पशुओं में खुरपका–मुंहपका रोग
- चेतना मोतला, पंडित दीनदयाल उपाध्याय पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय एवं गो अनुसंधान संस्थान (DUVASU), मथुरा
- शिप्रा वर्मा, आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या
- प्रशांत तिवारी, ICMR-NIHR, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत
परिचय
खुरपका-मुंहपका रोग पशुओं में होने वाला एक संक्रामक विषाणु जनित रोग है। इस रोग को विभिन्न स्थानों पर कई अन्य नामों से भी जाना जाता है, जैसे की एफ.एम.डी, खरेडू, चपका, खुरपा आदि। यह पशुओं में अत्याधिक तेजी से फैलता है तथा कुछ समय में एक झुंड या पूरे गाँव के अधिकतर पशुओं को संक्रमित कर देता है। यह रोग गाय, भैस, भेड़, ऊंट, सुअर, हाथी इत्यादि में होने वाला एक अत्याधिक संकामक रोग है, खासकर दुधारू गाय एवं भैस में यह रोग अधिक नुकसान दायक होता है। विदेशी व संकर नस्ल की गायों में भी यह रोग अधिक गम्भीर रूप से पाया जाता है। मुंहपका-खुरपका रोग किसी भी उम्र की गायें एवं उनके बच्चों में हो सकता है। यह जानवरों की खतरनाक बीमारियों में से है, जो कि किसानों या पशुपालकों को काफी आर्थिक हानि पहुंचाता है। इस रोग के चपेट में आने से पशु की कार्यक्षमता व उत्पादन क्षमता कम हो जाती है एवं पशुधन उत्पादन में भारी कमी आती है। देश से पशु उत्पादों के निर्यात एवं लोगो की जीविका पर भी काफी विपरीत प्रभाव पड़ता है।
रोग का कारण एवं संक्रमण
खुरपका-मुंहपका एक बहुत ही प्रचलित विषाणु जनित रोग है जो आर.एन.ए. समूह के पिकोर्नविरिर्डी कुल के जीन्स अफतहोस वायरस के कारण होता है। इस विषाणु के अनेक प्रकार तथा उप-प्रकार है। प्रमुख सीरोटाइप में ओ, ए, सी, एशिया-1, सैट-1, सैट-2 सैट-3 तथा इनकी कई उप-किस्में शामिल है । भारत में यह रोग मुख्यतः ओ, ए, सी तथा एशिया-1 प्रकार के विषाणुओं द्वारा होता है । यह रोग बीमार पशु के सीधे सम्पर्क में आने, पानी, घास, दाना, बर्तन, दूध निकलने वाले व्यक्ति के हाथों से, हवा से फैलते हैं।
रोग के लक्षण
तीव्र ज्वर (102-105फा) साधारणतः युवा पशु में जानलेवा होता है। परंतु वयस्क पशु में नहीं। पशुओं की मृत्यु प्राय: गलाघोटु रोग होने से होती है(गलाघोटु रोग से बचाने के लिए अपने पशुओं को बरसात से पहले इसका टीका अवश्य लगवाएं)
- मुँह से अत्यधिक लार का टपकना (रस्सी जैसा)
- जीभ तथा तलवे पर छालों का उभरना जो बाद में फट कर घाव में बदल जाते हैं।
- जीभ की सतह का निकल कर बाहर आ जाना एवं थूथनों पर छालों का उभरना।
- दूध उत्पादन में लगभग 80 प्रतिशत की कमी, गाभिन पशुओं के गर्भपात एवं बच्चा मरा हुआ पैदा हो सकता है।
- बछड़ों में अत्याधिक ज्वर आने के पश्चात बिना किसी लक्षण की मृत्यु होना।

पशुओं में खुरपका–मुंहपका रोग का रोगजनन
एफएमडी वायरस के संक्रमण और प्रतिकृति का प्राथमिक स्थल ग्रसनी की श्लेष्मा झिल्ली में है। वायरस त्वचा के घावों या जठरांत्र संबंधी मार्ग से भी प्रवेश कर सकता है। लसीका तंत्र में फैलने के बाद, वायरस मुंह, थूथन, थन, पैर और क्षतिग्रस्त त्वचा के क्षेत्रों (जैसे, सूअरों के घुटने और कूल्हे) के उपकला में प्रतिकृति बनाता है। फिर पुटिकाएँ विकसित होती हैं और 48 घंटों के भीतर फट जाती हैं। 50% से अधिक जुगाली करने वाले जानवर जो बीमारी से ठीक हो जाते हैं और वे भी जिन्हें टीका लगाया गया है और फिर वे वायरस के संपर्क में आए हैं, वे वाहक बन सकते हैं, यानी, उनके ग्रसनी क्षेत्र में संक्रामक वायरस का स्तर कम होता है। वाहक अवस्था मवेशियों में 3.5 साल तक, भेड़ों में 9 महीने तक और अफ्रीकी भैंसों में 5 साल से ज़्यादा तक रह सकती है। आश्चर्यजनक रूप से, सूअरों में ऐसे लगातार संक्रमण नहीं होते हैं। इन वाहक पशुओं द्वारा उत्पन्न जोखिम कम (लेकिन शून्य नहीं) प्रतीत होता है क्योंकि वाहक मवेशियों से भोले मवेशियों में लंबे समय तक निकट संपर्क द्वारा रोग का संचरण (नियंत्रित स्थितियों के तहत) संभव नहीं है। हालांकि, वाहक भैंस से मवेशियों में रोग का संचरण प्राप्त किया गया है और वाहक मवेशियों से भोले मवेशियों में ग्रसनी द्रव के सीधे हस्तांतरण द्वारा भी।

रोग का उपचार–
* रोग के लक्षण आरम्भ होने के पश्चात् पशु चिकित्सक की सलाह लें। इस रोग का कोई निश्चित उपचार नहीं है सिर्फ लक्षणों के आधार पर पशु का उपचार किया जाता है।
* संक्रमित पशु में सेकैन्डरी संक्रमण को रोकने के लिए उसे एंटीबाॅयोटिक्स जैसे की डाइक्रिस्टीसीन या आॅक्सीटेट्रासाइक्लीन आदि 5 या 7 दिन तक दिये जा सकते है।
* मुंह व खुरों के घावों को फिटकरी याँ पोटाश के पानी से धोते हैं। मुंह में बोरो-गिलिसरीन तथा खुरों में किसी एंटीसेप्टिक लोशन का प्रयोग किया जा सकता है
* खुर के घाव में हिमैक्स या नीम के तेल का प्रयोग करें जिससे की मक्खी नहीं बैठे क्योंकि मक्खी के बैठने से कीड़े हो सकते है।
* एंटीइनफ्लामेटरी व एनालजेसिक दवाईयों का भी उपयोग दर्द कम करने के लिए लाभदायक होता है।
रोग की रोकथाम
* संक्रमित पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग कर देना चाहिए ।
* संक्रमित पशुओं के आवागमन पर रोक लगा देना चाहिए ।
* बीमार पशुओं की देख-भाल करने वाले व्यक्ति को भी स्वस्थ पशुओं के बाड़े से दूर रहना चाहिए ।
* नये पशुओं को झुंड में मिश्रित करने से पूर्व सिरम से उसकी जाँच अवश्य करना चाहिए।
* नए पशुओं को कम से कम चैदह दिनों तक अलग बाँध कर रखना चाहिए तथा भोजन एवं अन्य प्रबन्धन भी अलग से ही करना चाहिए।
टीकाकरण–
इस बीमारी से बचाव के लिए पशुओं को पोलीवेलेंट वेक्सीन के वर्ष में दो बार टीके अवश्य लगवाने चाहिए। बच्छे में पहला टीका 1माह की आयु में, दूसरा टीका तीसरे माह की आयु तथा तीसरा 6 माह की उम्र में और उसके बाद नियमित सारिणी के अनुसार यानी प्रत्येक 6 महीने में नियमित टीकाकरण करना चाहिए।
* पशुशाला को साफ-सुथरा रखना चाहिए।
* संक्रमित पशुओं को पूर्ण आहार देना चाहिए। जिससे खनिज एवं विटामीन की मात्रा पूर्ण रूप से मिलती रहे।
* मरे पशु के शव को खुला न छोड़कर गाढ़ देना चाहिए।



