भीषण गर्मी और लू से बचाव हेतु पशुधन प्रबंधन
मनीष सोनी एवं सागर अशोक खुलापे
भाकृअनुप – राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र, बीकानेर
प्रस्तावना
गर्मी के मौसम में जब तापमान 40-45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचता है, तब न केवल मानव जीवन बल्कि पशुधन भी गंभीर संकट में पड़ जाता है। पशुओं में ‘हीट स्ट्रोक’ या लू लगना एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, जो उनकी दुग्ध उत्पादन क्षमता को 20-30% तक कम कर सकती है। इसके अलावा, यह उनकी प्रजनन क्षमता और जीवन की गुणवत्ता पर भी नकारात्मक असर डाल सकती है। एक जागरूक पशुपालक के लिए यह केवल आर्थिक लाभ का विषय नहीं है, बल्कि यह मानवीय संवेदना का भी विषय है।
लू के लक्षण
गर्मी के बढ़ते प्रभाव के कारण पशु हाफंने लगते हैं, उनका मुंह खुला रहता है, और वे तेजी से सांस लेते हैं।अत्यधिक गर्मी के कारण उनके मुंह से गाढ़ी लार टपकने लगती है। वे सुस्त हो जाते हैं और बेचैनी में बार-बार उठना-बैठना करते हैं, छायादार जगह की तलाश में रहते हैं। दूध में अचानक गिरावट, फैट की मात्रा का कम होना, और शरीर का तापमान बढ़ने पर आंखों का लाल होना लू के प्रमुख लक्षण हैं। ऐसे में, पशुपालकों के लिए यह आवश्यक है कि वे इन लक्षणों को पहचानें और समय पर उपाय करें।
आवास, गोशाला और जल प्रबंधन
पशु के रहने की जगह को ठंडा रखना लू से बचाव की पहली सीढ़ी है यदि गोशाला की छत कंक्रीट या टिन की बनी है, तो उस पर सफेद चूने का लेप लगाना चाहिए। इसके ऊपर 4-6 इंच मोटी घास या पराली की परत बिछाने से अंदर का तापमान 5 से 8 डिग्री तक कम हो जाता है। गोशाला को पूरी तरह से हवादार रखना चाहिए ताकि क्रॉस-वेंटिलेशन बना रहे और गर्मी के दौरान हवा का प्रवाह आसानी से हो सके। गर्मी के चरम घंटों, विशेष रूप से दोपहर 12 से 4 बजे के बीच, ‘फॉगर सिस्टम’ या पंखों का उपयोग करना चाहिए। हालांकि, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि फर्श ज्यादा गीला न हो, क्योंकि इससे खुरों में संक्रमण का डर रहता है। इसके अलावा, खिड़कियों पर जूट के गीले बोरे लटकाने से ठंडी हवा अंदर आती है, जिससे गोशाला का तापमान नियंत्रित रहता है। जल प्रबंधन के मामले में, पशुओं को दिन में कम से कम 4-5 बार साफ और ठंडा (15°C – 20°C) पानी पिलाना चाहिए। धूप में रखे पाइपों और टंकियों के गर्म पानी से पशुओं को ‘समर डायरिया’ हो सकता है, इसलिए पाइपों को जूट की बोरियों से ढकें और टंकियों को सफेद रंग से पेंट करें। पानी में थोड़ा मीठा सोडा (Sodium Bicarbonate) और नमक मिलाना एसिडोसिस और डिहाइड्रेशन को रोकने में सहायक होता है।
वैज्ञानिक आहार और कार्य प्रबंधन
गर्मी के दिनों में पशु की पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है, इसलिए आहार प्रबंधन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। दिन की चिलचिलाती धूप में भारी चारा देने के बजाय, कुल आहार का 70% हिस्सा शाम 6 बजे से सुबह 6 बजे के ठंडे घंटों में देना चाहिए। पशुओं को दोपहर की कड़ी धूप में चरने या काम करने के लिए बाहर न छोड़ें।खेती में काम आने वाले पशुओं के लिए सुबह 5 से 9 और शाम 6 के बाद का समय ‘गोल्डन आवर्स’ है। आहार में सूखे चारे की मात्रा कम कर हरा चारा और साइलेज बढ़ाना चाहिए क्योंकि इनमें पानी की मात्रा अधिक होती है। पशुओं के शरीर से पुराने बालों को ग्रूमिंग (सफाई) के जरिए हटाना चाहिए ताकि उनकी त्वचा बेहतर तरीके से ऊष्मा नियंत्रित कर सके।
आपातकालीन चिकित्सा और पारंपरिक उपाय
यदि कोई पशु लू की चपेट में आकर अचानक गिर जाए, तो बिना समय गंवाए उसे तुरंत सबसे ठंडी और हवादार छाया मेंले जाना चाहिए। प्राथमिक चिकित्सा के तौर पर पशु के सिर, गर्दन और थन (Udder) पर सामान्य ठंडा पानी डालें और ठंडी पट्टियां रखें, लेकिन ध्यान रहे कि पूरे शरीर पर एक साथ बर्फ जैसा पानी न डालें, क्योंकि इससे शरीर को ‘थर्मल शॉक’ लग सकता है। यदि पशु होश में है, तो उसे गुड़-नमक का घोल या इलेक्ट्रोलाइट्स पिलाएं और तुरंत डॉक्टर को बुलाकर ग्लूकोज की व्यवस्था करें। पारंपरिक उपायों में, पशु को सौंफ-मिश्री का शरबत पिलाना बहुत कारगर है। गर्मियों की शुरुआत में ही ‘गलघोंटू’ और ‘खुरपका-मुंहपका’ जैसे रोगों का टीकाकरण अनिवार्य रूप से करवा लेना चाहिए। इसके अलावा, शाम को गोशाला में नीम की पत्तियों का धुआं करने से मक्खी-मच्छरों का प्रकोप कम होता है, जिससे पशु तनावमुक्त रहता है।
निष्कर्ष
पशुधन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और गर्मी के ये महीने उनकी कड़ी परीक्षा के होते हैं।यदि हम उनके आवास, आहार और पानी पीने के तरीकों में ये वैज्ञानिक और व्यावहारिक बदलाव करें, तो न केवल हम अपने बेजुबान पशुओं को कष्ट से बचा सकते हैं, बल्कि अपनी डेयरी के मुनाफे को भी साल भर बरकरार रख सकते हैं। याद रखें, एक सुखी और स्वस्थ पशु ही समृद्ध किसान की पहचान है। हमेशा अपने नजदीकी पशु चिकित्सा केंद्र के संपर्क में रहें और किसी भी असामान्य लक्षण पर तुरंत विशेषज्ञ की सलाह लें।
शीतल और आराम दायक गोशाला प्रबंधन





