गायों में खुरपका-मुंहपका रोग: कारण, लक्षण, प्रभाव एवं प्रभावी नियंत्रण

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 गायों में खुरपका-मुंहपका रोग: कारण, लक्षण, प्रभाव एवं प्रभावी नियंत्रण

Sudhanshu Kumar1, Anil Kumar Safi2, Jignesh Vansola3

1Assistant Professor, Department of Veterinary Medicine, Mahala Veterinary College, Reengus, RAJUVAS

2Assistant Professor, Department of Veterinary Anatomy, Mahala Veterinary College, Reengus, RAJUVAS

3Assistant Professor, Department of Animal Nutrition, Mahala Veterinary College, Reengus, RAJUVAS 

Corresponding author: Sudhanshubvc7463@gmail.com 

खुरपका-मुंहपका रोग (FMD) दो खुर वाले (cloven-hoofed) पशुओं में होने वाला अत्यंत संक्रामक, तीव्र एवं आर्थिक दृष्टि से विनाशकारी वायरल रोग है। यह रोग Foot-and-mouth disease virus (FMDV) द्वारा उत्पन्न होता है, जो  Picornaviridae के Aphthovirus वंश का सदस्य है। भारत जैसे दुग्ध-प्रधान देश में FMD का प्रभाव दूध उत्पादन, प्रजनन दक्षता, पशु-कल्याण तथा निर्यात क्षमता पर गहरा पड़ता है।

  1. एटियोलॉजी (Etiology) एवं विषाणु की विशेषताएँ

FMDV एक छोटा, नॉन-एनवेलप्ड, सिंगल-स्ट्रैन्डेड पॉजिटिव-सेंस RNA वायरस है। इसके सात प्रमुख सेरोटाइप (O, A, C, Asia-1, SAT-1, SAT-2 & SAT-3) ज्ञात हैं; भारत में प्रायः O, A एवं Asia-1 प्रचलित हैं। महत्वपूर्ण तथ्य यह है, कि एक सेरोटाइप से संक्रमित पशु दूसरे सेरोटाइप के विरुद्ध पर्याप्त प्रतिरक्षा विकसित नहीं करता; अतः टीकों में प्रचलित सेरोटाइप्स का समावेश आवश्यक है।

वायरस पर्यावरणीय रूप से अपेक्षाकृत स्थिर है—निम्न तापमान और तटस्थ pH पर लंबे समय तक जीवित रह सकता है, परंतु अम्लीय pH तथा उच्च तापमान पर शीघ्र निष्क्रिय हो जाता है।

  1. महामारी विज्ञान (Epidemiology)
    • होस्ट रेंज:गाय, भैंस, भेड़, बकरी, सूअर तथा अन्य जंगली द्विखुरी प्रजातियाँ।
    • संक्रमण का स्रोत:संक्रमित पशु की लार, नासिक स्राव, दूध, वीर्य, मल-मूत्र तथा फूटे हुए वेसिकल का द्रव।
    • प्रसार के मार्ग:
  • प्रत्यक्ष संपर्क
  • एरोसोल (विशेषकर सघन पशु आबादी में)
  • दूषित चारा-पानी, वाहन, उपकरण
  • पशु बाजार एवं परिवहन
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एक संक्रमित पशु से वायरस का उत्सर्जन (shedding) लक्षण प्रकट होने से पूर्व भी प्रारंभ हो सकता है, जिससे रोग नियंत्रण चुनौतीपूर्ण हो जाता है। कुछ मामलों में गायों में carrier state (फैरिंजियल क्षेत्र में वायरस का दीर्घकालिक अस्तित्व) भी देखा गया है।

  1. रोगजनन (Pathogenesis)

वायरस प्रायः श्वसन मार्ग या मौखिक मार्ग से शरीर में प्रवेश करता है। प्रारंभिक प्रतिकृति (primary replication) ग्रसनी एवं श्वसन उपकला में होती है, जिसके पश्चात् viremia विकसित होती है।

वायरस उपकला कोशिकाओं में तीव्र प्रतिकृति कर इंट्रासेल्युलर एडिमा एवं वेसिकल (छाला) निर्माण करता है। ये वेसिकल फटकर अल्सर में परिवर्तित हो जाते हैं।

बछड़ों में मायोकार्डियम में संक्रमण से “Tiger heart lesions” (धारीदार नेक्रोसिस) विकसित हो सकते हैं, जो अचानक मृत्यु का कारण बनते हैं।

  1. नैदानिक लक्षण (Clinical Manifestations)

(A) सामान्य लक्षण

  • उच्च ज्वर (40–41°C)
  • अवसाद, भूख में कमी
  • दूध उत्पादन में तीव्र गिरावट

(B) वेसिकुलर घाव

  • जीभ, मसूड़े, होंठ, डेंटल पैड पर छाले
  • अत्यधिक लार स्राव (ptyalism)
  • खुरों के इंटरडिजिटल स्पेस में वेसिकल
  • लंगड़ापन  

(C) दुग्ध ग्रंथि 

  • थनों पर घाव
  • दुग्ध निष्कासन में दर्द
  • Secondary mastitisकी संभावना

(D) बछड़े

  • तीव्र मायोकार्डाइटिस(Acute myocarditis)
  • अचानक मृत्यु, बिना स्पष्ट वेसिकल

मृत्यु दर वयस्क पशुओं में सामान्यतः कम (1–5%) होती है, परंतु बछड़ों में अधिक हो सकती है।

  1. रोग का आर्थिक प्रभाव

FMD से होने वाली हानि बहुआयामी है:

  • 50–80% तक दूध उत्पादन में कमी
  • शरीर वजन में गिरावट
  • प्रजनन चक्र में व्यवधान (अनियमित हीट, गर्भपात)
  • उपचार एवं प्रबंधन लागत
  • व्यापार प्रतिबंध
  1. निदान (Diagnosis)

(A) नैदानिक आधार

  • विशिष्ट वेसिकुलर घाव
  • तीव्र प्रसार

(B) प्रयोगशाला परीक्षण

  • ELISA (Antigen detection / Antibody detection)
  • RT-PCR
  • Virus isolation
  • Serotyping
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भिन्न रोगों जैसे वेसीकुलर स्टोमैटाइटिस, ब्लूटंग आदि से विभेदक निदान आवश्यक है।

  1. उपचार (Treatment)

FMD का कोई विशिष्ट एंटीवायरल उपचार उपलब्ध नहीं है। उपचार लाक्षणिक एवं सहायक (supportive therapy) पर आधारित है:

  • NSAIDs (ज्वर एवं दर्द नियंत्रण हेतु)
  • ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स (द्वितीयक जीवाणु संक्रमण रोकने हेतु)
  • एंटीसेप्टिक माउथ वॉश
  • खुरों की ड्रेसिंग
  • उच्च गुणवत्ता का मुलायम आहार

उचित देखभाल से 2–3 सप्ताह में वयस्क पशु स्वस्थ हो सकते हैं, परंतु उत्पादन हानि दीर्घकालिक हो सकती है।

  1. प्रतिरक्षण एवं नियंत्रण (Prevention and Control)
  2. टीकाकरण
  • 6 माह के अंतराल पर नियमित टीकाकरण
  • बहु-सेरोटाइप इनएक्टिवेटेड वैक्सीन
  • सामूहिक (mass) टीकाकरण रणनीति

2️. जैव-सुरक्षा उपाय

  • संक्रमित पशु का पृथक्करण
  • पशुशाला की स्वच्छता एवं कीटाणुशोधन
  • नए पशु का क्वारंटीन
  • पशु आवागमन नियंत्रण

3️. निगरानी (Surveillance)

  • सीरोलॉजिकल सर्वे
  • रोग की शीघ्र रिपोर्टिंग
  1. सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं खाद्य सुरक्षा

FMD मनुष्यों में अत्यंत दुर्लभ है और सामान्यतः हल्का संक्रमण करता है। संक्रमित पशु का दूध उबालने पर सुरक्षित हो जाता है। तथापि, रोगग्रस्त पशुओं के उत्पादों का उचित प्रसंस्करण आवश्यक है।

निष्कर्ष

खुरपका-मुंहपका रोग एक अत्यंत संक्रामक एवं आर्थिक दृष्टि से गंभीर पशु रोग है, जिसका प्रभाव केवल व्यक्तिगत पशुपालक तक सीमित नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर दुग्ध उत्पादन एवं व्यापार पर पड़ता है।

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