भारत में प्रयोगशाला पशु (लैब एनिमल्स) : उपयोग,नियम और रोजगार अवसर
डॉ.सोनू कुमार यादव1 , डॉ.निर्भय भावसार2
1पीएच.डी. शोधकर्ता, पशुधन उत्पादन एवं प्रबंधन विभाग, पशुचिकित्सा विज्ञान एवं पशुपालन महाविद्यालय, रीवा
2एम.वी. एससी. – प्रसार शिक्षा विभाग, भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, बरेली
प्रयोगशाला पशु वे जीव होते हैं जिन्हें वैज्ञानिक अनुसंधान, शिक्षा, औषधि परीक्षण और जैव-चिकित्सीय अध्ययनों के लिए नियंत्रित वातावरण में पाला और उपयोग किया जाता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में नई दवाओं, टीकों और उपचार पद्धतियों के विकास से पहले उनकी सुरक्षा और प्रभावशीलता की जाँच इन्हीं पशुओं पर की जाती है। सामान्यतः माउस, रैट, खरगोश और गिनी पिग जैसे छोटे स्तनधारी प्रयोगशालाओं में अधिक उपयोग किए जाते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, प्रयोगशाला पशु वे प्राणी हैं जिन्हें जैव-चिकित्सीय अनुसंधान, दवा परीक्षण, रोग मॉडल निर्माण तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी अध्ययनों में प्रयोग किया जाता है, ताकि मानव एवं पशु स्वास्थ्य में सुधार लाया जा सके।
औषधियों एवं टीकों के नैदानिक परीक्षण (Clinical Trial) से पूर्व प्रयोगशाला पशुओं का उपयोग इसलिए किया जाता है क्योंकि उनमें मनुष्य के साथ महत्वपूर्ण जैविक समानता पाई जाती है। जैविक समानता (Biological Similarity) का अर्थ है कि प्रयोगशाला पशुओं और मनुष्यों की जीन संरचना, अंग-प्रणाली तथा शारीरिक क्रियाएँ काफी हद तक समान होती हैं। उदाहरण के लिए, मनुष्य और चूहे के जीन लगभग 85–95% तक मिलते-जुलते पाए गए हैं, जिससे दवाओं के प्रभाव और दुष्प्रभाव का अनुमान लगाया जा सकता है। दोनों में हृदय, यकृत, गुर्दा और तंत्रिका तंत्र समान प्रकार से कार्य करते हैं, इसलिए दवाओं की अवशोषण (Absorption), वितरण (Distribution), उपापचय/चयापचय (Metabolism) तथा उत्सर्जन (Excretion) प्रक्रिया का अध्ययन पशुओं में किया जाता है। रोग मॉडल बनाकर मधुमेह, कैंसर और अन्य बीमारियों की प्रक्रिया को समझा जाता है। प्रतिरक्षा प्रणाली की समानता के कारण वैक्सीन परीक्षण भी पहले पशुओं पर किया जाता है। इसी जैविक समानता के आधार पर मानव परीक्षण से पहले दवाओं की सुरक्षा और प्रभावशीलता सुनिश्चित की जाती है।
भारत में प्रमुख प्रयोगशाला पशु–
- माउस (चूहा)– मस मस्क्यूलस
- रैट (बड़ा चूहा)– रैटस नॉर्वेजिकस
- खरगोश– ओरिक्टोलैगस क्यूनिक्यूलस
- गिनी पिग– कैविया पोरसेलस
- हैम्स्टर– मेसोक्रिसेटस ऑराटस
- रीसस बंदर– मैकाका मुलाटा
प्रयोगशाला पशुओं का रख-रखाव–
- आवास-प्रयोगशाला पशुओं के आवास की व्यवस्था साफ, हवादार तथा नियंत्रित तापमान वाली होनी चाहिए, जहाँ तापमान सामान्यतः 20–25°C के बीच बनाए रखा जाए। वातावरण में नमी 40–70% के स्तर पर संतुलित रहनी चाहिए ताकि पशुओं का स्वास्थ्य प्रभावित न हो। प्रकाश व्यवस्था भी वैज्ञानिक रूप से नियंत्रित हो, जिसमें 12 घंटे प्रकाश और 12 घंटे अंधकार का चक्र (light–dark cycle) बनाए रखा जाए। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक पशु के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध हो तथा पिंजरों में स्वच्छ और सूखी बिछावन (bedding) सामग्री का उपयोग किया जाए, जिससे आराम, स्वच्छता और रोग नियंत्रण सुनिश्चित हो सके।
- भोजन एवं पानी–प्रयोगशाला पशुओं को संतुलित और मानकीकृत आहार प्रदान किया जाना चाहिए, ताकि उनके विकास और स्वास्थ्य में कोई कमी न आए। भोजन उनकी प्रजाति और आयु के अनुसार वैज्ञानिक रूप से निर्धारित होना चाहिए। उन्हें स्वच्छ एवं शुद्ध पेयजल निरंतर उपलब्ध कराया जाए, जिसके लिए अक्सर ऑटोमेटिक वाटरिंग सिस्टम का उपयोग किया जाता है। साथ ही, भोजन और पानी के बर्तनों की प्रतिदिन सफाई आवश्यक है, जिससे संक्रमण और रोगों से बचाव हो सके।
- स्वच्छता एवं सैनिटेशन–प्रयोगशाला पशुओं के रख-रखाव में स्वच्छता एवं सैनिटेशन का विशेष महत्व होता है। पिंजरों की नियमित रूप से सफाई तथा कीटाणुशोधन किया जाना चाहिए, ताकि संक्रमण का खतरा कम हो सके। बिछावन सामग्री को समय-समय पर बदलना आवश्यक है, जिससे दुर्गंध और रोगजनकों की वृद्धि न हो। साथ ही, रोग फैलाव को रोकने के लिए बायो-सिक्योरिटी उपाय जैसे सीमित प्रवेश, स्वच्छ वेशभूषा और उपकरणों का निर्जंतुकरण अनिवार्य रूप से अपनाया जाना चाहिए।
- स्वास्थ्य निगरानी–प्रयोगशाला पशुओं की स्वास्थ्य निगरानी अत्यंत आवश्यक है, ताकि किसी भी रोग या असामान्यता का समय रहते पता लगाया जा सके। इसके लिए नियमित स्वास्थ्य परीक्षण किया जाना चाहिए और पशुओं के व्यवहार, आहार तथा शारीरिक स्थिति पर निरंतर ध्यान देना चाहिए। यदि कोई पशु बीमार पाया जाए तो उसे तुरंत अलग (Isolation) रखकर उचित उपचार प्रदान किया जाना चाहिए। साथ ही, रोगों की रोकथाम के लिए समय-समय पर टीकाकरण एवं परजीवी नियंत्रण के उपाय अपनाना अनिवार्य है।
- नैतिक नियम -प्रयोगशाला पशुओं के उपयोग में नैतिक नियमों का पालन अत्यंत आवश्यक है। इसके अंतर्गतपशुओं पर प्रयोगों के नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण हेतु समिति (CPCSEA) के दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए, ताकि पशु-कल्याण सुनिश्चित हो सके। अनुसंधान के दौरान पशुओं को अनावश्यक पीड़ा या तनाव से बचाना अनिवार्य है तथा सभी प्रक्रियाएँ मानवीय तरीके से की जानी चाहिए। साथ ही, पशुओं की देखभाल और प्रयोग केवल प्रशिक्षित एवं योग्य स्टाफ द्वारा ही किया जाना चाहिए, जिससे सुरक्षा और नैतिकता दोनों बनी रहें।
सीपीसीएसईए दिशा-निर्देश–
- पशुओं पर प्रयोगों के नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण के लिए समिति (CPCSEA) भारत में प्रयोगशाला पशुओं पर होने वाले प्रयोगों की निगरानी एवं नियंत्रण करती है।यह संस्था पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 (Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960) के अंतर्गत कार्य करती है।
- सभी पशु-गृह, प्रजनक तथा अनुसंधान संस्थानों का सीपीसीएसईए में पंजीकरण अनिवार्य है।
- प्रत्येक संस्थान में संस्थागत पशु नैतिकता समिति का गठन आवश्यक है।
- किसी भी शोध परियोजना को प्रारंभ करने से पूर्व नैतिकता समिति की स्वीकृति लेना अनिवार्य है।
- पशु-गृह में नियंत्रित तापमान, आर्द्रता, वायु-संचार तथा स्वच्छता की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।
- पशुओं के लिए संतुलित आहार, स्वच्छ पेयजल एवं नियमित स्वास्थ्य परीक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- त्रि-आर सिद्धांत—वैकल्पिक विधि अपनाना, न्यूनतम संख्या में पशुओं का उपयोग तथा पीड़ा में कमी करना—का पालन अनिवार्य है।
- बीमार पशुओं को पृथक रखना तथा आवश्यकता होने पर मानवीय विधि से जीवन-समापन की व्यवस्था करनी चाहिए।
- नियमों के उल्लंघन की स्थिति में पंजीकरण निरस्त किया जा सकता है तथा विधिक कार्यवाही की जा सकती है।
भारत में कई प्रमुख सरकारी संस्थानों में मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला पशु-गृह (Lab Animal House) संचालित हैं। ये मुख्यतः चिकित्सा, औषधि, जैव-प्रौद्योगिकी और पशु-चिकित्सा अनुसंधान के लिए उपयोग किए जाते हैं। प्रमुख स्थान इस प्रकार हैं:
1.अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), नई दिल्ली
यह भारत का प्रमुख चिकित्सा अनुसंधान संस्थान है। यहाँ उन्नत प्रयोगशाला पशु-गृह सुविधा उपलब्ध है, जहाँ औषधियों, टीकों तथा विभिन्न रोगों पर प्रायोगिक अध्ययन किए जाते हैं। नियंत्रित तापमान, जैव-सुरक्षा तथा नैतिक मानकों के अनुरूप पशुओं की देखभाल की जाती है।
- भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के विभिन्न संस्थान
आईसीएमआर के अंतर्गत देशभर में अनेक राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र संचालित हैं। इन संस्थानों में जैव-चिकित्सीय अनुसंधान, संक्रामक रोग अध्ययन तथा औषधि परीक्षण हेतु मानक पशु-गृह स्थापित हैं। सभी पशु प्रयोग नैतिक समिति की स्वीकृति से किए जाते हैं। - 3. राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (NIV), पुणे
यह संस्थान विषाणुजनित रोगों के अध्ययन में अग्रणी है। यहाँ वैक्सीन विकास, संक्रमण मॉडल और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया के अध्ययन के लिए विशेष जैव-सुरक्षित पशु-गृह सुविधा उपलब्ध है। - भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (IVRI), इज़तनगर, उत्तर प्रदेश
यह देश का प्रमुख पशु-चिकित्सा अनुसंधान केंद्र है। यहाँ पशु रोगों, टीकों तथा औषधियों के विकास हेतु उन्नत पशु-गृह संचालित है, जहाँ वैज्ञानिक मानकों के अनुसार प्रजनन एवं परीक्षण किए जाते हैं। - राष्ट्रीय औषधि शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (NIPER), मोहाली
यह संस्थान औषधि निर्माण, दवा विकास और औषध-परीक्षण में विशेषज्ञ है। यहाँ प्रयोगशाला पशुओं के माध्यम से नई दवाओं की प्रभावकारिता और सुरक्षा का मूल्यांकन किया जाता है। - कोशिकीय एवं आणविकजीवविज्ञान केंद्र (CCMB), हैदराबाद
यह संस्थान आनुवंशिकी, जैव-प्रौद्योगिकी और कोशिकीय अनुसंधान के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ पशु मॉडल का उपयोग कर रोगों की आणविक स्तर पर समझ विकसित की जाती है। - सरकारी चिकित्सा महाविद्यालय एवं कृषि/पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय
देश के विभिन्न राज्यों में स्थित सरकारी मेडिकल कॉलेज तथा पशु चिकित्सा विश्वविद्यालयों में भी मान्यता प्राप्त पशु-गृह स्थापित हैं। इनका उपयोग शिक्षण, शोध तथा औषधि परीक्षण के लिए किया जाता है। ये सभी संस्थान नियामक दिशानिर्देशों के अनुसार कार्य करते हैं।
प्रयोगशाला पशु-गृह की स्थापना कैसे करें
1.कानूनी पंजीकरण– सबसे पहले आपको अपनी संस्था/फर्म (स्वामित्व, साझेदारी या निजी लिमिटेड कंपनी) का पंजीकरण कराना होगा। इसके बाद प्रयोगशाला पशु-गृह के लिए पशुओं पर प्रयोगों के नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण के लिए समिति (CPCSEA) में पंजीकरण अनिवार्य है। बिना CPCSEA अनुमति पशु-गृह संचालित करना अवैध है। यह व्यवस्था पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 (Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960) के अंतर्गत आती है।
2.अवसंरचना की तैयारी– प्रयोगशाला पशु-गृह स्थापित करने के लिए निर्धारित मानकों के अनुरूप आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध होना अनिवार्य है। परिसर में तापमान लगभग 22±3 डिग्री सेल्सियस तथा आर्द्रता 50–60 प्रतिशत के बीच नियंत्रित रखी जानी चाहिए, साथ ही उचित वायु-संचार और प्रकाश व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। नए या संदिग्ध पशुओं के लिए पृथक क्वारंटाइन कक्ष होना आवश्यक है, ताकि संक्रमण का प्रसार रोका जा सके। इसके अतिरिक्त पशुओं के प्रजनन हेतु अलग कक्ष, पिंजरों की धुलाई और कीटाणुशोधन के लिए समुचित क्षेत्र, तथा आहार और बिस्तर सामग्री के सुरक्षित भंडारण की व्यवस्था होनी चाहिए। संपूर्ण परिसर में जैव-सुरक्षा उपायों का पालन करना भी अत्यंत आवश्यक है, जिससे पशुओं और कर्मियों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
3.नैतिक समिति का गठन– यदि आप अनुसंधान हेतु पशु-गृह खोल रहे हैं, तो संस्थागत पशु नैतिकता समिति (IAEC) बनानी होगी, जो प्रत्येक परियोजना को स्वीकृति देगी।
4.तकनीकी स्टाफ– प्रयोगशाला पशु-गृह के संचालन के लिए पंजीकृत पशु-चिकित्सक की देखरेख आवश्यक है, जो पशुओं के स्वास्थ्य और उपचार की जिम्मेदारी संभालता है। इसके साथ प्रशिक्षित पशु-परिचर दैनिक देखभाल और स्वच्छता सुनिश्चित करते हैं, जबकि रिकॉर्ड संधारण अधिकारी सभी प्रजनन और स्वास्थ्य अभिलेख रखता है। पूरे परिसर में नियमित स्वास्थ्य निगरानी और स्वच्छता की व्यवस्था भी आवश्यक है।
5.त्रि-आर (3R) सिद्धांत का पालन– प्रयोगशाला पशु-गृह में कार्य करते समय त्रि-आर (3R) सिद्धांत का पालन अनिवार्य है, जिसके तहत जहाँ संभव हो वैकल्पिक विधियों का उपयोग किया जाता है, प्रयोग में न्यूनतम संख्या में पशुओं का इस्तेमाल किया जाता है और पशुओं की पीड़ा को यथासंभव कम किया जाता है।
6.निरीक्षण एवं अनुमोदन– पशुओं पर प्रयोगों के नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण के लिए समिति (CPCSEA) द्वारा प्रयोगशाला पशु-गृह का स्थल निरीक्षण किया जाता है, और सभी निर्धारित मानकों की पूर्ति होने पर ही पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी किया जाता है। इसके अलावा, पंजीकरण स्थायी नहीं होता; समय-समय पर नवीनीकरण और पुनः निरीक्षण करना आवश्यक होता है ताकि मानक और नियम निरंतर बनाए रखे जा सकें।
7.वित्तीय योजना– प्रयोगशाला पशु-गृह की स्थापना और संचालन के लिए सुदृढ़ वित्तीय योजना आवश्यक है। इसमें प्रारंभिक निवेश लगभग 10–20 लाख रुपये होता है, जो सुविधाओं और इकाई के आकार पर निर्भर करता है। इसके अतिरिक्त मासिक रख-रखाव खर्च भी होना चाहिए, जिसमें पशुओं का आहार, आवश्यक दवाइयाँ, स्टाफ का वेतन, बिजली और अन्य परिचालन व्यय शामिल होते हैं।
उपर्युक्त सभी कदमों को अपनाकर कोई भी व्यक्ति प्रयोगशाला पशु-गृह खोल सकता है और अपनी आय को बढ़ा सकता है। साथ ही, भारत में प्रयोगशाला पशुओं की मांग लगातार बढ़ रही है, इसलिए इन्हें पालना न केवल आर्थिक दृष्टि से लाभकारी है बल्कि यह रोजगार सृजन का भी एक प्रभावी साधन बन सकता है।
References-
- Animal Welfare Board of India. (1960). Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960. Government of India. https://legislative.gov.in
- Committee for the Purpose of Control and Supervision of Experiments on Animals (CPCSEA). (n.d.). Guidelines for laboratory animal facility. Ministry of Environment, Forest and Climate Change, Government of India. http://www.cpcsea.nic.in
- Indian Council of Medical Research. (2010). ICMR ethical guidelines for biomedical research on animals. ICMR. https://www.icmr.gov.in
- World Health Organization. (2017). WHO guidelines on laboratory animal care and use. World Health Organization. https://www.who.int
- National Institutes of Health, National Research Council. (2011). Guide for the care and use of laboratory animals(8th ed.). National Academies Press.
- All India Institute of Medical Sciences (AIIMS). (n.d.). Animal house facility standards. AIIMS, New Delhi. https://www.aiims.edu
- Indian Veterinary Research Institute. (n.d.). Animal house and animal experimentation guidelines. ICAR-IVRI. https://www.ivri.nic.in
- National Institute of Pharmaceutical Education and Research (NIPER). (n.d.). Animal house and research facility guidelines. Ministry of Chemicals and Fertilizers, Government of India. https://www.niper.gov.in
- Centre for Cellular and Molecular Biology (CCMB). (n.d.). Animal facility and ethical standards. Council of Scientific & Industrial Research. https://www.ccmb.res.in
- Indian Council of Medical Research. (2006). National ethical guidelines for biomedical and health research involving animals. ICMR. https://www.icmr.gov.in



