जूनोटिक रोग: पशु उत्पादों से जुड़ी एक वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती

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जूनोटिक रोग: पशु उत्पादों से जुड़ी एक वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती

नम्रता अग्रवाल, रविंदर, सृष्टि पटेल एवं अम्बाश्री दुबे

भाकृअनुप–भारतीय पशु-चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, इज्जतनगर–243122, उत्तर प्रदेश

अनुरूपी लेखक, ई-मेल: agrawal.namrata.1995@gmail.com

परिचय:

हमारे भोजन की थाली में आने वाले पशु उत्पाद—जैसे दूध, मांस, अंडे, मछली और समुद्री खाद्य पदार्थ—पोषण का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। लेकिन यदि इनका उत्पादन, प्रसंस्करण, भंडारण या पकाने की प्रक्रिया सुरक्षित न हो, तो यही उत्पाद मनुष्यों तक कई खतरनाक रोगजनकों को पहुँचा सकते हैं। ऐसे रोग, जो पशुओं से मनुष्यों में फैलते हैं, जूनोटिक रोग कहलाते हैं। जूनोटिक रोग आज वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चिंता बन चुके हैं। उभरते और पुनः उभरते संक्रामक रोगों का बड़ा भाग पशु स्रोतों से जुड़ा पाया गया है। मनुष्यों, पशुओं और पर्यावरण के बीच बढ़ता संपर्क, वन्यजीवों के आवासों में हस्तक्षेप, पशु उत्पादों का वैश्विक व्यापार और बदलती खाद्य आदतें इन रोगों के जोखिम को और बढ़ा रही हैं। इसलिए अब केवल मानव स्वास्थ्य पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए “वन हेल्थ” दृष्टिकोण आवश्यक है, जिसमें मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य को एक साथ समझा जाता है।

भोजन कैसे बनता है संक्रमण का माध्यम?

दूषित भोजन जूनोटिक रोगों के प्रसार का एक प्रमुख माध्यम है। यदि मांस, दूध, अंडे या मछली जैसे पशु उत्पाद स्वच्छ परिस्थितियों में तैयार न किए जाएँ, ठीक से संग्रहीत न हों या पर्याप्त रूप से पकाए न जाएँ, तो ये खाद्य-जनित रोगों का कारण बन सकते हैं।

Salmonella, Campylobacter और शिगा टॉक्सिन उत्पादक Escherichia coli जैसे रोगजनक पशु उत्पादों से जुड़े प्रमुख खाद्य-जनित खतरे हैं। ये संक्रमण सामान्य दस्त से लेकर गंभीर जटिलताओं, जैसे गुर्दे की विफलता और हेमोलिटिक यूरेमिक सिंड्रोम, तक का कारण बन सकते हैं। अधपका मांस, असुरक्षित खाद्य हैंडलिंग, खराब स्वच्छता और कच्चे-पके खाद्य पदार्थों का आपसी संपर्क संक्रमण के जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है।

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जूनोटिक रोग क्यों बढ़ रहे हैं?

जूनोटिक रोगों के बढ़ने के पीछे केवल रोगजनक जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि हमारी जीवनशैली और पर्यावरण में हो रहे बदलाव भी इसकी बड़ी वजह हैं। वनों की कटाई, शहरीकरण, कृषि विस्तार, पशु व्यापार और वन्यजीवों के आवासों में मानव दखल ने मनुष्यों, पशुधन और वन्यजीवों को पहले से अधिक नजदीक ला दिया है।

जूनोटिक रोगों का उद्भव सामान्यतः तीन चरणों में समझा जा सकता है। पहले चरण में रोगजनक अपने प्राकृतिक पशु भंडार में रहता है। दूसरे चरण में वह वन्यजीवों या पालतू पशुओं के माध्यम से मनुष्यों तक पहुँचता है। तीसरे चरण में यदि वह मानव-से-मानव संचरण में सक्षम हो जाए, तो स्थानीय संक्रमण महामारी का रूप ले सकता है। COVID-19 ने दुनिया को यह स्पष्ट रूप से दिखाया कि स्थानीय स्तर पर शुरू हुआ संक्रमण कैसे वैश्विक संकट बन सकता है।

गीले बाजार: संक्रमण का संवेदनशील केंद्र

गीले बाजारों में जीवित पशुओं की बिक्री, परिवहन और कई बार वहीं वध करने की प्रक्रिया मनुष्यों और पशुओं के बीच अत्यधिक निकट संपर्क बनाती है। जब अलग-अलग प्रजातियों के पशु एक ही स्थान पर रखे जाते हैं, तो रोगजनकों को एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति में जाने का अवसर मिल सकता है।

भीड़, तनाव, खराब स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन की कमी ऐसे बाजारों को जूनोटिक रोगों के लिए संवेदनशील बना देती है। एवियन इन्फ्लूएंजा और SARS जैसे प्रकोपों ने यह दिखाया है कि जीवित पशु बाजार सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए कितना बड़ा जोखिम बन सकते हैं। इसलिए इन बाजारों का पूर्ण प्रतिबंध ही एकमात्र समाधान नहीं है, बल्कि बेहतर नियमन, स्वच्छता, निरीक्षण और अवैध वन्यजीव व्यापार पर नियंत्रण अधिक व्यावहारिक और आवश्यक उपाय हैं।

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मछली और जलीय उत्पादों से जुड़े जोखिम

जूनोटिक रोग केवल स्थलीय पशुओं तक सीमित नहीं हैं। मछली और अन्य जलीय जीवों से भी कई रोगजनक मनुष्यों तक पहुँच सकते हैं। कच्ची या अधपकी मछली, दूषित समुद्री खाद्य पदार्थ और असुरक्षित प्रसंस्करण बैक्टीरिया, परजीवी और कवकजनित संक्रमणों का कारण बन सकते हैं।

जलीय कृषि के विस्तार, मछली की बढ़ती खपत और अंतरराष्ट्रीय व्यापार ने इन जोखिमों को बढ़ाया है। ऐसे में मछली उत्पादों की सुरक्षा के लिए उचित तापीय प्रसंस्करण, फ्रीजिंग, स्वच्छ हैंडलिंग, सुरक्षित जल प्रबंधन और नियमित रोगजनक निगरानी आवश्यक है।

खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों में छिपे रोगजनक

कुछ रोगजनक खाद्य प्रसंस्करण वातावरण में लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं। Listeria monocytogenes, Salmonella enterica और Cronobacter sakazakii जैसे जीवाणु सतहों, उपकरणों, जल निकासी प्रणालियों और भंडारण क्षेत्रों में बने रहकर खाद्य पदार्थों को बार-बार दूषित कर सकते हैं।

इसी कारण खाद्य उद्योग में केवल अंतिम उत्पाद की जाँच पर्याप्त नहीं होती। प्रसंस्करण वातावरण की नियमित निगरानी, HACCP प्रणाली, स्वच्छता मानक संचालन प्रक्रिया और “खोजो और समाप्त करो” जैसी रणनीतियाँ अत्यंत आवश्यक हैं।

रोकथाम: समाधान कहाँ है?

जूनोटिक रोगों को रोकने के लिए एक ही उपाय पर्याप्त नहीं है। इसके लिए कई स्तरों पर काम करना होगा। पशुओं का टीकाकरण, सुरक्षित पशुपालन, स्वच्छ वधशालाएँ, खाद्य प्रसंस्करण में स्वच्छता, उचित पकाने की विधि, कोल्ड-चेन प्रबंधन और उपभोक्ताओं में जागरूकता – ये सभी उपाय मिलकर संक्रमण की श्रृंखला को तोड़ सकते हैं।

वन हेल्थ दृष्टिकोण इस पूरी प्रक्रिया का आधार है। इसमें डॉक्टर, पशु चिकित्सक, खाद्य वैज्ञानिक, पर्यावरण विशेषज्ञ, नीति-निर्माता और आम जनता सभी की भूमिका होती है। एंटीबायोटिक दवाओं का विवेकपूर्ण उपयोग भी अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि रोगाणुरोधी प्रतिरोध जूनोटिक संक्रमणों के उपचार को और कठिन बना सकता है।

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निष्कर्ष

पशु उत्पाद हमारे भोजन और पोषण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन इनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना उतना ही आवश्यक है। जूनोटिक रोग हमें यह सिखाते हैं कि मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। यदि पशु उत्पादों की उत्पादन श्रृंखला में स्वच्छता, निगरानी, सुरक्षित प्रसंस्करण और वैज्ञानिक खाद्य सुरक्षा उपायों को अपनाया जाए, तो जूनोटिक रोगों के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। आज आवश्यकता है कि हम भोजन को केवल पोषण का स्रोत न समझें, बल्कि उसे सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा की दृष्टि से भी देखें। सुरक्षित पशु उत्पाद, स्वस्थ पशु और संतुलित पर्यावरण—यही भविष्य की सुरक्षित खाद्य प्रणाली की आधारशिला हैं।

 

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