मादा पशुओ में प्रजनन सम्बन्धी प्रमुख समस्यायें:  कारण, उपचार एवं बचाव

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मादा पशुओ में प्रजनन सम्बन्धी प्रमुख समस्यायें:  कारण, उपचार एवं बचाव

Major Reproductive Problems in Female Animals: Causes, Treatment, and Prevention

चेतना गंगवार, बृजेश  कुमार यादव, सोभित एवं पवन कुमार

 दीनदयाल उपाध्याय पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय, मथुरा (उ.प्र.)

  1. गर्भाशयका बाहर निकलना या गर्भाशय एवं योनि का भ्रंश

बच्चेदानी के पूरे अथवा कुछ अंश का योनि से बाहर निकलने को प्रोलेप्स या बच्चेदानी का बाहर निकलना कहते हैं। यह मुख्यतः गर्भावस्था के अंतिम महीनों में और ब्याने के कुछ घण्टों बाद होता है। यह रोग कमजोर पशुओं में अधिक होता है। पशुओं को कम पौष्टिक स्थूल आहार खिलाने से भी यह रोग उत्पन्न हो सकता है। इसका विभाजन हम दो आधारों पर कर सकते हैं:

गर्भावस्था के आधार पर

ब्याने के पहले का प्रोलेप्सः  यह मुख्यतः गर्भावस्था के अंतिम महीनों (मुख्यतः 8-10 महीनों के बीच) में होता है। इसमें गर्भकाल के अन्त में गर्भाशय बाहर निकल आता है। गर्भाशय एवं योनि का बाहर लटकना, भ्रंश कहलाता है।

ब्याने के बाद का प्रोलेप्सः यह मुख्यतः ब्याने के कुछ घण्टों बाद होता है और मुख्यतः पूरी बच्चेदानी बाहर आ जाती है।

 बच्चेदानी के भाग के आधार पर

गर्भाशय ग्रीवा एवं योनि का प्रोलेप्स इसमें केवल गर्भाशय ग्रीवा और योनि का कुछ भाग बाहर आता है।

गर्भाशय (बच्चेदानी) का प्रोलेप्स इसमें पूरी बच्चेदानी बाहर आ जाती है और गर्भाशय की गाठें बाहर दिखती

है।

कारण

  • इस्ट्रोजनहारमोन का अधिक साव, शरीर में कैल्शियम की कमी ।
  • योनिऊतकों में अत्यधिक वसा का जमा होना है
  • गुदामार्ग का रोग अथवा कड़ा गोबर करना
  • प्रसवमें कठिनाई एवं तदोपरांत गर्भाशय में घाव बनना
  • ब्यानेके समय अधिक जोर लगाने से गर्भाशय का अनियमित संकोचन, हाथ डालकर जोर से खींचना, जेर का न डालना तथा रूमेन की फैलावट इत्यादि इस के मुख्य कारण है।

लक्षण 

  • गर्भाशयके भागों का योनि से बाहर दिखना। गर्भकाल के अन्त में दोनों भगओष्ठ के बीच एक रक्त वर्ण गाँठ दिखलाई देती है। अन्दर की श्लेष्मिक झिल्ली भी सूजी रहती है और योनि से लसलसा सा पदार्थ भी निकलता रहता है। इसमें पशु लगातार बेचैन रहता है और पूरी बच्चेदानी को योनि मार्ग से बाहर निकालने का बार-बार प्रयास करता है। कभी-कभी गर्भाशय का इतना अधिक भाग बाहर निकल आता है कि दोनों जाँघो के बीच में लटकने लगता है और गर्भाशय ग्रीवा भी बाहर दिखाई देने लगती है। गर्भाशय के ऊपर गर्भाशय की गाँठें भी उपस्थित होते है जो कि गर्भाशय भ्रस की मुख्य पहचान है।

 उपचार / चिकित्सा

  • उपरोक्तलक्षणों के अनुसार रोग के लक्षण देखकर रोग का निदान किया जाता है।
  • निकलेहुये भाग को लाल दवा (पोटेशियम परमैगनेट) से धो देना चाहिए और इसके उपरांत गीला साफ सूती कपड़ा बाहर निकले बच्चेदानी के भाग पर लपेट देना चाहिए।
  • तदोपरान्तजल्द से जल्द पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

 ऐन्टीसेप्टिकविधि द्वाराः  गर्भाशय को अपनी सामान्य स्थिति में अन्दर वापस कर देना चाहिए। इसको अन्दर करने की विधियों निम्न प्रकार है:-

() ट्रस

  • पशुको अच्छी तरह जकड़ने के बाद पिछले भाग को सुन्न करने के लिये रीड़ की हड्डी में सुन्न की दवा लगानी चाहिए ।
  • इसकेबाद उसके पेशाब को पतली नली के द्वारा बाहर निकालना चाहिए
  • बाहरनिकले भाग पर निओस्पोरिन और जाइलोकेन की जेली का लेपन कर हाथ की मुठ्‌ठी बनाकर बच्चेदानी के भाग को उसके प्राकृतिक अवस्था में कर देना चाहिए।
  • हाथसे गर्भाशय को ठीक प्रकार से अन्दर कर के भगओष्ठ को रस्से की सहायता से मजबूती से बाँध देते है जिस से कि गर्भाशय बाहर न जा सके।

() बुनर/वायरसुचर

इसमें सिलने वाली तार को भग की भगओष्ठ के अन्दर डालकर उसको गोल छल्लों के रूप में मोड़ देते है। जिससे कि वे अन्दर की स्थिति को सामान्य रखे और गर्भाशय को बाहर न आने दें। 7 से 10 दिन बाद टॉके निकाल देना चाहिए।

() वेस्टक्लॅप

यह एक विशेष प्रकार का क्लैप इसी रोग के उपचार हेतु उपयोग करते है। आवश्यकतानुसार इसका आकार भिन्न-भिन्न होता है। इस विधि में भी गर्भाशय को ठीक प्रकार से अन्दर डालकर भग से भगओष्ठ के ऊपर इस क्लैप को कस देते है जिससे वह फिर बाहर नही आ पाता।

रखरखाव एवं बचाव

  • रोगीपशु को स्वच्छ वातावरण में रखना चाहिए और संतुलित आहार देना चाहिए।
  • पशुके पिछले भाग की साफ सफाई का विशेष ध्यान देना चाहिए।
  • टॉकोंकी जगह मलहम और मक्खी प्रतिरोधक स्प्रे का इस्तेमाल करना चाहिए।
  • पशुको कैल्शियम और फास्फोरस का घोल पिलाना चाहिए और बच्चेदानी वर्धक घोल पिलाना चाहिए।
  • हराचारा व मैग्नीशियम सल्फेट पशु को खिलाना चाहिए ताकि गोबर पतला हो।
  • ब्यॉतसे पहले बच्चेदानी का भाग बाहर आता है तो उसमें एंटीबायोटिक और प्रोजेस्ट्रोन का इन्जेक्सन भी लगा देना चाहिए। साथ ही साथ कैल्शियम भी पिलाना चाहिए।

यह एक गम्भीर रोग है, समय पर और सही ढंग से उपचार न करने पर बच्चेदानी में मवाद पड़ सकती है। इससे पशु के दुग्ध उत्पादन में कमी, बाँझपन और पशु की मृत्यु भी हो सकती है।

  1. प्रसूतिलकवा

यह रोग मादा पशुओं के ब्याने के कुछ देर पश्चात होता है। इसमें स्वस्थ पशु अकस्मात लेट जाता है और बीमार पड़ जाता है। यही इसकी मुख्य पहचान है।

लक्षण

 पशु नीचे जमीन पर लेट जाता है। पशु खड़ा नही हो सकता है परीक्षण करने पर पशु की नाड़ी तथा श्वांस दर और शरीर का तापमान सामान्य रहते है। पशु का परीक्षण जब कमर के पीछे या कान के पीछे के भाग मे किया जाता है तो उसे छूने पर भी कोई हलचल नही होती है। यही लकवा की मुख्य पहचान भी है।

चिकित्सा/उपचार

  • रोगीपशु को दस्तावर आहार देना चाहिए दस्तावर औषधियों जैसे मैगसल्फ इत्यादि देनी चाहिए।
  • स्ट्रैचनीनका टीका लगाना चाहिए।
  1. गर्भाशयशोथ(मेट्राइटिस)
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इस रोग में गर्भाशय में सूजन हो जाती है जो प्रायः जीवाणुओं के संक्रमण के कारण होती है। सूजन में मवाद भर जाती है और रोग अधिक बढ़ने पर पशु की मृत्यु भी हो सकती है। 

कारण

 रोग उत्पन्न करने वाले जीवाणु स्ट्रेप्टोकोकाई, स्टैफिलोकोकाई. कोरिनीबैक्टीरियमपायोजिनीस, माइकोबैक्टीरियमट्यूबर कुलोसिस तथा कोलीफार्म जीवाणु मुख्य हैं।

लक्षण

 उग्र गर्भाशय शोथ (अक्यूट मेट्राइटिस)

  • अधिकतीव रोग में श्लेष्मिक झिल्ली सूज कर लाल हो जाती है तथा पशु बेचैन रहता है।
  • प्रारम्भिकअवस्था में बहुत अधिक बुखार होता है जो बाद में सामान्य से कम हो जाता है।
  • रोगीपशु की योनि में से गन्दा रक्त मिश्रत मवाद बाहर निकलता रहता है।
  • पशुबार-बार पेशाब करता है।

दीर्घकालीन गर्भाशय शोथ (क्रोनिक मेट्राइटिस) 

  • योनिमें से रूक-रूक कर बदबूदार तरल पदार्थ निकलता रहता है।
  • पशुबेचैन रहता है।
  • पशु बार-बारपेशाब करता है।

रोग का निदान

 लक्षणों के अनुसार/रोग के लक्षण देखकर रोग का निदान किया जा सकता है।

माइक्रोस्कोप द्वाराः गर्भाशय साव स्लाइड पर लेकर स्टेनिंग द्वारा जीवाणु देखे जा सकते हैं।

 चिकित्सा

  • एन्टीसेप्टिकलोशन से हाथ धोकर रोगी पशु के गर्भाशय एवं योनि की सफाई: 1:1 एक्रीफ्लेविनलोशन/1:10000 लाल दवा (पोटैशियम परमैगनेट) से करते है।
  • सल्कोप्रिमबोलस4 6 गोलियाँ सफाई के बाद गर्भाशय में रखनी चाहिए।
  • स्ट्रेप्टोपेनिसिलनया नियोमाइसीन का टीका अन्र्तपेशी विधि से लगाना लाभदायक होता है।
  1. जेरका डालना

यदि पशु ब्याने के 8 से 12 घण्टे बाद तक जेर नहीं गिराता है तो ऐसी स्थिति को जेर का न गिरना कहते है।

कारण

  • गर्भपात, जुड़वाबच्चे, बच्चेदानी की जड़ता/ निश्चलता, प्रसव में कठिनाई
  • हारमोनका असंतुलन, विटामिन ए और सेलेनियम की कमी, कैल्शियम की कमी, किटोसिस

लक्षणः जेर का लटकना, भूख न लगना, तेज बुखार, दूध में कमी

उपचार एवं रोकथाम

  • ब्यांतके तुरन्त बाद नवजात बच्चे को थन से लगाकर दूध पिलाना चाहिए। यह प्रक्रिया जेर को प्राकृतिक रूप से बाहर आने में मदद करती है।
  • कुछ आयुर्वेदिकदवाएँ जैसे इन्वोलॉन, यू-टोन, यूट्रा-सेफ, हिमरोप इत्यादि को 100-200 मिली. पिलाने से भी जेर को बाहर आने में मदद मिलती है। पशु को कैल्शियम भी पिलाना चाहिए।
  • हाथके द्वारा योनि मार्ग से जेर को ऐंठ कर धीरे-धीरे खींचकर निकालना चाहिए। यह विधि सामान्यतः ब्याने के 24-36 घण्टे बाद अपनानी चाहिये।
  • हाथसे जेर निकालने के बाद स्ट्रीकलीन 500 मिलीग्राम की चार, फ्यूरिया की दो (1 ग्राम), अथवा सी-फ्लोक्स टी जेड, अथवा पोवीडोन आयोडिन अथवा लिनोवो आई यू 3-5 दिन तक बच्चेदानी में डालनी चाहिए।
  • आवश्यकतानुसारस्ट्रोप्टोपेनिसिलीन, ऑक्सीटेट्रासाइकलीन प्रतिजैविक दवाएँ 3-5 दिन तक लगाना चाहिए।
  • ऑक्सीटोसिनब्यॉत के तुरन्त बाद और उसका दोबारा प्रयोग 2-4 घण्टे बाद करने से जेर रूकने की सम्भावना कम हो जाती है।
  • प्रोस्टाग्लैंडिनका इन्जेक्सन ब्यॉत के 24 घण्टे के अन्दर देने पर जेर के रूकने की सम्भावना कम हो जाती है।
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