सूकर पालन का लाभ एवं नवजात शावकों की देखभाल

0
70

सूकर पालन का लाभ एवं नवजात शावकों की देखभाल

1डॉ. प्रिंसी तिवारी, 1*डॉ. शुभम दीप चैधरी, 1डॉ. मनीष कुमार शुक्ला, 2डॉ. अतुल कुमार, 1डॉ आशुतोष त्रिपाठी,1डॉनीरजकुमारतिवारीएवं1डॉ. अखिलपटेल

1पशु प्रजनन, मादा रोग एवं प्रसूति विज्ञान विभाग, पशुचिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय,

सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मोदीपुरम, मेरठ 250110

उत्तर प्रदेश

2पशुधन उत्पादन और प्रबंधन विभाग, पशुचिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय,

सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मोदीपुरम, मेरठ 250110

उत्तर प्रदेश

*Corresponding author: shubhamdeepvet@gmail.com

 

सारांश

सूकर पालन एक ऐसा पशुपालन व्यवसाय है, जिसे अपेक्षाकृत कम पूंजी में शुरू करके अच्छा आर्थिक लाभ अर्जित किया जा सकता है। यदि वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन किया जाए, तो यह ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों, भूमिहीन परिवारों तथा छोटे पशुपालकों के लिए आय का एक विश्वसनीय स्रोत बन सकता है। सूकर ऐसे अनेक कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण से प्राप्त अवशेषों का भी उपयोग कर लेते हैं, जिनका उपयोग मनुष्य या अन्य पालतू पशु सामान्यतः नहीं कर पाते। इस प्रकार ये कम लागत वाले संसाधनों को उच्च गुणवत्ता वाले मांस में परिवर्तित कर देते हैं।

मुख्य शब्दसूकर पालन, शावक, प्रसव, स्टार्टर आहार, विषाणुजनित रोग

 

भारत में अधिकांश स्थानों पर सूकर पालन अभी भी पारंपरिक तरीके से किया जाता है, जिसके कारण देशी नस्लों की वृद्धि दर अपेक्षाकृत कम रहती है। इनके मांस की गुणवत्ता भी उन्नत नस्लों की तुलना में कम होती है तथा एक बार में जन्म लेने वाले शावकों की संख्या भी सीमित रहती है। इसके विपरीत, लार्ज व्हाइट यॉर्कशायर, लैंडरेस तथा मिडिल व्हाइट यॉर्कशायर जैसी उन्नत नस्लें कम आयु में प्रजनन योग्य हो जाती हैं और सामान्यतः एक बार में 8 से 14 शावकों को जन्म देने की क्षमता रखती हैं। उचित पोषण मिलने पर ये लगभग 8 से 9 माह की आयु में 100 किलोग्राम तक वजन प्राप्त कर सकती हैं, जिससे पशुपालक को अच्छा आर्थिक लाभ मिलता है।

सूकर पालन की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसकी उच्च प्रजनन क्षमता है। जहाँ गाय और भैंस की संख्या में वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी होती है, वहीं सूकर बहुत कम समय में अपनी संख्या कई गुना बढ़ा सकते हैं। इसके अतिरिक्त इन्हें पालने के लिए अन्य बड़े पशुओं की अपेक्षा कम स्थान की आवश्यकता होती है, जिससे सीमित संसाधनों वाले किसान भी इस व्यवसाय को आसानी से अपना सकते हैं।

सूकरों के आहार में मुख्य रूप से ऊर्जा युक्त पदार्थों का उपयोग किया जाता है, जैसे मक्का, आलू, चावल, जौ तथा अन्य स्टार्चयुक्त खाद्य सामग्री। संतुलित आहार, स्वच्छ पानी और उचित प्रबंधन से उनकी वृद्धि तेजी से होती है तथा उत्पादन क्षमता भी बढ़ती है।

नवजात सूकर शावकों की देखभाल

सूकर पालन में अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए नवजात शावकों की मृत्यु दर को कम करना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए जन्म के समय से ही उनकी वैज्ञानिक ढंग से देखभाल की जानी चाहिए।

  • प्रसव के समय प्रशिक्षित व्यक्ति की उपस्थिति लाभदायक रहती है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर तुरंत सहायता प्रदान की जा सके।
  • जन्म के तुरंत बाद शावक के नाक, मुंह और आंखों पर लगी झिल्ली या श्लेष्मा को साफ कर देना चाहिए, जिससे वह सामान्य रूप से श्वास ले सके।
  • नाभि रज्जु को शरीर से लगभग 2 से 5 सेंटीमीटर की दूरी पर बाँधकर स्वच्छ ब्लेड या कैंची से काटना चाहिए तथा संक्रमण से बचाव के लिए उस पर आयोडीन का घोल लगाना चाहिए।
  • प्रसूति कक्ष में सुरक्षा रेल की व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे मादा सूकर के नीचे दबकर शावकों की मृत्यु न हो।
  • जन्म के समय शावकों के दाँत नुकीले होते हैं। यदि आवश्यकता हो तो इन्हें उचित उपकरण से छोटा कर देना चाहिए, जिससे मादा के थनों में घाव बनने की संभावना कम हो।
  • जन्म के तुरंत बाद शावकों को माँ का पहला दूध (कोलोस्ट्रम) अवश्य पिलाना चाहिए। यह दूध रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ आवश्यक पोषक तत्व भी प्रदान करता है।
  • प्रारंभिक दिनों में शावकों को नियमित अंतराल पर दूध पीने देना चाहिए। लगभग तीन सप्ताह की आयु से धीरे-धीरे ठोस आहार देना प्रारंभ कर देना चाहिए।
READ MORE :  आधुनिक सूकर पालन की पद्धति एवं प्रबंधन

शावकों के लिए प्रारंभिक संतुलित आहार

तीन सप्ताह की आयु के बाद निम्न प्रकार का स्टार्टर आहार दिया जा सकता है।

आहार सामग्री प्रतिशत
मक्का का आटा    47
मूंगफली खली    20
शीरा               9
मछली चूर्ण    10
चोकर    10
यीस्ट     2
खनिज मिश्रण     2
कुल                100

 

इस मिश्रण में आवश्यकता के अनुसार विटामिन एवं अन्य पोषक पूरक भी मिलाए जा सकते हैं।

लगभग चार सप्ताह की आयु में शावकों का दूध छुड़ाकर उन्हें अलग रखा जाना चाहिए। इसके बाद उन्हें उच्च गुणवत्ता वाला स्टार्टर आहार उपलब्ध कराया जाए, जिससे उनकी वृद्धि तेजी से हो सके।

नवजात शावकों में लौह की कमी सामान्य रूप से देखी जाती है, क्योंकि माँ के दूध से पर्याप्त मात्रा में लौह उपलब्ध नहीं हो पाता। इस कमी से एनीमिया, कमजोरी तथा वृद्धि रुकने जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए जन्म के 3 से 4 दिन के भीतर पशु चिकित्सक की सलाह अनुसार आयरन का इंजेक्शन लगाना लाभदायक रहता है।

इसी प्रकार प्रारंभिक दिनों में ऊर्जा की कमी से बचाने के लिए आवश्यकता अनुसार ग्लूकोज दिया जा सकता है। समय-समय पर विटामिन पूरक, कृमिनाशक दवाएँ तथा आवश्यक टीकाकरण भी पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार कराना चाहिए। इससे शावकों की जीवित रहने की क्षमता बढ़ती है तथा भविष्य में उनका विकास बेहतर होता है।

 

सूकरों के प्रमुख रोग एवं उनकी रोकथाम

सूकर पालन में अधिक उत्पादन एवं लाभ प्राप्त करने के लिए पशुओं को रोगमुक्त रखना अत्यंत आवश्यक है। उचित पोषण, स्वच्छ वातावरण, नियमित टीकाकरण तथा समय पर उपचार अपनाकर अधिकांश संक्रामक रोगों से बचाव किया जा सकता है। सूकरों में सामान्यतः निम्नलिखित प्रमुख रोग देखने को मिलते हैं।

  1. एरिसिपेलस (डायमंड स्किन रोग)
READ MORE :  बैकयार्ड पोल्ट्री/ शूकर से मनुष्यों में फैलने वाली जूनोटिक बीमारियों से बचाव हेतु जैव सुरक्षा उपाय।।

यह एक जीवाणुजनित संक्रामक रोग है, जो सभी आयु वर्ग के सूकरों को प्रभावित कर सकता है। रोगग्रस्त पशु में तेज बुखार, सुस्ती, भूख में कमी तथा चलने-फिरने में कठिनाई दिखाई देती है। कई मामलों में शरीर की त्वचा पर हीरे के आकार के गुलाबी या लाल रंग के चकत्ते बन जाते हैं, जिसके कारण इसे डायमंड स्किन रोग भी कहा जाता है। समय पर उपचार न मिलने पर यह रोग उत्पादन क्षमता को प्रभावित कर सकता है।

  1. स्वाइन फीवर

यह अत्यधिक संक्रामक विषाणुजनित रोग है, जो सूकर पालन में भारी आर्थिक हानि का कारण बन सकता है। प्रभावित पशुओं में तेज बुखार, भूख न लगना, कमजोरी, चलने में असंतुलन, शरीर का पिछला भाग लड़खड़ाना तथा त्वचा का नीला या बैंगनी पड़ना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। कई बार पशु गोल-गोल घूमने लगता है तथा मांसपेशियों में कंपन भी देखा जाता है। इस रोग की रोकथाम का सबसे प्रभावी उपाय समय पर टीकाकरण है।

  1. स्वाइन इन्फ्लुएंजा

यह एक विषाणुजनित श्वसन रोग है, जो तेजी से एक पशु से दूसरे पशु में फैल सकता है। रोग होने पर तेज बुखार, खाँसी, नाक से पानी निकलना, साँस लेने में कठिनाई, आँखों में लालिमा तथा कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। संक्रमित पशु की समय पर पहचान कर उसे अन्य पशुओं से अलग रखना आवश्यक होता है।

  1. सूकर चेचक

यह भी एक विषाणुजनित रोग है, जिसमें मुख्य रूप से त्वचा प्रभावित होती है। प्रारंभ में पशु को हल्का बुखार आता है, जिसके बाद शरीर के विभिन्न भागों, विशेषकर कान, पेट,चेहरे एवं पैरों पर छोटे-छोटे दाने निकलने लगते हैं। बाद में ये दाने बड़े होकर पपड़ी का रूप ले लेते हैं। यह रोग प्रायः जूँ एवं अन्य बाह्य परजीवियों के माध्यम से फैलता है, इसलिए इनके नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।

रोगों की रोकथाम एवं जैव सुरक्षा के उपाय

सूकर पालन में रोगों की रोकथाम उपचार की अपेक्षा अधिक प्रभावी और किफायती होती है। यदि कुछ आवश्यक प्रबंधन उपाय नियमित रूप से अपनाए जाएँ, तो अधिकांश संक्रामक रोगों की संभावना काफी कम की जा सकती है।

  • बीमार पशुओं को तुरंत स्वस्थ पशुओं से अलग रखें, ताकि संक्रमण का प्रसार न हो।
  • नए खरीदे गए सूकरों को सीधे झुंड में शामिल करने के बजाय कम से कम 60 दिनों तक पृथक रखकर उनका स्वास्थ्य परीक्षण करें।
  • पशुशाला की नियमित सफाई एवं समय-समय पर कीटाणुनाशक दवाओं से विसंक्रमण करें।
  • सूकरों को उनकी आयु एवं आवश्यकता के अनुसार संतुलित एवं पौष्टिक आहार उपलब्ध कराएँ तथा स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था बनाए रखें।
  • पशु चिकित्सक द्वारा निर्धारित टीकाकरण एवं कृमिनाशन कार्यक्रम का नियमित पालन करें।
  • रोग से मृत पशुओं का सुरक्षित निपटान करें। उन्हें खुले स्थान पर न छोड़ें, बल्कि गहरा गड्ढा खोदकर चूना डालकर वैज्ञानिक विधि से दबाएँ।
  • पशुशाला में उपयोग होने वाले बिछावन को समय-समय पर बदलते रहें तथा उसे सूखा एवं स्वच्छ रखें।
  • सूकर शाला में अनावश्यक व्यक्तियों, आवारा पशुओं तथा जंगली जीवों के प्रवेश को रोकें, क्योंकि वे संक्रमण फैलाने का माध्यम बन सकते हैं।
  • मक्खी, मच्छर, जूँ एवं अन्य बाह्य परजीवियों के नियंत्रण के लिए समय-समय पर स्वीकृत कीटनाशकों का प्रयोग करें।
  • गोबर, मूत्र एवं अन्य अपशिष्ट पदार्थों के उचित निस्तारण की व्यवस्था करें, जिससे पशुशाला का वातावरण स्वच्छ एवं रोगमुक्त बना रहे।
  • किसी भी पशु में असामान्य व्यवहार, बुखार, भूख कम लगना या अन्य रोग के लक्षण दिखाई देने पर तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें।
READ MORE :  भारत में स्वाइन फार्मिंग का महत्व और दायरा

निष्कर्ष

सूकर पालन एक लाभकारी एवं तेजी से बढ़ने वाला पशुपालन व्यवसाय है, बशर्ते इसे वैज्ञानिक प्रबंधन के साथ संचालित किया जाए। उन्नत नस्लों का चयन, संतुलित पोषण, नवजात शावकों की समुचित देखभाल,नियमित टीकाकरण, कृमिनाशन तथा स्वच्छता संबंधी उपाय अपनाने से पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है। इससे मृत्यु दर में कमी आती है, उत्पादन क्षमता बढ़ती है तथा पशुपालकों को अधिक एवं स्थायी आर्थिक लाभ प्राप्त होता है।

 

References:

  1. Alexander, T. J. L. (1984). The production of healthy pigs. Blackwell Scientific Publications.
  2. Cutler, R. S., Holyoake, P. K., Sutherland, M. A., & Edwards, S. A. (Eds.). (2023). Diseases of swine (12th ed.). Wiley-Blackwell.
  3. Food and Agriculture Organization of the United Nations. (2012). Pig sector Kenya: FAO animal production and health livestock country reviews No. 3. FAO.
  4. Food and Agriculture Organization of the United Nations. (2014). Good practices for biosecurity in the pig sector: Issues and options in developing and transition countries (FAO Animal Production and Health Paper No. 169). FAO.
  5. Indian Council of Agricultural Research. (2021). Handbook of animal husbandry (4th ed.). ICAR.
  6. Muirhead, M. R., & Alexander, T. J. L. (2013). Managing pig health and the treatment of disease (2nd ed.). 5M Publishing.
  7. Straw, B. E., Zimmerman, J. J., D’Allaire, S., & Taylor, D. J. (Eds.). (2019). Diseases of swine (11th ed.). Wiley-Blackwell.
  8. Taylor, D. J. (2013). Pig diseases (9th ed.). 5M Publishing.

 

Please follow and like us:
Follow by Email
Twitter

Visit Us
Follow Me
YOUTUBE

YOUTUBE
PINTEREST
LINKEDIN

Share
INSTAGRAM
SOCIALICON