गाय एवं भैंसों में कृत्रिम गर्भाधान : उत्पादकता वृद्धि का महत्वपूर्ण साधन

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गाय एवं भैंसों में कृत्रिम गर्भाधान : उत्पादकता वृद्धि का महत्वपूर्ण साधन

¹डॉ. प्रिंसी तिवारी, ¹*डॉ. शुभम दीप चौधरी, ¹डॉ. मनीष कुमार शुक्ला, ²डॉ. अतुल कुमार, ¹डॉ. आशुतोष त्रिपाठी, ¹डॉ. नीरज कुमार तिवारी एवं ¹डॉ. अखिल पटेल

¹पशु प्रजनन, मादा रोग एवं प्रसूति विज्ञान विभाग, पशुचिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मोदीपुरम, मेरठ–250110, उत्तर प्रदेश

²पशुधन उत्पादन एवं प्रबंधन विभाग, पशुचिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मोदीपुरम, मेरठ–250110, उत्तर प्रदेश

*संपर्क लेखक: shubhamdeepvet@gmail.com

कृत्रिम गर्भाधान

नर प्रजनन कोशिका (शुक्राणु) को कृत्रिम तरीके से मादा पशु के जननांगों में प्रत्यारोपित करना कृत्रिम गर्भाधान कहलाता है। इस तकनीक में वीर्य का कृत्रिम योनि अथवा अन्य तकनीकों द्वारा संकलन करके, प्रयोग में लाने के समय तक उचित ढंग से सुरक्षित रखा जाता है। वीर्य की गुणवत्ता का परीक्षण करने के उपरांत उसे यथावत अथवा तनुकृत करके ऋतुमयी मादा के गर्भाशय ग्रीवा एवं गर्भाशय में कृत्रिम रूप से प्रत्यारोपित किया जाता है।

सफल कृत्रिम गर्भाधान के लिए मादा में ऋतु (गर्मी) के लक्षणों की उचित समय पर पहचान होना अत्यंत आवश्यक है। बड़े पशु समूहों अथवा बड़ी डेयरियों में इस कार्य के लिए एक प्रशिक्षित व्यक्ति को विशेष रूप से नियुक्त किया जा सकता है। उचित समय पर ऋतुमयी मादा की पहचान तथा कुशलतापूर्वक कृत्रिम गर्भाधान कराने से प्रजनन दर में वृद्धि तथा अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त होता है। इसलिए कृत्रिम गर्भाधान के लिए पशुओं में गर्मी के लक्षणों की जानकारी होना आवश्यक है।

गाय एवं भैंस में गर्मी के प्रमुख लक्षण:

  • बार-बार रंभाना।
  • पूँछ उठाना।
  • बार-बार पेशाब करना।
  • प्रजनन अंगों में सूजन तथा अधिक रक्त प्रवाह के कारण लालिमा आना।
  • पशु का बेचैन होना।
  • दूसरे जानवरों पर चढ़ना।
  • प्रजनन अंगों से पारदर्शी, गाढ़ा एवं चिपचिपा स्राव निकलना।
  • गर्मी में आने के 10–12 घंटे बाद पशु का साँड़ अथवा अन्य पशु को अपने ऊपर चढ़ने देना।
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कृत्रिम गर्भाधान के लाभ:

  1. कृत्रिम गर्भाधान प्रजनन की ऐसी पद्धति है, जिसके द्वारा पशुओं में नस्ल सुधार अपेक्षाकृत शीघ्र किया जा सकता है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि उच्च कोटि के साँड़ों से अधिक संख्या में उत्कृष्ट संतति प्राप्त की जा सकती है। प्राकृतिक समागम द्वारा एक साँड़ से एक वर्ष में अधिकतम लगभग 100 बछड़े/बछियाँ प्राप्त किए जा सकते हैं, जबकि कृत्रिम गर्भाधान द्वारा उसी अवधि में लगभग 2000 संततियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। इस प्रकार यह विधि न केवल अधिक लाभदायक है, बल्कि उच्च गुणवत्ता वाले साँड़ों की कमी की समस्या का भी समाधान करती है।
  2. कृत्रिम गर्भाधान द्वारा साँड़ों से फैलने वाले संक्रामक जननांग रोगों के प्रसार को रोका जा सकता है।
  3. उच्च कोटि के ऐसे साँड़, जो किसी शारीरिक व्याधि अथवा चोट के कारण प्राकृतिक प्रजनन में उपयोग नहीं किए जा सकते, उनके वीर्य का उपयोग कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से किया जा सकता है।
  4. अच्छी नस्ल के साँड़ों का वीर्य एक स्थान से दूसरे स्थान तक आसानी से भेजकर प्रजनन कार्य में उपयोग किया जा सकता है। यह अपेक्षाकृत कम खर्चीला भी होता है।
  5. गरीब किसान, जो उच्च कोटि का साँड़ खरीदने में सक्षम नहीं हैं, वे इस तकनीक द्वारा उच्च गुणवत्ता वाले हिमीकृत वीर्य का उपयोग कर उत्कृष्ट संतति प्राप्त कर सकते हैं।

कृत्रिम गर्भाधान की कुछ सीमाएँ/हानियाँ:

इन कमियों को उचित प्रबंधन द्वारा काफी हद तक दूर किया जा सकता है।

  1. मादा पशु के मदकाल (ऋतुकाल) की सही पहचान के लिए पर्याप्त ज्ञान, समय एवं परिश्रम की आवश्यकता होती है।
  2. कृत्रिम गर्भाधान की सफलता या विफलता काफी हद तक तकनीशियन की दक्षता पर निर्भर करती है।
  3. प्राकृतिक प्रजनन की तुलना में कृत्रिम गर्भाधान में अधिक तकनीकी ज्ञान एवं बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता होती है।
  4. कृत्रिम गर्भाधान में स्वच्छता का विशेष महत्व है। थोड़ी-सी लापरवाही भी मादा पशु में जननांग संबंधी रोग उत्पन्न कर सकती है।
  5. इस विधि के लिए कुशल एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों की आवश्यकता होती है।
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कृत्रिम गर्भाधान से उत्तम जनन क्षमता प्राप्त करने हेतु आवश्यक सावधानियाँ:

  • सावधानीपूर्वक कार्य करें तथा अत्यधिक बल का प्रयोग न करें।
  • गर्भाधान की प्रक्रिया दो चरणों में पूर्ण होती है। प्रथम चरण में वीर्यवाहक नलिका (कैथेटर) को गर्भाशय ग्रीवा तक पहुँचाया जाता है तथा द्वितीय चरण में गर्भाशय ग्रीवा को वीर्यवाहक नलिका के ऊपर लाया जाता है।
  • वीर्य का कुछ भाग गर्भाशय में तथा शेष भाग गर्भाशय ग्रीवा में जमा करें।
  • पूरी प्रक्रिया के दौरान धैर्य एवं संयम बनाए रखें तथा पर्याप्त समय लेकर कार्य करें।
  • गर्भाधान सही समय पर अर्थात ए.एम.–पी.एम. नियम के अनुसार करें।

कुशलतापूर्वक तथा सही समय पर किया गया कृत्रिम गर्भाधान न केवल उच्च प्रजनन दर प्रदान करता है, बल्कि पशुपालकों को साँड़ के पालन-पोषण पर होने वाले अतिरिक्त व्यय से भी बचाता है तथा उनकी आर्थिक आय में वृद्धि करता है।

 

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