भविष्य के शहर : बिना पेट्रोल और बिना प्रदूषण वाली दुनिया

0
109
भविष्य के शहर : बिना पेट्रोल और बिना प्रदूषण वाली दुनिया
 
                      – डॉ दीपक कोहली
 
मानव सभ्यता के इतिहास में शहर हमेशा विकास, शक्ति और आधुनिकता के प्रतीक रहे हैं। प्राचीन सभ्यताओं के नगर नदियों के किनारे बसे, मध्यकालीन शहर व्यापार और संस्कृति के केंद्र बने और औद्योगिक क्रांति के बाद आधुनिक महानगरों ने विज्ञान तथा तकनीक के सहारे अभूतपूर्व विस्तार प्राप्त किया। बीसवीं सदी में पेट्रोल और डीजल आधारित परिवहन व्यवस्था ने शहरों की गति को इतना तेज कर दिया कि दुनिया तेजी को ही विकास का पर्याय मानने लगी। चौड़ी सड़कें, कारों की लंबी कतारें, धुआँ उगलते उद्योग,रात-दिन जगमगाती रोशनियाँ और ऊँची-ऊँची इमारतें आधुनिक शहरों की पहचान बन गईं। लेकिन इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक तक पहुँचते-पहुँचते मानवता को यह महसूस होने लगा कि जिस विकास मॉडल को प्रगति समझा गया था, वही पृथ्वी के लिए सबसे बड़ा संकट बनता जा रहा है।
 
आज दुनिया के अधिकांश महानगर वायु प्रदूषण, जल संकट, ऊर्जा संकट, ट्रैफिक जाम और बढ़ते तापमान जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। शहरों की हवा में घुलता धुआँ धीरे-धीरे मानव स्वास्थ्य को नष्ट कर रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया की बड़ी आबादी ऐसी हवा में साँस लेने को मजबूर है जो स्वास्थ्य मानकों के अनुरूप नहीं है। दिल्ली, बीजिंग, मेक्सिको सिटी और जकार्ता जैसे महानगरों में स्थिति कई बार इतनी गंभीर हो जाती है कि लोगों को घरों से बाहर निकलने से बचने की सलाह दी जाती है। लाखों वाहन प्रतिदिन अरबों लीटर पेट्रोल और डीजल जलाते हैं, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और सूक्ष्म कण वातावरण में फैलते रहते हैं। यही गैसें जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग को तेज कर रही हैं।
 
वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि शहरी विकास की वर्तमान दिशा नहीं बदली गई, तो आने वाले दशकों में पृथ्वी पर जीवन और अधिक कठिन हो सकता है। इसी कारण अब दुनिया भर में “ग्रीन सिटी”, “नेट-जीरो सिटी”, “कार्बन न्यूट्रल अर्बन सिस्टम” और “सस्टेनेबल सिटी” जैसी अवधारणाएँ तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं। भविष्य के शहरों की कल्पना ऐसे स्थानों के रूप में की जा रही है जहाँ पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता समाप्त हो जाए, ऊर्जा का अधिकांश भाग नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त हो, परिवहन प्रणाली प्रदूषणमुक्त हो और प्रकृति तथा तकनीक के बीच संतुलन स्थापित हो सके।
 
भविष्य के शहरों की यह कल्पना अब केवल विज्ञान कथा का विषय नहीं रही। दुनिया के कई देशों में ऐसे प्रयोग शुरू हो चुके हैं जो यह संकेत देते हैं कि आने वाले दशकों में शहरों का स्वरूप पूरी तरह बदल सकता है। वैज्ञानिकों और शहरी योजनाकारों का मानना है कि भविष्य के शहरों का सबसे बड़ा आधार स्वच्छ ऊर्जा होगी। वर्तमान समय में विश्व की अधिकांश ऊर्जा आवश्यकताएँ कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों से पूरी होती हैं। लेकिन ये संसाधन सीमित हैं और इनके उपयोग से भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है। इसी कारण अब सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जलविद्युत और हाइड्रोजन ऊर्जा को भविष्य का आधार माना जा रहा है।
 
सौर ऊर्जा को भविष्य के शहरों की रीढ़ कहा जा रहा है। सूर्य प्रतिदिन पृथ्वी पर जितनी ऊर्जा भेजता है, वह मानव सभ्यता की कुल आवश्यकता से हजारों गुना अधिक है। वैज्ञानिक “फोटोवोल्टिक प्रभाव” पर आधारित ऐसी तकनीकों का विकास कर चुके हैं जिनकी सहायता से सूर्य के प्रकाश को सीधे विद्युत ऊर्जा में बदला जा सकता है। सौर पैनलों में उपस्थित सिलिकॉन कोशिकाएँ प्रकाश के फोटॉनों को अवशोषित कर इलेक्ट्रॉनों की गति उत्पन्न करती हैं और यही गति विद्युत धारा में परिवर्तित हो जाती है। आने वाले समय में भविष्य के शहरों की प्रत्येक इमारत ऊर्जा उत्पादन की इकाई बन सकती है। घरों की छतों पर लगे सौर पैनल, खिड़कियों में लगे पारदर्शी सोलर ग्लास और सड़कों के किनारे स्थापित ऊर्जा पैनल शहरों को आत्मनिर्भर बना सकते हैं।
 
वैज्ञानिक अब “बिल्डिंग इंटीग्रेटेड फोटोवोल्टिक” तकनीक पर तेजी से काम कर रहे हैं। इसमें इमारतों की दीवारों और काँच की सतहों को ही ऊर्जा उत्पादक बना दिया जाता है। भविष्य में संभव है कि शहरों की गगनचुंबी इमारतें केवल रहने या काम करने की जगह न हों, बल्कि वे विशाल ऊर्जा संयंत्रों की तरह कार्य करें। इससे बिजली उत्पादन के लिए अलग से बड़े ताप विद्युत संयंत्रों की आवश्यकता कम हो जाएगी और कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी आ सकेगी।
 
भविष्य के शहरों में परिवहन व्यवस्था का स्वरूप भी पूरी तरह बदल सकता है। आज दुनिया के अधिकांश शहर निजी कारों पर आधारित हैं। लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि यह मॉडल टिकाऊ नहीं है। पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहन न केवल प्रदूषण फैलाते हैं, बल्कि वे शहरों में अत्यधिक स्थान भी घेरते हैं। सड़कों और पार्किंग के लिए शहरों का बड़ा हिस्सा उपयोग में आ जाता है। भविष्य में इलेक्ट्रिक वाहन इस व्यवस्था को बदल सकते हैं। इलेक्ट्रिक वाहन विद्युत मोटर से चलते हैं और इनमें ऊर्जा बैटरियों में संग्रहित रहती है। चूँकि इनमें ईंधन का दहन नहीं होता, इसलिए धुआँ भी नहीं निकलता।
 
लिथियम-आयन बैटरियाँ वर्तमान समय में इलेक्ट्रिक वाहनों का मुख्य आधार हैं, लेकिन वैज्ञानिक अब इससे भी अधिक उन्नत “सॉलिड स्टेट बैटरियों” पर कार्य कर रहे हैं। इन बैटरियों में तरल इलेक्ट्रोलाइट के स्थान पर ठोस पदार्थ का उपयोग होता है, जिससे उनकी ऊर्जा क्षमता बढ़ जाती है और आग लगने का खतरा कम हो जाता है। यदि यह तकनीक बड़े पैमाने पर सफल हो जाती है, तो इलेक्ट्रिक वाहनों की दूरी और कार्यक्षमता दोनों बढ़ सकती हैं।
 
भविष्य के शहरों में केवल वाहन ही नहीं बदलेंगे, बल्कि पूरी परिवहन अवधारणा बदल जाएगी। “साझा परिवहन” और “ऑन डिमांड मोबिलिटी” की अवधारणाएँ तेजी से विकसित हो रही हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आने वाले दशकों में लोग निजी कार रखने के बजाय आवश्यकता पड़ने पर स्वचालित साझा वाहन सेवाओं का उपयोग करेंगे। चालक रहित वाहन कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कैमरों, सेंसरों और लाइडर तकनीक की सहायता से स्वयं सड़क का विश्लेषण कर चल सकेंगे। इससे दुर्घटनाओं में कमी आएगी और ट्रैफिक अधिक व्यवस्थित हो सकेगा।
 
भविष्य के शहरों में साइकिल और पैदल मार्गों का महत्व भी बढ़ेगा। वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि यदि शहरों में सुरक्षित और हरित साइकिल नेटवर्क बनाए जाएँ, तो छोटी दूरी के लिए लोग कारों का उपयोग कम करने लगते हैं। यूरोप के कई शहरों ने यह मॉडल सफलतापूर्वक अपनाया है। भविष्य में “15 मिनट सिटी” की अवधारणा अत्यधिक लोकप्रिय हो सकती है, जिसमें व्यक्ति अपने घर से 15 मिनट के भीतर स्कूल, अस्पताल, कार्यालय और बाजार तक पहुँच सके। इससे ऊर्जा की बचत होगी और प्रदूषण भी कम होगा।
 
ऊर्जा के क्षेत्र में हाइड्रोजन को भविष्य का “स्वच्छ ईंधन” माना जा रहा है। वैज्ञानिक “ग्रीन हाइड्रोजन” तकनीक पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। जब जल का विद्युत अपघटन किया जाता है, तो उससे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन प्राप्त होती हैं। यदि यह प्रक्रिया सौर या पवन ऊर्जा द्वारा संचालित हो, तो प्राप्त हाइड्रोजन पूर्णतः स्वच्छ ईंधन बन सकती है। हाइड्रोजन ईंधन कोशिकाएँ रासायनिक अभिक्रिया द्वारा बिजली उत्पन्न करती हैं और इनके उत्सर्जन में केवल जलवाष्प निकलती है। भविष्य में भारी ट्रकों, जहाजों और विमानों के लिए हाइड्रोजन ईंधन अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
 
भविष्य के शहरों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और इंटरनेट ऑफ थिंग्स महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे। सेंसरों का विशाल नेटवर्क शहर की प्रत्येक गतिविधि पर निगरानी रखेगा। ट्रैफिक सिग्नल, बिजली वितरण, जल आपूर्ति और कचरा प्रबंधन सभी प्रणालियाँ डेटा आधारित होंगी। यदि किसी क्षेत्र में प्रदूषण बढ़ेगा, तो प्रणाली स्वतः वाहनों का मार्ग बदल सकती है। यदि किसी पाइपलाइन में रिसाव होगा, तो सेंसर तुरंत सूचना दे देंगे। इससे संसाधनों की बर्बादी कम होगी और शहर अधिक कुशल बन सकेंगे।
 
जल प्रबंधन भविष्य के शहरों की सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक होगा। जलवायु परिवर्तन और बढ़ती आबादी के कारण दुनिया के अनेक शहर जल संकट का सामना कर रहे हैं। भविष्य में प्रत्येक इमारत में वर्षा जल संचयन और जल पुनर्चक्रण प्रणाली अनिवार्य हो सकती है। स्नान, रसोई और घरेलू उपयोग से निकलने वाले पानी को जैविक तथा रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा शुद्ध कर पुनः उपयोग किया जाएगा। वैज्ञानिक “मेम्ब्रेन फिल्ट्रेशन”, “रिवर्स ऑस्मोसिस” और “यूवी डिसइन्फेक्शन” जैसी तकनीकों को अधिक प्रभावी और सस्ती बनाने पर कार्य कर रहे हैं।समुद्री तट वाले शहरों के लिए समुद्री जल का विलवणीकरण भविष्य में एक महत्वपूर्ण समाधान बन सकता है। आधुनिक “डिसेलिनेशन” संयंत्र समुद्री जल से नमक अलग कर उसे पेयजल में बदल सकते हैं। हालाँकि यह प्रक्रिया अभी ऊर्जा-गहन है, लेकिन नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग से इसे अधिक टिकाऊ बनाया जा सकता है।
 
भविष्य के शहरों में हरियाली केवल सौंदर्य का प्रतीक नहीं होगी, बल्कि पर्यावरणीय आवश्यकता होगी। वैज्ञानिकों ने पाया है कि पेड़ वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर तापमान नियंत्रित करने में मदद करते हैं। इसके अतिरिक्त पौधे ध्वनि प्रदूषण कम करने और मानसिक स्वास्थ्य सुधारने में भी सहायक होते हैं। “अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव” आधुनिक शहरों की एक गंभीर समस्या है। कंक्रीट और डामर सूर्य की ऊष्मा को अवशोषित कर लेते हैं, जिससे शहर आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक गर्म हो जाते हैं। हरित क्षेत्र और वर्टिकल गार्डन इस प्रभाव को कम कर सकते हैं।
 
वर्टिकल फॉरेस्ट  ” की अवधारणा इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग है। इसमें बहुमंजिला इमारतों की बालकनियों और दीवारों पर हजारों पौधे लगाए जाते हैं। ये पौधे वातावरण से प्रदूषक अवशोषित करते हैं और तापमान नियंत्रित करने में सहायता करते हैं। भविष्य में शहरों की गगनचुंबी इमारतें कंक्रीट के जंगल नहीं, बल्कि जीवित हरित संरचनाएँ बन सकती हैं।
 
भविष्य के शहरों में कचरे को भी संसाधन के रूप में देखा जाएगा। वर्तमान समय में अधिकांश महानगरों के सामने ठोस कचरा प्रबंधन सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है। प्लास्टिक, भोजन अवशेष और इलेक्ट्रॉनिक कचरा पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। भविष्य की “सर्कुलर इकॉनमी” व्यवस्था में कचरे को पुनः उपयोग योग्य संसाधनों में बदला जाएगा। जैविक कचरे से बायोगैस और जैविक खाद बनाई जाएगी। प्लास्टिक का रासायनिक पुनर्चक्रण कर नए उत्पाद तैयार किए जाएँगे। इलेक्ट्रॉनिक कचरे से ताँबा, सोना और दुर्लभ धातुएँ पुनः प्राप्त की जा सकेंगी।
 
वैज्ञानिक “वेस्ट टू एनर्जी” तकनीकों पर भी तेजी से काम कर रहे हैं। इन तकनीकों में कचरे को ऊर्जा में बदला जाता है। नियंत्रित दहन, गैसीकरण और जैविक अपघटन प्रक्रियाओं के माध्यम से बिजली तथा ईंधन तैयार किए जा सकते हैं। इससे लैंडफिल पर निर्भरता कम होगी और मीथेन उत्सर्जन में कमी आएगी।भविष्य के शहरों में कृषि भी बदल जाएगी। “वर्टिकल फार्मिंग” और “हाइड्रोपोनिक्स” जैसी तकनीकों की सहायता से बहुमंजिला इमारतों के भीतर खेती की जा सकती है। हाइड्रोपोनिक्स में पौधों को मिट्टी के बिना पोषक घोल में उगाया जाता है। इससे पानी की खपत बहुत कम होती है और उत्पादन अधिक नियंत्रित रहता है। भविष्य में शहर अपने भीतर ही बड़ी मात्रा में ताजा भोजन उत्पन्न कर सकेंगे।
 
हालाँकि बिना पेट्रोल और बिना प्रदूषण वाली दुनिया बनाना आसान नहीं है। इसके सामने अनेक तकनीकी और आर्थिक चुनौतियाँ हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों के लिए लिथियम और कोबाल्ट जैसी धातुओं की आवश्यकता होती है, जिनके खनन से पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों की प्रारंभिक लागत अभी भी अधिक है। इसके अतिरिक्त तेजी से बढ़ती शहरी आबादी और अनियोजित विकास भी बड़ी बाधाएँ हैं।
 
भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह परिवर्तन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत की शहरी आबादी आने वाले दशकों में तेजी से बढ़ने वाली है। यदि भारतीय शहरों ने अभी से टिकाऊ विकास की दिशा नहीं अपनाई, तो प्रदूषण, जल संकट और ऊर्जा संकट भयावह रूप ले सकते हैं। भारत में सौर ऊर्जा मिशन, इलेक्ट्रिक बसें, मेट्रो रेल और स्मार्ट सिटी परियोजनाएँ इसी परिवर्तन की शुरुआत हैं। लेकिन वास्तविक सफलता तभी मिलेगी जब विकास की अवधारणा केवल आर्थिक वृद्धि तक सीमित न रहकर पर्यावरणीय संतुलन को भी प्राथमिकता देगी।
 
भविष्य का शहर केवल तकनीक का चमत्कार नहीं होगा। वह मानव और प्रकृति के बीच संतुलन की नई परिभाषा प्रस्तुत करेगा। वहाँ विकास का अर्थ केवल अधिक उत्पादन और अधिक उपभोग नहीं, बल्कि स्वच्छ हवा, सुरक्षित जल, हरित वातावरण और स्वस्थ जीवन होगा। संभव है कि आने वाली पीढ़ियाँ पेट्रोल पंपों को इतिहास की वस्तु के रूप में देखें। जिस प्रकार आज भाप इंजन संग्रहालयों में दिखाई देते हैं, उसी प्रकार पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहन भी भविष्य में अतीत की तकनीक बन सकते हैं।
 
मानव सभ्यता आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ उसके निर्णय आने वाले हजारों वर्षों का भविष्य तय करेंगे। विज्ञान और तकनीक ने हमें अपार शक्ति दी है, लेकिन अब वही विज्ञान हमें यह भी सिखा रहा है कि पृथ्वी की सीमाएँ हैं। यदि मानवता ने समय रहते स्वच्छ ऊर्जा, टिकाऊ विकास और पर्यावरण संतुलन को अपनाया, तो भविष्य के शहर केवल रहने की जगह नहीं होंगे, बल्कि वे विज्ञान, प्रकृति और मानव संवेदनाओं के सामंजस्य का जीवंत उदाहरण बन सकेंगे। तब शहरों की हवा धुएँ से नहीं, हरियाली से भरी होगी और मानव सभ्यता पहली बार सच अर्थों में विकास और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित कर पाएगी।
_______________________________________
 
डॉ दीपक कोहली , विशेष सचिव, उत्तर प्रदेश सचिवालय, 5/104, विपुल खंड, गोमती नगर, लखनऊ- 226010.
 


Please follow and like us:
Follow by Email
Facebook

Twitter

Visit Us
Follow Me
YOUTUBE

YOUTUBE
PINTEREST
LINKEDIN

Share
INSTAGRAM
SOCIALICON
READ MORE :  Coccidiosis in Chicken