भैंस पालन में वन हेल्थ की भूमिका: रोग नियंत्रण और सुरक्षित दूध उत्पादन
डॉ. सविता, डॉ. सरिता यादव, डॉ. अशोक बूरा एवं डॉ. एफ. सी. टुटेजा
सार
वन हेल्थ एक समन्वित दृष्टिकोण है, जो मानव,पशु और पर्यावरण के स्वास्थ्य को एक साथ जोड़कर सुरक्षित दुग्ध उत्पादन और रोग नियंत्रण को सुनिश्चित करता है। भैंस पालन में अफ्लाटॉक्सिन, कीटनाशक अवशेष, एंटीबायोटिक अवशेष, ब्रुसेलोसिस तथा अन्य जूनोटिक रोग दूध की गुणवत्ता और जनस्वास्थ्य के लिए प्रमुख चुनौतियाँ हैं। स्वच्छ चारा एवं पानी, टीकाकरण, बायोसिक्योरिटी, एंटीबायोटिक की प्रतीक्षा अवधि का पालन तथा नियमित निगरानी प्रणाली अपनाकर एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस और रासायनिक अवशेषों को कम किया जा सकता है। वन हेल्थ आधारित प्रबंधन सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण और टिकाऊ भैंस पालन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
मुख्य शब्द: वन हेल्थ, भैंस पालन, सुरक्षित दूध उत्पादन, अफ्लाटॉक्सिन, कीटनाशक अवशेष, एंटीबायोटिक अवशेष, ब्रुसेलोसिस, जूनोटिक रोग, एएमआर, जनस्वास्थ्य।
भारत एक कृषि एवं पशुपालन प्रधान देश है, जहाँ भैंस पालन किसानों की आय और पोषण सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार है। देश के कुल दूध उत्पादन में भैंसों का बड़ा योगदान है, इसलिए दूध की गुणवत्ता, पशु स्वास्थ्य और मानव स्वास्थ्य को सुरक्षित रखना अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान समय में बदलते पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, रासायनिक पदार्थों के बढ़ते उपयोग, एंटीबायोटिक के अत्यधिक प्रयोग तथा जूनोटिक रोगों के प्रसार ने दुग्ध उत्पादन प्रणाली को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। इन सभी समस्याओं के समाधान के लिए वन हेल्थ दृष्टिकोण को सबसे प्रभावी रणनीति माना जा रहा है, जिसमें मानव, पशु और पर्यावरण के स्वास्थ्य को एक साथ जोड़कर देखा जाता है। वन हेल्थ का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पशुओं से प्राप्त होने वाले दूध और अन्य उत्पाद सुरक्षित हों, पर्यावरण प्रदूषित न हो और मानव स्वास्थ्य पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े। यह दृष्टिकोण विशेष रूप से दुग्ध उत्पादन प्रणाली में महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि दूध सीधे मानव उपभोग में आता है और किसी भी प्रकार का रासायनिक या जैविक प्रदूषण सीधे जनस्वास्थ्य को प्रभावित करता है।
दूध में अफ्लाटॉक्सिन की उपस्थिति एक गंभीर समस्या बनती जा रही है।अफ्लाटॉक्सिन मुख्य रूप से फफूंद लगे चारे और अनाज से उत्पन्न होता है, जिसे भैंसों द्वारा खाने पर यह शरीर में जाकर दूध में अफ्लाटॉक्सिन M1 के रूप में निकलता है। यह विषैला तत्व लंबे समय तक शरीर में रहने पर कैंसर, लीवर की बीमारी और प्रतिरक्षा तंत्र की कमजोरी का कारण बन सकता है। जलवायु परिवर्तन और नमी बढ़ने के कारण चारे में फफूंद लगने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे अफ्लाटॉक्सिन का खतरा और अधिक बढ़ जाता है। इसलिए सूखा और स्वच्छ चारा, उचित भंडारण और नियमित दूध परीक्षण अत्यंत आवश्यक है। वन हेल्थ दृष्टिकोण में दूध को एक संवेदनशील संकेतक माना जाता है, जिससे पूरे कृषि-खाद्य तंत्र की सुरक्षा का आकलन किया जा सकता है।
इसी प्रकार दूध में कीटनाशक अवशेष भी एक बड़ी चिंता का विषय हैं। कृषि में उपयोग होने वाले कीटनाशक चारे, पानी और पशु शेड के माध्यम से भैंसों के शरीर में पहुंच जाते हैं और दूध में अवशेष के रूप में पाए जाते हैं।ऑर्गेनोफॉस्फेट, ऑर्गेनोक्लोरीन, पाइरेथ्रॉयड और कार्बामेट जैसे कीटनाशक मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं। दूषित दूध के सेवन से बच्चों और बुजुर्गों में हार्मोनल असंतुलन, तंत्रिका तंत्र की समस्याएं और अन्य स्वास्थ्य जोखिम बढ़ सकते हैं। इसलिए सुरक्षित चारा, स्वच्छ पानी, सीमित कीटनाशक उपयोग और पशु शेड की साफ-सफाई अत्यंत जरूरी है। वन हेल्थ के अंतर्गत पर्यावरण और कृषि प्रबंधन को भी उतना ही महत्व दिया जाता है जितना पशु और मानव स्वास्थ्य को।
दूध में एंटीबायोटिक अवशेष की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है।भैंसों में मास्टाइटिस और अन्य संक्रमणों के इलाज के दौरान एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग किया जाता है, लेकिन यदि दवा अवशेष प्रतीक्षा अवधि (withdrawal period) का पालन नहीं किया जाता तो दूध में दवा के अवशेष रह जाते हैं। ऐसे दूध के सेवन से एलर्जी, आंतों के माइक्रोबायोम में बदलाव और बच्चों में विकास संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। एंटीबायोटिक अवशेष से एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) का खतरा भी बढ़ जाता है, जो आज वैश्विक स्वास्थ्य संकट बन चुका है। AMR के कारण बैक्टीरिया दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं, जिससे सामान्य संक्रमण का इलाज भी कठिन हो जाता है। इसलिए एंटीबायोटिक का नियंत्रित उपयोग, दवा अवशेष प्रतीक्षा अवधि का पालन, नियमित दूध जांच और पशु चिकित्सक की सलाह का पालन करना अत्यंत आवश्यक है।
ब्रुसेलोसिस भैंसों में पाया जाने वाला एक प्रमुख जूनोटिक रोग है, जो मानव में भी फैल सकता है।इस रोग के कारण पशुओं में गर्भपात, दूध उत्पादन में कमी और कमजोरी देखी जाती है, जबकि मनुष्यों में बुखार, थकान और दीर्घकालिक बीमारी हो सकती है। यह रोग पशुपालकों, पशु चिकित्सकों और डेयरी कर्मचारियों के लिए एक व्यावसायिक खतरा माना जाता है। भारत सरकार द्वारा ब्रुसेलोसिस नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर टीकाकरण और निगरानी कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, जिससे इस रोग को नियंत्रित किया जा सके। दूध को उबालकर पीना और संक्रमित पशुओं को पशु निष्कासन करना इसके नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
ट्यूबरकुलोसिस, स्कारलेट फीवर, सेप्टिक सोर थ्रोट और रेबीज जैसे रोग भी पशु-मानव संपर्क के माध्यम से फैल सकते हैं और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं। ट्यूबरकुलोसिस दूषित दूध और संक्रमित पशुओं के संपर्क से फैल सकता है, जबकि स्कारलेट फीवर और सेप्टिक सोर थ्रोट बैक्टीरियल संक्रमण के कारण होते हैं और स्वच्छता की कमी व दूषित दूध से फैलते हैं। रेबीज एक घातक वायरल रोग है जो संक्रमित पशु या कुत्ते के काटने से फैलता है और समय पर उपचार न मिलने पर मृत्यु का कारण बन सकता है। इन सभी रोगों से बचाव के लिए टीकाकरण, स्वच्छता, जागरूकता और नियमित स्वास्थ्य जांच अत्यंत आवश्यक है।
वन हेल्थ दृष्टिकोण में पशुपालकों, वैज्ञानिकों, पशु चिकित्सकों,पर्यावरण विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं की संयुक्त भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। सुरक्षित दूध उत्पादन के लिए स्वच्छ चारा, साफ पानी, उचित टीकाकरण, बायोसिक्योरिटी, दवाओं का नियंत्रित उपयोग और नियमित निगरानी प्रणाली अपनाना आवश्यक है। दूध उत्पादन केवल आर्थिक गतिविधि नहीं है बल्कि यह जनस्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ है। इसलिए वन हेल्थ आधारित निगरानी प्रणाली अपनाकर दूध और पशु उत्पादों को सुरक्षित बनाया जा सकता है तथा मानव, पशु और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि वन हेल्थ दृष्टिकोण भविष्य की दुग्ध उत्पादन प्रणाली के लिए अत्यंत आवश्यक है। सुरक्षित दूध, स्वस्थ पशु और स्वच्छ पर्यावरण ही स्वस्थ समाज की आधारशिला हैं। यदि हम वैज्ञानिक प्रबंधन, जागरूकता और समन्वित प्रयासों को अपनाएं तो भैंस पालन को सुरक्षित,लाभकारी और टिकाऊ बनाया जा सकता है तथा जनस्वास्थ्य को बेहतर बनाया जा सकता है।
आईसीएआर–केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान (CIRB), हिसार, हरियाणा



