परिणामस्वरूप मानव-वन्य संघर्ष की घटनाएँ बढ़ती हैं। कई बार हाथी खेतों में प्रवेश कर फसल नष्ट कर देते हैं, तो कभी तेंदुए शहरी बस्तियों में दिखाई देते हैं। यह संघर्ष किसी एक पक्ष की गलती नहीं, बल्कि असंतुलित विकास का परिणाम है। यदि विकास योजनाओं में पर्यावरणीय संतुलन का ध्यान न रखा जाए तो यह संघर्ष और तीव्र होगा।

READ MORE :  Nature Conservation Index 2025: Mapping the Frontiers of Global Conservation Success

अवैध शिकार और तस्करी भी एक गंभीर संकट है। हाथी दाँत, गैंडे का सींग और बाघ की खाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊँचे मूल्य पर बिकते हैं, जिसके कारण शिकारी गिरोह सक्रिय रहते हैं। इन गतिविधियों को रोकने में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और विश्व प्रकृति निधि जैसी संस्थाएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं, जो देशों के बीच समन्वय स्थापित कर संरक्षण अभियानों को सशक्त करती हैं। आधुनिक तकनीक, जैसे ड्रोन निगरानी, उपग्रह चित्रण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विश्लेषण, अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण में सहायक सिद्ध हो रहे हैं। फिर भी केवल तकनीकी उपाय पर्याप्त नहीं, जब तक कि सामाजिक चेतना और क़ानूनी कठोरता साथ न हो।

जलवायु परिवर्तन ने वन्य जीवों की जीवन-शैली को गहराई से प्रभावित किया है। तापमान में वृद्धि के कारण कई प्रजातियाँ अपने पारंपरिक आवास छोड़ने को विवश हैं। पहाड़ी क्षेत्रों के जीव ऊँचाई की ओर प्रवास कर रहे हैं, जबकि समुद्री जीव महासागरों के तापमान में बदलाव से जूझ रहे हैं। कोरल रीफ का क्षरण समुद्री जैव-विविधता के लिए गंभीर संकट बन चुका है। अनियमित वर्षा चक्र, सूखा और बाढ़ भी प्रजनन चक्र को प्रभावित करते हैं। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो आने वाले दशकों में पारिस्थितिक असंतुलन का गंभीर परिणाम मानव समाज को भी भुगतना पड़ेगा।

इस परिदृश्य में विश्व वन्य जीव दिवस हमें केवल संकटों की सूची नहीं देता, बल्कि आशा और संकल्प का संदेश भी देता है। भारत में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ और ‘प्रोजेक्ट एलीफेंट’ जैसी पहलें यह दर्शाती हैं कि सुविचारित नीति, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामुदायिक सहभागिता से सकारात्मक परिवर्तन संभव है। कई राज्यों में समुदाय-आधारित संरक्षण मॉडल विकसित हुए हैं, जहाँ स्थानीय लोग वन्य पर्यटन से आय अर्जित कर संरक्षण के सहभागी बने हैं। जब ग्रामीणों को यह अनुभव होता है कि वन्य जीव उनके शत्रु नहीं, बल्कि विकास के भागीदार हैं, तब संरक्षण की भावना स्वतः सुदृढ़ होती है।

शिक्षा और जन-जागरूकता भी संरक्षण की आधारशिला है। विद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा, प्रकृति भ्रमण और वृक्षारोपण कार्यक्रम बच्चों में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित करते हैं। मीडिया और वृत्तचित्रों ने भी वन्य जीवन को जनचर्चा का विषय बनाया है। सामाजिक माध्यमों के माध्यम से संरक्षण अभियानों को व्यापक समर्थन मिलता है। किंतु यह समर्थन केवल आभासी न रह जाए, बल्कि व्यवहार में परिवर्तित हो, यही सबसे बड़ी चुनौती है।

वन्य जीव संरक्षण का आर्थिक पक्ष भी महत्त्वपूर्ण है। इको-टूरिज़्म अनेक क्षेत्रों में रोजगार और आय का स्रोत बना है। किंतु यदि यह अनियंत्रित हो, तो वही पर्यटन वन्य जीवों के लिए तनाव का कारण बन सकता है। अतः संतुलित और सतत पर्यटन नीति आवश्यक है, जो प्रकृति को क्षति पहुँचाए बिना आर्थिक लाभ दे सके। साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि संरक्षण केवल लाभ-हानि के गणित पर आधारित न हो, बल्कि नैतिकता और सह-अस्तित्व की भावना से प्रेरित हो। प्रत्येक जीव का अस्तित्व मूल्यवान है, चाहे वह प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ दे या नहीं।

READ MORE :  गायब होती तितलियाँ : बदलते पर्यावरण और परागण संकट की अनकही कहानी

भारतीय संस्कृति में पशु-पक्षियों को पूजनीय माना गया है। अनेक देवी-देवताओं के साथ पशुओं का संबंध स्थापित किया गया है, जो इस बात का प्रतीक है कि हमारी परंपरा सह-अस्तित्व की समर्थक रही है। आज आवश्यकता है कि हम उस सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ जोड़ें। संरक्षण का अर्थ केवल कानून बनाना नहीं, बल्कि व्यवहार में परिवर्तन लाना है। प्लास्टिक का कम उपयोग, प्राकृतिक उत्पादों को प्राथमिकता, अवैध वन्य उत्पादों का बहिष्कार और पर्यावरण के अनुकूल जीवन-शैली अपनाना ऐसे छोटे कदम हैं, जो बड़े परिणाम ला सकते हैं।

विश्व वन्य जीव दिवस 2026 हमें यह सोचने का अवसर देता है कि विकास की हमारी अवधारणा कैसी हो। क्या वह विकास, जो जंगलों को उजाड़कर ऊँची इमारतें खड़ी कर दे, वास्तव में प्रगति कहलाएगा? या वह विकास, जो पर्यावरण के साथ सामंजस्य स्थापित कर भविष्य की पीढ़ियों को सुरक्षित पृथ्वी दे, अधिक सार्थक होगा? यह प्रश्न आज मानवता के सामने खुला हुआ है। यदि हमने समय रहते संतुलन नहीं साधा, तो प्रकृति का प्रतिशोध अत्यंत कठोर हो सकता है।

अंततः यह समझना होगा कि वन्य जीवों की रक्षा कोई परोपकार नहीं, बल्कि आत्मरक्षा है। जब हम किसी बाघ, हाथी या गैंडे को बचाते हैं, तो हम उस संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को बचाते हैं, जिसमें हमारी साँसों का आधार निहित है। विश्व वन्य जीव दिवस हमें करुणा, जिम्मेदारी और दूरदृष्टि का संदेश देता है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि पृथ्वी केवल मनुष्यों की नहीं, बल्कि उन सभी प्राणियों की भी है, जिनके साथ हम इस ग्रह को साझा करते हैं। यदि हम सह-अस्तित्व की राह चुनें, तो 3 मार्च केवल एक तिथि नहीं, बल्कि एक सतत संकल्प बन सकता हैऐसा संकल्प, जो प्रकृति और मानवता दोनों के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला रखे।

डॉ दीपक कोहली ,विशेष सचिव, उत्तर प्रदेश सचिवालय,  लखनऊ- 226010 

Please follow and like us:
Follow by Email
Twitter

Visit Us
Follow Me
YOUTUBE

YOUTUBE
PINTEREST
LINKEDIN

Share
INSTAGRAM
SOCIALICON