दुग्ध पशुओं में थनैला रोग का नियंत्रण: नुकसान से बचाव 

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दुग्ध पशुओं में थनैला रोग का नियंत्रण: नुकसान से बचाव 

साफसफाई और सही प्रबंधन से बढ़ेगा दूध और मुनाफा “

 Vinita1*, Kumar Vinay2

  1. M.V.Sc, Department of Veterinary & Animal Husbandry Extension Education,LUVAS, Hisar, Haryana, India
  2. Haryana Veterinary Surgeon I, Department of Animal Husbandry and Dairying, Govt. of Haryana

परिचय   

भारत में डेयरी उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक मजबूत आधार है l हरित क्रांति के बाद दुग्ध उत्पादन में वृद्धि हुई, लेकिन इसके साथ कई रोग भी बड़े, जिसमें थनैला रोग सबसे महत्वपूर्ण है l

इस डेयरी क्षेत्र की “साइलेंट किलर डिजीज” कहा जाता है, क्योंकि कई बार यह बिना स्पष्ट लक्षणों के भी भारी आर्थिक नुकसान करता है l

परिभाषा:

थनैला रोग वह अवस्था है जिसमें पशु के थन में जीवाणुओं के संक्रमण के कारण सूजन हो जाती है, जिससे दूध की मात्रा और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती हैं l

(संदर्भ: इंटरनेशनल डेयरी फेडरेशन, 2011)

थनैला रोग के प्रकार

प्रकार विशेषताएं
प्रकट थनैला (क्लीनिकल) थन में सूजन, दर्द, दूध में गांठे या पानी जैसा दूध
अप्रकट थनैला (सब-क्लीनिकल) बाहरी लक्षण नहीं, पर उत्पादन में कमी

रोग के कारण

थनैला रोग मुख्यतः जीवाणु संक्रमण से होता है, जैसे:

  • स्टेफिलोकोक्कस
  • स्ट्रैप्टॉकोक्कस

अन्य कारण:

  • गंदा और गिला बिछावन
  • दुहाई के समय हाथों की अस्वच्छता
  • गलत दुहाई विधि
  • थन में चोट या घाव
  • संक्रमित पशु के संपर्क में आना
  • कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता

आर्थिक प्रभाव

  • 20 से 40 प्रतिशत तक दूध उत्पादन में कमी
  • दूध की गुणवत्ता में गिरावट (वसा और एसएनएफ में कमी)
  • उपचार पर अतिरिक्त खर्च
  • पशु की उत्पादक आयु में कमी
READ MORE :  Battling External Parasite Infestation in Farm Animals: Prevalence and Effective Management

भारत में अनुमानित नुकसान:

6000-8000 रुपय प्रति पशु प्रति वर्ष

(संदर्भ: राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड, 2020)

लक्षण

पशु में बदलाव:

  • थन में सूजन, लालिमा और गर्माहट
  • थन को छूने पर दर्द

दूध में बदलाव:

  • गाठें या दाने
  • पानी जैसा दूध
  • खून के धब्बे

अन्य संकेत:

  • बुखार
  • पशु का सुस्त होना
  • दूध उत्पादन में अचानक कमी

नियंत्रण एवं बचाव

“थनैला रोग में बचाव ही सबसे प्रभावी उपाय है”

  1. स्वच्छता प्रबंधन
  • गौशाला को साफ और सुख रखें
  • बिछावन नियमित बदले
  • गोबर और गंदगी का उचित निपटानकरें
  • उचित हवा का प्रभाव बनाए रखें
  1. दुहाई प्रबंधन
  • दुहाई से पहले और बाद में थनोको साफ पानी से धोएं
  • दुहाई से पहले हाथ धोना अनिवार्य
  • थानों को दवा युक्त गोल में डूबना (टीटडिप्पिंग) करें
  • संक्रमित पशु को अंत में दुहें
  1. पोषण प्रबंधन
  • संतुलित आहार दें
  • विटामिन ए और सेलेनियम का समावेश करें
  • स्वच्छ और पर्याप्त पानी उपलब्ध कराएं
  1. नियमित जांच
  • दूध की समय-समय पर जांच करें
  • कैलिफोर्निया थनैला प्रशिक्षण (सीएमटी) कराएां
  • पशु चिकित्सक से संपर्क बनाए रखें
  1. सुखा काल प्रबंधन
  • सुखाकाल उपचार अपनाएं
  • इस समय संक्रमणसे विशेष बचाव करें

उपचार

उपचार हमेशा पशु चिकित्सक की सलाह से करें

  • उचित औषधीयोका उपयोग
  • थन की हल्की मालिश
  • संक्रमित दूध को अलग रखें
  • पशु को स्वच्छ और आरामदायक वातावरण दें

थनैला नियंत्रण क्रम

सफाई → सही दुहाई → संतुलित पोषण → नियमित जांच → समय पर उपचार → अधिक उत्पादन → अधिक मुनाफा

सफलता की कहानी

पंजाब के एक डेयरी किसान ने केवल थनों को दवा युक्त गोल में डूबने और नियमित जांच की आदत अपनाई l

  • 6 महीने में थनैला रोग 35 प्रतिशत कम हुआ
  • दूध उत्पादन में 20 प्रतिशत वृद्धि हुई
READ MORE :  MANAGEMENT OF TEAT AND UDDER AFFECTIONS IN DAIRY ANIMALS

(संदर्भ: जनरल ऑफ डेरी साइंस, 2018)

निष्कर्ष

थनैला रोग डेयरी व्यवसाय के लिए एक गंभीर समस्या है, लेकिन सही प्रबंधन और स्वच्छता से इसे काफी हद तक रोका जा सकता है l

“रोकथाम पर ध्यान दें, मुनाफा अपने आप बढ़ेगा”

संदर्भ

  1. इंटरनेशनल डेयरी फेडरेशन (2011)
  2. राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (2020)
  3. जनरल ऑफ डेयरी साइंस (2018)
  4. खाद एवं कृषि संगठन रिपोर्ट (2019)
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