दुग्ध पशुओं में हीट स्ट्रेस न्यूनीकरण हेतु रणनीतियाँ

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दुग्ध पशुओं में हीट स्ट्रेस न्यूनीकरण हेतु रणनीतियाँ

आनंद कुमार जैन,  आदित्य मिश्रा, अनिल गट्टानी, संजु मण्डल,  प्रगति पटेल और पूर्णिमा सिंह

 पशु शरीर क्रिया  विज्ञान और जैव रसायन विभाग

पशु  चिकित्सा और पशु पालन महाविद्यालय  जबलपुर मध्य प्रदेश  

परिचय:
गर्मी का मौसम विशेष रूप से दुग्ध पशुओं के लिए एक बड़ी चुनौती प्रस्तुत करता है। उच्च तापमान और आर्द्रता के कारण पशु हीट स्ट्रेस (Heat Stress) से प्रभावित होते हैं, जिससे दूध उत्पादन, प्रजनन क्षमता और पशुओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। हीट स्ट्रेस के दौरान पशु शरीर का तापमान नियंत्रित नहीं कर पाते और शारीरिक प्रक्रियाएँ बाधित हो जाती हैं। अतः हीट स्ट्रेस का प्रभावी प्रबंधन दुग्ध उत्पादन को बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

हीट स्ट्रेस से होने वाले दुष्प्रभाव

  • दूध उत्पादन एवं दुग्ध की गुणवत्ता में कमी

हीट स्ट्रेस से होने वाले दुष्प्रभाव

दुग्ध पशुओं पर हीट स्ट्रेस का प्रतिकूल प्रभाव सीधे उनके दूध उत्पादन, स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता पर पड़ता है। इसके मुख्य दुष्प्रभाव निम्नलिखित हैं –

  1. दूध उत्पादन एवं गुणवत्ता में कमी
  • दूध की मात्रा घट जाती है।
  • वसा, प्रोटीन एवं लैक्टोज़ की मात्रा कम हो जाती है।
    1. चारे एवं पानी का सेवन घट जाना
  • पशु भूख कम कर देते हैं।
  • पानी की खपत बढ़ जाती है लेकिन चारे की खपत घटती है।
    1. शारीरिक परिवर्तनों में वृद्धि
  • श्वसन दर (Respiration Rate) और हृदय गति (Heart Rate) बढ़ जाती है।
  • शरीर का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है।
    1. प्रजनन दक्षता में कमी
  • हीट स्ट्रेस के कारण प्रजनन चक्र (Estrous cycle) प्रभावित होता है।
  • गर्भधारण दर घट जाती है।
    1. रोग प्रतिरोधक क्षमता पर असर
  • इम्यूनिटी कमजोर हो जाती है।
  • मास्टाइटिस एवं परजीवी संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
    1. चयापचय एवं हार्मोनल असंतुलन
  • ग्लूकोज़ एवं ऊर्जा की कमी हो जाती है।
  • हार्मोनल असंतुलन (Cortisol, Prolactin, Thyroid hormones) होने से पशु का स्वास्थ्य प्रभावित होता है।
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हीट स्ट्रेस न्यूनीकरण हेतु रणनीतियाँ

  1. पर्यावरणीय प्रबंधन

हीट स्ट्रेस न्यूनीकरण हेतु पर्यावरणीय प्रबंधन सबसे प्रभावी रणनीति मानी जाती है। इसका उद्देश्य पशुओं को आरामदायक वातावरण उपलब्ध कराना है ताकि उनके शरीर पर तापमान का बोझ कम हो। इसके अंतर्गत निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं –

  1. छायादार स्थान एवं वेंटिलेशन युक्त शेड की व्यवस्था करें
  • पशुओं के रहने वाले स्थान पर पर्याप्त हवा का प्रवाह होना चाहिए।
  • शेड की ऊँचाई उचित रखें ताकि वेंटिलेशन अच्छा रहे।
    1. छत पर परावर्तक (Reflective) पेंट का प्रयोग करें
  • छत पर सफेद या परावर्तक पेंट लगाने से गर्मी का अवशोषण कम होता है।
  • इससे शेड का तापमान 3-5°C तक कम हो सकता है।
    1. पंखे एवं स्प्रिंकलर का प्रयोग करें
  • पंखे हवा का संचार बढ़ाते हैं और पसीने/वाष्पन के माध्यम से ठंडक देते हैं।
  • स्प्रिंकलर या फॉगिंग सिस्टम से पशु के शरीर पर हल्की फुहारें डालकर ठंडक पहुँचाई जा सकती है।
    1. ग्रीन शेड नेट व पेड़ों की छाया का लाभ लें
  • शेड नेट से सीधी धूप का प्रभाव 70–80% तक कम किया जा सकता है।
  • पशु आवास के आसपास अधिक से अधिक पेड़ लगाएँ, जो प्राकृतिक छाया प्रदान करते हैं।
  1. पानी की उपलब्धता
    • पर्याप्त मात्रा में ठंडा और स्वच्छ पानी उपलब्ध कराएँ।
    • दिन में कई बार पानी बदलें।
    • पानी के टब छायादार स्थानों पर रखें।
  1. पोषण प्रबंधन
  • संतुलित एवं सुपाच्य आहार प्रदान करें।
  • उच्च गुणवत्ता वाली हरी चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करें।
  • इलेक्ट्रोलाइट्स (Na, K, Cl) एवं मिनरल मिक्सचर का प्रयोग करें।
  • आहार में विटामिन C एवं E का सम्मिलन करें जिससे ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस कम हो।
  • चारे को दिन के ठंडे समय (सुबह/शाम) पर खिलाएँ।
  1. पशु स्वास्थ्य प्रबंधन
  • नियमित टीकाकरण एवं कृमिनाशक दवाओं का प्रयोग करें।
  • गर्मी में होने वाले रोग जैसे मास्टाइटिस, हीट एक्सॉशन की रोकथाम हेतु सतर्क रहें।
  • समय-समय पर पशुओं की स्वास्थ्य जांच करें।
  1. जेनेटिक एवं प्रजनन रणनीति
  • स्थानीय एवं हीट-टॉलरेंट नस्लों को प्राथमिकता दें।
  • क्रॉस ब्रीडिंग में ऐसे बैलों का चयन करें जिनमें ऊष्मा सहनशीलता अधिक हो।
  • प्रजनन का समय गर्मी के बजाय ठंडे मौसम में नियोजित करें।
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निष्कर्ष

हीट स्ट्रेस दुग्ध पशुओं के लिए गंभीर समस्या है जो सीधे-सीधे दूध उत्पादन और पशुओं की सेहत को प्रभावित करती है। पर्यावरणीय, पोषणीय, स्वास्थ्य एवं जेनेटिक रणनीतियों को अपनाकर हीट स्ट्रेस के प्रभाव को कम किया जा सकता है। किसान भाई यदि उचित प्रबंधन अपनाएँ तो गर्मी के मौसम में भी दुग्ध उत्पादन को बनाए रखा जा सकता है और पशुओं की उत्पादकता एवं स्वास्थ्य सुरक्षित रह सकता है।

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