Role of Veterinarians in Promoting Sustainable Dairy Practices

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सतत डेयरी प्रथाओं को बढ़ावा देने में पशु चिकित्सकों की भूमिका

बुलबुल 

पशु मादा रोग एवं प्रसूति विभाग

(लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, हिसार)

सारांश

वर्तमान समय में सतत डेयरी प्रथाएँ डेयरी उद्योग के विकास, पर्यावरण संरक्षण तथा पशु कल्याण के लिए अत्यंत आवश्यक मानी जा रही हैं। बढ़ती जनसंख्या, दुग्ध उत्पादों की मांग, जलवायु परिवर्तन तथा प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक उपयोग के कारण डेयरी क्षेत्र के समक्ष अनेक चुनौतियाँ उत्पन्न हो रही हैं। ऐसी परिस्थितियों में पशु चिकित्सकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। पशु चिकित्सक न केवल पशुओं के रोगों की रोकथाम एवं उपचार करते हैं, बल्कि वे पशु स्वास्थ्य प्रबंधन, संतुलित पोषण, प्रजनन प्रबंधन, जैव सुरक्षा, दुग्ध गुणवत्ता नियंत्रण तथा पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। यह लेख सतत डेयरी प्रथाओं को बढ़ावा देने में पशु चिकित्सकों की बहुआयामी भूमिका का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। लेख में पशु कल्याण, रोग नियंत्रण, एंटीबायोटिक के विवेकपूर्ण उपयोग, अपशिष्ट प्रबंधन, जल संरक्षण तथा किसानों के प्रशिक्षण जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा की गई है। साथ ही आधुनिक तकनीकों, डिजिटल पशु चिकित्सा सेवाओं तथा जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों के संदर्भ में पशु चिकित्सकों की भूमिका को भी स्पष्ट किया गया है। लेख में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि यदि पशु चिकित्सकों, किसानों, वैज्ञानिक संस्थाओं तथा सरकार के बीच समन्वित प्रयास किए जाएँ, तो डेयरी उद्योग को अधिक उत्पादक, लाभकारी एवं पर्यावरण अनुकूल बनाया जा सकता है। सतत डेयरी विकास न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करेगा बल्कि खाद्य सुरक्षा एवं पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी सहायक सिद्ध होगा।

प्रमुख शब्द (Keywords)

सतत डेयरी प्रथाएँ, पशु चिकित्सक, डेयरी उद्योग, पशु कल्याण, दुग्ध गुणवत्ता, पशु पोषण

भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है और डेयरी उद्योग का यहाँ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान है। लाखों किसान अपनी आजीविका के लिए पशुपालन एवं दुग्ध उत्पादन पर निर्भर हैं। बढ़ती जनसंख्या तथा पोषण संबंधी आवश्यकताओं के कारण दूध और दुग्ध उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। परंतु दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण प्रदूषण, पशु रोगों का बढ़ता खतरा तथा प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन डेयरी क्षेत्र के सामने गंभीर चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रहे हैं (Thornton, 2010)। इन चुनौतियों का समाधान “सतत डेयरी प्रथाओं” के माध्यम से किया जा सकता है।

सतत डेयरी प्रथाओं का अर्थ ऐसी डेयरी प्रणाली से है जो आर्थिक रूप से लाभकारी, पर्यावरण के अनुकूल तथा सामाजिक रूप से उत्तरदायी हो। इसमें पशु स्वास्थ्य, पोषण, पशु कल्याण, जैव सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण तथा गुणवत्तापूर्ण दूध उत्पादन पर विशेष ध्यान दिया जाता है (FAO, 2019)। इन सभी पहलुओं को सफलतापूर्वक लागू करने में पशु चिकित्सकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। आधुनिक समय में पशु चिकित्सक केवल रोगों का उपचार करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे डेयरी प्रबंधन सलाहकार, पोषण विशेषज्ञ, रोग नियंत्रण अधिकारी तथा किसानों के प्रशिक्षक के रूप में भी कार्य कर रहे हैं (Kumar and Singh, 2017)। यह लेख सतत डेयरी प्रथाओं को बढ़ावा देने में पशु चिकित्सकों की बहुआयामी भूमिका का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

सतत डेयरी प्रथाओं की अवधारणा

सतत डेयरी प्रथाएँ ऐसी वैज्ञानिक एवं प्रबंधन आधारित गतिविधियाँ हैं जिनका उद्देश्य दीर्घकालीन दुग्ध उत्पादन को बनाए रखते हुए पर्यावरण संरक्षण तथा पशु कल्याण सुनिश्चित करना है। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—

  • पशुओं का बेहतर स्वास्थ्य: पशुओं को हर प्रकार की बीमारियों से बचाने के लिए निरंतर प्रयास करते रहना ।
  • गुणवत्तापूर्ण एवं सुरक्षित दूध उत्पादन: रोगमुक्त एवं पोषक दूध का उत्पादन सुनिश्चित करना ।
  • प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण: प्रकृति द्वारा प्रदान किए गए संसाधनों जैसे जल, भूमि, वन, वायु, ऊर्जा एवं जैव विविधता का संतुलित, वैज्ञानिक एवं जिम्मेदारीपूर्ण उपयोग करना
  • किसानों की आय में वृद्धि: किसानों की कुल आर्थिक आमदनी को बढ़ाना, ताकि वे बेहतर जीवन स्तर प्राप्त कर सकें और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें।
  • पर्यावरण प्रदूषण में कमी: वायु, जल, मिट्टी तथा आसपास के वातावरण में होने वाले हानिकारक प्रदूषण को कम करना, ताकि प्राकृतिक संतुलन बना रहे और मानव एवं पशु स्वास्थ्य सुरक्षित रह सके।
  • पशु कल्याण को बढ़ावा देना: पशुओं को ऐसा सुरक्षित, स्वस्थ, आरामदायक और तनावमुक्त वातावरण प्रदान करना, जिससे उनका शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य बेहतर बना रहे।
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FAO (2018) के अनुसार सतत डेयरी प्रणाली ग्रामीण विकास और खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

पशु स्वास्थ्य प्रबंधन में पशु चिकित्सकों की भूमिका

पशु स्वास्थ्य किसी भी डेयरी प्रणाली की सफलता का आधार होता है। स्वस्थ पशु अधिक दूध उत्पादन करते हैं तथा उनकी उत्पादन क्षमता लंबे समय तक बनी रहती है। पशु चिकित्सक रोगों की रोकथाम, निदान और उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

  • रोग नियंत्रण एवं टीकाकरण:

पशुओं में खुरपका-मुंहपका (FMD), ब्रूसेलोसिस, गलघोटू तथा ब्लैक क्वार्टर जैसे रोग डेयरी उद्योग को भारी आर्थिक नुकसान पहुँचाते हैं। पशु चिकित्सक नियमित टीकाकरण कार्यक्रमों के माध्यम से इन रोगों की रोकथाम करते हैं (Radostits et al., 2017)। रोगों की रोकथाम से पशुओं की मृत्यु दर कम होती है तथा किसानों की आय सुरक्षित रहती है।

  • रोगों का समय पर निदान:

आधुनिक प्रयोगशाला तकनीकों एवं नैदानिक परीक्षणों की सहायता से पशु चिकित्सक रोगों की प्रारंभिक अवस्था में पहचान कर लेते हैं। प्रारंभिक निदान से उपचार आसान हो जाता है तथा रोग फैलने की संभावना कम हो जाती है।

  • एंटीबायोटिक का विवेकपूर्ण उपयोग:

आज एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस एक वैश्विक समस्या बन चुकी है। पशु चिकित्सक उचित दवाओं के चयन एवं सीमित उपयोग की सलाह देकर इस समस्या को नियंत्रित करने में सहायता करते हैं (WOAH/OIE, 2021)।

  • पशु पोषण एवं आहार प्रबंधन:

संतुलित पोषण सतत डेयरी उत्पादन का मुख्य आधार है। उचित पोषण से पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता, प्रजनन क्षमता तथा रोग प्रतिरोधक शक्ति में वृद्धि होती है (NRC, 2001)। पशु चिकित्सक पशुओं की आयु, वजन एवं दुग्ध उत्पादन क्षमता के अनुसार संतुलित आहार योजना तैयार करते हैं। वे किसानों को हरे चारे, सूखे चारे, दाने तथा खनिज मिश्रण के संतुलित उपयोग की जानकारी देते हैं (Singh et al., 2019)।

  • पोषण संबंधी रोगों की रोकथाम:

कैल्शियम, फास्फोरस एवं विटामिन की कमी से अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। पशु चिकित्सक इन रोगों की पहचान कर उचित उपचार एवं पूरक आहार की सलाह देते हैं।

  • पर्यावरण संरक्षण में योगदान:

संतुलित आहार पशुओं में पाचन क्षमता को बढ़ाता है तथा मीथेन गैस उत्सर्जन को कम करता है, जिससे ग्रीनहाउस गैसों में कमी आती है (FAO and OECD, 2022)।

  • पशु कल्याण को बढ़ावा देने में भूमिका:

सतत डेयरी प्रणाली में पशु कल्याण अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। पशुओं को स्वस्थ एवं तनावमुक्त वातावरण उपलब्ध कराना आवश्यक है।

  • वैज्ञानिक आवास व्यवस्था:

पशु चिकित्सक डेयरी शेड की वैज्ञानिक डिजाइन, वेंटिलेशन, तापमान नियंत्रण तथा साफ-सफाई के संबंध में किसानों को सलाह देते हैं। उचित आवास व्यवस्था पशुओं को गर्मी एवं संक्रमण से बचाती है (Webster, 2016)।

  • तनाव प्रबंधन:

हीट स्ट्रेस, भीड़भाड़ तथा खराब प्रबंधन से पशुओं की उत्पादकता घटती है। पशु चिकित्सक गर्मी से बचाव हेतु शीतलन प्रणाली, पर्याप्त पानी तथा उचित पोषण की सलाह देते हैं (Upadhyay and Ashutosh, 2014)।

  • मानवीय व्यवहारव पशु कल्याण :

पशुओं के प्रति संवेदनशील व्यवहार, उचित देखभाल तथा दर्द नियंत्रण पशु कल्याण के महत्वपूर्ण भाग हैं। WOAH/OIE (2021) ने पशु कल्याण को सतत पशुपालन का आवश्यक घटक माना है।

  • प्रजनन प्रबंधन में पशु चिकित्सकों की भूमिका:

अच्छा प्रजनन प्रबंधन डेयरी उत्पादन बढ़ाने में सहायक होता है। पशु चिकित्सक आधुनिक प्रजनन तकनीकों के माध्यम से पशुओं की उत्पादकता बढ़ाने में योगदान देते हैं।

  • कृत्रिम गर्भाधानव बांझपन उपचार :

कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से उच्च गुणवत्ता वाली नस्लों का विकास किया जाता है। इससे दूध उत्पादन में वृद्धि होती है (Banerjee, 2018)। डेयरी पशुओं में बांझपन एक सामान्य समस्या है। पशु चिकित्सक हार्मोनल उपचार एवं उचित पोषण के माध्यम से इस समस्या का समाधान करते हैं।

  • गर्भ परीक्षण:
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समय पर गर्भ परीक्षण से पशुओं की प्रजनन क्षमता का बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है।

  • दुग्ध गुणवत्ता एवं खाद्य सुरक्षा:

आज उपभोक्ता सुरक्षित एवं उच्च गुणवत्ता वाले दूध की मांग कर रहे हैं। पशु चिकित्सक दूध की गुणवत्ता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

  • मास्टाइटिस नियंत्रण:

मास्टाइटिस डेयरी उद्योग की प्रमुख समस्या है, जिससे दूध उत्पादन एवं गुणवत्ता दोनों प्रभावित होते हैं। पशु चिकित्सक स्वच्छ दुहन तकनीक तथा नियमित जांच की सलाह देते हैं (Radostits et al., 2017)।

  • अवशेष मुक्त दूध उत्पादन:

एंटीबायोटिक अवशेष युक्त दूध मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। पशु चिकित्सक दवाओं के उपयोग के बाद “withdrawal period” का पालन सुनिश्चित करते हैं।

  • स्वच्छ दुग्ध उत्पादन:

दूध दुहने के उपकरणों तथा डेयरी परिसर की साफ-सफाई बनाए रखने हेतु पशु चिकित्सक किसानों को प्रशिक्षित करते हैं (NDDB, 2021)।

पर्यावरण संरक्षण में पशु चिकित्सकों की भूमिका

डेयरी उद्योग पर्यावरण पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव डालता है। गोबर, मूत्र तथा मीथेन गैस प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हो सकते हैं। पशु चिकित्सक पर्यावरण अनुकूल डेयरी प्रबंधन को बढ़ावा देते हैं। गोबर का उपयोग जैविक खाद एवं बायोगैस उत्पादन में किया जा सकता है। इससे ऊर्जा उत्पादन के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण भी संभव होता है (FAO, 2019)। संतुलित आहार एवं स्वस्थ पशुओं के माध्यम से मीथेन उत्सर्जन कम किया जा सकता है (Thornton, 2010) तथा ग्रीनहाउस गैसों के उत्पादन को कम किया जा सकता है । इसके अतिरिक्त डेयरी फार्मों में जल का अत्यधिक उपयोग होता है। पशु चिकित्सक जल के पुनर्चक्रण एवं नियंत्रित उपयोग की सलाह देते हैं।

जैव सुरक्षा (Biosecurity) रोगों के प्रसार को रोकने के लिए आवश्यक है। Yadav and Patel (2018) के अनुसार डेयरी फार्मों में जैव सुरक्षा उपाय अपनाने से संक्रमण का खतरा काफी कम हो जाता है। प्रमुख जैव सुरक्षा उपायों में नए पशुओं की जांच, संक्रमित पशुओं को अलग रखना, फार्म की नियमित सफाई, उपकरणों का कीटाणुशोधन, आगंतुकों की सीमित आवाजाही इत्यादि शामिल हैं । पशु चिकित्सक इन उपायों के कार्यान्वयन में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

किसानों को प्रशिक्षण एवं जागरूकता

ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक किसान अभी भी पारंपरिक पद्धतियों का उपयोग करते हैं। पशु चिकित्सक किसानों को वैज्ञानिक डेयरी प्रबंधन की जानकारी देकर जागरूक बनाते हैं। प्रशिक्षण के प्रमुख क्षेत्र संतुलित पोषण, टीकाकरण, स्वच्छ दुग्ध उत्पादन, प्रजनन प्रबंधन, रोग पहचान इत्यादि हो सकते हैं । NDDB (2021) के अनुसार किसान प्रशिक्षण कार्यक्रमों से दुग्ध उत्पादन एवं गुणवत्ता में महत्वपूर्ण सुधार देखा गया है।

जलवायु परिवर्तन से निपटने में भूमिका

जलवायु परिवर्तन डेयरी उद्योग के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। अत्यधिक तापमान, सूखा एवं नई बीमारियाँ पशुओं की उत्पादकता को प्रभावित कर रही हैं (Upadhyay and Ashutosh, 2014)।

इसके उपायों के अंतरगत पशु चिकित्सकों का योगदान गर्मी सहनशील नस्लों की सलाह देने मे, हीट स्ट्रेस प्रबंधन, रोग निगरानी, आपदा प्रबंधन, पोषण प्रबंधन आदि के लिए देखा जा सकता है । इन उपायों के माध्यम से पशु चिकित्सक जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायता करते हैं।

डिजिटल तकनीकों ने डेयरी उद्योग को आधुनिक बनाया है। पशु चिकित्सक किसानों को नई तकनीकों के उपयोग हेतु प्रशिक्षित करते हैं। प्रमुख तकनीकों में सेंसर आधारित स्वास्थ्य निगरानी, मोबाइल एप्लिकेशन, डिजिटल रिकॉर्ड प्रबंधन, स्वचालित दुग्ध मशीनें, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित रोग पहचान आदि शामिल हैं । इन तकनीकों से उत्पादकता बढ़ती है तथा रोग नियंत्रण अधिक प्रभावी बनता है।

भारत में पशु चिकित्सकों के सामने चुनौतियाँ

हालाँकि पशु चिकित्सकों की भूमिका महत्वपूर्ण है, फिर भी उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जो कि निम्नलिखित है :

  • किसानों में जागरूकता का अभाव:

ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक किसान अभी भी पारंपरिक पशुपालन विधियों पर निर्भर हैं। उन्हें वैज्ञानिक डेयरी प्रबंधन, संतुलित आहार, टीकाकरण, जैव सुरक्षा तथा पशु कल्याण जैसे महत्वपूर्ण विषयों की पर्याप्त जानकारी नहीं होती। इस जागरूकता की कमी के कारण उत्पादन क्षमता कम रहती है तथा पशुओं में रोगों का खतरा बढ़ जाता है।

  • संसाधनों एवं उपकरणों की कमी:
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कई ग्रामीण एवं दूरदराज क्षेत्रों में पशु चिकित्सा सेवाएँ, प्रयोगशालाएँ, आधुनिक उपकरण तथा दवाइयाँ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होतीं। इससे रोगों का समय पर निदान और उपचार कठिन हो जाता है। संसाधनों की कमी के कारण पशु स्वास्थ्य प्रबंधन प्रभावित होता है, जिससे डेयरी उत्पादन और किसानों की आय दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

  • जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न नई बीमारियाँ:

जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि, अनियमित वर्षा और पर्यावरणीय असंतुलन देखा जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप पशुओं में नई और जटिल बीमारियाँ उत्पन्न हो रही हैं तथा कुछ पुराने रोगों का प्रसार भी बढ़ रहा है। हीट स्ट्रेस जैसी समस्याएँ पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता और प्रजनन स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं। यह स्थिति पशु चिकित्सकों के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी है।

  • छोटे किसानों की आर्थिक सीमाएँ:

भारत में अधिकांश किसान छोटे और सीमांत श्रेणी के हैं, जिनके पास सीमित आर्थिक संसाधन होते हैं। वे आधुनिक पशुपालन तकनीक, उच्च गुणवत्ता वाले चारे, टीकाकरण और चिकित्सा सेवाओं पर पर्याप्त निवेश नहीं कर पाते। आर्थिक सीमाओं के कारण पशुओं की देखभाल और प्रबंधन प्रभावित होता है, जिससे उत्पादन क्षमता कम रह जाती है। यदि सरकारी सहायता और वित्तीय योजनाएँ प्रभावी ढंग से लागू की जाएँ तो इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

Government of India (2023) के अनुसार भारत में पशुधन की संख्या की तुलना में पशु चिकित्सा सेवाएँ अभी भी अपर्याप्त हैं।

निष्कर्ष

सतत डेयरी प्रथाएँ वर्तमान समय की आवश्यकता हैं। डेयरी उद्योग को अधिक उत्पादक, पर्यावरण अनुकूल तथा पशु कल्याण आधारित बनाने में पशु चिकित्सकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे केवल रोग उपचार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पशु स्वास्थ्य प्रबंधन, पोषण, प्रजनन, पर्यावरण संरक्षण, जैव सुरक्षा तथा किसानों के प्रशिक्षण में भी सक्रिय योगदान देते हैं। यदि सरकार, वैज्ञानिक संस्थाएँ, पशु चिकित्सक एवं किसान मिलकर कार्य करें, तो भारत में डेयरी उद्योग को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाया जा सकता है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा तथा खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी। इसलिए भविष्य में सतत डेयरी विकास में पशु चिकित्सकों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होती जाएगी।

संदर्भ सूची (References)

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  • Government of India. (2023). Basic Animal Husbandry Statistics. Ministry of Fisheries, Animal Husbandry and Dairying, New Delhi.
  • Kumar, R. and Singh, N.P. (2017). “Role of Veterinary Services in Sustainable Livestock Development.” Indian Journal of Animal Sciences,87(5): 523–530.
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  • (2001). Nutrient Requirements of Dairy Cattle. National Academies Press, Washington D.C.
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  • Singh, J., Kumar, A. and Yadav, S. (2019). “Importance of Animal Nutrition in Sustainable Dairy Production.” Indian Journal of Dairy Science, 72(4): 411–418.
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  • Upadhyay, R.C. and Ashutosh. (2014). “Climate Change and Dairy Cattle Production.” Indian Dairyman, 66(6): 72–78.
  • Webster, J. (2016). Animal Welfare: Freedoms, Dominions and A Life Worth Living. Wiley-Blackwell.
  • WOAH/OIE. (2021). Animal Welfare and Sustainable Livestock Systems. Paris, France.
  • Yadav, C.M. and Patel, R.K. (2018). “Biosecurity Measures in Dairy Farms.” Veterinary World, 11(9): 1245–1252.
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