भारत को देखता भूखा विश्व
तरुण श्रीधर
भोजन अब केवल एक आर्थिक वस्तु नहीं है; यह एक रणनीतिक संपत्ति और मानवीय दायित्व है। दुनिया भूखी है, और वह भारत की ओर देख रही है।
विश्व और भोजन पर युद्ध का साया गहराता जा रहा है। जब वैश्विक खाद्य व्यवस्था पर कोविड-19 महामारी के दिए घाव भरने ही लगे थे, यूक्रेन-रूस युद्ध असहज सामान्य स्थिति बन रहा था, कि और भयावह संघर्ष सामने हैं। ईरान के विरुद्ध अमेरिका और इजराइल के सैन्य अभियान, हार्मुज जलडमरूमध्य का बंद होना, लाल सागर के शिपिंग मार्गों में व्यवधान और पाकिस्तान व अफगानिस्तान के बीच खुला युद्ध, इन सबसे उपजी भू-राजनीतिक उथल-पुथल वैश्विक खाद्य और कृषि क्षेत्र द्वारा बड़ी मेहनत से बनाई गई स्थिरता को बिगाड़ रही है। इस बीच खाद्य सुरक्षा के प्रतीक के रूप में उभरे भारत के लिए इसके निहितार्थ चुनौती हैं तो अवसर भी।
रूस-यूक्रेन युद्ध से साफ हो गया था कि कैसे दुनिया के एक हिस्से का संघर्ष महाद्वीपों में खाद्य कीमतें बढ़ा सकता है। रूस और यूक्रेन का गेहूं निर्यात भाग विश्व का लगभग 30, जौ का 32 और सूरजमुखी तेल का 50 प्रतिशत से अधिक था। काला सागर अनाज गलियारा बाधित होने से अफ्रीका और पश्चिम एशिया के सबसे कमजोर देशों की खाद्य व्यवस्था हिल गई थी। भारत ने शुरू में गेहूं के एक विश्वसनीय वैकल्पिक स्रोत के रूप में आगे आने की पेशकश की थी, लेकिन मई 2022 में भीषण गर्मी के कारण घरेलू उत्पादन के पूर्वानुमान बिगड़े और निर्यात प्रतिबंध मजबूरी बना। दुनिया को कड़ा सबक यह मिला कि खाद्य कूटनीति के बेहतरीन इरादों को भी जलवायु की अनिश्चितता विफल कर सकती है ।
अब 2026 में, सबक अनसुने ही रह गए हैं। हॉर्मुज प्रभावी ढंग से अवरुद्ध है। यहां से दुनिया के लगभग 27 प्रतिशत तेल निर्यात, 20 प्रतिशत वैश्विक एलएनजी और एक-तिहाई यूरिया उर्वरक का व्यापार होता है। यहां से होती शिपिंग में 70 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है। साथ ही, लाल सागर भी हूतियों के कारण खतरनाक हो गया है। जहाज ‘केप ऑफ गुड होप’ के रास्ते भेजे जा रहे हैं, जिससे 10 से 15 दिन अधिक लग रहे हैं। माल ढुलाई की लागत दोगुनी हो गई है। समुद्री बीमा प्रीमियम निषेधात्मक हो गए हैं ।
भारत के लिए सबसे चिंताजनक प्रभाव बाधित उर्वरक आपूर्ति है। हम कृषि आयातित उर्वरकों पर बहुत अधिक निर्भर हैं। लगभग 90 प्रतिशत फास्फेटिक उर्वरक और 100 प्रतिशत पोटाश। भारत अपनी कुल उर्वरक आवश्यकता का लगभग 30 प्रतिशत आयात करता है, जिसमें पश्चिम एशिया की हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत है। कतर, यूएई और ओमान भारत के सल्फर आयात का लगभग 76 प्रतिशत हिस्सा देते हैं, जबकि कतर, सऊदी अरब और ईरान भारत को यूरिया निर्यात करने वाले शीर्ष तीन देश हैं। ये सभी हार्मुज के रास्ते आते हैं ।
चूंकि कतर ने एलएनजी का उत्पादन रोक दिया है और शिपिंग लागत दोगुनी हो गई है, भारत के उर्वरक क्षेत्र पर जून से शुरू होने वाले खरीफ सीजन से पहले संकट है। फरवरी 2026 तक वैश्विक यूरिया की कीमतें 600 अमेरिकी डालर प्रति टन को पार कर गई हैं। नाकाबंदी जारी रही, तो यूरिया और डीएपी की उपलब्धता बहुत कम हो सकती है। सरकारी खजाने पर उर्वरक सब्सिडी का बोझ और बढ़ेगा।
पाकिस्तान के, तालिबान के खिलाफ खुले युद्ध से सीमाएं बंद हैं। अफगानिस्तान के लिए यह विनाशकारी है। वहां पहले से ही 95 प्रतिशत घरों में पर्याप्त भोजन नहीं था। अब पाकिस्तान से गेहूं, आटा और चीनी की आपूर्ति बंद होने से करीब 1.74 करोड़ अफगान (जनसंख्या का 40 प्रतिशत) गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं ।
पाकिस्तान भी इससे अछूता नहीं है। 2026 में वहां गेहूं उत्पादन में 20 से 22 लाख टन की गिरावट की आशंका है। भारत ने पिछले वर्षों में मानवीय आधार पर अफगानिस्तान को 6 करोड़ टन से अधिक गेहूं भेजा है। क्या बढ़ती क्षेत्रीय अस्थिरता हमारी इस मदद को जारी रखने देगी?
विश्व खाद्य कार्यक्रम के 2026 के अनुमान बताते हैं कि दुनिया भर में 31.8 करोड़ लोग अधिक भूख का सामना कर रहे हैं, जो महामारी से पहले की संख्या से दोगुना है। इस सदी में पहली बार गाजा और सूडान के कुछ हिस्सों में अकाल की पुष्टि हुई है। वैश्विक भूख का 69 प्रतिशत हिस्सा युद्ध के कारण है। फरवरी 2026 में खाद्य मूल्य सूचकांक बढ़कर 125.3 अंक पर पहुंच गया है ।
इस निराशाजनक वैश्विक पृष्ठभूमि के विपरीत, भारत की कहानी असाधारण है। यहां 2024-25 में अनाज उत्पादन रिकार्ड 357.73 मिलियन टन रहा। चावल और गेहूं ने अब तक का उच्चतम उत्पादन दर्ज किया। डेयरी और मत्स्य पालन में भारत का दूध उत्पादन 248 मिलियन टन रहा, जो अमेरिका से दोगुना है। मछली उत्पादन पिछले दशक में 106 प्रतिशत बढ़ा है। कृषि और संबद्ध क्षेत्र का भारत की जीडीपी में 16 प्रतिशत योगदान देते हैं जो 46 प्रतिशत आबादी का आधार है। फरवरी 2026 में भारत सरकार ने मई 2022 से लगे गेहूं निर्यात प्रतिबंध को हटाने का निर्णय लिया है। भारत ने 25 लाख टन गेहूं और 5 लाख टन गेहूं उत्पादों के निर्यात की अनुमति दी है। यह रिकार्ड उत्पादन और आरामदायक स्टाक स्तर (निजी संस्थाओं के पास 75 मिलियन टन और केंद्रीय पूल में 182 मिलियन टन) के कारण संभव हुआ है । यह कदम भारत की खाद्य सुरक्षा की ताकत का एक शक्तिशाली संकेत है।
इसके बावजूद हमें अपनी नीतियों में कुछ बदलाव करने की आवश्यकता है। पहला यह कि उर्वरक सुरक्षा के लिए आयात पर निर्भरता कम करने के लिए आपूर्ति स्रोतों का विविधीकरण, बफर स्टाक और नैनो व जैविक उर्वरकों को बढ़ावा देना चाहिए। दूसरा यह कि खाद्य प्रसंस्करण को राष्ट्रीय सुरक्षा की तरह प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि बर्बादी रुके। तीसरा यह कि भारत को एक “खाद्य महाशक्ति” के रूप में खुद को स्थापित करना चाहिए और अपनी उत्पादन क्षमता का उपयोग कूटनीतिक और मानवीय उद्देश्यों के लिए करना चाहिए।
NB-यह महत्वपूर्ण लेख “भारत को देखता भूखा विश्व” प्रसिद्ध कृषि नीति विशेषज्ञ श्री तरुण श्रीधर द्वारा लिखा गया है, जो मूल रूप से दैनिक जागरण के 18 मई 2026 अंक में प्रकाशित हुआ था।
वैश्विक खाद्य सुरक्षा, कृषि कूटनीति एवं भारत की उभरती भूमिका पर आधारित इस विचारोत्तेजक लेख को जनहित एवं कृषि-पशुपालन क्षेत्र के पाठकों तक महत्वपूर्ण संदेश पहुँचाने के उद्देश्य से पशुधन प्रहरी में पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है।
मूल प्रकाशन एवं लेखक को पूर्ण श्रेय सहित।
(लेखक भारतीय खाद्य एवं कृषि परिषद के महानिदेशक और भारत सरकार के पूर्व सचिव हैं)



