पीपीआर रोग: पहचान, रोकथाम और टीकाकरण

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पीपीआर रोग: पहचान, रोकथाम और टीकाकरण

PPR Disease: Identification, Prevention, and Vaccination

मैनका कुमारी

सहायक आचार्य, पशु चिकित्सा विभाग

महात्मा गांधी पशु चिकित्सा महाविद्यालय भरतपुर

Email- mainkakumari1111@gmail.com

पीपीआर (पेस्ट डेस पेटिट्स) रूमिनेंट्स भेड़ और बकरियों का एक तीव्र, अत्यधिक संक्रामक, विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (ओआईई) द्वारा अधिसूचित और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण ट्रांसबाउंड्री वायरल रोग है जो उच्च रुग्णता और मृत्यु दर से जुड़ा है  पीपीआर एक वायरल बीमारी है, जो पैरामाइक्सोवायरस के परिवार से जुडी है जिससे बकरियों में अत्यधिक मृत्यु होती है, इसलिए पीपीआर रोग को ‘बकरियों में महामारी‘ या ‘बकरी प्लेग‘ के नाम से भी जाना जाता है। एक अध्ययन के अनुसार पीपीआर रोग से भारत में बकरी पालन के क्षेत्र में सालाना साढ़े पाँच हजार करोड़ रुपये का नुकसान होता है। इसमें मृत्यु दर प्रायः 50 से 80 % तक होती है जोकि अत्यधिक गंभीर स्थिति में बढ़कर 100 % हो सकती है। इस बीमारी से बकरियों और भेड़ में बुखार, मुंह में घाव, दस्त, निमोनिया और बकरियों की मौत तक हो जाती है। यह रोग विशेषकर कम उम्र के मेमनों और कुपोषण व परजीवियों से ग्रसित बकरियों में अति गंभीर एवं प्राणघातक सिद्ध होता है। रोग से निर्मुक्त होकर बकरियाँ जीवन पर्यन्त प्रतिरक्षित हो जाती हैं।

पीपीआर रोग का कारक

‘मोरबिल्ली’ नामक विषाणु का संबंध पैरामिक्सोविरिडी परिवार से है। पीपीआर विषाणु 60 डिग्री सेल्सियस पर एक घंटे रखने पर भी जीवित रहता है परंतु ईथर, अल्कोहॉल एवं साधारण डिटर्जेंट्स के प्रयोग से इस विषाणु को आसानी से नष्ट किया जा सकता है।

पीपीआर बीमारी फैलने के कारण

  • मूलतः यह बकरियों और भेड़ों का रोग है।
  • बकरियों में रोग अधिक गंभीर होता है।
  • 4 महीने से 1 साल के बीच के मेमने, कुपोषण और परजीवियोंसे पीड़ित भेड़ और बकरियों को पीपीआर रोग होने का खतरा होता है.
  • नजदीकी स्पर्श या संपर्क और निवास से बकरियों में पीपीआर की महामारी फैलती है।
  • सभी उम्र और दोनों लिंग (मादाऔर नर) अतिसंवेदनशील होते हैं।
  • बीमार बकरी की आँख, नाक, व मुँह के स्राव तथा मल में पीपीआर वायरसपाया जाता है।
  • बीमारबकरी के खांसने और छींकने से यह हवा के माध्यम से तेजी से फैलता है।
  • तनाव, जैसे परिवहन, गर्भावस्था, , परजीवीवाद, अन्य बीमारी इत्यादि, के कारण भी बकरियाँ इसरोग के लिए संवेदनशील हो जाती हैं।
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रोग के लक्षण

  • पीपीआर संक्रमण होने के दो से सात दिन में इसके लक्षण दिखाई देने लगते हैं।
  • रोग के घातक रूप में प्रारम्भ में उच्च ज्वर (40 से 42 डिग्री सेल्सियस) बहुत ही आम है।
  • पीपीआर रोग सेबीमार बकरियों में नीरसता, छींक तथा आँख व नासिका से तरल स्राव देखा जाता है।
  • दो से तीन दिन के पश्चात मुख और मुखीय श्लेष्मा झिल्ली में छाले और प्लाक उत्पन्न होने लगते हैं।
  • पीड़ाकर मुँह व सूजे हुए ओंठों के कारण चारा ग्रहण करना असंभव हो जाता है।
  • इससे इनके मुंह से अत्यधिक दुर्गंध आनी शुरू हो जाती है।
  • आंखें और नाक चिपचिपे या पुटीय स्राव से ढक जाते हैं, आंखें खोलने और सांस लेने में कठिनाई होती है।
  • पीपीआर रोग मुख्य रूप से कुपोषण और परजीवियों से पीड़ित मेमनों, भेड़ों और बकरियों में बहुत गंभीर साबित होता है।
  • कुछ जानवरों को दस्त और कभी-कभी खूनी दस्त होते हैं।
  • द्वितीयक जीवाणुयीय निमोनिया के कारण बकरियों में साँस फूलना व खाँसना आम बात है।
  • ज्यादातर मामलों मेंसंक्रमण के एक सप्ताह के भीतर ही बीमार बकरी की मृत्यु हो जाती है।
  • पीपीआर रोगके कारण गर्भवती भेड़ और बकरियों में गर्भपात हो सकता है।

निदान

  • एलिसापरिक्षण द्वारा विषाणु का पता लगाकर
  • विषाणु के पृथ्‍कीकरण एवं पहचान करके

पीपीआर का उपचार एवं रोकथाम

  • सबसे पहले स्वस्थ बकरियों को बकरियों से अलग रखना चाहिए ताकि रोग को नियंत्रित और फैलने से बचाया जा सके इसके बाद ही रोगी बकरियों का उपचार प्रारम्भ किया जाना चाहिए।
  • वायरस जनित रोग होने के कारण पीपीआर का कोई विशिष्ट उपचार नहीं है. हालांकि बैक्टीरिया और परजीवियों को नियंत्रित करने वाली दवाओं का प्रयोग उपयोग करके मृत्यु दर को कम किया जा सकता है।
  • पीपीआर को रोकने के लिए भेड़ और बकरियों का टीकाकरण ही एकमात्र प्रभावी तरीका है।
  • टीकाकरण से पहले भेड़ और बकरियों को कृमिनाशक दवा देनी चाहिए।
  • फेफड़ों के द्वितीयक जीवाणु संक्रमण को रोकने के लिए पशु चिकित्सक द्वारा निर्धारित ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक का प्रयोग किया जाता है।
  • आँख, नाक और मुख के आस पास के जख्मों की रोगाणुहीन रुई के फाहे से दिन में दो बार साफ करना चाहिए।
  • वर्तमान में माना जाता है कि द्रव चिकित्सा और प्रतिजैविक दवाओं जैसे एनरोफ्लोक्सासिन एवं सेफ्टीऑफर के साथ पांच प्रतिशत बोरोग्लिसरीन से मुख के छालोंको धोने से बकरियों को बहुत फायदा होता है।
  • मुलायम, नम, पोषक, स्वच्छ और स्वादिष्ट चारा बीमार बकरियों को खिलाना चाहिए। पीपीआर महामारी फैलने पर तुरंत ही नजदीकी सरकारी पशु-चिकित्सालय में सूचना देनी चाहिए।
  • मृत बकरियों को सम्पूर्ण रूप से जला कर नष्ट करना चाहिए।साथ ही बाड़ों और बर्तन को शुद्ध रखना बहुत जरूरी है।
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टीकाकरण

  • बकरियों का टीकाकरण ही पीपीआर से बचाव का एकमात्र कारगर उपाय है।
  • रिकॉम्बिनेंट एंटी-आरपी वैक्सीन का प्रयोग करना चाहिए।
  • Live एटेन्युएटेड पीपीआर वैक्सीन उपलब्ध है।
  • नाम: पीपीआर टीका, रक्षा पीपीआर- उपलब्धता: 100 और 50 खुराक के साथ-         सूखे वैक्सीन शीशियों को पतला और फ्रीज करें-
  • पीपीआर का टीका 3 महीने की उम्र में एक मि.ली. मात्रा में त्वचा के नीचे दिया जाता है। इससे बकरियों में तीन साल के लिए प्रतिरक्षा आ जाती है।
  • सभी नरों और तीन साल तक पाली हुयी बकरियों का दोबारा से टीकाकरण करना चाहिए।
  • पशुपालक को टीकाकरण के तीन हफ्तों तक बकरियों को तनाव मुक्त रखना जरुरी है।
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