“जलीय जीवों का जीवन-संकट और संरक्षण”
–डॉ दीपक कोहली-
पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति का प्रथम संकेत जलीय माध्यम से मिलता है। सूक्ष्म प्रोटोज़ोआ से लेकर विशाल मछली-प्रजातियों, समुद्री स्तनधारियों और प्रवाल-भित्तियों तक, जल आधारित पर्यावरण में जीवन की असंख्य आकृतियाँ पाई जाती हैं। जलीय परितंत्र अत्यंत जटिल जैव-विन्यास पर आधारित होते हैं, जिनमें पोषण-शृंखला, ऊर्जा-प्रवाह, घुलित प्राणवायु मात्रा, लवणता, ताप-स्तर, प्रकाश प्रवेश, जलप्रवाह की गति और तलछट संरचना जैसे कई वैज्ञानिक घटक संतुलन बनाए रखते हैं। किंतु वर्तमान शताब्दी में इन वैज्ञानिक घटकों में तीव्र परिवर्तन जलीय जीवों के अस्तित्व के लिए गहरी चुनौती बनकर उभरा है। जलीय जीवों का संसार अत्यंत विशाल है, खारे और मीठे दोनों प्रकार के जल में फैला एक रंगीन, जटिल और अपनी अंतर्निहित लय में गतिशील जगत। इन जीवों में सूक्ष्म प्लवक से लेकर विशालकाय व्हेल तक, चमकदार कोरल से लेकर पारदर्शी जेलिफ़िश तक, सतह पर तैरते जलपक्षियों से लेकर तलहटी में छिपकर रहने वाले केकड़ों तक, प्रत्येक जीवन अपनी विशिष्ट भूमिका निभाता है। यह संसार जितना रहस्यमय है, उतना ही कई प्रकार के संकटों से घिरा है, और दुर्भाग्य यह है कि इन संकटों के मूल में मनुष्य-निर्मित कारण ही सबसे अधिक पाए जाते हैं।
एक समय था जब नदियाँ, झीलें और समुद्र स्वच्छ, पारदर्शी और जीवनदायी थे। इन जलस्रोतों में रहने वाले जीव अपनी स्वाभाविक लय के साथ फलते-फूलते थे। लेकिन जैसे-जैसे सभ्यता का विस्तार हुआ, मनुष्य ने इन्हीं जलस्रोतों को अपनी सुविधाओं और विकास के लिए उपयोग करना शुरू कर दिया। यह उपयोग धीरे-धीरे दुरुपयोग में बदल गया और आज स्थिति यह है कि दुनिया की लगभग सभी प्रमुख नदियाँ प्रदूषण से जूझ रही हैं, समुद्री तट प्लास्टिक और रसायनों से पटे पड़े हैं, और कई जलीय प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर पहुँच चुकी हैं। प्रदूषण का यह रूप केवल सतह पर तैरते कचरे तक सीमित नहीं है; यह जल की गहराई में पहुंचकर उन जीवों को भी प्रभावित करता है जिन्हें हम देख भी नहीं सकते। कीटनाशक, घरेलू अपशिष्ट, औद्योगिक रसायन और शहरों का मल-जल मिलकर जल को विषाक्त बना देते हैं। यह विषाक्तता मछलियों के शरीर में प्रवेश कर उनके तंत्रिका तंत्र, प्रजनन क्षमता और प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देती है।
समुद्रों में बढ़ता प्लास्टिक एक गम्भीर वैश्विक संकट बन चुका है। लाखों समुद्री जीव प्रत्येक वर्ष प्लास्टिक को भोजन समझकर निगल लेते हैं। समुद्री कछुए अक्सर प्लास्टिक की थैलियों को जेलीफ़िश समझकर खा लेते हैं और धीरे-धीरे दम घुटने या पाचन तंत्र के अवरुद्ध होने से मर जाते हैं। कई मछलियाँ और पक्षी प्लास्टिक रिंग्स में उलझकर घायल हो जाते हैं या उनकी गति बाधित हो जाती है। प्लास्टिक के सूक्ष्म कण ‘माइक्रोप्लास्टिक्स’ के रूप में समुद्री जल में फैल रहे हैं, जो खाने की श्रृंखला में प्रवेश कर अंततः मनुष्य तक पहुँच जाते हैं। शोध बताते हैं कि अब समुद्र के लगभग हर हिस्से में माइक्रोप्लास्टिक मिल रहे हैं, चाहे वह गहराई में हो या ध्रुवीय क्षेत्रों के आसपास।
केवल प्रदूषण ही नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन भी जलीय जीवन के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है। बढ़ते वैश्विक तापमान का सीधा असर महासागरों पर पड़ रहा है। समुद्रों का तापमान बढ़ने से कोरल रीफ़ सबसे पहले प्रभावित होते हैं। ये कोरल समुद्री जैव विविधता के केंद्र होते हैं—हजारों जीवों का निवास-स्थान। लेकिन जब तापमान बढ़ता है, तो ये कोरल धीरे-धीरे सफेद होकर मरने लगते हैं, जिसे ‘कोरल ब्लीचिंग’ कहा जाता है। पिछले दो दशकों में कोरल ब्लीचिंग की घटनाएँ बहुत बढ़ी हैं, जिसके कारण अनेक समुद्री प्रजातियाँ अपने घरों से बेघर हो रही हैं। इसी प्रकार, झीलों और नदियों में तापमान बढ़ने से पानी में घुली हुई ऑक्सीजन कम होने लगती है। जब ऑक्सीजन की मात्रा बहुत कम हो जाती है, तो हजारों मछलियाँ एक साथ मर जाती हैं—इसे ‘फिश किल’ कहा जाता है।
अत्यधिक दोहन भी जलीय जीवन संकट का महत्वपूर्ण कारण है। मनुष्य ने भोजन और व्यापार के लिए समुद्रों का अत्यधिक शोषण किया है। पहले जहाँ पारंपरिक तरीकों से मछली पकड़ना होता था, वहीं अब बड़े-बड़े जहाज़ों और आधुनिक उपकरणों द्वारा टनों मछलियाँ एक साथ पकड़ ली जाती हैं। कई बार वे मछलियाँ भी पकड़ी जाती हैं जो अभी प्रजनन योग्य नहीं होतीं, जिससे अगली पीढ़ी की संख्या कम होती जाती है। ट्रॉलिंग जैसी विधियाँ समुद्री तल पर मौजूद नाजुक पारिस्थितिकी को नुकसान पहुँचाती हैं और कई प्रजातियों के आवास नष्ट कर देती हैं। कुछ समुद्री क्षेत्रों में मछलियों की आबादी इतनी घट चुकी है कि वैज्ञानिक उनके पुनर्स्थापन को कठिन मानते हैं।
नदियों में रहने वाली प्रजातियाँ भी गंभीर संकट का सामना कर रही हैं। बड़े-बड़े बाँधों ने नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बदल दिया है। कई मछलियाँ प्रवासी होती हैं—वे प्रजनन के लिए लंबी दूरी तय करती हैं। जब उनके मार्ग में बाँध आ जाते हैं, तो उनकी जीवन-चक्र रुक जाता है। भारत की गंगा नदी में मिलने वाली कई मछलियों की संख्या इसी कारण तेजी से घट रही है। नदी तल में जमा गाद, अवैध खनन और तटों पर अतिक्रमण भी नदी के प्राकृतिक आवास को नुकसान पहुँचाते हैं। शहरीकरण और औद्योगीकरण ने नदियों को एक तरह से अपशिष्ट-वाहिनी में बदल दिया है।
जलीय वातावरण में बढ़ते प्रदूषण और तापमान के कारण नए रोग भी फैल रहे हैं। सूक्ष्मजीव और विषैले शैवाल तेजी से पनप रहे हैं। कई बार समुद्रों और झीलों की सतह पर हरे, लाल या भूरे रंग की मोटी परत जम जाती है, जिसे ‘हॉर्मफुल एल्गल ब्लूम’ कहा जाता है। यह परत धूप को नीचे जाने से रोकती है और पानी में ऑक्सीजन की कमी पैदा कर देती है। परिणामस्वरूप, बड़े पैमाने पर जीव मर जाते हैं और पूरा पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है। कई मछलियाँ और शंख-घोंघे इन विषैले शैवालों के संपर्क में आने से बीमार पड़ जाते हैं या पूरी आबादी नष्ट हो जाती है।
इन चुनौतियों के बीच सबसे बड़ी चिंता यह है कि जलीय जीव केवल जल में बसे हुए प्राणी नहीं हैं—वे पृथ्वी की संपूर्ण पारिस्थितिकी को प्रभावित करते हैं। समुद्रों में रहने वाले प्लवक पृथ्वी की लगभग आधी ऑक्सीजन बनाते हैं। मछलियाँ और अन्य जीव कार्बन चक्र को संतुलित रखते हैं। नदियाँ और झीलें जलचक्र का आधार हैं और इनके जीव इस चक्र को स्वाभाविक बनाए रखते हैं। यदि जलीय जीवन संकट में पड़ता है, तो इसका सीधा असर खाद्य श्रृंखला, जलवायु, तटीय अर्थव्यवस्था और मानव स्वास्थ्य पर पड़ता है।
अब प्रश्न यह है कि इस स्थिति से बाहर कैसे निकला जाए। सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम है—जलस्रोतों को प्रदूषण-मुक्त करना। औद्योगिक अपशिष्ट को उपचारित किए बिना नदियों में छोड़ने पर कड़ी रोक लगानी चाहिए। शहरों के सीवर सिस्टम को आधुनिक बनाना और गांवों में भी स्वच्छता-व्यवस्था को मजबूत करना आवश्यक है। प्लास्टिक के उपयोग में कमी लाना और समुद्र तटों की नियमित सफाई करना भी अत्यंत जरूरी है। स्कूलों और समुदायों में जागरूकता कार्यक्रम इस दिशा में बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
समुद्रों में संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार भी एक व्यवहारिक और सफल समाधान है। ऐसे क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की मछली पकड़ने या खनन गतिविधि की अनुमति नहीं होती। विश्व के कई हिस्सों में यह तरीका अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुआ है, क्योंकि इससे समुद्री जीवन को पुनर्जीवित होने में मदद मिलती है। इन संरक्षित क्षेत्रों में मछलियाँ और अन्य जीव सुरक्षित प्रजनन कर पाते हैं, जिससे उनसे सटे क्षेत्रों में भी जैव विविधता बढ़ती है।
टिकाऊ मत्स्य-प्रबंधन जलीय जीवन के संरक्षण का एक अन्य महत्वपूर्ण स्तंभ है। मछली पकड़ने के कोटा निर्धारित करना, प्रजनन-काल में मछली पकड़ने पर पूर्ण रोक लगाना, और बड़े जालों के उपयोग पर नियंत्रण आवश्यक है। पारंपरिक और कम विनाशकारी तरीकों को बढ़ावा देने से समुद्री पारिस्थितिकी को नुकसान कम होता है। वैज्ञानिक समुदाय और स्थानीय मछुआरा समुदाय मिलकर ऐसी नीतियाँ बना सकते हैं जो पारिस्थितिकी और आजीविका दोनों को सुरक्षित रखें।
नदियों के संदर्भ में, नदी-पुनरुद्धार कार्यक्रम अत्यंत आवश्यक हैं। नदी किनारों पर हरियाली बढ़ाना, अवैध खनन पर रोक लगाना और तटों पर अतिक्रमण हटाना नदियों को पुनर्जीवित करता है। जहाँ संभव हो, वहाँ बाँधों में ‘फिश पास’ बनाए जाने चाहिए ताकि प्रवासी मछलियाँ प्रजनन के लिए अपने प्राकृतिक मार्ग पर चल सकें। कुछ देशों में यह प्रयोग अत्यंत सफल रहा है और भारत में भी इसे अपनाया जा रहा है।
संरक्षण की इस प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। समुद्री और नदी किनारे रहने वाले लोग अपने प्राकृतिक परिवेश को सबसे अधिक समझते हैं। उनके अनुभव और पारंपरिक ज्ञान का उपयोग संरक्षण योजनाओं में किया जाए, तो परिणाम अधिक प्रभावी होते हैं। उन्हें संरक्षण के लाभों से अवगत कराना और विकल्प आधारित आजीविका उपलब्ध कराना संरक्षण को स्थायी बनाता है। कई देशों में ‘कम्युनिटी-लेड मरीन कन्ज़र्वेशन’ मॉडल अत्यंत सफल रहे हैं।
अंततः, जलीय जीवों का संरक्षण केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह मानव सभ्यता के अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है। यदि हम नदियों, झीलों और समुद्रों में रहने वाले प्राणियों को बचाते हैं, तो हम स्वयं को बचाते हैं। समुद्रों का स्वास्थ्य मौसम को नियंत्रित करता है, नदियों का स्वास्थ्य कृषि को, और जलीय जीवों का स्वास्थ्य हमारी खाद्य-श्रृंखला को। इसलिए इस दिशा में लिया गया प्रत्येक कदम मानवता के भविष्य की सुरक्षा का कदम है। आज आवश्यकता है कि समाज, सरकारें, वैज्ञानिक और समुदाय, सभी मिलकर यह समझें कि जलीय जीवन का संरक्षण प्रकृति के प्रति हमारा कर्तव्य ही नहीं, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। जब जल स्वच्छ होगा, जीव स्वस्थ होंगे, पारिस्थितिकी संतुलित होगी और पृथ्वी अपने वास्तविक रूप में धड़कने लगेगी। यही संरक्षण का वास्तविक उद्देश्य है—एक ऐसा जलमय संसार, जिसमें प्रत्येक जीव को अपना स्थान, अपना जीवन और अपनी प्राकृतिक लय प्राप्त हो।
प्रेषक: डॉ दीपक कोहली ,विशेष सचिव, उत्तर प्रदेश सचिवालय, 5/104, विपुल खंड, गोमती नगर, लखनऊ- 226010 ( मोबाइल- 6389005559)



