पशुओं में होने वाले परजीवी रोग एवं उनका प्रबंधन

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 पशुओं में होने वाले परजीवी रोग एवं उनका प्रबंधन

               डॉ. प्रबुद्ध दुबे* एवं डॉ. शुभम दीप चौधरी
              पशु प्रजनन, मादा रोग एवं प्रसूति विज्ञान विभाग
        पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय (COVAS), मेरठ – 250110

              *संपर्क लेखक: prabuddhdubey16@gmail.com

परजीवी वे जीव हैं जो अपने भोजन एवं चयापचय के लिए दूसरे जीव पर निर्भर रहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं—

  1. बाह्य परजीवी (Ectoparasites): जो शरीर की बाह्य त्वचा पर पाए जाते हैं, जैसे—किलनी, पिस्सू आदि।
  2. अंतः परजीवी (Endoparasites): जो शरीर के भीतर पाए जाते हैं, जैसे—कृमि अथवा रक्त में पाए जाने वाले प्रोटोजोआ।

गौवंशीय पशुओं में पर्णकृमि (Liver Fluke)

  • यकृत (Liver) में पाए जाने वाले पर्णकृमि पशु का रक्त चूसते हैं, जिससे पशु को कब्ज तथा बाद में दस्त की समस्या हो जाती है।
    • आंतों के पर्णकृमि पतले दस्त का कारण बनते हैं।
    नियंत्रण: यह रोग घोंघों (Snails) द्वारा फैलता है। अतः तालाब अथवा पोखरों के पानी में उपयुक्त रसायन डालकर घोंघों का नियंत्रण करें तथा जलाशयों के चारों ओर बाड़ लगाएँ।

फीताकृमि (Tapeworm)

  • यह पशु की आंतों में पाया जाता है। इसके खंड गोबर के साथ बाहर निकलते हैं, जो पके हुए चावल जैसे दिखाई देते हैं।
    नियंत्रण: गोबर की जाँच निकटतम पशु चिकित्सालय में कराएँ।

गोलकृमि एवं चमड़ी के रोग

  • चमड़ी में घाव होने पर उसमें से रक्त बहता है, जिससे मक्खियाँ आकर्षित होती हैं और संक्रमण फैलाती हैं।
    • बछड़ों में टॉक्सोकेरा (Toxocara) के कारण बदबूदार दस्त होते हैं।
    • एक माह की आयु में बछड़ों को कृमिनाशक दवा दें तथा 3–4 माह बाद पुनः कृमिनाशक दवा दें।
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प्रोटोजोआ जनित रोग

  1. सूर्रा (Surra)

यह रोग रक्त चूसने वाली मक्खियों द्वारा फैलता है। प्रभावित पशु को चक्कर आते हैं, बुखार रहता है तथा वह अंधे जैसा व्यवहार करने लगता है। समय-समय पर रक्त की जाँच कराएँ।

  1. थायलेरियोसिस (Theileriosis)

यह रोग संकर नस्ल के पशुओं में अधिक पाया जाता है।

लक्षण:
• बुखार
• रक्ताल्पता (एनीमिया)
• लसीका ग्रंथियों में सूजन

बचाव:
• किलनियों (Ticks) का नियंत्रण करें।
रक्षा-वैक-टी (Raksha-Vac-T) टीका 2 माह से अधिक आयु के पशुओं को प्रतिवर्ष लगवाएँ।

  1. रक्तमूत्रता (Hematuria)

वयस्क पशुओं में मूत्र के साथ रक्त आता है।

बचाव:
• पशु गृह की दरारों को भर दें।
• आसपास की घास जला दें ताकि किलनियाँ न पनपें।

गर्भपात एवं अन्य संक्रमण

  • चौथे महीने से पहले गर्भपात ट्राइकोमोनास (Trichomonas) के कारण हो सकता है। अतः संक्रमित सांड का प्रजनन में उपयोग न करें।
    • कुत्ते एवं बिल्लियों के मल से नियोस्पोरा (Neospora) तथा टॉक्सोप्लाज़्मा (Toxoplasma) का संक्रमण फैल सकता है। इसलिए फार्म पर कुत्तों को दूर रखें तथा उनके मल को तुरंत साफ करें।

समग्र नियंत्रण एवं प्रबंधन

सभी परजीवी रोगों के प्रभावी नियंत्रण हेतु समय-समय पर पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार कृमिनाशक दवाओं का उपयोग करें तथा पशु गृह की नियमित सफाई एवं स्वच्छता बनाए रखें।

 

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