पशुओं में किलनी (Ticks) का प्रभावी नियंत्रण: स्वस्थ पशु, अधिक उत्पादन और अधिक लाभ

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पशुओं में किलनी (Ticks) का प्रभावी नियंत्रण: स्वस्थ पशु, अधिक उत्पादन और अधिक लाभ

लेखक

डॉ. प्रशांत तिवारी
ICMR-NIHR, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

डॉ. चेतना मोटला
पंडित दीन दयाल उपाध्याय पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय एवं गो-अनुसंधान संस्थान (DUVASU), मथुरा, उत्तर प्रदेश

परिचय

पशुपालन भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार है। पशुओं का अच्छा स्वास्थ्य ही अधिक दूध उत्पादन, बेहतर प्रजनन क्षमता तथा अधिक आर्थिक लाभ की कुंजी है। किंतु बाह्य परजीवी (Ectoparasites), विशेषकर किलनी (Ticks), पशुपालकों के लिए एक गंभीर चुनौती बनी हुई हैं। किलनी रक्त चूसने वाले परजीवी हैं, जो पशुओं को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार से नुकसान पहुँचाती हैं। भारत की गर्म एवं आर्द्र जलवायु इनके प्रजनन के लिए अत्यंत अनुकूल होने के कारण लगभग सभी राज्यों में इनका प्रकोप देखा जाता है।

किलनी से होने वाले नुकसान

किलनी केवल रक्त नहीं चूसती, बल्कि अनेक खतरनाक रक्तजनित रोगों का भी प्रसार करती है, जिनमें प्रमुख हैं—

  • थीलेरियोसिस (Theileriosis)
  • बेबेसियोसिस (Babesiosis)
  • एनाप्लाज्मोसिस (Anaplasmosis)

इन रोगों के कारण पशुओं में बुखार, कमजोरी, एनीमिया, वजन में कमी, दूध उत्पादन में गिरावट तथा गंभीर संक्रमण होने पर मृत्यु तक हो सकती है। लगातार किलनी के संक्रमण से पशु तनावग्रस्त रहते हैं, जिससे उनकी उत्पादकता एवं प्रजनन क्षमता भी प्रभावित होती है।

किलनी की पहचान कैसे करें?

यदि पशु में निम्न लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत किलनी की जांच करें—

  • शरीर पर छोटी भूरी या काली किलनियाँ दिखाई देना।
  • बार-बार शरीर खुजलाना।
  • त्वचा पर घाव या सूजन।
  • रक्त की कमी एवं कमजोरी।
  • दूध उत्पादन में कमी।
  • पशु का सुस्त एवं कमजोर दिखाई देना।
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किलनियाँ प्रायः कानों के पीछे, गर्दन, गलकंबल, थनों के आसपास, पूँछ के नीचे तथा पैरों के बीच अधिक पाई जाती हैं।

किलनी नियंत्रण के वैज्ञानिक उपाय

  1. पशुशाला की स्वच्छता

किलनी नियंत्रण की शुरुआत स्वच्छ पशुशाला से होती है।

  • गोबर एवं गंदगी प्रतिदिन हटाएँ।
  • दीवारों एवं फर्श की दरारों की नियमित सफाई करें।
  • नमी कम रखें।
  • प्रत्येक 15–21 दिन पर स्वीकृत कीटनाशकों का छिड़काव करें।
  • छिड़काव के समय पशुओं को बाहर रखें तथा सूखने के बाद ही वापस लाएँ।
  1. रासायनिक उपचार (Acaricides)

पशु चिकित्सक की सलाह से निम्न दवाओं का प्रयोग किया जा सकता है—

  • डेल्टामेथ्रिन
  • साइपरमेथ्रिन
  • एमिट्राज
  • आइवरमेक्टिन

ध्यान दें: एक ही दवा का लगातार उपयोग न करें। समय-समय पर दवा बदलने से किलनियों में प्रतिरोधक क्षमता (Resistance) विकसित होने की संभावना कम रहती है।

  1. प्राकृतिक एवं हर्बल उपाय

हल्के संक्रमण में कुछ प्राकृतिक उपाय भी सहायक सिद्ध हो सकते हैं—

  • नीम का तेल
  • नीलगिरी (Eucalyptus) का तेल
  • लहसुन का अर्क
  • हल्दी आधारित मिश्रण

ये पर्यावरण के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्प हैं, किन्तु गंभीर संक्रमण में इनका उपयोग पशु चिकित्सक की सलाह के साथ ही करना चाहिए।

  1. नियमित ग्रूमिंग (सफाई एवं ब्रशिंग)

पशुओं की नियमित ब्रशिंग एवं शरीर की सफाई करने से किलनियाँ प्रारम्भिक अवस्था में ही हट जाती हैं। इससे संक्रमण एवं रोगों का प्रसार कम होता है।

  1. भैंसों को नियमित स्नान कराना

ग्रामीण क्षेत्रों में भैंसों को नदी, तालाब अथवा स्वच्छ जलाशयों में नियमित स्नान कराने की परंपरा रही है। पानी में कुछ समय रहने से शरीर का तापमान कम होता है तथा त्वचा पर चिपकी हुई कई बाह्य परजीवियों, विशेषकर किलनियों की पकड़ कमजोर पड़ जाती है। इससे किलनी का प्रकोप कुछ हद तक कम हो सकता है तथा पशु को गर्मी से भी राहत मिलती है।

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हालाँकि केवल स्नान कराना पर्याप्त नहीं है। प्रभावी नियंत्रण के लिए पशुशाला की स्वच्छता, नियमित निरीक्षण तथा आवश्यकता पड़ने पर उचित एकारिसाइड का प्रयोग भी आवश्यक है।

सावधानी: गंदे या दूषित जल में पशुओं को न नहलाएँ, क्योंकि इससे त्वचा रोग एवं अन्य संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ सकता है।

  1. जैविक नियंत्रण

कुछ लाभकारी फफूंद एवं प्राकृतिक शत्रु किलनी की संख्या कम करने में सहायक पाए गए हैं। भविष्य में विकसित हो रहे टिक-रोधी टीके (Tick Vaccines) भी किलनी नियंत्रण का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकते हैं।

निष्कर्ष

किलनी नियंत्रण केवल दवा के प्रयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वच्छ पशुशाला, वैज्ञानिक प्रबंधन, नियमित निरीक्षण, प्राकृतिक उपाय तथा पशु चिकित्सकीय सलाह का समन्वित परिणाम है। यदि किसान समेकित किलनी नियंत्रण (Integrated Tick Management) अपनाएँ, तो पशुओं को गंभीर रोगों से बचाया जा सकता है, दूध एवं मांस उत्पादन बढ़ाया जा सकता है तथा पशुपालन को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है।

याद रखें

स्वच्छ पशुशाला, नियमित निरीक्षण और समय पर किलनी नियंत्रण ही स्वस्थ पशु एवं सफल पशुपालन की पहचान है।

 

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