गायब होती तितलियाँ : बदलते पर्यावरण और परागण संकट की अनकही कहानी

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गायब होती तितलियाँ : बदलते पर्यावरण और परागण संकट की अनकही कहानी

 

  – डॉ. दीपक कोहली –

जब भी किसी बगीचे में रंग-बिरंगी तितलियाँ फूलों के ऊपर मंडराती दिखाई देती हैं, तो मन अनायास ही प्रसन्नता से भर उठता है। उनके कोमल पंखों पर उकेरे गए रंग, उनकी हल्की उड़ान और फूलों के बीच उनका नृत्य प्रकृति की सुंदरता को जीवंत बना देता है। तितलियाँ केवल देखने में सुंदर जीव नहीं हैं, बल्कि वे पृथ्वी के जटिल पारिस्थितिकी तंत्र की अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी भी हैं। उनकी उपस्थिति यह संकेत देती है कि आसपास का वातावरण स्वच्छ है, जैव-विविधता सुरक्षित है और प्रकृति का संतुलन अभी तक पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ है। किंतु आज यही तितलियाँ धीरे-धीरे पृथ्वी से गायब होती जा रही हैं। खेतों, जंगलों, गाँवों और शहरों के उद्यानों में जो तितलियाँ कभी सहज दिखाई देती थीं, वे अब दुर्लभ होती जा रही हैं। यह केवल एक सुंदर जीव के कम होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी पर गहराते पर्यावरणीय संकट का मौन संकेत भी है।

पिछले कुछ दशकों में विश्वभर के वैज्ञानिकों ने तितलियों की घटती संख्या को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। यूरोप, अमेरिका, जापान और एशिया के अनेक देशों में तितलियों की कई प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर पहुँच चुकी हैं। कई स्थानों पर वैज्ञानिकों ने पाया कि कुछ दशकों पहले जिन क्षेत्रों में हजारों तितलियाँ दिखाई देती थीं, वहाँ अब उनकी संख्या अत्यंत सीमित रह गई है। प्रसिद्ध “मोनार्क बटरफ्लाई” जैसी प्रवासी तितलियों की आबादी में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। भारत जैसे जैव-विविधता सम्पन्न देश में भी स्थिति चिंताजनक होती जा रही है। पश्चिमी घाट, हिमालय, अरुणाचल प्रदेश, असम और सुंदरवन जैसे क्षेत्रों में पाई जाने वाली अनेक दुर्लभ तितलियाँ अब पहले की तुलना में बहुत कम दिखाई देती हैं। कई स्थानीय प्रजातियाँ धीरे-धीरे अपने प्राकृतिक आवास से गायब हो रही हैं।

पर्यावरण वैज्ञानिकों का मानना है कि तितलियों की यह घटती संख्या पृथ्वी के बिगड़ते पर्यावरणीय संतुलन का प्रत्यक्ष संकेत है। तितलियाँ अत्यंत संवेदनशील जीव होती हैं। तापमान, आर्द्रता, पौधों की उपलब्धता और जलवायु में होने वाले छोटे-से परिवर्तन भी उनके जीवन को प्रभावित कर देते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक तितलियों को “बायो-इंडिकेटर” अर्थात जैविक संकेतक के रूप में देखते हैं। यदि किसी क्षेत्र में तितलियों की संख्या घट रही है, तो इसका अर्थ है कि वहाँ का पारिस्थितिकी तंत्र संकट में है।

तितलियों का जीवनचक्र स्वयं प्रकृति की अद्भुत रचना का उदाहरण है। अंडे से निकलने वाला छोटा-सा लार्वा, फिर प्यूपा और अंततः सुंदर तितली में उसका रूपांतरण प्रकृति के सबसे आकर्षक जैविक परिवर्तनों में से एक है। किंतु यह जीवनचक्र अत्यंत नाजुक होता है। तितलियों की अधिकांश प्रजातियाँ विशिष्ट पौधों पर निर्भर करती हैं। वे अपने अंडे केवल उन्हीं पौधों पर देती हैं, जिनकी पत्तियाँ उनके लार्वा के भोजन का स्रोत होती हैं। यदि वे पौधे समाप्त हो जाएँ, तो तितलियों का पूरा जीवनचक्र बाधित हो जाता है। यही कारण है कि प्राकृतिक वनस्पतियों के नष्ट होने का सबसे अधिक प्रभाव तितलियों पर पड़ता है।

तितलियाँ प्रकृति में परागण की प्रक्रिया की महत्वपूर्ण भागीदार हैं। सामान्यतः परागण की चर्चा होने पर मधुमक्खियों का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, किंतु तितलियाँ भी अनेक जंगली फूलों, औषधीय पौधों और कृषि फसलों के परागण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जब तितलियाँ फूलों से रस ग्रहण करती हैं, तब उनके शरीर पर परागकण चिपक जाते हैं। वे जब दूसरे फूलों पर बैठती हैं, तो ये परागकण वहाँ पहुँचकर पौधों के प्रजनन में सहायता करते हैं। इस प्रकार तितलियाँ जैव-विविधता को बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।यदि परागण की यह प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित हो जाए, तो उसका प्रभाव केवल पौधों तक सीमित नहीं रहेगा। अनेक वनस्पतियाँ बीज और फल नहीं बना पाएँगी। इससे उन जीवों पर भी प्रभाव पड़ेगा जो इन पौधों पर निर्भर हैं। धीरे-धीरे पूरी खाद्य श्रृंखला प्रभावित होने लगेगी। इसलिए तितलियों का संरक्षण केवल एक जीव को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखने का प्रयास है।

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आज तितलियों के सामने सबसे बड़ा संकट उनके प्राकृतिक आवास के नष्ट होने का है। बढ़ते शहरीकरण और औद्योगिकीकरण ने जंगलों, घासभूमियों और प्राकृतिक उद्यानों को तेजी से समाप्त किया है। जहाँ कभी जंगली फूलों और विविध वनस्पतियों से भरे खुले क्षेत्र होते थे, वहाँ अब कंक्रीट के विशाल ढाँचे दिखाई देते हैं। शहरों का विस्तार केवल मनुष्यों के लिए स्थान बना रहा है, किंतु इससे असंख्य छोटे जीवों का संसार उजड़ रहा है। तितलियाँ उन जीवों में सबसे अधिक प्रभावित होने वालों में शामिल हैं।

कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग तितलियों के लिए सबसे घातक खतरों में से एक बन चुका है। आधुनिक कृषि में उपयोग होने वाले अनेक रसायन केवल हानिकारक कीटों को ही नहीं मारते, बल्कि तितलियों, मधुमक्खियों और अन्य लाभकारी जीवों को भी प्रभावित करते हैं। खेतों में छिड़के जाने वाले रासायनिक कीटनाशक तितलियों के अंडों और लार्वा को नष्ट कर देते हैं। कई बार ये रसायन उनके तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करते हैं, जिससे वे भोजन खोजने और प्रजनन करने में असमर्थ हो जाती हैं। वैज्ञानिकों ने यह भी पाया है कि कुछ कीटनाशक तितलियों की दिशा पहचानने की क्षमता को प्रभावित करते हैं, जिसके कारण वे अपने प्राकृतिक मार्ग से भटक जाती हैं।

खरपतवारनाशकों का प्रभाव भी कम गंभीर नहीं है। जिन पौधों को किसान “अनावश्यक घास” समझकर नष्ट कर देते हैं, वे वास्तव में तितलियों के जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक हो सकते हैं। कई तितलियाँ केवल विशिष्ट जंगली पौधों पर ही अंडे देती हैं। जब ये पौधे समाप्त हो जाते हैं, तो तितलियों की पूरी पीढ़ी समाप्त हो सकती है। इस प्रकार आधुनिक कृषि व्यवस्था अनजाने में जैव-विविधता के विनाश का कारण बनती जा रही है।

जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और अधिक गंभीर बना दिया है। पृथ्वी का बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, अत्यधिक गर्मी, सूखा और मौसम चक्र में परिवर्तन तितलियों के जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रहे हैं। तितलियाँ तापमान के प्रति अत्यंत संवेदनशील होती हैं। उनका भोजन, प्रजनन और प्रवास मौसम पर निर्भर करता है। यदि मौसम चक्र असामान्य हो जाए, तो उनके जीवन का पूरा संतुलन बिगड़ जाता है।

वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि कई तितलियाँ अब उन क्षेत्रों की ओर प्रवास कर रही हैं जहाँ तापमान अपेक्षाकृत कम है। पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाने वाली कई प्रजातियाँ ऊँचाई की ओर खिसक रही हैं। किंतु हर प्रजाति अपने लिए नया आवास खोज पाने में सक्षम नहीं होती। परिणामस्वरूप अनेक तितलियाँ धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं। जलवायु परिवर्तन का एक और गंभीर प्रभाव यह है कि फूलों के खिलने का समय बदल रहा है। कई बार ऐसा होता है कि जब तितलियाँ भोजन की तलाश में निकलती हैं, तब तक फूल खिल चुके होते हैं या सूख चुके होते हैं। इससे उनके भोजन का संकट बढ़ जाता है।

प्रकाश प्रदूषण भी तितलियों और अन्य कीटों के जीवन को प्रभावित कर रहा है। शहरों और कस्बों में रातभर जलने वाली कृत्रिम रोशनी प्राकृतिक जैविक चक्र को बाधित करती है। कई कीट और पतंगे प्रकाश की ओर आकर्षित होकर अपने सामान्य व्यवहार से भटक जाते हैं। इससे उनका प्रजनन और जीवनकाल प्रभावित होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ता प्रकाश प्रदूषण आने वाले समय में परागण करने वाले कीटों के लिए एक बड़ा संकट बन सकता है।

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वायु प्रदूषण का प्रभाव भी कम खतरनाक नहीं है। उद्योगों और वाहनों से निकलने वाली जहरीली गैसें केवल मनुष्यों के स्वास्थ्य को ही प्रभावित नहीं करतीं, बल्कि वे पौधों और कीटों के बीच के प्राकृतिक संबंधों को भी बाधित करती हैं। शोधों से यह पता चला है कि वायु प्रदूषण फूलों की प्राकृतिक गंध को कम कर देता है। तितलियाँ और मधुमक्खियाँ फूलों की गंध के आधार पर उन्हें खोजती हैं। जब यह गंध कम हो जाती है, तो परागण की प्रक्रिया प्रभावित होने लगती है।

तितलियों का गायब होना केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि आर्थिक और खाद्य सुरक्षा का प्रश्न भी है। विश्व की लगभग 75 प्रतिशत खाद्य फसलें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से परागण पर निर्भर हैं। फल, सब्जियाँ, तिलहन, मसाले और अनेक औषधीय पौधे परागण के बिना पर्याप्त उत्पादन नहीं कर सकते। यदि परागणकर्ता जीवों की संख्या घटती रही, तो भविष्य में खाद्य संकट गहरा सकता है। कृषि उत्पादन कम होगा, खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता प्रभावित होगी और जैव-विविधता में भारी कमी आएगी।

तितलियों का महत्व केवल कृषि और पर्यावरण तक सीमित नहीं है। वे सांस्कृतिक और भावनात्मक दृष्टि से भी मानव जीवन का हिस्सा रही हैं। भारतीय लोकगीतों, चित्रकला, साहित्य और बच्चों की कहानियों में तितलियाँ सौंदर्य, स्वतंत्रता और आशा का प्रतीक मानी जाती रही हैं। अनेक कवियों ने तितलियों को प्रकृति की मुस्कान कहा है। बच्चों के लिए तितलियाँ हमेशा आकर्षण का केंद्र रही हैं। किंतु आधुनिक जीवनशैली ने मनुष्य को प्रकृति से दूर कर दिया है। बच्चे अब खुले मैदानों और बगीचों की अपेक्षा मोबाइल और डिजिटल स्क्रीन के संसार में अधिक समय बिताते हैं। इससे प्रकृति के साथ उनका भावनात्मक संबंध कमजोर पड़ रहा है।आज अनेक बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने अपने आसपास कभी विविध प्रकार की तितलियाँ देखी ही नहीं। यह केवल जैव-विविधता का संकट नहीं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच टूटते संबंधों का भी संकेत है। यदि आने वाली पीढ़ियाँ प्रकृति को केवल पुस्तकों और चित्रों में देखेंगी, तो संरक्षण की भावना भी कमजोर पड़ जाएगी।

हालाँकि स्थिति गंभीर है, लेकिन समाधान असंभव नहीं हैं। यदि समय रहते प्रभावी कदम उठाए जाएँ, तो तितलियों और अन्य परागणकर्ताओं को बचाया जा सकता है। सबसे पहले प्राकृतिक आवासों का संरक्षण आवश्यक है। जंगलों, घासभूमियों और प्राकृतिक उद्यानों को बचाना होगा। शहरों और गाँवों में ऐसे उद्यान विकसित किए जाने चाहिए जहाँ स्थानीय फूलों और पौधों को लगाया जाए। “बटरफ्लाई गार्डन” की अवधारणा आज विश्व के अनेक देशों में लोकप्रिय हो रही है। इन उद्यानों में तितलियों के अनुकूल पौधे लगाए जाते हैं, जिससे उन्हें भोजन और प्रजनन के लिए सुरक्षित वातावरण मिल सके।

भारत में भी कई स्थानों पर बटरफ्लाई पार्क और संरक्षण केंद्र विकसित किए जा रहे हैं। ये न केवल तितलियों के संरक्षण में सहायक हैं, बल्कि लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी बढ़ाते हैं। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में छोटे-छोटे तितली उद्यान विकसित किए जा सकते हैं। यदि घरों की बालकनियों और छतों पर भी स्थानीय फूलों वाले पौधे लगाए जाएँ, तो शहरी क्षेत्रों में तितलियों की संख्या बढ़ाई जा सकती है।

रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग को कम करना भी अत्यंत आवश्यक है। जैविक खेती और प्राकृतिक कृषि पद्धतियाँ केवल मिट्टी और जल को ही सुरक्षित नहीं रखतीं, बल्कि परागणकर्ताओं के लिए भी अनुकूल वातावरण तैयार करती हैं। किसानों को यह समझाना होगा कि तितलियाँ और मधुमक्खियाँ कृषि की सहयोगी हैं, शत्रु नहीं। यदि कृषि और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, तो उत्पादन और जैव-विविधता दोनों को सुरक्षित रखा जा सकता है।

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तितलियों का संरक्षण वास्तव में पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा का प्रयास है। जब हम तितलियों को बचाने की बात करते हैं, तब हम पृथ्वी पर जीवन की विविधता और संतुलन को बचाने की बात कर रहे होते हैं।शिक्षा और जन-जागरूकता इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। विद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। बच्चों को प्रकृति से जोड़ने वाली गतिविधियाँ, जैसे वृक्षारोपण, तितली उद्यान भ्रमण, प्रकृति शिविर और जैव-विविधता अध्ययन, संरक्षण की भावना विकसित कर सकते हैं। समाज को यह समझना होगा कि तितलियों का संरक्षण केवल वैज्ञानिकों या पर्यावरणविदों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी भी इस संकट के समाधान में सहायक हो सकते हैं। वैज्ञानिक तितलियों की घटती संख्या का अध्ययन कर रहे हैं और उनके संरक्षण के लिए नई रणनीतियाँ विकसित की जा रही हैं। कई देशों में “सिटीजन साइंस” कार्यक्रमों के माध्यम से आम नागरिकों को तितलियों की गणना और अध्ययन में शामिल किया जा रहा है। इससे न केवल वैज्ञानिक आँकड़े एकत्र होते हैं, बल्कि लोगों में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता भी बढ़ती है।

भारत जैसे विशाल और जैव-विविधता सम्पन्न देश में तितलियों का संरक्षण विशेष महत्व रखता है। यहाँ हिमालय से लेकर पश्चिमी घाट तक विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में हजारों प्रकार की तितलियाँ पाई जाती हैं। यदि इनके आवास नष्ट होते रहे, तो हम केवल एक सुंदर जीव ही नहीं खोएँगे, बल्कि अपने पारिस्थितिक संतुलन का एक महत्वपूर्ण आधार भी खो देंगे।आज आवश्यकता इस बात की है कि हम तितलियों को केवल सौंदर्य का विषय न समझें, बल्कि उन्हें पृथ्वी के जीवन चक्र की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में पहचानें। यदि तितलियाँ गायब हो रही हैं, तो यह संकेत है कि प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है। यह संकट केवल जंगलों या खेतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अंततः मानव जीवन को भी प्रभावित करेगा। इसलिए तितलियों को बचाना केवल पर्यावरण प्रेम नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के सुरक्षित भविष्य की आवश्यकता है।

तितलियों के नाजुक पंख हमें यह संदेश देते हैं कि प्रकृति की सबसे सुंदर चीजें भी अत्यंत संवेदनशील होती हैं। यदि मानव अपनी विकास यात्रा में प्रकृति के संतुलन की उपेक्षा करता रहेगा, तो एक दिन यह रंगीन संसार केवल चित्रों और स्मृतियों तक सीमित रह जाएगा। आने वाली पीढ़ियाँ शायद पुस्तकों में पढ़ें कि कभी पृथ्वी पर रंग-बिरंगी तितलियाँ उड़ती थीं, जो फूलों के साथ प्रकृति को जीवंत बनाती थीं। इसलिए अभी भी समय है कि हम प्रकृति के साथ अपने संबंधों को पुनः समझें, जैव-विविधता की रक्षा करें और पृथ्वी को केवल मनुष्यों के लिए नहीं, बल्कि उन असंख्य जीवों के लिए भी सुरक्षित बनाएँ जिनके साथ मिलकर यह संसार सुंदर बनता है।जब किसी सुबह किसी बगीचे में तितली फूल पर बैठती है, तो वह केवल रस नहीं ग्रहण कर रही होती, बल्कि वह पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता को आगे बढ़ा रही होती है। उसकी छोटी-सी उड़ान में प्रकृति का विशाल संतुलन छिपा होता है। यदि यह उड़ान थम गई, तो केवल एक जीव नहीं, बल्कि पूरी पारिस्थितिक व्यवस्था प्रभावित होगी। इसलिए तितलियों की रक्षा वास्तव में जीवन की रक्षा है, प्रकृति की रक्षा है और मानव भविष्य की रक्षा है।

प्रेषक: डॉ दीपक कोहली , 5/104, विपुल खंड, गोमती नगर, लखनऊ- 226010 .

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