ब्रुसेलोसिस: रोगजनन, निदान, उपचार एवं नियंत्रण की समीक्षा
Nagendra Singh*1, Anupama Verma2, Rishi kumar3
1Assistant professor, Shourabh College Of Veterinary Science, Kheda,
Hindauncity, Karauli (322234), Rajsthan
2 Division of Veterinary Medicine, ICAR-Indian Veterinary Research Institute, Izatnagar, Bareilly, Uttar Pradesh, India, 243122
3Division of Livestock Product Technology, ICAR-Indian Veterinary Research Institute, Izatnagar, Bareilly, Uttar Pradesh, India, 243122
Corresponding author: snagendrasingh23@gmail.com
ब्रुसीलोसिस एक पशुजन्य संक्रामक रोग है जो ब्रुसेला जीवाणु के कारण होता है। यह बीमारी मुख्यतः गाय, भैंस, भेड़, बकरी, शुकर एवं कुत्तों में पायी जाती हैं। यह बीमारी एक गंभीर जूनोटिक बीमारी है, जो पशुओं से मनुष्यों में फैलती है। इस रोग को कई अन्य नामों से भी जाना जाता है, जैसे अंडुलेंट फीवर, क्रीमियन फीवर, मेडिटेरेनियन फीवर, रिमिटिंग फीवर, माल्टीज़ फीवर, गोट फीवर, जिब्राल्टर फीवर और बोवाइन ब्रुसीलोसिस (संक्रामक गर्भपात या बैंग्स डिजीज)। पशुओं में यह मुख्य रूप से प्रजनन तंत्र को प्रभावित करता है, जिससे गर्भपात, बाँझपन और उत्पादन क्षमता में कमी आती है। इस बीमारी से ग्रस्त पशु में 7-9 महीने के गर्भकाल मैं गर्भपात हो जाता है। ये रोग पशुशाला में बड़े पैमाने पर फैलता है तथा पशुओं में गर्भपात कराता है जिससे बहुत अधिक आर्थिक हानि होती है। ये बीमारी मनुष्य के स्वास्थ्य एवं आर्थिक दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण बीमारी है। विश्व स्तर पर लगभग 5 लाख मनुष्य हर साल इस रोग से ग्रस्त हो जाते हैं।
कारण
ब्रुसेला जीवाणु ग्राम-नेगेटिव कोक्कोबैसिली होते हैं, जिनमें मुख्य रूप से ब्रुसेला एबॉर्टस, ब्रुसेला मेलिटेंसिस तथा ब्रुसेला सुइस शामिल होते हैं। ये जीवाणु जीवनपर्यंत संक्रमित पशु के दूध और गर्भाशय स्राव से निकलता रहता है।
संचरण
ब्रुसेलोसिस पशुओं एवं मनुष्यों में भिन्न भिन्न प्रकार से फैलता है। सामान्यतः पशुओं में यह दूषित चारे/जल एवं गर्भपातित सामग्री के संपर्क से होता है; जबकि मनुष्यों में बिना पाश्चरीकृत दुग्ध एवं दुग्ध उत्पाद प्रमुख स्रोत हैं। संचरण के प्रमुख मार्गों का विवरण निम्न तालिका में दिया जा रहा है:
| क्रम | संचरण मार्ग | पशुओं में | मनुष्यों में
|
| 1. | मुंह के माध्यम से | दूषित चारा, जल, दुध पीने (जन्म के बाद) से एवं संक्रमित सामग्री जैसे गिरे हुए भ्रूण से | बिना पाश्चुरीकृत दूध एवं डेयरी उत्पाद (पनीर, मक्खन) का सेवन |
| 2. | सीधे संपर्क से | गर्भपातित भ्रूण, अपरा झिल्ली, गर्भाशय स्राव के संपर्क से | संक्रमित पशु के ऊतकों, रक्त, स्राव को छू“” से (पशुपालक, डॉक्टर, कसाई) |
| 3. | श्वसन द्वारा (एयरोसॉल) | दूषित वातावरण में धूल/बूंदों के श्वसन से | प्रयोगशाला दुर्घटनाएँ; खलिहानों में दूषित धू’ |
| 4. | त्वचा के घाव द्वारा | चारागाह में काँटे/नुकीली वस्तुओं से | चोट या खरोंच वाली त्वचा के संपर्क में ”ने से (व्यावसायिक जोखिम) |
| 5. | यौन संपर्क द्वारा | संक्रमित साँड़ के साथ प्राकृतिक मैथुन/ संक्रमित वीर्य से कृत्रिम गर्भाधान। द्वारा | अत्यंत दुर्लभ (इक्का-दुक्का मामले) |
| 6. | ऊर्ध्वाधर (माँ से बच्चे में) | गर्भनाल के माध्यम से (गर्भावस्था में) | दुर्लभ (गर्भावस्था के दौरान या स्तनपान”से) |
| 7. | दूषित उपकरणों से | दूध निकालने की मशीन, सुई, पशु चिकित्सा उपकरण | प्रयोगशाला उपकरण, सीरिंज (व्यावसायिक जोखिम) |
रोगजनन
ब्रुसेला प्रजाति के जीवाणु ऐच्छिक अंतःकोशकीय रोगजनक होते हैं जो मेजबान की फागोसाइटिक कोशिकाओं के अंदर जीवित रहने और प्रजनन करने में सक्षम होती हैं। यह अंतःकोशकीय अनुकूलन उन्हें प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया से बचने और पुराने संक्रमण को स्थापित करने की क्षमता प्रदान करता है। प्रमुख विषाणु कारक हैं:
- लिपोपोलिसैकराइड: इन्हें प्रतिरक्षा तंत्र से बचाव।
- यूरिएज: इन्हेंअम्लीय वातावरण में जीवित रहने में सहायक।
- साइक्लिक न्यूक्लियोटाइड्स cAMP, GMP:कोशिकीय क्रिया में हस्तक्षेप करते हैं।
- VirB Operon: कोशिकीय जीवन के लिए आवश्यक प्रोटीन बनाता है।
- 24-kDa प्रोटीन: (प्रतिरक्षा से बचाव करता है।
लक्षण
ब्रुसेलोसिस के लक्षणों को मुख्यतः 2 भागों में बांटा जा सकता है: 1) पशुओं में एवं, 2) मनुष्यों में। नीचे दी गई तालिका में पशु एवं मनुष्यों के लक्षणों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है:
| क्रम | पशुओं के लक्षण | मनुष्यों में लक्षण |
| 1. | गर्भपात (7-9 माह में, 30-80%) | अंडुलेंट बुखार (बार बार केबुखार का आना) |
| 2. | अपरा अवरोधन (प्लेसेंटा नहीं गिरता) | रात को अत्यधिक पसीना (विशिष्ट लक्षण) |
| 3. | बाँझपन (बार-बार गर्भधारण में असफल) | जोड़ों में दर्द |
| 4. | ऑर्काइटिस (नर में अंडकोश सूजन) | अत्यधिक थकान (महीनों तक बनी रह सकती है) |
| 5. | हाइग्रोमा (घुटने/कंधे पर मुलायम सूजन) | हेपेटोस्प्लेनोमेगाली (यकृत+प्लीहा बढ़ना) |
| 6. | दूध उत्पादन में गिरावट | सामान्यीकृत लिम्फैडेनोपैथी (लिम्फ नोड्स बढ़ना |
रोगविज्ञान
पशुओं में ब्रुसेलोसिस के प्रमुख रोगविज्ञानी परिवर्तनों में लिम्फ नोड्स एवं प्रजनन अंगों में ग्रैनुलोमेटस सूजन, गर्भाशय में नेक्रोटिक प्लेसेंटाइटिस, यकृत-प्लीहा का बढ़ना, तथा फेफड़ों में ब्रॉन्कोप्न्युमोनिया एवं कॉब्लस्टोन जैसे घाव शामिल हैं, जो अंततः गर्भपात, बाँझपन एवं प्रणालीगत रोग का कारण बनते हैं। मानव ब्रुसेलोसिस मुख्यतः ब्रुसेला मेलिटेंसिस (सर्वाधिक विषाणुजनक एवं प्रचलित) एवं ब्रुसेला कैनिस से होता है, जिसमें बुखार, थकान, जोड़ों में दर्द, हेपेटोस्प्लेनोमेगाली एवं गंभीर मामलों में न्यूरोब्रुसेलोसिस जैसे लक्षण देखे जाते हैं। उल्लेखनीय है कि कम संक्रामक खुराक के कारण ब्रुसेला को संभावित जैविक हथियार के रूप में वर्गीकृत किया गया है, तथा यद्यपि व्यक्ति-से-व्यक्ति संचरण दुर्लभ है, प्रकोप प्रायः एक सामान्य दूषित स्रोत से जुड़े होते हैं।
निदान
ब्रुसेलोसिस के निदान हेतु प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के परीक्षणों का उपयोग किया जाता है। नैदानिक इतिहास एवं लक्षणों के आधार पर संदेह होने के बाद, प्रयोगशाला परीक्षणों द्वारा पुष्टि की जाती है। मुख्य निदान विधियाँ निम्नलिखित हैं:
| क्रम | विधि | विवरण |
| 1. | नैदानिक इतिहास | गर्भावस्था की अंतिम तिमाही (7-9 माह) में गर्पपात का इतिहास – प्रमुख संकेत |
| लक्षण देखना | जेर (अपरा) का रुकना, गर्भाशय की सूजन” नर पशुओं में अंडकोष की सूजन, पैरों के जोड़ों प’ हाइग्रोमा | |
| विशिष्ट पहचान | गर्भपात के बाद चमड़े जैसा जेर निकलना | |
| 4. | प्रयोगशाला जांच | योनि स्राव / दूध / रक्त / जेर की जांच
रोज़ बंगाल टेस्ट (RBPT): क्षेत्र में स्क्रीनिंग हेतु सरल एवं तीव्र ELISA / PCR: सटीक पुष्टि हेतु |
| 5. | मनुष्यों में निदान | रक्त / वीर्य की जांच” तेज बुखार एवं जोड़ों में दर्द का इतिहास |
उपचार (ट्रीटमेंट)
पशुओं में चिकित्सा: बोवाइन ब्रुसेलोसिस के लिए एंटीबायोटिक उपचार सीमित प्रभावकारिता रखता है। यद्यपि ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन (20 mg/kg IM, हर तीसरे दिन, 14 दिन) एवं स्ट्रेप्टोमाइसिन (20 mg/kg IM, प्रतिदिन, 7 दिन) का संयोजन कुछ प्रभाव दिखाता है, तथापि उच्च लागत, दूध/मांस में अवशेषों का जोखिम एवं अपूर्ण निदान के कारण उपचार को प्रोत्साहित नहीं किया जाता। अधिकांश राष्ट्रीय नियंत्रण कार्यक्रम टेस्ट-एंड-स्लॉटर (परीक्षण एवं वध) नीति पर आधारित हैं।
मानव ब्रुसेलोसिस में चिकित्सा: WHO के अनुसार, मानव ब्रुसेलोसिस के लिए प्रथम-पंक्ति उपचार है:
- डॉक्सीसाइक्लिन (100 mg दिन में दो बार, 6 सप्ताह) + रिफैम्पिसिन (600-900 mg/दिन, 6 सप्ताह)
- वैकल्पिक: डॉक्सीसाइक्लिन + स्ट्रेप्टोमाइसिन (1g/दिन, 14-21 दिन)
गर्भवती महिलाओं एवं बच्चों में रिफैम्पिसिन + TMP-SMX का उपयोग किया जाता है। उपचार न लेने पर मृत्यु दर 2-5% तक हो सकती है (मुख्यतः एंडोकार्डाइटिस के कारण)।
नियंत्रण (कंट्रोल)
- टीकाकरण
| टीका | प्रजाति | टीकाकरण की आयु | प्रभावकारिता | विशेषता |
| S19 (संजीव क्षीण) | गोवंश, भैंस | 4-8 माह (केवल मादा) | 80-95% | आजीवन प्रतिरक्षा, परन्तु मानव में रोगजनक |
| RB51 (संजीव क्षीण) | गोवंश | 4-12 माह (केवल मादा) | 70-90% | मानव के लिए सुरक्षित, गर्भवती में वर्जित |
| Rev.1 | बकरी, भेड़ | 3-6 माह | 95% | बी. मेलिटेंसिस के लिए |
- प्रमुख नियंत्रण रणनीतियाँ
- टेस्ट-एंड-स्लॉटर (परीक्षण एवं वध) सीरोपॉजिटिव पशुओं की पहचान कर उनका वध; विकसित देशों में सफल।
- टेस्ट-एंड-सेग्रीगेशन (परीक्षण एवं पृथक्करण) भारत जैसे देशों में व्यावहारिक; सकारात्मक पशुओं को अलग रखें।
- जैव सुरक्षा (Biosecurity) पशुशाला की सफाई, कीटाणुशोधन, नए पशुओं की क्वारंटीन।
- आवाजाही नियंत्रण संक्रमित क्षेत्रों से पशुओं के परिवहन पर रोक।
- दूध का पाश्चुरीकरण सभी वाणिज्यिक दूध का अनिवार्य पाश्चुरीकरण।
- सार्वजनिक जागरूकता पशुपालकों को रोग के खतरों एवं बचाव के उपायों की शिक्षा।
- एक स्वास्थ्य (One Health) दृष्टिकोण
ब्रुसेलोसिस के प्रभावी नियंत्रण हेतु पशु चिकित्सा, मानव चिकित्सा एवं पर्यावरण विज्ञान के समन्वय की आवश्यकता है। यह दृष्टिकोन निम्नलिखित पर जोर देता है:
- पशुओं में टीकाकरण एवं निगरानी।
- मनुष्यों में तीव्र निदान एवं उपचार।
- दूध एवं डेयरी उत्पादों की गुणवत्ता नियंत्रण।
- पशुपालकों एवं पशु चिकित्सकों की व्यावसायिक सुरक्षा।
निष्कर्ष
ब्रुसेलोसिस एक अत्यंत गंभीर ज़ूनोटिक रोग है, जो भारत में पशु एवं मानव स्वास्थ्य दोनों को व्यापक रूप से प्रभावित करता है। इस रोग की अंतःकोशिकीय प्रकृति, अत्यंत कम संक्रामक खुराक (10-100 जीवाणु) एवं दीर्घकालिकता इसके नियंत्रण में एक बड़ी चुनौती बनती है। पशुओं में इस रोग का कोई प्रभावी एवं व्यावहारिक उपचार उपलब्ध नहीं है। अतः टीकाकरण, परीक्षण-एवं-पृथक्करण, जैव सुरक्षा उपाय तथा दूध का पाश्चुरीकरण ही इस पर नियंत्रण के एकमात्र प्रभावी साधन हैं। मनुष्यों में दीर्घकालिक दोहरी एंटीबायोटिक चिकित्सा (जैसे डॉक्सीसाइक्लिन + रिफैम्पिसिन) अनिवार्य है, जिसे पूरा करना अत्यंत आवश्यक है। इस रोग के सफल उन्मूलन हेतु एक स्वास्थ्य (One Health) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। पशु चिकित्सा, मानव चिकित्सा, पर्यावरण विज्ञान एवं नीति निर्माताओं का सम्मिलित प्रयास से ही ब्रुसेलोसिस को जड़ से समाप्त किया जा सकता है।
References
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