‘पशु संरक्षण’ में “गैर-सरकारी संगठनों और युवाओं की भूमिका”: एक जमीनी दृष्टिकोण
Role of NGOs and Youth in ‘Animal Protection’: A Grassroots Perspective
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में पशु हमारी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के साथ ही हमारे पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाने में अहम् भूमिका निभाते हैं। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में उनका संरक्षण समाज में एक अहम् विषय बन गया है। हालांकि शासन स्तर पर तमाम योजनाएं चलाई जा रही हैं, पर धरातल पर उसे मूर्तरूप देने में अपेक्षित परिणाम सामने नहीं दिख रहा है। इसके कारणों के पीछे यदि देखा जाय तो जन-जागरूकता और नैतिक मूल्यों के अभाव को सर्वोपरि रखा जा सकता है। ऐसे में गैर-सरकारी संगठनों और युवा वर्ग की भूमिका मायने रखती है।
आज केन्द्र सरकार से लेकर प्रदेश सरकारों तक खासकर उत्तर प्रदेश सरकार इस दिशा में कार्य करने के लिए तमाम महत्वाकांक्षी योजनाएं लाकर आम जनमानस को प्रोत्साहित कर रही है। लेकिन धरातल पर जन जागरूकता और नैतिक मूल्यों के अभाव में अपेक्षित परिणाम सामने नहीं दिख रहा है। हालांकि पहले से समाज में बहुत से परिवर्तन देखने को मिल रहा है। जहां पेटा, ब्ल्यू क्रास आफ इंडिया व पीपुल फॉर एनीमल जैसे संगठन राष्ट्रीय स्तर पर वहीं जिले और तहसील स्तर पर भी कुछ संगठनों का अस्तित्व उभर कर सामने आया है।वे घायल पशुओं के उपचार से लेकर उन्हें संरक्षित करने की दिशा में जमीनी स्तर पर भी निरंतर कार्य करना शुरू कर दिए हैं। लेकिन अभी उस दिशा में अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ पा रहे हैं।
सरकारी तंत्र सीमित होने के कारण शासन स्तर पर बनाई गई योजनाओं को मूर्तरूप देने में आने वाली बाधाओं को दूर करने में गैर सरकारी संगठन और युवा पीढ़ी अपनी अहम् भूमिका निभा सकते है।गैर सरकारी संगठन आज जहां घायल पशुओं के रेस्क्यू और उपचार,पशु जन्म नियंत्रण अभियान, संरक्षण केन्द्रों को गोंद लेकर इस दिशा में अपना योगदान दे रहे हैं, वहीं स्कूलों और सामुदायिक जगहों पर जन जागरूकता कार्यक्रम आयोजित कर लोगों को इस दिशा में जागरूक और प्रोत्साहित कर इस दिशा में जोड़ा जा सकता है।
जहां तक बात युवाओं की है तो उनको ऊर्जा का केंद्र माना जाता है।कहा जाता है कि युवा समाज और देश के कर्णधार होते हैं। हालांकि वर्तमान में युवा पीढ़ी की भूमिका इस क्षेत्र में अत्यंत कारगर साबित हो रही है। आज का युवा इण्टरनेट सेवा के माध्यम से स्वयंसेवी अभियानों, रेस्क्यू ऑपरेशनों और पब्लिक अवेयरनेस कार्यक्रमों,कॉलेजों में बने ‘एनिमल वेलफेयर क्लब्स’में अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर इस दिशा में और अधिक कारगर साबित हो सकते है। ऐसे में सरकारों, संगठनों को युवाओं का साथ मिल जाए तो पशु संरक्षण ही क्या हमारा देश हर क्षेत्र में विश्व के अन्य देशों के लिए एक मिसाल बन जाय।
संसाधनों की कमी और सामाजिक उदासीनता जैसी चुनौतियाँ भी समर्पण और सहयोग के आगे नतमस्तक हो जाती हैं ।यह कहा जा सकता है कि पशु संरक्षण केवल संवेदना ही नहीं, वरन् हमारी नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है। सभी के सहयोग से हम एक ऐसे सशक्त समाज का निर्माण कर सकते हैं, जहां मानव के साथ साथ पशु भी सम्मान और सुरक्षा के घेरे में जीवन यापन कर सकते हैं।
— डॉ. आलोक सिंह पालीवाल
पशुचिकित्साधिकारी , बूढापुर,
आजमगढ़
9450087822,9369746600



