थनिला रोग पशुपालकों के लिए एक गंभीर और आर्थिक समस्या

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थनिला रोग पशुपालकों के लिए एक गंभीर और आर्थिक समस्या

हरी राम मीना1, करिश्मा मीना2, राजकमल मीना3, मानवेन्द्र सिंह4, मनि‍षा मीना5

1,4 पशु आनुवंशिकी एवं प्रजनन विभाग, राजस्थान पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, बीकानेर

  1. पशु औषधि विज्ञान, विभाग, राजस्थान पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, जोबनेर, जयपुर
  2. पशु पोषण विभाग, राजस्थान पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, बीकानेर
  3. पशु प्रसूति विज्ञान, राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थानकरनाल, हरियाणा

परिचय :-

थनिला रोग (मास्टाइटिस) एक बहु-कारक (multifactorial) रोग है, जो पशुओं की देखभाल की प्रणाली और उनके रख-रखाव के वातावरण से सीधा जुड़ा होता है। यह पशुओं के थन (udder) में सूजन (inflammation) की स्थिति है, जिसमें दूध का रंग और गाढ़ापन (consistency) बदल जाता है। ये कीटाणु पशुओं के शरीर, थन, या उसके आसपास के वातावरण जैसे कि गंदगी, गोबर, मिट्टी, चारा, पानी, पौधे, और दूध निकालने वाले उपकरणों पर पाए जाते हैं। इस बीमारी में दूध उत्पादन अचानक कम हो जाता है, जिससे डेयरी किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।

अच्छी बात यह है कि दूध को उबालने या पास्चुरीकरण करने से ये हानिकारक कीटाणु मर जाते हैं और मनुष्यों को नुकसान नहीं पहुंचाते। लेकिन अगर दूध को बिना अच्छी सफाई के या कच्चा (raw) इस्तेमाल किया जाए, तो यह स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है।

 

मास्टाइटिस होने के प्रमुख कारण – 

इसके दो मुख्य कारण होते हैं – संक्रमण और चोट।

  • संक्रमण (Infection)
  • चोट (Injury)

संक्रमण (Infection)

मास्टाइटिस अधिकतर बैक्टीरिया के संक्रमण के कारण होता है। दो मुख्य बैक्टीरिया (Streptococcus agalactiae, Staphylococcus aureus) जो इस रोग को फैलाते हैं, ये बैक्टीरिया गंदे बिछावन (bedding), गंदे थन डिप (teat dips), या दूषित दूध निकालने वाले उपकरणों से थनों में पहुंच जाते हैं।

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जब ये बैक्टीरिया थनों में पहुंचते हैं, तो शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली (immune system) उनसे लड़ने के लिए प्रतिक्रिया करती है, जिससे थन में सूजन हो जाती है और मास्टाइटिस हो जाता है।

चोट (Injury)

थनों में चोट लगने से भी मास्टाइटिस हो सकता है। यह चोट कई प्रकार की हो सकती है।

  • शारीरिक चोट (Physical):जैसे किसी और जानवर के सींग या पैर से चोट लगना
  • रासायनिक चोट (Chemical):जैसे गलत दवा या थन डिप का उपयोग
  • मशीन से लगी चोट (Mechanical):जैसे दूध निकालने वाली मशीन का गलत इस्तेमाल
  • गर्मी या ठंड से हुई चोट (Thermal):जैसे बहुत ठंडा या गरम वातावरण
  • चोट लगने पर थनों की त्वचा और अंदरूनी हिस्से कमजोर हो जाते हैं, जिससे बैक्टीरिया आसानी से अंदर जा सकते हैं और संक्रमण पैदा कर सकते हैं।

मास्टाइटिस के लक्षण

  • यदि किसी पशु को मास्टाइटिस हो गया है, तो उसमें निम्नलिखित लक्षण दिखाई देते हैं:
  • थन में सूजन– थन गर्म, लाल, सख्त और दर्दनाक हो जाते हैं।
  • थन को छूने नहीं देना– पशु थन छूने पर लात मारने लगती है, या परेशान हो जाती है।
  • दूध में खूनका आना– दूध में खून की हल्की मिलावट के कारण उसका रंग हल्का गुलाबी या लाल दिखाई देता है।
  • दूध कारंग तथा गंध बदल जाना – दूध में पीला या भूरा तरल, झाग या गांठें (clots/flakes) मिलती हैं और उसमें बदबू आती है।
  • दूध की मात्रा में कमीआना – दूध उत्पादन अचानक कम हो जाता है।

मास्टाइटिस के आर्थिक प्रभाव :

  • दूध उत्पादन में कमी– मास्टाइटिस से ग्रसित पशु कम दूध देती है, जिससे किसान की आय घट जाती है।
  • बछड़ों की ग्रोथ पर असर– दूध कम होने से बछड़े को पूरा पोषण नहीं मिल पाता, जिससे उसका वजन ठीक से नहीं बढ़ता।
  • दुग्ध उत्पादनों में घाटा– दूध की कमी से पनीर, घी जैसे उत्पाद बनाने में भी नुकसान होता है।
  • फार्म की कुल लाभ में गिरावट– कम दूध और कमजोर बछड़े की वजह से पूरे पशुपालन व्यवसाय की कमाई प्रभावित होती है।
  • पशुओंकी प्रजनन क्षमता पर असर – मास्टाइटिस पशुओं की गर्भधारण दर (first service conception) कम करता है और हीट साइकल में देरी लाता है, जिससे प्रजनन चक्र बिगड़ता है।
  • लंबी अवधि का आर्थिक नुकसान– बार-बार मास्टाइटिस होने से इलाज, दवा और देखभाल की लागत बढ़ती है, जिससे फार्म को लम्बे समय में भारी आर्थिक हानि होती है।
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मास्टाइटिस से प्रबंधन द्वारा बचाव के मुख्य उपाय :-

  • कंक्रीट फर्श से बचें– पशुओं को नरम बिछावन (भूसा, बुरादा या रेत) पर रखें।
  • शेड को साफ और सूखा रखेंक्योंकि गंदगी से बैक्टीरिया पनपते हैं।
  • दूध निकालने से पहले और बाद में हाथ और थन धोएं।
  • हर बार मशीन, बर्तन और टेट कप को अच्छे से साफ करें।
  • पहले स्वस्थ और अंत में बीमार पशुओं का दूध निकालें।
  • नये पशुओं का दूध अलग निकालें और CMT टेस्ट से जांच करें।
  • दूध निकालने के बाद पशु को बैठने न दें, चारा दें।
  • थनों को चोट और मक्खियों से बचाएं, बार-बार बीमारपशुओं को अलग रखें।

मास्टाइटिस के नियंत्रण के उपाय :-

  • लक्षण दिखते ही इलाज शुरू करें– जैसे ही मास्टाइटिस के लक्षण दिखाई दें, तुरंत किसी पशु चिकित्सक से संपर्क करें और उचित एंटीबायोटिक इलाज कराएं।
  • बीमार पशु को अलग रखें– संक्रमित पशु को अन्य स्वस्थ पशुओं से अलग रखें ताकि संक्रमण न फैले।
  • बछड़े को संक्रमित थन चूसने न दें– इससे बछड़े को भी संक्रमण हो सकता है।
  • संक्रमित दूध को ठीक से निकालें और नष्ट करें– संक्रमित थन से दिन में तीन बार दूध निकालें और उसे पर्यावरण को दूषित किए बिना फेंकें।
  • दूषित दूध के नष्ट करने में सावधानी– दूध में 5% फिनोल मिलाकर उसे सही तरीके से नष्ट करें।
  • न ठीक होने वाले थन को सुखा दें– जो थन इलाज के बाद भी ठीक न हो, उसे स्थायी रूप से सुखा (dry) देना चाहिए।
  • दूध निकालने की मशीन की नियमित जांच और रिकॉर्ड रखें– थन कप लाइनर समय पर बदलें और सभी इलाजों का रिकॉर्ड बनाए रखें।

मास्टाइटिस की पहचान और इलाज :-

  • झुंड की नियमित जांच करेंसब-क्लिनिकल और क्लिनिकल मास्टाइटिस का समय पर पता लगाने के लिए रूटीन जांच जरूरी है।
  • कैलिफोर्निया मास्टाइटिस टेस्ट (CMT)का उपयोग करके प्रारंभिक जांच की जा सकती है।
  • इसके बादसॉमैटिक सेल काउंट (Somatic Cell Count) और बैक्टीरियल कल्चर जैसे परीक्षण किए जाते हैं।
  • अन्य जांचों मेंELISA, बैक्टीरियल कल्चर और मल्टीप्लेक्स PCR टेस्ट शामिल हैं।
  • बीमारी की पुष्टि होने परउचित एंटीबायोटिक दवाओं से इलाज करना चाहिए, जो पशु चिकित्सक की सलाह से हो।
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निष्कर्ष (Conclusion):

  • मास्टाइटिस कई प्रकार के बैक्टीरिया के कारण होता है और कुछ मामलों में यह अपने आप भी ठीक हो सकता है।
  • सब-क्लिनिकल मास्टाइटिस के लिए कई बार थन में दी जाने वाली एंटीबायोटिक दवाएं असरदार होती हैं, लेकिन इलाज की लागत पर झुंड की स्थिति का असर पड़ता है।
  • इलाज शुरू करने से पहले दूध की जांच (मिल्क कल्चर) जरूरी है ताकि यह पता चल सके कि कौन-सा बैक्टीरिया जिम्मेदार है।
  • मास्टाइटिस काजल्दी पता लगाना और उसका सही तरीके से प्रबंधन करना डेयरी पशुओं के स्वास्थ्य और उत्पादन के लिए बहुत जरूरी है।
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