मुर्गीपालन में सन्तुलित आहार का महत्व
डॉ. अरुणिमा सिंह1* एवं डॉ. प्रबुद्ध दुबे2
1पशु विकृति विज्ञान विभाग, पंडित दीनदयाल उपाध्याय पशुचिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय एवं गो-अनुसंधान संस्थान (डुवासु) मथुरा – 281001, उत्तर प्रदेश
2पशु प्रजनन, मादा रोग एवं प्रसूति विज्ञान विभाग, पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय (COVAS), मेरठ – 250110, उत्तर प्रदेश
*संपर्क लेखक: 001drarunima@gmail.com
मुर्गीपालन के धंधे में सन्तुलित आहार का विशेष महत्व है। जिस आहार पर पलने वाली मुर्गियाँ अधिक स्वस्थ रहें, उनकी बढ़ोतरी अच्छी हो और वे अण्डे अधिक दें, उसे ‘सन्तुलित आहार’ कहा जाता है। मुर्गीपालन पर कुल खर्च का करीब 80 प्रतिशत आहार पर ही निर्भर करता है। अतः इस व्यवसाय से लाभ या हानि मुर्गी के आहार पर ही निर्भर करती है। सफल मुर्गीपालन के लिए प्रायः मुर्गी की आयु तथा उत्पादन पर सन्तुलित आहार की व्यवस्था की जाती है। एक मुर्गी एक महीने में करीब चार किलो दाना खाती है और 15–20 अण्डे देती है। इस प्रकार सात-आठ रुपये का आहार खिलाकर नौ से दस रुपये मूल्य के अण्डे प्राप्त किये जा सकते हैं। अतः एक मुर्गी से प्रति माह एक से दो रुपये की आय सहज ही प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार अगर मुर्गीपालक भाई एक हजार अण्डा देने वाली मुर्गी रखकर मुर्गीपालन करना चाहें तो केवल अण्डे से एक हजार से दो हजार रुपये की आमदनी अपनी खेती-बारी के धन्धे के अतिरिक्त प्राप्त कर सकते हैं।
एक दिन के चूजे से अण्डा शुरू करने की उम्र तक एक मुर्गी 10 किलो दाना खाती है। एक मुर्गी प्रतिदिन 110 ग्राम सन्तुलित दाना खाती है और इस तरह एक साल तक अण्डा उत्पादन के लिए 50 किलो दाने की खपत होती है। यद्यपि मुर्गियों का मुख्य आहार उनकी विभिन्न जातियों पर निर्भर करता है। मुर्गियों के खाने में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, खनिज, विटामिन एवं पानी का होना आवश्यक है।
प्रोटीन : यह ऊतकों के निर्माण और अण्डों के उत्पादन के लिए आवश्यक अमीनो अम्ल प्रदान करता है। यदि 2 किलोग्राम दाना प्रतिदिन करने वाली मुर्गी रोजाना एक अण्डा देती हो तो उसे प्रतिदिन 18 ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता होती है। कुछ अमीनो अम्ल ऐसे होते हैं जो शरीर नहीं बना सकता, परन्तु इनका आहार में होना नितान्त आवश्यक है, अन्यथा शरीर रोगग्रस्त हो जाता है। मुर्गियों के लिए आवश्यक ऐसे ग्यारह अम्लों में से केवल तीन ऐसे हैं जो आहार के अन्दर जरूरत से कम मात्रा में पाए जाते हैं। ये लाइसिन, मिथियोनिन तथा ट्रिप्टोफैन हैं। जानवरों से प्राप्त खाद्य पदार्थों में इन अम्लों की मात्रा ज्यादा होती है।
कार्बोहाइड्रेट : इसका मुख्य कार्य शरीर के लिए ऊर्जा तथा शक्ति प्रदान करना है। इनके अलावा ये अमीनो अम्ल, वसा तथा कुछ अन्य पदार्थ बनाने के काम भी आते हैं।
वसा : वसा से कार्बोहाइड्रेट की तुलना में कई गुना ज्यादा ऊर्जा प्राप्त होती है। वसा में आवश्यक अम्ल पाए जाते हैं, जो शरीर के काम आते हैं। लेकिन इन अम्लों का शरीर को कम जरूरत पड़ती है। यही कारण है कि आहार बनाते समय वसा पर कोई खास ध्यान नहीं रखा जाता है।
खनिज : अण्डे में छिलके तथा शरीर की हड्डियाँ बनने में खनिज का बहुत महत्व है। अतः मुर्गीपालक भाई अगर अण्डे के छिलके बहुत पतले पायें तो खनिज चूर्ण (कैल्सियम) के स्रोत मिला दें। ये मुर्गियों को कैल्सियम प्राप्ति के मुख्य स्रोत हैं—शेल ग्रिट, लाइमस्टोन, संगमरमर के टुकड़े, इत्यादि।
विटामिन : मुर्गियों के स्वास्थ्य, वृद्धि, प्रजनन एवं उत्पादन के लिए इनकी आवश्यकता होती है। आहार में इनकी कमी होने से अनेक बीमारियाँ हो जाती हैं। विटामिन मुर्गियों के खाये गये आहार को पचाने में मदद करते हैं।
पानी : यह भी अन्य खाद्य के समान ही आवश्यक है। गर्मियों में पानी दो-तीन बार बदलते रहने पर मुर्गियों को ठण्डा पानी मिल सकता है। इससे वे ऊँचे तापक्रम को अच्छी तरह सहन कर सकती हैं।
उपयुक्त तत्वों के अलावा चूजों के आहार में कॉक्सीडियोस्टेट मिलाया जाता है, जो खूनी दस्त की बीमारी से चूजों को बचाता है। भारतीय मानक संस्थान (आई० एस० आई०) के अनुसार आहार में प्रोटीन की मात्रा चूजों, ग्रोवर एवं अण्डा देने वाली मुर्गी में क्रमशः 20, 16 एवं 15 प्रतिशत होनी चाहिए।
मुर्गीपालक भाई मुर्गियों को हरी सब्जियाँ, जैसे—गोभी का पत्ता, पालक और बरसीम देकर विटामिन की कमी को पूरा कर सकते हैं। प्रति मुर्गी को एक औंस से ज्यादा हरी साग-सब्जियाँ नहीं दी जाती हैं।
असन्तुलित आहार देने से निम्नलिखित हानियाँ होती हैं :
- अण्डों के उत्पादन में कमी।
- मुर्गियों की वृद्धि में कमी।
- मृत्यु दर में वृद्धि।



