कचरा बहूत लेकिन निपटाएं कहां

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TARUN SHRIDHAR

कचरा बहूत लेकिन निपटाएं कहां

-तरुण श्रीधर

NB-साभार पुनर्प्रकाशन :

(यह महत्वपूर्ण एवं विचारोत्तेजक लेख मूल रूप से दैनिक जागरण के 5 मई 2025 के अंक में प्रकाशित हुआ था।

पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण स्वच्छता एवं सतत विकास जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों पर आधारित इस लेख को जनहित एवं जागरूकता के उद्देश्य से पशुधन प्रहरी में साभार पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है।

मूल लेखक एवं मूल प्रकाशन को पूर्ण श्रेय सहित।)

यूरोप के विशेष आकर्षण ऐल्प्स पर्वत के प्रशंसक एक पर्वतारोही ने ना चाहते भी मुझ से स्वीकार किया कि हिमालय में एक विशेष सम्मोहन है जो विश्व की किसी अन्य पर्वत शृंखला में नहीं है: अध्यात्म, रहस्य जिसमे व्यक्ति स्वयं को खो प्रकृति में विलीन हो जाता है। साथ ही प्रश्न किया कि इस अनुपम विशेषता को हम सहेज क्यों नहीं कर पा रहे। इशारा था कचरा प्रबंधन की ओर।

क़ानूनी अधिसूचना द्वारा यह आदेश पारित किए हैं हिमाचल प्रदेश सरकार ने कि प्रत्येक सार्वजनिक परिवहन वाहन, टैक्सी, बस इत्यादि में कूड़ा-कचरा पात्र रखना अनिवार्य होगा और उल्लंघन की दृष्टि में 10,000 रुपए जुर्माना भरना पड़ेगा। इसके पीछे घोषित उद्देश्य है प्रदूषण की रोकथाम और पर्यावरण संरक्षण। प्रदेश सरकार की पहल सराहनीय है; स्वच्छ पर्यावरण ही तो हमारी मुख्य पहचान है। निसन्देह चारों ओर फैलता कूड़ा कचरा इस स्वच्छता पर भारी पड़ रहा है। इस प्रकार का कदम बहुत पहले ही लिया होता तो शायद आज समस्या इतनी गंभीर ना होती। कदम एकदम उचित है पर अभी मात्र पहला ही कदम है। मंजिल कोसों दूर है। अधिसूचना कहती है कि वाहनों के “स्वामी/चालक” कूड़े कचरे को “चिन्हित स्थानों पर निष्पादित करेंगे”। वास्तविक चुनौती यहीं से प्रारंभ होती है; चिन्हित स्थान कहाँ हैं और कहाँ होंगे? क्या यह स्थान सभी के लिए सुलभ और सुविधाजनक होंगे? क्या सार्वजनिक स्थलों पर यह स्थान साफ़ सुथरे और हाइजीनिक रखने में हम सफल हो पाएंगे?

प्रकृति का चमत्कार है हिमालय पर्वत। शरीर और आत्मा है हमारे राष्ट्र का। इसकी असंख्य नदियाँ, झरने आदि पूरे उत्तर भारत के जीवन को सिंचित करते हैं; उत्तर और पूर्वी भारत की उपजाऊ भूमि हिमालय की ही देन हैं। साथ ही हिमालय पोषित करता है हमारी सभ्यता और संस्कृति को। स्वाभाविक है कि हिमालय और इसके आँचल में रहने वाले लोग ख़ूबसूरत हैं, बाहर और अंदर दोनों से। दुर्भाग्यवश आज गंदगी का प्रहार हो रहा है इस पर। यदि हम वास्तव में इससे प्यार करते हैं, तो कर्तव्य है हमारा कि पर्यावरण संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाए जाएं; सांकेतिक कार्यवाही बहुत हो चुकी। हिमालय और हिमाचल तो प्रतिबिंब हैं एक दूसरे के, शाब्दिक पर्यायवाची भी हैं; एक हिम का निवास स्थल है तो दूसरे का निवास हिम के आँचल में। जब हम हिमालय और उसकी सुंदर घाटियों को कूड़े कचरे की चोट देते हैं तो भूल जाते हैं कि यह घाव हमारी आने वाली पीढ़ियों को सर्वाधिक सताएगा। खो देंगी वो प्रकृति की सबसे अनमोल धरोहर को।

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हाल ही की बात है जब गाँव में प्रवास के दौरान प्रण किया था कि रत्ति भर नॉन-बायोडिग्रेडेबल कूड़ा, अर्थात् जो प्राकृतिक तौर पर सढ़नशील न हो, सार्वजनिक भूमि या जंगल में फेंकना तो दूर, ना जलाएँगे और ना ही गड्डे में डालेंगे। इस सोच के पीछे जज़्बा था प्रकृति और उसके स्रोतों का संरक्षण और सफ़ाई। अपने घर के अतिरिक्त आसपास का भी कूड़ा-कचरा एकत्रित किया। दस दिन में ही इतना कूड़ा इकठ्ठा हो गया की कूड़े के डब्बों को लोड करने के बाद गाड़ी में ख़ुद का सामान रखना दूभर हो गया। हम ने यह कूड़ा 100 किलोमीटर से अधिक दूर संयंत्र में भेजा। साधन थे हमारे पास, खर्च वहन करने की क्षमता भी; लेकिन कब तक? अन्य ग्रामीण क्या करें? सभी ने लगभग एक ही हल ढूंढा है: निकटतम सरकारी अथवा वन भूमि पर फैंक दो; हाँ कुछ एक थे जो जलाने या गाड़ने का विकल्प प्रयोग कर रहे थे, लेकिन पर्यावरण को प्रदूषित तो यह भी करते हैं। दुकानदार और व्यापारी तो थोक में पोषण कर रहे हैं जंगलों का कूड़े कचरे से। किसी भी छोटे मोटे कस्बे या व्यापार केंद्र के निकट के संपर्क मार्ग देख लें, प्रकृति की गोद में, आपको कचरे के प्लॉट मिल जाएँगे।

सड़ते कचरे की दुर्गंध कुछ कुछ अंतराल बाद देवदार, चीड़ और बान इत्यादि की भीनी सुगंध पर हावी हो जाती है, यह मेरा निजी अनुभव है, बारम्बार और हाल ही में भी; एक दो नहीं अपितु कई संपर्क मार्गों पर। यह कोई अपवाद नहीं है; हर ग्रामीण संपर्क मार्ग और पगडंडी में ऐसा दृश्य निसंदेह मिलेगा। प्लास्टिक रैपर, बोतलें, हर प्रकार का कूड़ा कचरा: यह दृश्य प्रकृति के सौंदर्य को निहारते कुछ कदम पश्चात यकीनन मिलेगा। और यह ऐसे मार्ग और पगडंडियाँ हैं जहाँ आजतक भूल कर भी कोई पर्यटक नहीं आया। यदि कूड़ा कचरा निदान की हमारी रणनीति पर्यटकों पर ही केंद्रित रहती है तो यह संभवतः ऊँठ के मुँह में जीरे से भी कम ही होगा। पर्यटन स्थलों पर प्रबंधन सुगमता से किया जा सकता है पर सैंकड़ों गाँव कस्बों का क्या? यहाँ समस्या विशालकाय है लेकिन हल तो दूर इसे कोई समस्या स्वीकार भी नहीं कर रहा।

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एक बहुत सुखद बात जो रोज़ देखी वह है नियमित दूध एकत्रण की गाड़ी और उसके ड्राइवर द्वारा शालीनता से हर चार कदम पर रुक कर ग्रामीणों से दूध लेना और हिसाब रखना। मुस्कान रहती है इस समय हर ग्रामीण के चेहरे पर। एक सुदृढ़ संस्थागत व्यवस्था स्थापित है दूध एकत्रण की और यह व्यवस्था दक्षता से कार्य कर रही है। अब यदि दूध उठाया जा सकता है तो कूड़ा कचरा क्यों नहीं? क्यों स्थापित नहीं कर पाए हम कोई संस्थागत तंत्र कूड़े कचरे के प्रबंधन के लिए; यह भी तो प्रतिदिन ही पैदा होता है, और काफ़ी मात्र में भी। यह प्रश्न स्वयं से पूछा क्योंकि शासन में रहते तो यह मैंने किया नहीं, और स्थानीय लोगों से भी। समझ में यह आया कि सामान्य समझ अनुसार दूध कमाई है जबकि कूड़ा खर्च; एक संपत्ति तो दूसरा बोझ। आइए थोड़ा दृष्टिकोण बदलें। जिस पड़ाव पर हम पहुँच रहे हैं वहाँ संभव है हम हिम के आँचल में कई कूड़े कचरे के ढेर समायोजित कर दें। पर्यटन घनत्व वाले कई स्थानों पर तो यह परिस्थिति उत्पन्न हो ही चुकी है। 5-5 रुपए के कुरकुरे, चसुकी, चॉकलेट और ऐसे नाना प्रकार के कचरा खाद्य पदार्थों ने घर घर के रास्ते और द्वार की ओर भी यह गंदगी पहुँचा दी है जिसे प्राकृतिक माध्यम से नष्ट नहीं किया जा सकेगा। अतः कूड़ा कचरा प्रबंधन और निदान बोझ नहीं अपितु एक ज़िम्मेदार निवेश है भविष्य की सुरक्षा में, अपनी सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक बहुमूल्य धरोहर के संरक्षण में।

अंधाधुंध और अनियंत्रित पेड़ कटाई ने चिपको आंदोलन को जन्म दिया जिसने पहाड़ी राज्यों में पर्यावरण पतन पर लगाम लगाई। आज जब हिमाचल शासन ने पहल कर पर्यावरण के शत्रु कचरे पर अंकुश लगाने की अच्छी बुनियाद रखी है तो क्यों ना इसी पर हम सब स्वच्छता के आंदोलन की इमारत रखें। कहते हैं ना अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।

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(लेखक भारतीय खाद्य एवं कृषि परिषद के महानिदेशक व भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी हैं)

 

 संपादकीय टिप्पणी

आज प्लास्टिक एवं ठोस कचरा प्रबंधन की समस्या केवल शहरों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि गाँवों, जंगलों, पर्वतीय क्षेत्रों एवं प्राकृतिक धरोहरों के अस्तित्व के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी है।

श्री तरुण श्रीधर द्वारा लिखित यह लेख केवल हिमालय या हिमाचल की स्थिति का वर्णन नहीं करता, बल्कि पूरे देश में तेजी से बढ़ती पर्यावरणीय अव्यवस्था का वास्तविक चित्र प्रस्तुत करता है।

पशुधन प्रहरी का मानना है कि स्वच्छ पर्यावरण, सुरक्षित जल स्रोत, स्वस्थ पशुधन, टिकाऊ कृषि एवं ग्रामीण विकास एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। यदि आज कूड़ा-कचरा प्रबंधन को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को इसका गंभीर दुष्परिणाम भुगतना पड़ेगा।

यह लेख समाज, प्रशासन, ग्रामीण समुदायों एवं नीति निर्माताओं के लिए एक गंभीर चेतावनी के साथ-साथ जनभागीदारी आधारित स्वच्छता आंदोलन का संदेश भी देता है।

इसी उद्देश्य से यह महत्वपूर्ण लेख अपने पाठकों के लिए साभार प्रस्तुत किया जा रहा है।

— राजेश कुमार सिंह

संपादक ,  पशुधन प्रहरी

इस लेख के मूल प्रकाशन एवं बौद्धिक अधिकार लेखक तथा मूल प्रकाशक के पास सुरक्षित हैं। यह पुनर्प्रकाशन केवल जनजागरूकता, शैक्षणिक एवं सामाजिक हित के उद्देश्य से किया गया है।

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