महासागरों के प्राचीन प्रहरी : समुद्री कछुओं के संरक्षण की वैश्विक पुकार
– डॉ दीपक कोहली –
पृथ्वी के विशाल महासागर केवल जलराशि के अथाह विस्तार नहीं हैं, बल्कि वे असंख्य जीवों, पारिस्थितिक तंत्रों और जीवन प्रक्रियाओं के आधार स्तंभ हैं। इन महासागरों में कुछ ऐसे जीव भी निवास करते हैं जिन्होंने करोड़ों वर्षों के प्राकृतिक उतार-चढ़ाव, महाद्वीपीय परिवर्तनों और जलवायु बदलावों को पार करते हुए आज तक अपना अस्तित्व बनाए रखा है। समुद्री कछुए ऐसे ही अद्भुत जीवों में शामिल हैं। डायनासोरों के युग से लेकर आधुनिक मानव सभ्यता तक की यात्रा के साक्षी रहे ये जीव महासागरों के प्राचीन प्रहरी माने जाते हैं। उनकी उपस्थिति केवल जैव विविधता की समृद्धि का प्रतीक नहीं है, बल्कि समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों के स्वास्थ्य और संतुलन का भी महत्वपूर्ण संकेतक है।
विश्व समुद्री कछुआ दिवस प्रतिवर्ष 16 जून को मनाया जाता है। यह दिवस केवल एक जीव विशेष के संरक्षण का अवसर नहीं है, बल्कि महासागरों की जैव विविधता, समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों और पृथ्वी के पर्यावरणीय संतुलन को सुरक्षित रखने का वैश्विक अभियान भी है। समुद्री कछुए पृथ्वी पर उन जीवों में शामिल हैं जो करोड़ों वर्षों से अस्तित्व में हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार समुद्री कछुओं के पूर्वज लगभग 10 करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी पर विचरण कर रहे थे, अर्थात वे डायनासोरों के युग से लेकर आज तक अनेक प्राकृतिक परिवर्तनों, जलवायु उतार-चढ़ावों और भूगर्भीय घटनाओं को पार करते हुए जीवित बचे हैं। यही कारण है कि इन्हें महासागरों का जीवित इतिहास भी कहा जाता है।
आज जब मानव गतिविधियों के कारण समुद्री प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता का संकट लगातार बढ़ रहा है, तब समुद्री कछुओं का संरक्षण पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। विश्व समुद्री कछुआ दिवस हमें यह समझने का अवसर प्रदान करता है कि समुद्री कछुए केवल समुद्र में रहने वाले आकर्षक जीव नहीं हैं, बल्कि वे महासागरों के स्वास्थ्य के सूचक और समुद्री पारिस्थितिक तंत्र के महत्वपूर्ण अंग हैं। यदि समुद्री कछुए सुरक्षित रहेंगे तो समुद्री घास के मैदान, प्रवाल भित्तियाँ, तटीय पारिस्थितिक तंत्र और अनेक समुद्री प्रजातियाँ भी सुरक्षित रहेंगी।
समुद्री कछुओं की विशेषता यह है कि वे अपना अधिकांश जीवन समुद्र में बिताते हैं, किंतु अंडे देने के लिए मादाएँ उसी समुद्र तट पर लौटती हैं जहाँ उनका जन्म हुआ था। वैज्ञानिकों के लिए यह अभी भी एक अद्भुत रहस्य है कि हजारों किलोमीटर की यात्रा करने के बाद भी वे अपने जन्मस्थल को कैसे पहचान लेती हैं। अनुसंधानों से पता चला है कि पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को महसूस करने की उनकी क्षमता उन्हें दिशा-निर्देशन में सहायता करती है। यह जैविक नेविगेशन प्रणाली प्रकृति की सबसे अद्भुत व्यवस्थाओं में से एक मानी जाती है।
विश्व में वर्तमान समय में समुद्री कछुओं की सात प्रमुख प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें लेदरबैक, ग्रीन टर्टल, हॉक्सबिल, लॉगरहेड, ऑलिव रिडले, केम्प्स रिडले और फ्लैटबैक शामिल हैं। इनमें से अधिकांश प्रजातियाँ संकटग्रस्त या अति संकटग्रस्त श्रेणी में आती हैं। भारत के समुद्री तटों पर मुख्य रूप से ऑलिव रिडले, ग्रीन टर्टल, हॉक्सबिल, लॉगरहेड और लेदरबैक समुद्री कछुए पाए जाते हैं। विशेष रूप से ऑलिव रिडले कछुए भारत में सबसे अधिक चर्चित हैं क्योंकि इनके विशाल सामूहिक प्रजनन कार्यक्रम, जिन्हें ‘अरिबाडा’ कहा जाता है, ओडिशा के समुद्र तटों पर देखने को मिलते हैं। लाखों मादा कछुए एक साथ तट पर आकर अंडे देती हैं, जो विश्व की सबसे अद्भुत प्राकृतिक घटनाओं में गिनी जाती है।
समुद्री कछुओं का जीवन चक्र अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है। एक मादा कछुआ एक बार में लगभग 100 से 150 अंडे दे सकती है, किंतु उनमें से बहुत कम बच्चे वयस्क अवस्था तक पहुँच पाते हैं। अंडों को पक्षियों, केकड़ों और अन्य शिकारी जीवों से खतरा रहता है। अंडों से निकलने वाले छोटे कछुओं को समुद्र तक पहुँचने की कठिन यात्रा करनी पड़ती है। इसके बाद भी बड़ी मछलियाँ, समुद्री पक्षी और अन्य शिकारी जीव उनका शिकार करते हैं। अनुमान है कि हजारों बच्चों में से केवल एक या दो ही वयस्क बन पाते हैं। इस प्राकृतिक संघर्ष के अतिरिक्त अब मानवजनित खतरों ने उनकी स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया है।
समुद्री कछुओं का पारिस्थितिक महत्व अत्यंत व्यापक है। ग्रीन टर्टल समुद्री घास का सेवन करते हैं और इस प्रकार समुद्री घास के मैदानों को स्वस्थ बनाए रखते हैं। यदि समुद्री घास अनियंत्रित रूप से बढ़ती रहे तो उसका संतुलन बिगड़ सकता है। समुद्री घास के स्वस्थ मैदान अनेक मछलियों, झींगों और अन्य समुद्री जीवों के लिए आश्रय स्थल का कार्य करते हैं। इसी प्रकार हॉक्सबिल कछुए समुद्री स्पंज खाते हैं, जिससे प्रवाल भित्तियों का संतुलन बना रहता है। लेदरबैक समुद्री कछुए बड़ी मात्रा में जेलीफिश खाते हैं। यदि जेलीफिश की संख्या अत्यधिक बढ़ जाए तो यह मत्स्य संसाधनों और समुद्री खाद्य श्रृंखला को प्रभावित कर सकती है। इस प्रकार समुद्री कछुए महासागरों के प्राकृतिक प्रबंधक के रूप में कार्य करते हैं।
समुद्री कछुओं के संरक्षण का एक महत्वपूर्ण पहलू समुद्र तटों के पोषण चक्र से भी जुड़ा है। जब कछुए समुद्र तटों पर अंडे देते हैं, तब सभी अंडे सफलतापूर्वक नहीं फूटते। जो अंडे या खोल शेष रह जाते हैं, वे तटीय रेत को पोषक तत्व प्रदान करते हैं। इससे समुद्र तटीय वनस्पतियों का विकास होता है और तटीय पारिस्थितिक तंत्र को मजबूती मिलती है। इस प्रकार समुद्री कछुए समुद्र और भूमि के बीच पोषक तत्वों के आदान-प्रदान में भी योगदान देते हैं।
दुर्भाग्यवश आज समुद्री कछुए अनेक गंभीर खतरों का सामना कर रहे हैं। प्लास्टिक प्रदूषण इनमें सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरा है। समुद्र में तैरती प्लास्टिक की थैलियाँ जेलीफिश जैसी दिखाई देती हैं, जिन्हें कछुए भोजन समझकर निगल लेते हैं। इससे उनके पाचन तंत्र में अवरोध उत्पन्न हो जाता है और कई बार उनकी मृत्यु हो जाती है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार समुद्रों में प्रतिवर्ष लाखों टन प्लास्टिक कचरा पहुँचता है, जिसका दुष्प्रभाव समुद्री कछुओं सहित असंख्य समुद्री जीवों पर पड़ रहा है।
मत्स्य उद्योग भी समुद्री कछुओं के लिए एक बड़ी चुनौती है। मछली पकड़ने वाले जालों में फँसकर बड़ी संख्या में कछुए हर वर्ष मारे जाते हैं। इस समस्या को ‘बायकैच’ कहा जाता है। अनेक बार कछुए जाल में फँसकर सतह पर साँस लेने नहीं पहुँच पाते और दम घुटने से उनकी मृत्यु हो जाती है। इस समस्या को कम करने के लिए कई देशों में ‘टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस’ अर्थात कछुआ बहिर्गमन उपकरण का उपयोग किया जा रहा है, जिससे कछुए जाल से बाहर निकल सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन भी समुद्री कछुओं के भविष्य के लिए गंभीर चिंता का विषय है। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि समुद्री कछुओं के बच्चों का लिंग अंडों के ऊष्मायन तापमान पर निर्भर करता है। अधिक तापमान पर अधिक मादाएँ जन्म लेती हैं, जबकि अपेक्षाकृत कम तापमान पर नर कछुओं की संख्या बढ़ती है। वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण कई क्षेत्रों में नर और मादा का प्राकृतिक अनुपात प्रभावित हो रहा है। यदि यह असंतुलन लंबे समय तक बना रहा तो प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट उत्पन्न हो सकता है।
समुद्र स्तर में वृद्धि भी एक नई चुनौती है। अनेक समुद्र तट, जहाँ समुद्री कछुए सदियों से अंडे देते रहे हैं, अब कटाव और जलभराव की समस्या का सामना कर रहे हैं। यदि ऐसे तट नष्ट हो जाते हैं तो कछुओं के प्रजनन स्थल भी समाप्त हो सकते हैं। तटीय विकास परियोजनाएँ, होटल, सड़कें और कृत्रिम रोशनी भी उनके प्राकृतिक व्यवहार को प्रभावित करती हैं। अंडों से निकलने वाले बच्चे सामान्यतः समुद्र की ओर दिखाई देने वाले प्राकृतिक प्रकाश के आधार पर दिशा पहचानते हैं, किंतु कृत्रिम रोशनी उन्हें भ्रमित कर देती है और वे गलत दिशा में चले जाते हैं।
भारत समुद्री कछुओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। ओडिशा के गहिरमाथा, रुषिकुल्या और देवी नदी के मुहाने विश्व के प्रमुख ऑलिव रिडले प्रजनन स्थलों में गिने जाते हैं। यहाँ राज्य सरकार, वन विभाग, वैज्ञानिक संस्थान और स्थानीय समुदाय मिलकर संरक्षण कार्यक्रम चलाते हैं। अंडों की सुरक्षा, निगरानी, मत्स्य गतिविधियों का नियमन और जनजागरूकता जैसे उपायों से कछुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है।
अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह भी समुद्री कछुओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। यहाँ लेदरबैक समुद्री कछुओं की महत्वपूर्ण आबादी पाई जाती है। लेदरबैक विश्व का सबसे बड़ा समुद्री कछुआ है, जिसकी लंबाई दो मीटर तक और वजन 700 किलोग्राम से अधिक हो सकता है। इन विशाल कछुओं का संरक्षण वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि उनकी संख्या लगातार घट रही है।
विश्व के अनेक देशों में सामुदायिक भागीदारी आधारित संरक्षण कार्यक्रम सफल सिद्ध हुए हैं। स्थानीय मछुआरे, तटीय समुदाय, स्वयंसेवी संगठन और वैज्ञानिक मिलकर समुद्री कछुओं के अंडों की रक्षा करते हैं, घोंसलों की निगरानी करते हैं तथा घायल कछुओं का उपचार कर उन्हें पुनः समुद्र में छोड़ते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि जैव विविधता संरक्षण केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए समाज की सक्रिय सहभागिता भी आवश्यक है।
आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी भी समुद्री कछुओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। उपग्रह टैगिंग तकनीक की सहायता से वैज्ञानिक कछुओं की लंबी समुद्री यात्राओं का अध्ययन कर रहे हैं। इससे उनके प्रवास मार्गों, भोजन स्थलों और प्रजनन क्षेत्रों की जानकारी प्राप्त होती है। इन जानकारियों के आधार पर समुद्री संरक्षित क्षेत्रों की योजना बनाई जा रही है। आनुवंशिक अध्ययन भी विभिन्न आबादियों के संबंधों और संरक्षण प्राथमिकताओं को समझने में सहायता कर रहे हैं।समुद्री कछुओं का सांस्कृतिक महत्व भी कम नहीं है। अनेक सभ्यताओं में उन्हें दीर्घायु, धैर्य, बुद्धिमत्ता और स्थिरता का प्रतीक माना गया है। भारतीय परंपरा में भी कच्छप का विशेष स्थान है। भगवान विष्णु का कूर्म अवतार भारतीय संस्कृति में कछुए के महत्व को दर्शाता है। यह हमें प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान का संदेश देता है।
विश्व समुद्री कछुआ दिवस केवल संरक्षण विशेषज्ञों या वैज्ञानिकों तक सीमित नहीं है। प्रत्येक नागरिक इस अभियान में योगदान दे सकता है। समुद्र तटों पर प्लास्टिक कचरा न फैलाना, एकल-उपयोग प्लास्टिक का कम उपयोग करना, समुद्री संरक्षण कार्यक्रमों का समर्थन करना, पर्यावरण शिक्षा को बढ़ावा देना तथा जैव विविधता के महत्व को समझना ऐसे कदम हैं जो समुद्री कछुओं की सुरक्षा में योगदान दे सकते हैं। विद्यालयों और महाविद्यालयों में भी इस विषय पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए ताकि नई पीढ़ी प्रकृति संरक्षण के प्रति संवेदनशील बन सके।
आज जब पृथ्वी जलवायु संकट, प्रदूषण और जैव विविधता क्षरण जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब समुद्री कछुए हमें प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व का संदेश देते हैं। करोड़ों वर्षों से जीवित यह प्रजाति मानव सभ्यता से कहीं अधिक पुरानी है, किंतु आज उसका भविष्य मानव के हाथों में है। यदि हम महासागरों को प्रदूषण से मुक्त रखने, तटीय पारिस्थितिक तंत्रों को सुरक्षित बनाने और सतत विकास के सिद्धांतों को अपनाने में सफल होते हैं, तो समुद्री कछुए आने वाली पीढ़ियों के लिए भी महासागरों में विचरण करते रहेंगे।
विश्व समुद्री कछुआ दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि समुद्र केवल जल का विशाल विस्तार नहीं हैं, बल्कि जीवन की अनगिनत कहानियों का आधार हैं। समुद्री कछुए उन कहानियों के प्राचीन पात्र हैं, जिन्होंने पृथ्वी के इतिहास को अपनी आँखों से देखा है। उनका संरक्षण केवल एक प्रजाति को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि महासागरों के स्वास्थ्य, जैव विविधता की समृद्धि और मानवता के सतत भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है। जब हम समुद्री कछुओं की रक्षा करते हैं, तब वास्तव में हम अपने ग्रह के नीले हृदय, महासागरों की रक्षा कर रहे होते हैं, और यही विश्व समुद्री कछुआ दिवस का सबसे बड़ा संदेश है।
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प्रेषक: डॉ दीपक कोहली , विशेष सचिव, उत्तर प्रदेश सचिवालय, 5/104, विपुल खंड, गोमती नगर, लखनऊ- 226010



