पशुधन के लिए समुद्री शैवाल (Seaweed): एक गैर-पारंपरिक (Non-Conventional) चारा अनुपूरक की नई दिशा

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पशुधन के लिए समुद्री शैवाल (Seaweed): एक गैर-पारंपरिक (Non-Conventional) चारा अनुपूरक की नई दिशा

नेहा साहू

पशु पोषण विभाग, भाकृअनुप – राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान ,करनाल )

सारांश : 

समुद्री शैवाल (Seaweed) एक प्राकृतिक, पोषक तत्वों एवं जैव सक्रिय यौगिकों से समृद्ध चारा अनुपूरक है, जिसमें उच्च गुणवत्ता वाले खनिज, विटामिन, आवश्यक अमीनो अम्ल, पॉलीसैकेराइड, एंटीऑक्सीडेंट तथा प्रीबायोटिक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसके उपयोग से जुगाली करने वाले पशुओं में चारे की पाचन क्षमता, रूमेन सूक्ष्मजीवों की सक्रियता, पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता तथा दूध उत्पादन में सुधार देखा गया है। भारत जैसे विशाल तटीय संसाधनों वाले देश में समुद्री शैवाल का उत्पादन एवं पशु आहार में इसका वैज्ञानिक उपयोग पशुपालन की लागत कम करने, किसानों की आय बढ़ाने तथा पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। अतः समुद्री शैवाल को भविष्य के सतत (Sustainable), जलवायु-अनुकूल (Climate-Smart) एवं गैर-पारंपरिक पशु आहार अनुपूरक के रूप में व्यापक संभावनाओं वाला विकल्प माना जा सकता है।

मुख्य शब्द: समुद्री शैवाल, गैर-पारंपरिक चारा अनुपूरक, पशुधन, रूमेन, मीथेन उत्सर्जन।

प्रस्तावना:

भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है, परंतु पशुपालन की सबसे बड़ी चुनौती आज भी गुणवत्तापूर्ण एवं संतुलित पशु आहार की उपलब्धता है। बढ़ती जनसंख्या, सीमित कृषि भूमि, जलवायु परिवर्तन तथा पारंपरिक चारे की बढ़ती लागत के कारण पशुपालकों के सामने पोषण संबंधी समस्याएँ लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे समय में गैर-पारंपरिक (Non-Conventional) पशु आहार स्रोत पशुपालन के लिए एक प्रभावी विकल्प बनकर उभर रहे हैं। इन्हीं विकल्पों में समुद्री शैवाल (Seaweed) विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह समुद्र में प्राकृतिक रूप से उगने वाला पौधेनुमा जीव है, जो विटामिन, खनिज, प्रोटीन, जैव सक्रिय यौगिक (Bioactive Compounds) तथा एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है। वर्तमान में विश्वभर में समुद्री शैवाल का उपयोग पशु आहार अनुपूरक (Feed Supplement) के रूप में तेजी से बढ़ रहा है।

समुद्री शैवाल (Seaweed) क्या है?

समुद्री शैवाल समुद्र में पाए जाने वाले बहुकोशिकीय शैवाल हैं, जिन्हें सामान्यतः तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है—

  • हरी शैवाल (Green Algae)Ulva spp.
  • भूरी शैवाल (Brown Algae)Ascophyllum nodosum, Laminaria spp., Sargassum spp.
  • लाल शैवाल (Red Algae)Gracilaria spp., Kappaphycus spp., Asparagopsis taxiformis

भारत के तटीय क्षेत्रों जैसे गुजरात, तमिलनाडु, अंडमान एवं निकोबार दीप तथा लक्षद्दीप में समुद्री शैवाल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।

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समुद्री शैवाल का पोषण मूल्य

समुद्री शैवाल में अनेक महत्वपूर्ण पोषक तत्व पाए जाते हैं, जैसे—

  • 10–30% तक प्रोटीन (प्रजाति के अनुसार)
  • आवश्यक अमीनो अम्ल
  • कैल्शियम, मैग्नीशियम, आयोडीन, आयरन, जिंक एवं सेलेनियम
  • विटामिन A, C, E तथा B-कॉम्प्लेक्स
  • ओमेगा-3 फैटी अम्ल
  • पॉलीफेनॉल, फ्लेवोनॉयड एवं एंटीऑक्सीडेंट
  • प्राकृतिक प्रीबायोटिक यौगिक (Laminarin, Fucoidan, Alginate)

पशुओं के लिए समुद्री शैवाल के प्रमुख लाभ

  1. दूध उत्पादन में वृद्धि

समुद्री शैवाल में उपस्थित खनिज एवं जैव सक्रिय तत्व पाचन क्षमता को बेहतर बनाते हैं, जिससे पोषक तत्वों का उपयोग अधिक प्रभावी होता है और दूध उत्पादन में वृद्धि देखी जाती है।

  1. मीथेन उत्सर्जन में कमी

जुगाली करने वाले पशुओं से निकलने वाली मीथेन गैस जलवायु परिवर्तन का एक प्रमुख कारण है। विशेष रूप से Asparagopsis taxiformis में उपस्थित Bromoform नामक प्राकृतिक यौगिक रूमेन में मीथेन बनाने वाले सूक्ष्मजीवों की क्रिया को कम करता है, जिससे मीथेन उत्सर्जन में 60–90% तक कमी देखी गई है।

  1. पाचन शक्ति में सुधार

समुद्री शैवाल में उपस्थित प्रीबायोटिक तत्व लाभकारी रूमेन सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को बढ़ावा देते हैं, जिससे—चारे का बेहतर पाचन, वाष्पशील वसीय अम्ल (VFA) का उत्पादन बढ़ता है तथा ऊर्जा उपयोग दक्षता में सुधार होता है।

  1. रोग प्रतिरोधक क्षमता में विर्धि

समुद्री शैवाल में उपस्थित पॉलीसैकेराइड, एंटीऑक्सीडेंट तथा विटामिन शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाते हैं।

इसके नियमित उपयोग से—

  • संक्रमण की संभावना कम होती है।
  • सोमैटिक सेल काउंट (SCC) में कमी आ सकती है।
  • पशु अधिक स्वस्थ रहते हैं।
  1. प्रजनन क्षमता में सुधार

खनिजों एवं एंटीऑक्सीडेंट की पर्याप्त उपलब्धता से—

  • हीट का प्रदर्शन बेहतर होता है।
  • गर्भधारण दर में सुधार हो सकता है।
  • प्रजनन संबंधी समस्याएँ कम होती हैं।
  1. खुर एवं त्वचा का बेहतर स्वास्थ्य
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समुद्री शैवाल में उपस्थित जिंक, कॉपर तथा आयोडीन त्वचा, बाल एवं खुर के स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखते हैं।

  1. प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट

समुद्री शैवाल में पाए जाने वाले पॉलीफेनॉल एवं फ्लेवोनॉयड शरीर में ऑक्सीडेटिव तनाव को कम करते हैं, जिससे पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है।

रूमेन पर प्रभाव

समुद्री शैवाल के उपयोग से—

  • रूमेन का pH संतुलित रहता है।
  • लाभकारी बैक्टीरिया की संख्या बढ़ती है।
  • प्रोपियोनेट का उत्पादन बढ़ सकता है।
  • अमोनिया-नाइट्रोजन का बेहतर उपयोग होता है।
  • सूक्ष्मजीव प्रोटीन संश्लेषण में सुधार होता है।

कितनी मात्रा में उपयोग करें?

समुद्री शैवाल की मात्रा उसकी प्रजाति एवं उत्पाद के अनुसार बदलती है।

सामान्यतः—

  • गाय एवं भैंस: 20–100 ग्राम प्रति पशु प्रतिदिन
  • बकरी एवं भेड़: 5–20 ग्राम प्रतिदिन

किसी भी नए अनुपूरक का उपयोग पशु पोषण विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार करना चाहिए।

सावधानियाँ

  • अत्यधिक मात्रा में उपयोग नहीं करना चाहिए।
  • आयोडीन की अधिक मात्रा से बचना चाहिए।
  • केवल प्रमाणित एवं गुणवत्तायुक्त उत्पाद ही खरीदें।
  • फफूंदयुक्त या दूषित समुद्री शैवाल का उपयोग न करें।
  • संतुलित आहार के साथ ही इसका प्रयोग करें।

भारत में संभावनाएँ

भारत लगभग 7,500 किलोमीटर लंबी समुद्री तटरेखा वाला देश है। यहाँ समुद्री शैवाल उत्पादन की अपार संभावनाएँ हैं। यदि वैज्ञानिक तरीके से इसका उत्पादन एवं प्रसंस्करण किया जाए तो यह—

  • पशु आहार की लागत कम कर सकता है।
  • दुग्ध उत्पादन बढ़ा सकता है।
  • मीथेन उत्सर्जन घटाकर पर्यावरण संरक्षण में योगदान दे सकता है।
  • तटीय क्षेत्रों के किसानों एवं उद्यमियों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत बन सकता है।

निष्कर्ष

समुद्री शैवाल पशुपालन के लिए एक सुरक्षित, प्राकृतिक, टिकाऊ एवं पर्यावरण-अनुकूल गैर-पारंपरिक चारा अनुपूरक है। यह न केवल पशुओं की उत्पादन क्षमता, पाचन एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार करता है, बल्कि मीथेन उत्सर्जन को कम करके जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भविष्य में वैज्ञानिक अनुसंधान, गुणवत्तायुक्त उत्पादों की उपलब्धता तथा किसानों में जागरूकता बढ़ने के साथ समुद्री शैवाल भारतीय पशुपालन की एक महत्वपूर्ण पोषण रणनीति बन सकता है।

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संदर्भ (References)

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